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समझदारी और भागीदारी से भागी फ्लोरोसिस की बीमारी

कालापानी, बड़ी छतरी और दहेरिया गाँवों में जल उपयोगकर्ता समितियों का गठन किया गया जिनका काम पीने का साफ पानी एकत्रित करना और हर हालत में उसकी देखभाल और साफ-सफाई सुनिश्चित करना है। कालापानी गाँव की जल उपयोगकर्ता समिति की अध्यक्ष सक्कू बाई ने बताया कि किस तरह उनकी टीम पानी को साफ रखने और उसके उचित उपचार का काम करती है। कालापानी गाँव के किसान उदय सिंह ने तो फ्लोराइड के कम स्तर वाला अपना कुआँ ही गाँव के लोगों को इस्तेमाल के लिये दान में दे दिया है। धार जिले के कुछ गाँवों में स्वयंसेवी शोध संगठन पीएसआई के साथ मिलकर स्थानीय लोगों ने पानी में अतिरिक्त फ्लोराइड की समस्या को दूर कर लिया है।

जो भी लोग मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिला धार के कालापानी, बड़ी छतरी और दहेरिया गाँवों के बारे में जानते हैं, उनके मन में इनका जिक्र आते ही निराशा और आशा के मिले-जुले भावों का संचार होता है। इन तीन गाँवों की कहानी एक विकट समस्या से जूझने और देश को उससे उबरने की राह दिखाने की कहानी है।

निराश करने वाली बात यह है कि ये गाँव देश के उन क्षेत्रों में आते हैं जहाँ के पानी में फ्लोराइड की मात्रा बहुत ज्यादा है और जिसके चलते बच्चों से लेकर वयस्क तक फ्लोरोसिस जैसी बीमारी के शिकार हो रहे हैं।

जबकि आशा का संचार करने वाली बात यह है कि इन गाँवों में चल रही सहभागिता योजना के चलते न केवल फ्लोरोसिस को लेकर जागरुकता बढ़ी है बल्कि जनभागीदारी के कारण इस बीमारी का फैलाव रोकने में भी मदद मिल रही है।

इस काम में इनका मददगार बनकर सामने आया है देहरादून का लोक विज्ञान संस्थान (पीएसआई)। पीएसआई की टीम ने वर्ष 2003 में धार-झाबुआ के इन गाँवों में जाकर वहाँ के पानी की जाँच की, फ्लोराइड की बढ़ी हुई मात्रा के कारण होने वाली बीमारियों तथा समस्याओं से लोगों को अवगत कराया और उनमें यह भरोसा पैदा किया कि वे इस समस्या से अपने दम पर निपट सकते हैं।

यह सच है कि अब प्रदेश सरकार का लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग भी लोगों की मदद कर रहा है लेकिन स्थानीय लोगों ने काफी पहले आपसी भागीदारी से अपने संकट कम कर लिये थे।

पीएसआई ने पिछले दिनों मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में 'सहभागी भूजल प्रबन्धन के जरिये फ्लूरोसिस शमन’ विषय पर एक दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया।

इस कार्यशाला में पीएसआई के अलावा लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (पीएचईडी), भोपाल, फ्रैंक वाटर यूके, वसुधा, विकास संस्थान वाटर ऐड, आईएनआरईएम फाउंडेशन और अर्घ्यम आदि ने सहयोग किया और हिस्सेदारी की।

कार्यशाला का उद्देश्य यही था कि कैसे फ्लोरोसिस को लेकर काम कर रहे सभी पक्ष एक साथ आएँ और इस समस्या को खत्म करने की सहभागितापूर्ण राह तलाशें।

मुख्यतया पेयजल में फ्लोराइड की अधिक मात्रा के कारण उत्पन्न होने वाली इस बीमारी की भयावहता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है देश के 20 राज्य और अकेले मध्य प्रदेश के 27 जिले इसकी चपेट में हैं। पानी में फ्लोराइड की बढ़ी हुई मात्रा कई तरह की बीमारियों को जन्म दे सकती है।

इससे निपटने के क्रम में शासकीय-स्वयंसेवी प्रयास और आम लोगों में जागरुकता दोनों समान रूप से आवश्यक हैं। कार्यशाला के दौरान इस समस्या के विविध पहलुओं पर चर्चा के साथ-साथ इसके प्रभाव को कम करने के लिये सर्वमान्य हल पर पहुँचने का प्रयास किया गया।

कार्यशाला के आरम्भिक सत्र में ही पीएचईडी (इन्दौर क्षेत्र) के मुख्य अभियन्ता के के सोनगरिया ने उत्साहवर्धक खबर देते हुए बताया कि इन्दौर क्षेत्र के 12 फ्लोरोसिस प्रभावित जिलों में से 8 को इससे मुक्त करा लिया गया है।

वहीं इन्दौर क्षेत्र में काफी वक्त बिता चुके और अब पीएचईडी भोपाल में मुख्यअभियन्ता के रूप में पदस्थ सी एस संकुले ने बताया कि झाबुआ प्रदेश में फ्लोरोसिस प्रभावित क्षेत्र के रूप में 1986 में चिन्हित होने वाला पहला जिला बना। उन्होंने फ्लोरोसिस की भयावहता पर प्रकाश डालने के अलावा इससे निपटने को लेकर सरकार और स्वयंसेवी संगठनों के प्रयासों को लेकर भी सन्तोष जताया।

पहले सत्र में ही पीएसआई के संस्थापक निदेशक रवि चोपड़ा ने भी अपनी बात रखी। उन्होंने सहभागी भूजल प्रबन्धन की महत्ता का उल्लेख किया और देश में आदिवासियों को लेकर हो रहे दूसरे दर्जे के व्यवहार पर चिन्ता जताई। उन्होंने जोर देकर कहा कि सबको स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि इस समस्या का स्थानीय स्तर पर बिना पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ किये हल निकालना सम्भव है।

पीएसआई के कार्यकारी अनिल गौतम के मुताबिक सन् 2003 में जब काम शुरू किया गया तब 54 फीसदी आदिवासी आबादी वाले धार जिले में 13 से 18 वर्ष की उम्र के युवाओं में फ्लोरोसिस की समस्या बहुतायत में थी।

उदय सिंह और उनकी पत्नी जल आपूर्ति व्यवस्था का उद्घाटन करते हुए पीएसआई, देहरादून की टीम ने पानी की उपयोगिता और फ्लोराइड के प्रति उनमें जागरुकता पैदा करने के लिये प्रभावित गाँवों में कालापानी, बड़ी छतरी और दहेरिया नामक तीन गाँवों में पायलट परियोजनाओं की शुरुआत की।

इन गाँवों में जल उपयोगकर्ता समितियों का गठन किया गया जिनका काम पीने का साफ पानी एकत्रित करना और हर हालत में उसकी देखभाल और साफ-सफाई सुनिश्चित करना है। कालापानी गाँव की जल उपयोगकर्ता समिति की अध्यक्ष सक्कू बाई ने बताया कि किस तरह उनकी टीम पानी को साफ रखने और उसके उचित उपचार का काम करती है।

कालापानी गाँव के किसान उदय सिंह ने तो फ्लोराइड के कम स्तर वाला अपना कुआँ ही गाँव के लोगों को इस्तेमाल के लिये दान में दे दिया है।

क्या है फ्लोरोसिस


फ्लोरोसिस की बीमारी मुख्य रूप से पीने के पानी के जरिए शरीर में फ्लोराइड की अधिक मात्रा पहुँचने से होती है। यह शरीर में मौजूद कैल्शियम से क्रिया करता है और कैल्शियम फ्लोरोटाइट बनाता है। इसकी वजह से हड्डियों में विकार उत्पन्न होने लगता है। यह बीमारी दाँतों में तथा गम्भीर होने पर शरीर की अन्य हड्डियों में घर कर जाती है।

इसकी वजह से तंत्रिका तंत्र पर दबाव पड़ता है और आगे चलकर लकवा भी हो सकता है। दंत फ्लोरोसिस की बीमारी दाँतों के विकास को प्रभावित करती है लेकिन केवल बचपन में। एक बार दाँत निकल आने के बाद दाँतों में यह बीमारी नहीं होती। वहीं यह भी सच है कि फ्लारोसिस की बीमारी एक बार हो गई तो कभी ठीक नहीं होती है।

हैण्डपम्प में इससे निपटने की किट लगाकर काफी राहत पाई जा सकती है लेकिन उसकी देखभाल और मरम्मत की समस्या के चलते वह प्रभावी हल नहीं बन पाता। ऐसे में सामुदायिक भागीदारी ही इससे निपटने का प्रभावी तरीका है। खानपान की आदतों में बदलाव लाकर भी फ्लोराइड के दुष्प्रभाव को कम किया जा सकता है।

फ्लोरोसिस पीड़ितों के खाद्य पदार्थ


दूध, दही, पनीर आदि कैल्शियम युक्त पदार्थ। हरी सब्जियाँ, गुड़, चौलाई का साग, सहजन।

आँवाला, अमरुद, नींबू, संतरा, टमाटर आदि विटामिन सी युक्त पदार्थ।

अदरक, गाजर, प्याज, सब्जियाँ, पपीता, कद्दू आदि एंटीऑक्सिडेंट युक्त पदार्थ किन चीजों से बचें?

तम्बाकू, काला नमक, सेंधा नमक, पान मसाला, फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट आदि

पानी से कैसे निकालें फ्लोराइड


1. एक्टिवेटेड एल्युमिना विधि: पेट्रोकेमिकल सहउत्पाद एल्युमिना में फ्लोराइड सोखने की क्षमता है। 10 लीटर की बाल्टी में 3 किलो एक्टिवेटेड एल्युमिना डालकर उसे पानी से भर देते हैं बाल्टी के नीचे लगे वॉल्व से फ्लोराइड रहित पानी निकलता रहता है।

नालगोंडा विधि : पानी में एक निश्चित मात्रा में चूना, फिटकिरी या ब्लीचिंग पाउडर मिलाया जाता है और उसे तेजी से घुमाया जाता है। इससे फ्लोराइड सतह पर अवक्षेप बनकर तैरने लगता है जबकि शेष पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है।

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