लेखक की और रचनाएं

SIMILAR TOPIC WISE

Latest

भारत नदी दिवस 2015 : एक रिपोर्ट

‘नदी का विज्ञान’ विषय पर व्याख्यान की शुरुआत करते हुए श्री अनुपम मिश्र ने कहा “मैं नदी का विज्ञान नहीं जानता। मैं नदी के साथ हो रहे अवैज्ञानिक कार्यों की चर्चा करुँगा।... कहा कि नदी का काम है - बहना। उसे उसका काम करने दें। उसे बहने दें। उसका नहीं, अपना स्वभाव बदलें।” श्री मिश्र की नदी विज्ञान कथा में आकाश से बरसने वाले पानी को उसका ठिकाना लौटाने से लेकर नदी से अपने रिश्ते की परम्परागत समझ और संवेदना लौटा लाने की अपील, पानी द्वारा पहली बार चेन्नई की पहली मंजिल पर चढ़ने जैसे मुहावरे गढ़ने से लेकर वर्तमान राजनीतिक समझ पर चुटकी तक शामिल थी। तारीख - 28 नवम्बर, 2015 ; मौका था दिल्ली में भारत नदी दिवस मनाने का। बाहर जलवायु परिवर्तन का रुदन था; नदी जोड़ से विनाश की आशंका थी और नमामि गंगे को लेकर निराशा थी; किन्तु 71, मैक्समूलर रोड स्थित इनटेक के छोटे से सभागार में एक अजीब सा उत्साह था; उम्मीद थी।

खिलखिलाती यमुना, बलखाती यमुना, दहाड़ती यमुना, सिसकती यमुना; यमुना में खेलते, डूबते-उतराते और आस्था के दीप जलाते इंसान; यमुना को रोकते-टोकते-गंदलाते ढाँचे - एक तरफ यमुना का भूत, वर्तमान और अपेक्षित भविष्य बाँचती यह चित्र प्रदर्शनी थी, तो दूसरी तरफ नदी का विज्ञान बाँचते श्री अनुपम मिश्र।

जटिलतम विषय को सरल, सुगम्य, रोचक शैली में प्रस्तुत करने में महारत के कारण श्री मिश्र को पर्यावरणविद की बजाय, पर्यावरण कथाकार कहना श्रेयस्कर होगा। तीसरी तरफ नदी यमुना की चुनौतियों को लेकर गहरे सवाल उठाते स्कूली बच्चे थे, तो चौथी तरफ पानी तंत्र की बुनियादी समझ और खुले मन के साथ सवालों के जवाब देते दिल्ली के जल मंत्री थे। नदी जगाने निकले चार सितारों के संघर्ष की जगमगाहट को थपथपाने वाला दृश्य पाँचवाँ था।

आयोजक के रूप में पीस इंस्टीट्यूट चेरिटेबल ट्रस्ट, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इण्डिया, इनटेक, टॉक्सिक लिंक एवं सैंड्रप की संयुक्त भूमिका तथा लोक विज्ञान संस्थान (देहरादून) एवं अर्घ्यम ट्रस्ट (बंगलुरु) के विशेष सहयोग ने यह मौका मुहैया कराया।

भारत नदी दिवस में अतिथि के तौर पर मनु भटनागर, अनुपम मिश्र, कपिल मिश्र, मनोज मिश्र

उम्मीद जगा गया जल मंत्री से बाल संवाद


“नदी, शहर का आईना है। समाज बदलेगा, तब यमुना बदलेगी। यदि हम यमुना नहीं बदल पाये, तो समझिएगा कि हम व्यवस्था नहीं बदल पाये....’’

“मैं तीन साल में यमुना में डुबकी लगाऊँगा। (अर्थात यमुना जल की गुणवत्ता को स्नान योग्य स्तर तक लाऊँगा।) यह अब मेरी व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी है। आखिर जनता ने किसलिये कुर्सी पर बिठाया है?’’

“दिल्ली को आगे अब न रेणुका बाँध चाहिए, न शारदा-यमुना नदी जोड़। पानी बिल में छूट की सीमा बनाने से लाभ हुआ है। पानी बेकार न जाये’ दिल्ली के लोगों ने खुद यह प्रयास शुरू किया है। अभी पानी पूरे समय नहीं आता। इसलिये जब पानी आता है, तो लोग कटोरी-चम्मच तक भरकर रख लेते हैं। फिर अगले दिन ताजा भरने के चक्कर में रखा हुआ पानी बहा देते हैं। हम 24x7 पानी सप्लाई करने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं, इससे पानी की बर्बादी और कम होगी।’’

21वीं सदी का दूसरा दशक, सत्ता पर कारपोरेट प्रभाव का युग है। गौर कीजिए कि बावजूद इसके संप्रग के नेतृत्व वाली सरकार ने नदी जोड़ को लाल बस्ते में डालने की कोशिश की थी। श्री मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही केन्द्र सरकार का रुख उलट गया। क्या केन्द्र, क्या राज्य.. ऐसा लगता है कि सभी कारपोरेट एजेंडा पूरा करने में लग गए हैं।

किसी को नदी जोड़ से परहेज नहीं है। ऐसे समय में दिल्ली के जल, पर्यटन, कला, संस्कृति और गुरुद्वारा चुनाव मंत्री श्री कपिल मिश्र के इस बयान को सुनकर कोई इन्हें ‘वाटर एक्टिविस्ट मिनिस्टर’ कह दे, तो ताज्जुब नहीं।

कपिल मिश्र“जलबोर्ड ने 20 हजार करोड़ का दिल्ली सीवेज मास्टर प्लान - 2036 बनाया था; कितने इस 20 हजार करोड़ के बूते अपने आगे की लाइफ प्लान कर चुके थे। प्लान 2036 का है, तो 2056 तो हो ही जाएँगे। जब तक पूरी दिल्ली में सीवेज पड़ेंगे, तब तक पहले पड़ी लाइनें खराब हो चुकी होंगी; फिर उन्हें डालने का काम शुरू होगा। ऐसे तो कभी भी दिल्ली के सीवेज का प्रबन्ध नहीं हो सकेगा। मैंने जलबोर्ड को कहा कि यह प्लान तो काम नहीं कर सकता। आप ऐसा प्लान सोचो कि मोहल्ले का सीवेज, मोहल्ले में ट्रीट हो जाये और ट्रीट किये पानी का उसी मोहल्ले में रियूज भी हो जाये। डिपो में बसों की धुलाई तथा पार्कों की सिंचाई, पूरी तरह सीवेज ट्रीटमेंट के बाद प्राप्त जल का ही उपयोग हो। हम यह मैन्डेटरी करने जा रहे हैं। अभी सोचा है कि नजफगढ़ नाले का पानी साफ होकर ही यमुना में गिरे। जो ऐसा कर सकते हों, वे एक जगह करके दिखाएँ। हम करने को तैयार हैं। दिल्ली सरकार, एक-एक करके करने का प्रयास कर रही है। हो सकता है कि गलती हो; फिर भी हम करेंगे। आखिर कहीं से तो शुरुआत करनी होगी। फेल होने के डर से रुक तो नहीं सकते।’’

छोटे-छोटे बच्चे बड़े-बड़े सवाल कर रहे थे; रेपेरियन राइट के सवाल, अनपढ़ों को पढ़ा-लिखा बनाने का सवाल; मंत्री जवाब दे रहे थे - “रेपेरियन राइट का हिसाब लगाएँगे तो दिल्ली को पानी मिलना मुश्किल हो जाएगा।.... अनपढ़, नदी गन्दा नहीं करते। हम उन्हें इतना पानी ही नहीं देते, उनकी कॉलोनियों में तो हम सीवेज भी नहीं दे पाये कि वे नदी गन्दी करें।

इस अनुभव पर गौर करें


“मेरा विधानसभा क्षेत्र करावल नगर है। करावल नगर के आधे में सीवेज पाइप लाइन है, आधे में नहीं है। सीवेज पाइप लाइन वाले इलाके की तुलना में बिना सीवेज पाइप लाइन वाला इलाका, ज्यादा साफ और बीमारी मुक्त है।’’


भारत नदी दिवस पर दिल्ली के जल मंत्री श्री कपिल मिश्र का यह अनुभव बड़े काम का है। इस अनुभव को सामने रख समझने की कोशिश करनी चाहिए कि स्वच्छता की दृष्टि से क्या सीवेज पाइप लाइन वाकई कोई जरूरी चीज है या यह सिर्फ सीवेज चार्ज जुटाने के लिये जरूरी चीज है? इससे यह भी तय करना चाहिए कि कहाँ सीवेज डालना जरूरी है और कहाँ नहीं?

बिल्डर, ग्रुप हाउसिंग सोसाइटीज तथा डीडीए जैसे प्राधिकरणों द्वारा चारदीवारी युक्त आवासीय निर्माण ऐसा क्यों नहीं कर सकते कि वे अपनी चारदीवारी के भीतर बरसा सारे जल का संचयन क्यों नहीं कर सकते? सारे सीवेज को उपचारित कर उसके पश्चात प्राप्त ठोस मल का उपयोग खाद बनाकर बागवानी में और तरल का उपयोग वापस अपने शौचालय और स्नानागार में क्यों करना सम्भव नहीं है?

मुम्बई की मीठी नदी को उसका हक दिलाने की कोशिश में लगे स्थानीय पानी कार्यकर्ता श्री जनक दफ्तरी कहते हैं कि यह सम्भव है; न सिर्फ सम्भव है, बल्कि हानिकर भी नहीं है। हो सकता कि रासायनिक पद्धति से उपचारित होने के पश्चात प्राप्त अवजल, बागवानी को नुकसान पहुँचाए किन्तु बायो सेनेटाइजर से उपचारित होने के पश्चात यह सम्भावना शेष नहीं रहती। इसमें मुख्य लागत, सिर्फ एक बार लगती है।

दिलचस्प यह है कि ‘बायो सेनेटाइजर’ एक ऐसी सामग्री है, जिसका कभी क्षय नहीं होता। इस उपचार प्रणाली सबसे खास बात यह है कि बिजली आदि पर निर्भरता नहीं होने से फेल होने का खतरा नहीं रहता। श्री दफ्तरी, बायो सेनेटाइजर उपयोग आधारित इस प्रणाली के नासिक म्युनिसपलिटी, मुम्बई रेलवे स्टेशन के शौचालयों, गोवा के होटलों और मुम्बई में अपनी हाउसिंग सोसाइटी के परिसर में सफल उपयोग का दावा करते हैं। यह दावा कितना सच है, दिल्ली सरकार को कभी यह जाँचना चाहिए।

सम्मानित किये गये प्रतिभागीपहले शौच को सीवेज पाइप तक पहुँचाने के लिये ढेर सारा पानी बहाना, फिर सीवेज पाइप लाइन के जरिए मल को ढोकर कहीं दूर ले जाना, तत्पश्चात उपचारित करना और फिर शेष अवजल को नदी में बहाना; क्या इसकी तुलना में व्यक्तिगत सेप्टिक टैंक अथवा दो-चार गलियों के बीच के साझे अथवा चारदीवारी परिसरों के भीतर सामुदायिक स्तर पर सेप्टिक टैंकों का निर्माण व संचालन व्यावहारिक हो सकता है? इस पर विचारना चाहिए।

इससे सरकार की जिम्मेदारी खत्म होगी; कम-से-कम नये इलाकों में सीवेज और जलापूर्ति की अलग-अलग पाइप लाइन डालने की योजना पर सोचने की जरूरत ही नहीं बचेगी; सीवेज संयंत्रों पर भार घटेगा; लोगों का सीवेज चार्ज खर्च बचेगा; पानी का बिल घटेगा; स्वावलम्बन बढ़ेगा तथा सीवेज से मिली अतिरिक्त खाद और पानी से मुनाफ़ा होगा और नदी के निर्मल बहने की सम्भावना बढ़ जाएगी। क्या यह नहीं होगा? कभी सोचें।

नदी विज्ञान की अनुपम कथा और कथाकार


‘नदी का विज्ञान’ विषय पर व्याख्यान की शुरुआत करते हुए श्री अनुपम मिश्र ने कहा “मैं नदी का विज्ञान नहीं जानता। मैं नदी के साथ हो रहे अवैज्ञानिक कार्यों की चर्चा करुँगा।... कहा कि नदी का काम है - बहना। उसे उसका काम करने दें। उसे बहने दें। उसका नहीं, अपना स्वभाव बदलें।” श्री मिश्र की नदी विज्ञान कथा में आकाश से बरसने वाले पानी को उसका ठिकाना लौटाने से लेकर नदी से अपने रिश्ते की परम्परागत समझ और संवेदना लौटा लाने की अपील, पानी द्वारा पहली बार चेन्नई की पहली मंजिल पर चढ़ने जैसे मुहावरे गढ़ने से लेकर वर्तमान राजनीतिक समझ पर चुटकी तक शामिल थी। श्री मिश्र की कही नदी विज्ञान कथा की रिकॉर्डिंग, हिन्दी वाटर पोर्टल पर शीघ्र ही उपलब्ध होगी। उसे वहाँ सुनने की बराबरी मेरा यहाँ लिखा नहीं कर सकता। अतः मैं उसका उल्लेख यहाँ करने से अपने को रोक रहा हूँ।

अनुपम मिश्रमंच संचालन करने वाले श्री मनोज मिश्र, श्री सुरेश बाबू, इनटेक के अध्यक्ष की जगह, स्वागत उद्बोधन पढ़कर सुनाने वाले श्री मनु भटनागर, भारत नदी सप्ताह के प्रेरक पानी लेखक और नौकरशाह स्व. श्री रामास्वामी आर अय्यर की स्मृतियों को रखने वाले श्री जयेश भाटिया, श्री अय्यर के पुत्र श्रीराम, श्री अय्यर की धर्मपत्नी श्रीमती सुहासिनी और धन्यवाद ज्ञापन करने वाले श्री रवि अग्रवाल और सवाल करने वाले स्कूली बच्चे तो कार्यक्रम में महत्त्वपूर्ण भूमिका में थे ही, किन्तु भागीरथ प्रयास सम्मान के प्राप्तकर्ताओं का जिक्र न करना, कार्यक्रम के सबसे उजले पहलू से वंचित रखना होगा। आखिरकार, वे ही तो असली कर्मवीर हैं:

भागीरथ प्रयास सम्मान


संस्थागत श्रेणी
भारत नदी दिवस में अनुपम मिश्र और अन्य लोग1. सेव मोन रीजन फेडरेशन - नदी तवांग और नयामजंगछु (अरुणाचल प्रदेश) सात नदियों और मोंपा जनजाति के घर है, मोन क्षेत्र। 600 मेगावाट की तवांग-एक, 1800 मेगावाट की तवांग-दो तथा 780 मेगावाट की न्यामजंगछु पनबिजली परियोजनाओं समेत 3500 मेगावाट पनबिजली उत्पादन का लक्ष्य है। प्रस्तावित 15 पनबिजली परियोजनाओं की मंजूरी, नदियों और मोंपा समुदाय के सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय रिश्ते के बीच अवरोध बनेगी। हमारी थोड़ी सी जरूरत की पूर्ति के नाम पर हमारी नदी हमसे लुट जाएगी। इस समझ को रखने वाले स्थानीय लोगों ने विरोध का ऐलान किया। संगठन बना। स्थानीय बौद्ध लामा ने नेतृत्व सम्भाला। खतरा मोल लेकर भी आन्दोलन जारी रखा है।

इस जज्बे को सम्मानित करने के निर्णय ने इन्हें भागीरथ सम्मान दिलाया - सम्मान प्रतीक चिन्ह, एक शॉल और एक चेक। महासचिव श्री लोबसंग ग्यात्सो ने फेडरेशन की तरफ से यह सम्मान ग्रहण किया और आभार माना।

2. सम्भव ट्रस्ट
भारत नदी दिवस में सम्भव ट्रस्ट को सम्मानित किया गयानदी नांदुवाली (अलवर, राजस्थान)
बंध, जोहड़, एनीकट, जंगल, चारा, मवेशी...छोटे-छोटे काम करते जाना और नदी बहाना। सम्भव ट्रस्ट के साथ मिलकर 17 गाँवों द्वारा किये प्रयासों ने एक वक्त सूख चुकी नांदुवाली नदी पुनः बहा दी; बिना किसी बाहरी फंड और तकनीकी मदद के। श्री फरहाद कॉन्ट्रेक्टर, इस ट्रस्ट से जुड़े हैं। उनकी अनुपस्थिति में ट्रस्ट की ओर से श्री कुंजबिहारी जी ने यह सम्मान को लिया।

22 किलोमीटर की ऐसी छोटी-छोटी नदियाँ बह निकले, तो नदी जोड़ की जरूरत कहाँ है? अपने स्वावलम्बन से नदी बहाने के ऐसे गँवई प्रयासों से देश और प्रदेशों के पानी मंत्रियों को सीखना चाहिए। क्या वे सीखेंगे?

व्यक्तिगत श्रेणी सम्मान
3. श्री सच्चिदानन्द भारती
सच्चिदानंद भारती को सम्मानित करते दिल्ली सरकार के जल मंत्री कपिल मिश्र(गाड गंगा, उफरैखाल, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखण्ड)
श्री भारती, पेशे से अध्यापक हैं। जंगल बचाने से हुई शुरुआत चाल-खाल जैसे जलसंचयन ढाँचों की राह बढ़ चली। बिना किसी बाहरी मदद के 20 हजार चाल-खाल बनाने का दावा छोटा नहीं होता। जंगल संरक्षण के लिये ग्रीन पुलिस और श्रम व रचना के लिये महिला मंगल दलों को एक सूत में बाँध लेना बहुत बड़ा काम है। इसी बड़े काम के प्रताप ने कभी सूखी नदी में सिर्फ प्रवाह ही नही पैदा किया, नदी का नाम बदलकर भी गाड गंगा रख दिया।

निस्सन्देह, प्रेरणा और नेतृत्व श्री भारती का है, किन्तु यह सब काम दूधाातोली लोक विकास संस्थान के बैनर तले हुआ। जंगल की वापसी के महत्त्वपूर्ण काम के लिये, दूधातोली लोक विकास संस्थान को मध्य प्रदेश शासन द्वारा महात्मा गाँधी पुरस्कार जैसे महत्त्वपूर्ण पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। इस काम को व्यक्तिगत श्रेणी में सम्मानित करने पर किन्ही शख्स ने भोजन के वक्त व्यक्तिगत संवाद में मुझसे मेरी राय चाही।

ग़ौरतलब है कि भागीरथ सम्मान का मकसद विशेष तौर पर रचना व संघर्ष के ऐसे प्रयासों को सामने लाना तथा हिम्मत बढ़ाना है, जो सफल भले ही न हुए हों, किन्तु अपने नदी कार्य के प्रति समर्पण और ललक प्रशंसनीय तथा प्रेरित करने वाली हो। यह काम पहले से ख्याति प्राप्त है। हो सकता है कि आपमें से कोई इस कारण भी निर्णायक समिति पर पर सवाल उठायें।

किन्तु यह नहीं भूलना चाहिए कि जंगल से नदी जिन्दा करने का उफरैखाल का यह काम, एक ऐसा काम है जिसका न सिर्फ उत्तराखण्ड, बल्कि पूरे भारतीय हिमालय में कोई सानी नहीं है। इससे सीखकर, पहाड़ के जंगल, नदी और खेती बचाई जा सकती है; पलायन रोका जा सकता है। कभी जाकर देखें। ऐसे अनुपम कार्यों को प्रचारित करने की अभी और आवश्यकता है। इस महत्ता को देखते हुए आप सवाल उठाये बगैर भी काम चला सकते हैं।

4. एमेनुअल थियोफिलस भारत नदी दिवस में अनुपम मिश्र और अन्य लोग(नदी महाकाली, उत्तराखण्ड)
नदी के साथ जन जुड़ाव को संरक्षित करने का प्रयास है यह। इमेनुअल ने इसके लिये गंगा की 2,000 किलोमीटर लम्बी यात्रा भी की। सैंड्रप के लिये ‘हैडवाटर एक्सटिंक्शन’ शीर्षकयुक्त रिपोर्ट पर भी काम किया। यह रिपोर्ट, ऊपरी गंगा और ब्यास नदी बेसिन में बने पनबिजली बाँधों के मछली तथा नदी पारिस्थितिकी पर असर बताती है।

आयोजन के दौरान दिखाई एक-एक मिनट की फिल्मों ने कुछ-कुछ बताया जरूर, पर असली काम खुद आँखों से देखकर ही समझा जा सकता है। श्री सच्चिदानंद भारती जी ने अपने उद्बोधन में कहा भी कि जूरी के किसी सदस्य से इस काम को खुद जाकर नहीं देखा है। वह कहना भूल गए कि निर्णायक समिति के अध्यक्ष श्री अनुपम मिश्र इस काम और इसकी महत्ता से भली-भाँति परिचित हैं। खैर, साधारण परिधान, दुबली-पतली काठी और खिचड़ी दाढ़ी के बीच झाँकता साँवला किन्तु चमकता चेहरा - एमेनुअल की मेहनत और सातत्य की कहानी खुद कह देता है।

कपिल मिश्र ले प्रश्न पूछती छात्राउम्मीद करनी चाहिए कि भारत नदी दिवस आयोजकों द्वारा प्रदत भगीरथ प्रयास सम्मान हर बरस रंग लाएगा और नदी प्रयास हर बरस बढ़ते जाएँगे। बधाई एवं आभार!

Post new comment

The content of this field is kept private and will not be shown publicly.
  • Web page addresses and e-mail addresses turn into links automatically.
  • Allowed HTML tags: <a> <em> <strong> <cite> <code> <ul> <ol> <li> <dl> <dt> <dd>
  • Lines and paragraphs break automatically.

More information about formatting options

CAPTCHA
यह सवाल इस परीक्षण के लिए है कि क्या आप एक इंसान हैं या मशीनी स्वचालित स्पैम प्रस्तुतियाँ डालने वाली चीज
इस सरल गणितीय समस्या का समाधान करें. जैसे- उदाहरण 1+ 3= 4 और अपना पोस्ट करें
4 + 8 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.