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डूबे हुए शहर में तैरते हुए लोग

Author: 
प्रताप शिखर
Source: 
‘एक थी टिहरी’ पुस्तक से साभार, युगवाणी प्रेस, देहरादून 2010

टिहरी बांध टिहरी नगर झील में समा चुका है। यदि झील का जल पारदर्शी हो जाए तो झील के ऊपर उड़ान भरने से टिहरी को अब भी देखा जा सकता है किन्तु ऐसा होना सम्भव नहीं है। टिहरी तो टिहरी वासियों के मन की झील में भी समाया हुआ है। मैं देखता हूँ कि एक टिहरी मेरे अन्दर भी समाया हुआ है। मुझे जब भी टिहरी से मिलना होता है मैं अपने मन का टिहरी स्विच ऑन कर देता हूँ। मैं देखता हूँ कि पुल और हवाघर के मध्य भागीरथी के स्वच्छ जल में शिव-पार्वती के रूप में दो प्रस्तर शिलाएँ गोमुख की ओर बढ़ रही है। कहते हैं, गंगा सागर से चली इन मूर्तियों की यात्रा गोमुख में पूरी होगी और उसी दिन प्रलय हो जायेगी। मुझे लगता है कि वे मूर्तियाँ गोमुख पहुँच चुकी हैं, तभी तो टिहरी जलप्लावित हो गयी है।

चना खेत में दो मैदान थे। नीचे वाला मैदान प्रताप इण्टर कॉलेज का मैदान कहा जाता था। उस पर राजा ने दो तोपें फिट कर रखी थी, ऊपर वाला मैदान बीटीसी का मैदान कहा जाता था। बड़े नेताओं की बड़ी सभाएँ इन्हीं मैदानों में होती थी। राजमाता के कॉलेज में भी एक मैदान था। यह मैदान पोलो ग्राउण्ड के नाम से जाना जाता था। नीचे बाजार के पास वाला मैदान रामलीला मैदान और सुमन पार्क कहा जाता था। यहाँ भी सभाएँ हुआ करती थीं, इसके अलावा एक सेमल तम्पड़ भी था। इतने मैदानों के होते हुए भी सर्वोदयी और साम्यवादी अपनी छोटी-छोटी सभाएँ पुराना पोस्ट ऑफिस के सामने मुख्य बाजार में करते थे। जब पोस्ट ऑफिस नये भवन पर बस-अड्डा के निकट गया तो ये सभाएँ उधर ही होने लगीं। इन सभाओं के लिये कोई प्रचार या पूर्व आयोजन नहीं किया जाता, सायंकाल को टिहरी के लोग बाजार में घूमने निकलते थे। बस उसी समय कामरेड भाई हाथों में लाल झण्डे लेकर हुंकार भरते थे- ‘बोल जमाना हल्ला बोल।’ मद्य निषेध आन्दोलन, चिपको आन्दोलन फिर टिहरी बाँध विरोधी आन्दोलन की अलख इन्हीं स्थानों पर जलाई गयी थी।

चना खेत का मैदान राजा के शासनकाल में दूसरे कार्यों में भी प्रयुक्त किया जाता था। भैंसों की लड़ाई, खाडुओं, मुर्गों और बटेरों की लड़ाई भी इन्हीं मैदानों में कराई जाती थी। फाइनल मुकाबले में पहुँचे राजा और रैका पट्टी निवासी एक दलित के ‘धरती धकेल’ नाम के भैंसे में लड़ाई कराई गई, दलित का भैंसा जीत गया तो आनन-फानन में राजा ने मुँहमांगी कीमत दे कर भैंसों का संटवारा (अदला-बदली) कर दिया, फिर घोषणा की गई कि राजा का भैंसा ‘धरती धकेल’ ही जीता। तब तक लोग परिणाम से पहले ही वाकिफ हो चुके थे। इन्हीं मैदानों में राजा की कछड़ी (कोर्ट) लगती थी, फरियादी गाँव से पैदल चलकर रहने खाने का सामान साथ लेकर चना खेत पहुँचते थे।

मैदान में पहले से ही उनका डेरा पड़ जाता था। मैदान के किनारों पर उनके चूल्हे जल जाते थे, कभी-कभी तो एक ही गाँव के वादी-प्रतिवादी एक साथ आते थे और रहना-खाना भी साथ-साथ ही करते थे। रियासत टिहरी (जनपद-टिहरी, उत्तरकाशी) की सर्वोच्च परीक्षा भी इसी मैदान में होती थी। महाराजा साहब सर्वोच्च परीक्षक होते थे। परीक्षा में फेल होने पर एक युवक पुल से नदी में कूद गया था। बताते हैं कि उसके पिता ने कहा था- फेल होगा तो घर मत आना। प्रथम स्थान पाने वाले को ढाका की मलमल का दुपट्टा गोल्ड मैडल के रूप में दिया जाता था। अपर और मिडिल पास करने वाले युवकों को राजा तुरन्त नौकरी भी दे देते थे। पुराने मोटर-अड्डा के पास ‘गुदाडू की डोखरी’ (गुदोडू का खेत) थी, इस डोखरी में अपराधियों को खुली फांसी दी जाती थी। फांसी के दिन दूर-दूर से लोग फांसी का दृश्य देखने आते थे। अन्तिम फांसी 1947-48 के आस-पास गाजणा गाँव के गोविन्दु को दी गयी थी। उसने अपने भाई और भाई के परिवार के सात सदस्यों को खुंखरी से मार दिया था।

कैप्टन शूरवीर सिंह पंवार जी कहते थे कि- मैं 25-26 साल का नौजवान वकालत करके ही आया था कि राजा ने मुझे फांसी दिलाने का काम सौंप दिया था। वह गोविन्दु की दिलेरी के कायल थे। उसने दिलेरी के साथ फांसी के तख्ते की सीढ़ियाँ चढ़ी थी और जनता-जनार्दन को चारों ओर घूमकर अभिवादन किया था और कहा था-

‘जनु मैंन करे तनु क्वी न करियान लौ’ (जैसा मैंने किया वैसा कोई मत करना) कैप्टन पंवार ने अपना पुराना दरबार घुमाते हुए कहा था- इस पर सीमेन्ट की जगह उड़द की दाल, बेल का गूदा आदि का पलस्तर किया गया है। उनके पास एक दुर्लभ-पुस्तकालय उनके पिता के समय से ही था। उनके पिता कुंवर विचित्र शाह द्वारा एकत्र की कई दुर्लभ पाण्डु लिपियाँ उनके संग्रहालय में विद्यमान थी। एक बार वे देहरादून में अपने भाई कर्नल युद्धवीर सिंह के घर पर स्वास्थ्य लाभ कर रहे थे। मैं उनका हाल-चाल पूछने गया तो उन्होंने जेब से एक पोस्टकार्ड निकल कर कहा- इन लोगों को मेरे स्वास्थ्य की चिन्ता कम और मेरे पुस्तकालय को हड़पने की जल्दबाजी अधिक है। पोस्टकार्ड उनके गुरुभाई डॉ. महावीर प्रसाद गैरोला का था। उनके बाद पुस्तकालय की हिफाजत और रख-रखाव पर चिन्ता व्यक्त की गई थी और सुझाव था कि इसे गढ़वाल विश्वविद्यालय को दान किया जाए, लेकिन कैप्टन साहब गढ़वाल वि.वि. से संतुष्ट नहीं थे।

एक तो विश्वविद्यालय की ओर से इस प्रकार की कोई पहल नहीं की गई थी दूसरे उन्हें विश्वविद्यालय ने कभी किसी सभा, सेमिनार में आमन्त्रित करने का कष्ट तक नहीं उठाया। विश्वविद्यालय की ओर से उपाधि देकर अलंकृत करना तो दूर की बात थी उन्होंने दुःखी होकर कहा था, कुछ लोगों ने मुझे जिन्ना कह कर बदनाम किया जबकि सरकार ने मुझे रामपुर और अलीगढ़ में एस.डी.एम. बनाया था। मेरे रहते हुए वहाँ कभी भी साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुए थे। सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली पेंशन उनके लिये नाकाफी थी, पुस्तकें छापने का उन्हें शौक था। राजमाता कमलेन्दुमति शाह कभी-कभी उनके इस शौक को पूरा कर लेती थी।

एक बार गढ़वाल के कमिशनर श्री सुरेन्द्र सिंह पांगती से उन्होंने कहा कि- मेरे पुराने दरबार का मुआवजा तब मिलेगा जब मैं मर जाऊँगा, तो वह मुआवजा मेरे किस काम का होगा? पांगती जी ने सांत्वना के रूप में कुछ धनराशि उन्हें दिला दी थी। उस धनराशि से उन्होंने अचकन-शेरवानी और अपनी पसन्द के अलग कपड़े सिलवाये। चूड़ीदार पायजामा, सलवार अचकन पहने टिहरी में वे अलग ही पहचाने जाते थे। उनके गुरुभाई डॉ. महावीर प्रसाद गैरोला और उनके बीच नोक-झोंक बनी रहती थी पर वे एक-दूसरे के बिना रह भी नहीं सकते थे। डॉ. गैरोला ने साठ साल की उम्र में दर्शनशास्त्र से डी.फिल. और अस्सी साल की उम्र में डी.लिट की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने टिहरी से ‘नैतिकी’ पत्रिका का सम्पादन किया, कार्ल मार्क्स के वैज्ञानिक/भौतिक साम्यवाद से अलग हटकर उन्होंने आध्यात्मिक साम्यवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। वि.वि. के शिक्षा विभाग के डीन प्रो. राकेश चन्द्र नौटियाल के अलावा किसी ने भी उनके सिद्धान्त को छुआ तक नहीं। उनका सिद्धान्त कभी टिहरी की परिधि से बाहर नहीं जा सका और अब तो वह टिहरी की झील में दफन हो चुका है।

स्वामी रामतीर्थ परिसर टिहरी के प्राचार्य और समाजशास्त्री डॉ. पान सिंह रावत ने गैरोला जी के आध्यात्मिक साम्यवाद के सिद्धान्त पर टिप्पणी की थी- ‘दुनिया जान जाएगी कि हिमालय में दो सन्त पैदा हो गये हैं।’

कार्ल मार्क्स के पास बेचने के लिये अपना कोट था पर डॉ. गैरोला के पास अपना कोट भी नहीं। अपनी कमाई और बाँध के मुआवजे से प्राप्त धनराशि से उन्होंने किताबें छपवयी। कलकत्ता के किसी प्रकाशक से अंग्रेजी में ‘लरनेड फूल’ ग्रन्थ छपवाया जिसकी एक भी प्रति नहीं बिकी। प्रारम्भ में जब टिहरी के लोग बाँध का समर्थन कर रहे थे, तब गैरोला जी विरोध कर रहे थे और जब लोग विरोध करने लगे तो डॉ. साहब समर्थन करने लगे। एक तरफ टिहरी नगर की सलामती के लिये वे भैरव मन्दिर में नौ मन का रोट काटते हैं, तो दूसरी तरफ टिहरी के डूबने की कामना भी करते हैं। लोग स्वामी रामतीर्थ का स्मारक सिमलासू में बनाते हैं तो गैरोला जी कोटी गाँव में सेमल के पेड़ के नीचे उनकी मूर्ति स्थापित करते हैं। उनका मानना था कि स्वामी जी को उस सेमल के पेड़ के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। गैरोला जी स्वयं एक मूर्तिकार भी थे। कवि, लेखक, शिक्षक, मूर्तिकार, वकील होते हुए भी गैरोला जी नई टिहरी के पास एक गाँव में गुमनामी का जीवन जी रहे थे। किताबों के अलावा उनके पास कुछ भी सम्पत्ति नहीं थी। लोग उन्हें सनकी समझते हैं पर कुछ जानकार लोगों का कहना है कि उनकी पुस्तक ‘बुद्धिमान मूर्ख’ उनकी विद्वता की मिसाल है।

भारत में सर्वप्रथम बिजली कलकत्ता में आयी थी लेकिन इंग्लैण्ड से इंजीनियरिंग करके आए हुए महाराजा कीर्तिशाह ने भैंतोगी गधेरे से बिजली लाइन बिछाकर नया दरबार (राजमहल) में उससे भी पहले बिजली पहुँचा दी थी। टिहरी बाँध का विरोध करने वालों ने बाकायदा एक संघर्ष समिति बनाई। सरदार प्रेम सिंह इस समिति के सचिव बने। वे नैनबाग-जौनपुर से टिहरी आये तो टिहरी के ही होकर रह गए। गाँव से सन्देश आया कि तुम्हारी माँ बीमार है। देखने चले आओ। उन्होंने जवाब दिया- ‘मैं कोई डॉक्टर नहीं हूँ’ कुछ समय बाद पिता भी स्वर्ग सिधार गए। उन्हें वापस जौनपुर नहीं जाना था तो नहीं गए। बाद में कई बार मसूरी तक गए पर यहाँ से उनके पैर आगे नहीं बढ़ पाए।

जिला कांग्रेस कमेटी के दफ्तर (घण्टाघर) में उनका डेरा पड़ा था जो उनकी मौत के बाद ही वहाँ से उठा। बिना सलाखों वाली खिड़की के सामने बैठकर वे महिला चिकित्सालय का नजारा और सड़क पर चलने वाले छात्र-छात्राओं को निहारा करते थे। उनके निकट घिल्डियाल भवन था। कहते हैं यहाँ के निवासी एक वकील साहब होली का नवाब बनते थे। गधे पर उल्टा सवार होकर वे हाथ में जूता लेकर सामने आने वाले को मारते थे। जूलूस ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता लोगों की संख्या भी बढ़ती जाती थी। होली की ऐसी मस्ती और आनन्द नई टिहरी में नहीं मिलती है। घिल्डियाल भवन में रहने वाले देवी प्रसाद घिल्डियाल व उनके पुत्र ने शहरवासियों को अप्रैल फूल बनाने का एक नया तरीका खोजा। पहली अप्रैल की प्रातः पुत्र कातर स्वर में विलाप करने लगा- हे! मैं बाबाजी अब किसको कहूँगा?

तुम्हारे सिवा इस दुनिया में मेरा कौन है? अब कैसे रहूँगा मैं अकेला इस दुनिया में। शहर भर में वकील साहब के मर जाने की खबर फैल गयी। लोग उनके अन्तिम दर्शनों को आने लगे। महिलाएँ उनके पुत्र को ढांढस बंधाने लगीं पर वह दहाड़ मार-मारकर विलाप करता जा रहा था। कुछ लोगों ने अर्थी का प्रबन्ध किया। दाह संस्कार के लिये आवश्यक सामग्री जुटाई गयी। मृत शरीर को ज्यों ही अर्थी पर रखने की तैयारी होने लगी। वकील साहब उठ खड़े हुए-

‘मरल्या माचू तुम, तुमारी सजली डाण्डी,
तुम्हारी स्वैणी होली रांड, तुम जाणदा न्ही
आज त अप्रैल फूल छः’


घण्टाघर के पास ही ठक्कर बापा छात्रावास था। श्री भवानी भाई इसके अधीक्षक थे। वे मद्यनिषेध आन्दोलन, भूदान आन्दोलन, चिपको आन्दोलन टिहरी बाँध विरोधी आन्दोलन से जुड़े हुए रहे। वस्तुतः शहर में जुलूस और सभाएँ गाँधीवादी और साम्यवादी ही करते थे। इनका भूदान आन्दोलन चला तो उनका भूमि हथियाओ आन्दोलन। टिहरी डूबने के बाद भवानी भाई विस्थापित हो गए। बस वे छत्ताविहीन मधुमक्खी की तरह हो गए। अकेलेपन का जीवन बिताते हुए वे अस्वस्थ हो गए। किसी ने उन्हें ऋषिकेश के राजकीय अस्पताल में भर्ती करा दिया और उनकी अस्वस्थता का समाचार अखबार में छपवा दिया। अस्पताल में उन्होंने बताया कि अस्पताल मेरे लिये उपयुक्त स्थान है। एक तो यहाँ ज्यादातर डॉक्टर टिहरी के हैं। मेरा इलाज करने वाला डॉक्टर भी टिहरी से आया है। दूसरे यहाँ टिहरी के लोग मुझसे मिलने आ रहे हैं। उन्होंने सुन्दरलाल बहुगुणा से निवेदन किया कि डॉक्टर से कहें कि मुझे यहाँ से न हटायें किन्तु बीमारी की गम्भीरता को देखते हुए उन्हें देहरादून भेज दिया गया। जहाँ उनका देहान्त हो गया।

पुरानी टिहरी में दो महिला नेत्रियाँ थी, रामेश्वरी सजवाण और सौभाग्यवती गैरोला। श्रीमती सजवाण जिला पंचायत की उपाध्यक्ष भी रही थीं। राजनीति में इन दोनों महिलाओं की सक्रियता देखते ही बनती थी। श्री सत्य सिंह राणा, प्रेमलाल वैद्य, खुशहाल सिंह रांगड़, भूदेव लखेड़ा टिहरी की विभूतियाँ थीं, जो जिला पंचायत की अध्यक्ष रहे। खुशहाल सिंह रांगड़ विधायक भी रहे। मुख्यमन्त्री एच.एन. बहुगुणा टिहरी आए तो उनकी सभा अठूर (टिहरी से दो किमी. आगे) में करायी गई। बहुगुणा ने अठूर की असिंचित समतल भूमि के लिये नहर स्वीकृत की। झंगोरा-मंडुवा के बदले धान की फसल अठूरवासी अधिक समय तक नहीं उगा पाये।

नहर स्वीकृत करने का भी एक किस्सा है- दूर बैठे लोगों को पास आने के लिये बहुगुणा ने मंच से आवाज दी पर वे निकट नहीं आये। किसी ने उनसे कहा कि आपने उन्हें कुछ नहीं दिया, जिससे वे नाराज हैं। फिर बहुगुणा जी ने गढ़वाली में कहा कि तुम टिहरी वाले बड़े मतलबी हो। कोई मेहमान आता है तो कहते हो कि क्या लाये हो? फिर पूछते हो कि हम तुम्हारे घर आयेंगे तो क्या दोगे? चनाखेत से आगे भिलंगना की ओर टिहरी जेल थी। इस जेल में मोर सिंह नेगी कुख्यात दरोगा थे। वे राजनीतिक बन्दियों को बड़ी यातनायें देते थे। कहते हैं कि वे शौच के लिये इस्तेमाल कटोरे पर चाय पीने के लिये कैदियों को मजबूर करते थे। वे कैदियों की आदतें और स्वभाव जानते थे। एक बार एक कवि कैदी को अपने पास पीपल के पेड़ के नीचे बुलाकर डराया, प्रलोभन दिया और राजा के नाम दो पंक्तियाँ कविता लिखवा ली-

गाँधी कु चेला बण्यों जब आये दुरचाल,
क्षमा करा महाराज अब, सुणि ल्या दीन दयाल।


रुआंसे कवि ने अपने साथी कैदी के पास आकर कहा- ‘मोर सिंह की ज्वानी टुटिगे भुला। पीपल का डाला निस पतन ह्वैगे।’ आजादी के बाद मोर सिंह दरोगा कौशल दरबार में रहा करते थे। वे कभी-कभार ही बाजार आते थे। उनका सिर हिलता रहता था। उन्हें देखकर लोग घृणा से मुँह फेर लेते थे। लोग सहिष्णु थे, अन्यथा मोर सिंह दरोगा को सरेआम नोंच-नोंच कर मार डालते। नागेन्द्र सकलानी और मोलू भरदारी की शहादत के समय हुई टिहरी की जनक्रान्ति में मोर सिंह और अन्य अधिकारी रियासत के सरदार पटेल दादा दोलतराम की सूझबूझ से बच गए थे। टिहरी की जनक्रान्ति में युवक त्रेपन सिंह नेगी और विरेन्द्र दत्त सकलानी सामने आये।

28 दिसम्बर 1815 को ज्योतिषियों के निर्देशन में स्थापित टिहरी शहर 29 अक्टूबर 2005 को हाईकोर्ट के आदेश पर डुबा दिया गया। यहाँ के लोग तितर-बितर होकर बिखर गए। एक शहर विकास की भेंट चढ़कर सदा के लिये पानी में समा गया। एक बिरादरी सदा के लिये बिखर गयी।

नेगी ने कीर्तिनगर से खासपट्टी होते हुए टिहरी तक पहुँचे हुए जुलूस का नेतृत्व किया तो सकलानी ने नरेन्द्र नगर से टिहरी आ रहे महाराज को पुल पर ही रोक लिया। उन्हें राजमहल में नहीं घुसने दिया। क्रान्ति के बाद बनी अन्तरिम सरकार ने राजा के अधीनस्थ एक मन्त्री मंडल बनाया गया। केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि ज्योति प्रसाद ने कार्यभार संभालते ही दो टोपियां सिलवा ली थी। महाराजा के सामने काली टोपी पहन कर झुकते हुए अभिवादन करते तो मन्त्रियों के सामने सफेद टोपी पहन कर। कहते हैं कि राजशाही के पतन के अगले दिन बाजार में सफेद कपड़ा कहीं मिला ही नहीं। लोगों ने अपने लिये सफेद टोपियां सिलवा ली थी। मन्त्री मंडल में सम्मिलित लोग बाद में देश-प्रदेश की राजनीति में भी सक्रिय रहे। इनमें ठाकुर किशन सिंह, त्रेपन सिंह नेगी, खुशहाल सिंह रांगड़ प्रमुख हैं नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के डॉक्टर रहे कुशलानन्द गैरोला, आनन्दशरण रतूड़ी क्रमशः रियासत के स्वास्थ्यमन्त्री और वित्तमन्त्री बने थे।

बनारस से एमएबीटी कर गृहनगर लौटे चिरंजीलाल असवाल को राजा ने प्रताप इण्टर कॉलेज में अध्यापक नियुक्त कर दिया। उत्तर प्रदेश शिक्षा परिषद के सचिव रहे भगवती प्रसाद सकलानी उस समय कॉलेज के प्रधानाध्यापक रहे। टिहरी रियासत के विलीनीकरण के समय सभी कर्मचारियों को एक दर्जा कम कर उत्तर प्रदेश की सेवाओं में ले लिया गया। राजा ने असवाल जी को जिला शिक्षा अधिकारी से इण्टर कॉलेज का प्रधानाचार्य बना दिया था। टिहरी से अपने लगाव के कारण प्रमोशन होने पर भी वे टिहरी से बाहर नहीं गये और टिहरी की सर्वोच्च शिक्षण संस्थाओं इण्टर कॉलेज और बीटीसी कॉलेज में इधर से उधर स्थानान्तरित होते रहे और वहीं से सवानिवृत्त हो गए। श्री असवाल ने रियासत में पैदल घूम-घूमकर नए विद्यालयों की स्थापना करवायी।

जहाँ वे पैदल नहीं जा सकते थे, वहाँ दूरबीन से निरीक्षण किया। सेवा निवृत्ति के बाद वे अपने शिष्य सुन्दर लाल बहुगुणा द्वारा संचालित मद्यनिषेध आन्दोलन में कूद कर जेल जाने से भी नहीं हिचके। वे नरेन्द्र महिला महाविद्यालय के प्रबन्धक रहे अपने सेवाकाल में वे राजनीति से दूर रहे। महाराजा के समक्ष वे झुककर अभिवादन करते थे। महाराजा को वे वास्तव में बोलान्दा बद्री ही समझते थे। यद्यपि सुन्दरलाल बहुगुणा, विद्यासागर नौटियाल, इन्द्रमणी बडोनी, त्रेपन सिंह नेगी आदि उनके शिष्य थे पर उन्होंने विद्याध्ययन के समय राजनीति करने की सलाह कभी नहीं दी। टिहरी बाँध के कारण वे प्राणों से प्यारी टिहरी को अलविदा कहकर देहरादून चले गए और टिहरी की याद में प्राण त्याग दिए। वे कहते थे- टिहरी के बदले नई टिहरी नगर बसा दिया गया है पर भागीरथी-भिलंगना का संगम तो नई टिहरी में है ही नहीं। श्याम रंग के श्यामचंद नेगी असवाल जी के पड़ोसी थे जहाँ असवाल जी राजभक्ति के प्रतीक थे, वहीं श्याम चन्द्र नेगी राजद्रोह के प्रतीक थे। दोनों ने अपने-अपने तरीकों से रियासत की सेवा की थी श्री नेगी गढ़वाल के प्रथम जी.डी (1940) थे। वे देहरादून में रहकर अंग्रेजी अखबारों में लिखते थे।

मजदूर यूनियन में भी उनका सक्रिय सहयोग रहता था। राजशाही के विरोध में देहरादून से ही गतिविधियाँ संचालित की जाती थी। श्री नेगी उनके केन्द्र में रहते थे। लोकतंत्र समर्थक संगठन प्रजामंडल की स्थापना देहरादून में ही हुई थी। श्रीदेव सुमन भी इस संगठन के सदस्य थे। टिहरी बस अड्डे में बड़ी भीड़ लगी रहती थी। गुणानन्द पथिक गले में हारमोनियम लटकाये भीड़ के बीच में टपक पड़ते थे। दिखने में तो वह हड्डियों का ढाँचा मात्र थे पर जब उनके बोल फूट पड़ते तो लगता कि कहीं चट्टानों के बीच से झर-झर झरना बह रहा हो। वे गढ़वाली रामायण बनाते और हारमोनियम बजाते-बजाते सुनाते थें वर्गभेद और सामाजिक विषमता पर उनके गीत मंचों पर खूब गाये जाते थे-

गरीबू की दुनिया मा धनवानु कु राज,
हम भूखा तड़प्पा सि ह्वैन सरताज
यो गीत सुणल्या अमीरु का घर मां
हलवा रति ब्याणी
गरीबु का घर मां
कंडाली की स्याणी यो गीत सुणी जा।


उनके काव्य संग्रह ‘झंकार’ और ‘ललकार’ अब विलीन हो गये हैं। दलितों पर लिखी गयी उनकी कविता पर उन्हें पुरस्कृत किया गया था उनकी कविता थी-

गाँधी जी का प्यारा हरिजन
जन समाज मा गिर्यां किलै?


गढ़वाली के सिद्ध कवि जीवानन्द श्रीयाल टिहरी में निवास तो नहीं करते थे, पर सभा-सम्मेलनों, जुलूस प्रदर्शनों में उन्हें देखा जा सकता था। उनकी एक कविता गाँवों से टिहरी आने वाले आम आदमी की दशा का वर्णन करती है जो नगर पालिका का कर नहीं दे पाते थे।

‘चार आना चुंगी का अब मैं कखन द्यौं
सिमलासु का ओर मा सर्र उतरि जौं’


चिपको आन्दोलन में उन्होंने शिरकत की थी पर अद्वाणी हेंवल घाटी के जंगल में ठेकेदार से मुहूर्त का गुड़ा खाने पर आन्दोलन से हट गये थे। आन्दोलनकारियों के कष्ट और बीमारियाँ देखकर उन्होंने लिखा-

‘सैलानी भवानी सि खासण थौ
पर कला सुधरि, गुड़ खेक बच्यौं


घनश्याम रतूड़ी ‘सैलानी’ मद्य निषेध, चिपको, बाँध विरोधी आन्दोलनों के सिलसिले में अक्सर टिहरी में रहा करते थे। उनके कारण आन्दोलनों में जान आ जाती थी। लोग उन्हें सुनने के लिये ही जुलूस, सभाओं में सम्मिलित होते थे। उनके मधुर कटाक्ष विरोधियों को चुभते नहीं थे। एक बार एक ठेकेदार को उन्होंने उल्लू कहना चाहा पर सीधे-सीधे कह नहीं सकते थे। उन्होंने कह दिया कि छत्रगुण साहब पर लक्ष्मी की बड़ी कृपा है। होगी भी क्यों नहीं लक्ष्मी के वाहन जो हैं। वे मोर्चे पर गीतों की रचना करते थे। गाँव में एक वृद्धा ने कहा- बेटा! या दारू नखरू दैंत लग्यूं छः। बस सैलानी जी की कविता बनती गयी और वे उसे माइक पर चलते-चलते गाने लगे-

‘हिटा दीदी हिटा भुली।
चला गौं बचौला दारू कू दैन्त लग्यूं, तै दैन्त हटौला।’


रैणी गाँव में उन्होंने चिपको गीत की रचना की-

‘खड़ा उठा मैं बन्धु सब कट्ठा होला
सरकारी नीति से जंगलू बचौला।’


अपना आक्रोश व्यक्त करने या भड़ास निकालने के लिये कविता उनकी सर्वोत्तम माध्यम थी।

‘ह्वैगी सत्याग्रह शुरू ब्याली बिटीन
दारू की दुकान खोलि लोग उठीन।’


अपना आक्रोश व्यक्त करना होता तो ‘यों का रुठीन’ कहा जाता था। सावन चन्द रमोला कवि लेखक बनने से रह गये पर वे एक वकील अवश्य बने। वे सी.पी.एम. के नेता भी थे। प्रशासन द्वारा टिहरी बाजार में खच्चरों के प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था तो रमोला जी ने बाकायदा खच्चर यूनियन बना डाली और टिहरी बाजार में खच्चरों का जुलूस निकाला। अठूर के पास ढालदार सड़क पर लेट कर उन्होंने चक्काजाम करवाया और बाँध में कार्यरत श्रमिकों की समस्या रखी। ऋषिकेश में उन्होंने अद्वैतानन्द मार्ग पर बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर की मूर्ति स्थापित करवायी। उस समय बाबा साहब का नाम कम ही लोग जानते थे।

पृथ्वीचन्द रमोला टिहरी के दुर्लभ व्यक्ति थे। उन्होंने घोषणा कर दी कि मैं टिहरी को डूबने से बचाने के लिये अमुक तिथि को प्रातः 10 बजे स्वयं गंगा में समाधि ले लूँगा। नियत समय पर पुलिस ने भागीरथी को दोनों ओर से घेर लिया। तमाशबीनों की भीड़ लग गई। रमोला जी ज्यों ही नदी में उतरे पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। कभी वे घण्टाघर की चोटी से कूदना चाहते थे तो कभी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ जाते थे। आत्महत्या का प्रयास करने के मुकदमें उन पर अब भी चल रहे होंगे। सुमन मैदान में रातों-रात स्कूल का भवन खड़ा कर देना केवल उनके ही वश की बात थी। टिहरी डूब जाने पर वे कहाँ गये? कुछ पता नहीं। मोटर अड्डे के पास सरदार इन्द्र सिंह की दुकान थी। वह शहर के जाने-माने व्यवसायी थे। वे साम्यवादी और सर्वोदयी आन्दोलनों की समान रूप से सहायता करते थे। उनकी दुकान के निकट गुरुद्वारा था। यह गुरुद्वारा सामाजिक गतिविधियों में खास इस्तेमाल किया जाता था।

शहर के फक्कड़ बलबीर शाही कभी गुरुद्वारा तो कभी बस स्टेशन, पोस्ट ऑफिस के सामने खड़े हो कर जोर-जोर से बतियाने लगते थे। एक लम्बा गेरुवा चोंगा पहने हाथ में लम्बा डण्डा लिये जब वह बोलते तो लगता था कि वह झगड़ा कर रहे हैं। वह राजमाता गुलेरिया द्वारा निर्मित बद्रीनाथ की धर्मशाला में रहते थे। हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू और गढ़वाली वह धाराप्रवाह रूप में बोलते थे। उन्हें राज परिवार का सदस्य बताया जाता था और ज्ञान बावला कहा जाता था। नेकमल जी टिहरी बाजार के मूल-पुरुष कहे जाते थे। बाजार की अधिकांश दुकानें उनके द्वार ही बनवायी गयी थीं। उनके पास अथाह धन बताया जाता था। रजाई, गद्दे, तकियों पर वे नोट भर कर रखते थे। एक बार किसी ग्रामीण को नोटों से भरा गद्दा बिक्री हो गया। नेकमल जी को कुछ भी पता नहीं चला परन्तु ग्रामीण अगले दिन गद्दा वापस करने गया। नेकमल की केवल एक पुत्री थी। लक्ष्मी चन्द जैन शहर के जाने-माने व्यवसायी और साहूकार थे।

बताया जाता है कि जरूरत पड़ने पर राजा भी उनसे कर्जा लेते थे। एक समय में देवेश्वर दीपक टिहरी में भारतीय जनसंघ का दीपक जलाये रहते थे। बाद में वे लोकनायक जयप्रकाश द्वारा गठित जनता पार्टी के जिलाध्यक्ष बने। नीतियों और विचारों से साम्यवादी और जनसंघी एक-दूसरे के विपरीत ध्रुव थे। व्यक्तिगत रूप से भी साम्यवादी विद्यासागर नौटियाल और जनसंघी देवेश्वर दीपक एक दूसरे के विरोधी हो गये थे। उनकी नोंक-झोंक के किस्से शहरवासी चटखारे ले-लेकर सुनते थे। सर्वोदयी सुन्दर लाल बहुगुणा कई बार सर्वदलीय बैठक बुलाते थे। सभी दल अपने-अपने झण्डे-डण्डे के साथ बैठक में आते थे। एक बार बहुगुणा जी ने कह दिया कि पार्टी का जूता बाहर उतार कर आयें तो साम्यवादी भड़क गये। उन्होंने कहा कि हमारे झण्डे को जूता कहकर बहुगुणा जी ने झण्डे का अपमान किया हैं इस घटना के बाद बहुगुणा जी को उनका सहयोग तो नहीं मिला पर विद्यासागर नौटियाल के साथ पारिवारिक सम्बन्धों पर भी दरार पड़ गयी।

ईशा बेग मुस्लिम मोहल्ले में रहते थे। उन्होंने टिहरी बाँध विरोधी आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। उनके प्रोत्साहन पर मुस्लिम महिलाएँ भी आन्दोलन में कूदी थीं। वे सुन्दर लाल बहुगुणा की भाँति ही सिर पर सफेद कपड़ा बाँधते थे। मुस्लिम मोहल्ला की बालिका रजिया बेग का उत्साह और उमंग देखकर सुन्दर लाल बहुगुणा ने रजिया को अपनी शेष उम्र लग जाने की बात कही थी। यहाँ के युवक मंजूर बेग एक जमाने में माने हुए नेता थे। वे भाषण देने में जितने निपुण थे लेखन में उतने ही कमजोर थे। शहर के अन्य लोग जब कभी मस्जिद के सामने से गुजरते तो झुककर सम्मान प्रकट करते थे। टिहरी में एक कफ्फू झल्ली (पागल) हुए हैं। वह महाराजा की तरह ही राज्य के दौरे करते रहते थे इस दौरान वह महाराजा से बार-बार टकराते रहते थे।

वे राजा का घोड़ा रोक लेते थे और पूछते थे- महाराजा! कौन बड़ा? आप बड़े कि मैं बड़ा? राजा जवाब देते- कफ्फू साहब आप ही बड़े हैं। कफ्फू कहता- आप राजपाठ के राजा हैं और मैं बिना राजपाठ का राजा हूँ। इसलिये मैं ही बड़ा हूँ। फिर वह राजा के घोड़े को छोड़ देता था। कफ्फू झल्ली की विचित्र वेश-भूषा से वह आकर्षण का पात्र बना रहता था। वह अपने शरीर के नाप से अधिक लम्बे कपड़े पहनता था। यह कपड़े लोग उसे भेंट में दे देते थे। राजमाता कमलेन्दुमति शाह का उल्लेख करना परमावश्यक है। राजशाही के समय राजमाता जनता द्वारा डोली पर उठा कर राजा के साथ दौरों पर ले जाई जाती रही। बड़ी रानी होते हुए भी उनके पहले पैदा होने वाले बच्चे से पहले उनकी बहन और छोटी रानी इन्दुमति के बच्चे को षड्यंत्र कर पहले पैदा करवा दिया गया और उसे राजा का उत्तराधिकारी बनवा दिया गया। इससे सिद्ध होता है कि राजमहल में वह उपेक्षा का दंश झेलती रही।

उनका वास्तविक कार्य राजशाही के बाद स्वतन्त्र भारत में शुरू हुआ। उन्होंने महाराजा नरेन्द्रशाह ट्रस्ट की स्थापना की। राज्य की अनाथ, बेसहारा और विधवा महिलाओं के लिये स्कूल खोला। अन्धे और वृद्धों के लिये अंध/वृद्ध विद्यालय की स्थापना की। बालिकाओं की शिक्षा के लिये माध्यमिक विद्यालय और महाविद्यालय खोले। टिहरी में एक शानदार भवन का निर्माण कर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन से भवन का उद्घाटन करवाया। उनकी सारी शैक्षणिक और सामाजिक गतिविधियाँ इसी भवन से संचालित की जाती थीं। गढ़वाली होते हुए भी हिन्दी में बात करने वालों से वह नाराज हो जाती थी। राजमाता कमलेन्दुमति सरकार द्वारा टिहरी की उपेक्षा पर चिन्तित रहती थीं। अकालग्रस्त गढ़वाल में ज्वार-बाजरा भेजने पर उन्होंने अपना विरोध दर्ज कर इस घटिया अनाज की पूर्ति बन्द करवाई थी। राजमाता कमलेन्दुमति शाह ने आजादी के बाद टिहरी क्षेत्र से सांसद रहकर भारतीय लोकसभा की शोभा बढ़ाई।

प्रारम्भ से ही राजमाता ने टिहरी बाँध का विरोध किया था पर तब टिहरी के लोग विकास के लिये बाँध को जादू की छड़ी समझते थे। उन्होंने राजमाता की बात की परवाह नहीं की। गढ़वाली भाषा से राज परिवार का लगाव एक सनक की हद तक था। श्रीनगर के एक सेमिनार में कैप्टिन शूरवीर सिंह पंवार ने सुझाव रखा कि सारे लोग गढ़वाली में अपने लेख प्रस्तुत करेंगे। सवाल पैदा हुआ कि विज्ञान, भूगोल, आयुर्वेद आदि के शब्दों को गढ़वाली में किस प्रकार अनूदित किया जाए। इसी सेमिनार में दयाशंकर भट्ट जी ने अपना लेख अत्यन्त क्लिष्ट हिन्दी में पढ़ा। इस पर सभा की अध्यक्षता कर रहे श्याम चन्द नेगी बोल उठे- भट्ट जी, आप ने तो यह अंग्रेजीनुमा हिन्दी बोल दी है, जो किसी की समझ में नहीं आयी है।

मथुरा माई उर्फ डिमर्याण माई को टिहरी का बच्चा-बच्चा जानता था। उसका योगपंथ में पंजीकृत नाम हरिपुरी माई था। तीन धारा के पास सड़क से दो सौ फिट ऊपर उनकी कुटिया थी। पठाल की छतों से बने तीन भुमण्डों की दीवारें लाल मिट्टी से लिपी होती थी। एक में माई अपनी शिष्या कैलास माई के साथ रहती थी। दूसरे में उनका पूजाघर और तीसरे में विद्यार्थी अथवा कभी-कभी गाय का निवास होता था। माई गरीब विद्यार्थियों की मदद करती रहती थी। माई आंगन की मुंडेर पर बैठ कर सड़क पर आने-जाने वालों का अभिवादन स्वीकार करती एवं उनकी कुशलता की जानकारी लेती रहती थी। यहाँ से माई भागीरथी-भिलंगना के संगम को अविरल निहारती रहती। एक बार माई कौशल दरबार में खुले पुनर्वास कार्यालय गई।

वहाँ बाबुओं ने उनका उपहास उड़ाया कि साधु-सन्तों को नई टिहरी में जमीन और मकान की क्या जरूरत है। माई ने जोंगलहर में आकर कह दिया अब मुझे तुम नई टिहरी में आलीशान कोठी भी दोगे तो मैं वहाँ न जाकर अपनी कुटिया में ही जल-समाधि लेना पसन्द करूँगी। बाबू लोग उसके कोप से भयभीत हो गये। टिहरी डूबने और झील बनने से पूर्व ही माई मोक्ष को प्राप्त हुई। उनकी समाधि उनके द्वारा चयनित गणेश प्रयाग में दो शिलाओं के मध्य बनाई गई। उनके भक्तों ने उनके लिये नई टिहरी में भव्य कुटिया का निर्माण करवाया, जिसमें उनकी शिष्या कैलास माई अपनी शिष्या के साथ निवास करती है। मथुरा माई उर्फ डिमर्याण माई टिहरी के सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रही हैं।

दयाल सिंह राणा टिहरी से सटे हुये विकास खण्ड जाखणीधार के प्रमुख रहे थे। जाखणीधार विकासखण्ड का काफी बड़ा हिस्सा पानी में समा चुका है। राणा जी श्री हेमवती नन्दन बहुगुणा के परम भक्त थे। आपात्काल के बाद बहुगुणा ने सी.एफ.डी. बनाई तो राणा उसी में शामिल हो गये। उसके बाद बहुगुणा जहाँ-जहाँ गये, श्री राणा उनके साथ ही लगे रहे। श्री दयाल सिंह राणा ने छल-कपट की राजनीति न कर मूल्यों की राजनीति की है। वे जिला टिहरी गढ़वाल सहकारी बैंक लि. के जिला अध्यक्ष रहे थे। उनके दोबारा चुनाव लड़ने की प्रबल सम्भावना को देखते हुये एक उम्मीदवार ने उनसे चुनाव न लड़ने की विनती की। एक दिन जब वे कपड़े पहन रहे थे तो जेबों में नोटों की गड्डियाँ देखकर दंग रह गये। उन्होंने प्रण कर लिया कि अब वे चुनाव नहीं लड़ेंगे और कभी नहीं लड़ेंगे। उन्होंने मीठी झिड़की ‘‘तुम नौजवान न जाने क्या-क्या करोगे’’ के साथ गड्डियाँ वापस कर दी।

एक शिशु के पिता और कांग्रेस के सक्रिय युवा नेता राकेश राणा की मौत के बाद उन्होंने पुत्रवधु को पुनर्विवाह के लिये प्रेरित किया। उन्होंने स्वयं ही उसका विवाह महाराष्ट्र निवासी युवक से करवाया। विदाई के समय उन्होंने कहा ‘‘बेटी हमारे घर भी आते रहना।’’ विकास खण्ड प्रमुख और जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष के रूप में उनकी साफ-सुथरी छवि और उनके द्वारा किये गये उत्कृष्ट कार्यों के लिये उन्हें श्रद्धा के साथ याद किया जाता है। उनके विकास खण्ड में साम्यवादी पार्टी के एक कार्यकर्ता की विपन्नता को देखते हुये उन्होंने उसे मदद दिलाई, चाहे वह कार्यकर्ता मंच पर उनका पुरजोर विरोध करता था।

नगर पालिका टिहरी के अध्यक्ष रहे मालचन्द्र रमोला राजस्व विभाग में पटवारी रहे थे। सेवा निवृत्त होने पर उनका मन घर में नहीं लगा और वे टाइपराइटर लेकर टिहरी कचहरी में बैठ गये। जहाँ वे वकीलों और मुवक्किलों को अपनी सेवायें प्रदान करते थे। वे साहित्यिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उन्होंने गढ़वाली बाजूबन्द गीतों की तुलना कविवर बिहारी लाल के दोहों और विभिन्न शायरों से की। उन्होंने कल्पना और भावाभिव्यक्ति में बाजुबन्द के अज्ञात रचनाकारों की तुलना महान कवियों से की। एक बार उनके प्रयास से ‘रमोला सम्मेलन’ किया गया। कुछ लोगों ने सम्मेलन की तीखी आलोचना की और इसे जातिवाद को सुदृढ़ करने का प्रयास बताया। उन्होंने सफाई दी कि अग्रवाल सभायें होती हैं। हम भी वैसा ही करके धर्मशालायें बनवाना चाहते थे और गरीब बच्चों को छात्रवृत्ति देना चाहते थे। इस विरोध से उनका उत्साह ठण्डा पड़ गया और उनके कोमल हृदय को आघात लगा।

मोहन लाल नेगी और सुरेशचन्द जैन शहर के वरिष्ठ वकील हैं। पचास वर्षों तक सेवा करने पर बार एसोसिएशन ने उन्हें सम्मानित किया। श्री जैन जनता पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के पदाधिकारी रहे हैं परन्तु मोहन लाल नेगी राजनीति से दूर ही रहे। श्री नेगी वकालत के कारण कम और गढ़वाली कहानी लिखने के लिये अधिक जाने जाते हैं। उनके द्वारा लिखे गये कहानी संग्रह ‘जोनि पर छापु किलै’ और ‘बुरांश की पीड़’ टिहरी में बोली जाने वाली ठेट टिहरियाली गढ़वाली में लिखे गये हैं उन्होंने टिहरीयाली बोली को गढ़वाली साहित्य में स्थापित करने का काम किया है। उनकी कहानियों में स्थान और पात्र टिहरी शहर और उसके आस-पास के गाँवों से लिये गये हैं। जिन्हें अब झील निगल गई है। आने वाली पीढ़ी के लिये उनकी कहानियाँ टिहरी का दर्पण बन सकेंगी।

साहित्यकार विद्यासागर नौटियाल ने भी अपने कहानी संग्रह एवं उपन्यासों में टिहरी और आस-पास का वर्णन किया है। यद्यपि उनके साहित्य में वर्णित अतीत की घटनायें इतिहास नहीं हैं पर नई पीढ़ी को इतिहास की झलक दिखा सकती हैं। एक समय में अपने साहित्यकार का गला घोंट कर नौटियाल भारतीय साम्यवादी दल के कर्ता-धर्ता थे। उन्नीस सौ बासठ में चीन पर आक्रमण होने पर तत्कालीन प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू ने सारा गुस्सा विद्यासागर पर उतारा और उन्हें केन्द्रीय जेल बरेली में ठूँस दिया। टिहरी में साम्यवादियों के एक शान्तिपूर्ण जुलूस पर आपसी रंजिश के चलते दरोगा ने एक नाई को गोली से मार दिया था। फिर भी भीड़ को काबू में किया गया और टिहरी में अराजकता नहीं फैलने दी। एक समय में कामरेड विद्यासागर नौटियाल और गोविन्द सिंह नेगी की जोड़ी टिहरी में सक्रिय थी।

नेगी टिहरी क्षेत्र से लखनऊ विधानसभा में विधायक जाते थे। विधानसभा में उनकी आवाज गूँजती थी। विरोधी नेता के रूप में उनकी ख्याति थी। गुस्सा आने पर वे सदन में जूता तक चला देते थे और अधिक पीने पर दूसरे की गाड़ी को अपनी समझ कर ड्राइव करने लगते थे। विधानसभा में उनकी उच्च स्तरीय बहसें आज भी याद की जाती हैं। विद्यासागर नौटियाल देवप्रयाग क्षेत्र से लखनऊ विधानसभा के सदस्य रहे। इसके बाद पार्टी से बाहर होने पर वे साहित्य की शरण में गये। पार्टी से पृथक होने के बाद ही उनके उपन्यास ‘सूरज सबका है,’ ‘उत्तर बांया है’ और कहानी संग्रह टिहरी की कहानियाँ प्रकाशित हुई।

28 दिसम्बर 1815 को ज्योतिषियों के निर्देशन में स्थापित टिहरी शहर 29 अक्टूबर 2005 को हाईकोर्ट के आदेश पर डुबा दिया गया। यहाँ के लोग तितर-बितर होकर बिखर गए। एक शहर विकास की भेंट चढ़कर सदा के लिये पानी में समा गया। एक बिरादरी सदा के लिये बिखर गयी।

 

एक थी टिहरी  

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

डूबे हुए शहर में तैरते हुए लोग

2

बाल-सखा कुँवर प्रसून और मैं

3

टिहरी-शूल से व्यथित थे भवानी भाई

4

टिहरी की कविताओं के विविध रंग

5

मेरी प्यारी टिहरी

6

जब टिहरी में पहला रेडियो आया

7

टिहरी बाँध के विस्थापित

8

एक हठी सर्वोदयी की मौन विदाई

9

जीरो प्वाइन्ट पर टिहरी

10

अपनी धरती की सुगन्ध

11

आचार्य चिरंजी लाल असवाल

12

गद्य लेखन में टिहरी

13

पितरों की स्मृति में

14

श्रीदेव सुमन के लिये

15

सपने में टिहरी

16

मेरी टीरी

 

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