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भूजल में बढ़ता फ्लोराइड : एक परिदृश्य और जल संसाधन प्रबन्धन की भूमिका

Author: 
मीनाक्षी अरोड़ा, केसर सिंह
Source: 
राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान, रुड़की, पाँचवी राष्ट्रीय जल संगोष्ठी, 19-20 नवम्बर, 2015

सारांश
दुनिया के अधिकांश भागों में विभिन्न कार्यों के लिए भूजल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। बदलते परिवेश में विकासवादी गतिविधियों के चलते कृषि पद्धतियों, खाद्य आदतों और जीवनशैली आदि में परिवर्तन होने के कारण भूजल संदूषण बढ़ रहा है। भूजल में कुछ खास आयन की अधिक मात्रा का जमाव एक बड़ी समस्या बन गया है जिससे भूजल अनुपयोगी हो रहा है। फ्लोराइड भी एक ऐसा ही आयन है। मानवीय उपभोग के लिए फ्लोराइड की 0.6 मि.ग्रा./ली. मात्रा ही आवश्यक होती है। क्योंकि इससे दाँत और हड्डियों को मजबूती मिलती है। लेकिन 1.5 मि.ग्रा./ली. से अधिक फ्लोराइड होने पर विभिन्न प्रकार के फ्लोरोसिस रोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है। इससे दाँत और हड्डियाँ कमजोर या मुड़ने लग जाती हैं। पानी में फ्लोराइड प्राकृतिक या मानव जनित अथवा दोनों ही कारणों से हो सकता है। प्राकृतिक कारण क्षेत्र विशेष की भौगोलिक परिस्थितियाँ होती हैं। कुछ चट्टानों में फ्लोराइड पाया जाता है। ज्वालामुखी की राख में भी फ्लोराइड अधिक मात्रा में पाया जाता है। फर्टिलाइजर का प्रयोग और कोयले को जलाना फ्लोराइड के मानवजनित स्रोत हैं। चूँकि फ्लोराइड का मानवीय स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए भूजल में इसकी मात्रा की नियमित जाँच करना आवश्यक हो जाता है। ताकि भूजल को पीने योग्य बनाये रखने के लिए समय-समय पर कारगर उपाय किये जा सकें। भूजल से फ्लोराइड समाप्त करने के कई तरीके मौजूद हैं। फ्लोराइड संदूषित भूजल में साफ पानी मिलाकर, कृत्रिम पुनर्भरण ढाँचों का निर्माण आदि इसकी मात्रा को कम कर सकते हैं। मौजूदा कुओं में वर्षा जल संग्रहण भी फ्लोराइड कम करने में एक कारगर उपाय सिद्ध हो सकता है। इसके अतिरिक्त फ्लोकुलेशन और एडसोर्पशन आदि के जरिये भी पानी का डीफ्लोराइडेशन किया जा सकता है लेकिन विभिन्न उपायों को अपनाते समय क्षेत्र विशेष की स्थानीय परिस्थितियों जैसे भूजल की गुणवत्ता और संदूषण का स्रोत प्राकृतिक है या मानवजनित आदि को ध्यान में रखना होगा। फ्लोराइड संदूषण का अधिकांशतः कारण प्राकृतिक है। इसलिए लोगों को शिक्षित करना और पीने के लिये फ्लोराइड रहित भूजल उपलब्ध कराना एक स्वस्थ्य विश्व के लिए अपरिहार्य आवश्यकता है।

Abstract
Groundwater is the major source for various purposes in most parts of the world. In the present time because of the developmental activities, changing agricultural practices, life styles, food habits etc. ground water contamination is increasing. Presence of low or high concentration of certain ions is a major issue as they make the groundwater unsuitable for various purposes. Fluoride is one such ion. Fluoride concentration of at least 0.6 mg/l is required for human consumption as it will help to have stronger teeth and bones. Consumption of fluoride above 1.5 mg/l results in acute to various forms of fluorosis. Presence of low or high concentration of fluoride in groundwater is because of natural or anthropogenic causes or a combination of both. Natural sources are associated to the geological conditions of an area. Several rocks have fluoride. Anthropogenic sources of fluoride include agricultural fertilisers and combustion of coal. Since ingestion of high fluoride has a long term effect on human health it is essential to monitor its concentration in groundwater used for drinking periodically and take steps to bring them within the permissible range of 0.6 to 1.5 mg/l. Such conditions prove the importance of Water Resources Management. There are several methods available for the removal of fluoride from groundwater. To dilute the ground water contaminated with fluoride, building artificial recharging structures; which will decrease its concentration. Rainwater harvesting through existing wells also will prove effective to reduce the groundwater fluoride concentration. Methods like adsorption, ion exchange, reverse osmosis, electro-dialysis etc can be practiced at community level or at households to reduce fluoride concentration. But the choice of each method depends on the local conditions of the region and source of contamination. Fluoride contamination being a prominent and widespread problem in several parts of India educating the people and providing safe drinking potable water by adopting best water resource management practices is essential for a healthy nation.

भूजल में बढ़ता फ्लोराइड


देश में साफ पेयजल मुहैया कराना अभी भी एक सपना ही है। आज भी हम इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाए हैं। भारत की जनसंख्या एक अरब को पार कर गई है। बढ़ती जनसंख्या और खेती और उद्योगों की बढ़ती जरूरतों के चलते पानी की मात्रा में कमीं की समस्या पैदा हो गई है। यही वजह है कि देश को जल संसाधन प्रबंधन के क्षेत्र में कईं चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इससे शहरी और ग्रामीण जनसंख्या अपनी सभी जरूरतों के लिये ट्यूबवैल पर ज्यादातर निर्भर हो गई है। भूजल की इस बढ़ती निर्भरता और अतिदोहन के चलते जल गुणवत्ता की अनेकानेक समस्याएं पैदा हो गई हैं। इसी के मद्देनजर सन् 2003 में डॉ. एस के शर्मा, जीआरआई की टीम ने 9 राज्यों में जलगुणवत्ता की जांच की और संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं का विश्लेशण करने का प्रयास किया, ये 9 राज्य हैं- जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, ओडिशा और महाराष्ट्र।

परिणामः


सतही, उप-सतही और थर्मल स्टेशनों से एकत्रित किये गए नमूनों में फ्लोराइड की मात्रा जम्मू और कश्मीर में <0.2 से 18पीपीएम, हिमाचल प्रदेश में <0.2 से 6.5 पीपीएम, राजस्थान में > 1.5 पीपीएम, हरियाणा में 0.2 से 0.6, बिहार में 0.35 से 15 पीपीएम, पश्चिम बंगाल में औसतन 12 पीपीएम, छत्तीसगढ़ में 15 से 20 पीपीएम, ओडिशा में 8.2 से 13.2 पीपीएम और महाराष्ट्र में 0.7 से 6.0 पाई गई जिससे साफ संकेत मिलते हैं कि हरियाणा को छोड़कर बाकी सभी स्थानों पर फ्लोराइड 20 पीपीएम यानि काफी अधिक मात्रा में पाया गया। जल गुणवत्ता के इन आंकड़ों का आंकलन नीचे दी गई तालिका-1 में किया गया है।

तालिका-1: भारत के विभिन्न भागों में पाया गया औसत फ्लोराइड संदूषण
 

1

2

3

4

5

6

7

8

9

क्षेत्र

राज्य

लद्दाख

(ज. का.)

मनीकरन

(हि. प्र.)

भीलवाड़ा

(राज.)

सोहना

(हरियाणा)

तंटोली

(बिहार)

तात्तापानी

(छत्तीस.)

बकरेश्वर

(प. बंगा)

खुदरा

(ओडिशा)

अंकेश्वर (महा.)

नमूना संख्या

20

12

15

10

30

25

60

50

65

सतह

  

>1.50

 

0.35 से 4.00

  

8.20 से 13.20

2.70 से 6.00

उप सतह

<0.2 से 18.00

<0.2 से 6.50

 

0.20 से 0.60

  

0.60 से 15.00

  

थर्मल

     

15.00 से20.00

   

स्रोत – हाई फ्लोरीन इन ग्राउंड वाटर क्रीपल्स लाइफ इन पार्ट्स ऑफ इंडिया, डॉ एस के शर्मा, जीआरआई, डिफ्यूज पॉल्यूशन कॉन्फ्रेस डबलिन 2003, यूसीडी.आईई

 


तालिका-2: भारत में फ्लोराइड संदूषण और इसके स्रोत (उपलब्ध सामग्री के आधार पर)

राज्य, जिला/ स्थान

स्रोत

भूजल में फ्लोराइड की सामान्य रेंज

संदर्भ

आंध्र प्रदेश, कुर्मापल्ली वाटरशेड

फ्लोराइड वाली चट्टानें

21.0 मिग्रा/ली. तक

मोंडाल एट एल. 2009

आंध्र प्रदेश, नलगोंडा

फ्लोराइड वाली ग्रेनाइट चट्टानें

0.4 से 20 मिग्रा/ली.

राममोहन राव एट एल, 1993

आंध्र प्रदेश, नलगोंडा जिला के भाग

फ्लोराइड वाली ग्रेनाइट चट्टानें

0.1 से 8.8 मिग्रा/ली.

बृंदा एट एल, 2011

आंध्र प्रदेश वमसधारा रिवर बेसिन

पाइरॉक्सिन एम्फीबोलाइट्स और पेग्मेटाइट्स

3.4 मिग्रा/ली. तक

श्रीनिवास राव, 1997

आंध्र प्रदेश, विशाखापत्तनम

ग्रेनाइट चट्टानें

0.6 से 2.1 मिग्रा/ली.

सुब्बा राव, 2009

आंध्र प्रदेश, वैलापल्ली वाटरशेड

पॉमब्लेंड, बायोटाइट, एपेटाइट, फ्लोराइड और फ्लोराइड वाले कैल्क्रीट्स

0.5 से 7.6 मिग्रा/ली.

रेड्डी एट एल 2010

आंध्र प्रदेश, वैलापल्ली वाटरशेड

फ्लोराइड वाली चट्टानें

0.97 से 5.83 मिग्रा/ली

रेड्डी एट एल 2010

आंध्र प्रदेश और झारखंड

कोल एश

0.1 से >4 मिग्रा/ली

प्रसाद और मोंडाल, 2006

असम, गुवाहाटी

ग्रेनाइट

0.18 से 6.88 मिग्रा/ली

दास एट एल, 2003

दिल्ली

इरिगेशन वाटर और ब्रिक इंडस्ट्री

0.1-16.5 मिग्रा/ली

दत्ता एट एल, 1996

गुजरात, महसाना

ग्रेनाइट और पेग्मेटाइट

0.94 से 2.81 मिग्रा/ली

साल्वे एट एल, 2008

गुजरात, महसाना

कैल्साइट और डोलोमाइट का विलय

1.5 से 5.6 मिग्रा/ली

धीमान और केशरी, 2006

हरियाणा, भिवानी

चट्टानें

0.14 से 86 मिग्रा/ली

गर्ग एट एल, 2009

कर्नाटक, बेल्लारी

एपेटाइट, होर्नब्लेंड और बायोटाइट

0.33 से 7.8 मिग्रा/ली

वोडियार और श्रीनिवासन, 1996

केरल, पालघाट

होर्नब्लेंड और बायोटाइट

0.2 से 5.75 मिग्रा/ली

शाजी एट एल, 2007

महाराष्ट्र, यवतमाल

एम्फीबोल, बोयोटाइट और फ्लोरोएपेटाइट

0.30 से 13.41 मिग्रा/ली

मधनुरे एट एल, 2007

राजस्थान, हनुमानगढ़

फ्लोराइड वाली हॉस्ट चट्टानें

1.01 से 4.42 मिग्रा/ली

सुथार एट एल, 2008

तमिलनाडू, इरोड

हॉस्ट रॉक्स और फ्लोराइड का टूटना

0.5 और 8.2 मिग्रा/ली

कार्तिकेयन एट एल, 1010

उत्तर प्रदेश, कानपुर

 

0.14 से 5.34 मिग्रा/ली

शंकररामाकृष्णन एट एल, 2008

प. बंगाल, हुगली

सुपर फॉस्फेट फर्टीलाइजर

0.01 से 1.18 मिग्रा/ली

कुंडु और मंडल, 2009

स्रोत – के वृन्दा, एल इलैंजो, 2011, फ्लोराइड इन ग्राउंड वाटर : कॉजेज, इंप्लीकेशन्स एंड मिटिगेशन मेजर्स, एकेडेमिया.एडू

 


भूजल में फ्लोराइड के संभावित कारण


जिन संभावित कारणों और स्रोतों से पर्यावरण में फ्लोराइड संदूषण बढ़ रहा है -

एक्विफर सामग्री
अधिकांशतः भूजल में फ्लोराइड प्राकृतिक रूप से उपस्थित रहता है जो ऐसी चट्टानों के टूटने से पैदा होता है जिनमें फ्लोराइड की मात्रा अधिक होती है। फ्लोराइड की उच्च मात्रा वाला पानी अधिकांशतः समुद्र से आने वाले तलछटों और पहाड़ों की तलहटी वाले इलाकों (डब्लूएचओ, 2001; फावेल एट एल, 2006) में पाया जाता है। फ्लोराइड आग्नेय और सेडिमेंट्री चट्टानों में होता है। ग्रेनाइट चट्टानों में भी फ्लोराइड की मात्रा 500 से 1400 मिग्रा/ किग्रा तक पाई जाती है जैसा कि नलगोंडा में देखा गया है।

ज्वालामुखी की राख
ज्वालामुखी की राख में भी फ्लोराइड की उच्च मात्रा प्रायः होती है। हाइड्रोजन फ्लोरीन सबसे ज्यादा घुलनशील गैस है और ज्वालामुखी के फटने की स्थिति में यह आंशिक रूप से बाहर आती है। और यही फ्लोराइड वर्षा के साथ वातावरण से धरती की सतह पर आ जाता है। इसके बाद मिट्टी की सतह से धीरे धीरे वर्षाजल के साथ भूजल में रिस जाता है। चूंकि ज्वालामुखी की राख आसानी से घुल जाती है इसलिये भूजल में फ्लोराइड संदूषण के खतरे और भी बढ़ जाते हैं।

फ्लाई एश
ज्वालामुखी की तरह ही जीवाश्म ईंधन के जलने से उत्पन्न हुई फ्लाई एश में भी फ्लोराइड की काफी मात्रा होती है। कोयले के जलने से खासकर पावर प्लांटों में वर्ष में दुनिया भर में 100 से 150 मिलियन टन से भी ज्यादा फ्लाई एश पैदा होती है। अगर इस फ्लाई एश का निपटान ठीक से न किया जाए तो यह भूजल में फ्लोराइड उत्पन्न करती है। हालांकि यह मात्रा कोयले के प्रकार और गुणवत्ता पर भी निर्भर करती है।

फर्टीलाइजर
फास्फेट वाली फर्टीलाइजर मिट्टी और भूजल में फ्लोराइड की मात्रा को बढ़ा देती है। साथ ही सिंचाई वाले पानी में भी फ्लोराइड एकत्रित हो जाता है। और उस कृषि भूमि पर बार बार फर्टीलाइजर और फ्लोराइड संदूषित जल से सिंचाई करने के कारण भूजल में फ्लोराइड की मात्रा और भी अधिक हो जाती है।

इनके अतिरिक्त विभिन्न औद्योगिक प्रक्रियाओं, सीमेंट उत्पादन और सिरेमिक फायरिंग आदि भी पर्यावरण में फ्लोराइड की मात्रा को बढ़ाते हैं।

भूजल में बढ़ते फ्लोराइड के कारण होती बीमारियां


भूजल में फ्लोराइड नामक विष और उससे होने वाली बीमारी फ्लोरोसिस के बारे में 1930 में ही पता चल गया था। फ्लोरोसिस रोग का फैलाव देश के बड़े भूभाग में हो चुका है और 19 राज्यों के लोग इसकी चपेट में आ गए हैं। इसके भौगोलिक फैलाव और इससे होने वाली समस्या की गम्भीरता का आकलन मुमकिन होने के बावजूद अब तक हमारे पास इसके बारे में अंतिम जानकारी नहीं है। अभी भी देश में फ्लोराइड प्रभावित इलाकों की खोज हो रही है।

बरसों से इसने पेयजल के जरिए मिलने वाले पोषण को नुकसान पहुँचाया है। फ्लोराइड प्रभावित इलाकों में लोग बड़ी तेजी से अपंग हो रहे हैं। आज वास्तव में उन इलाकों में रहने वाले लोग एक अलग मुल्क के बाशिंदे लगने लगे हैं। उस क्षेत्र के सभी नागरिक भावनात्मक रूप से एक हो गए हैं, सभी ज़मीन से निकाला गया ऐसा पानी पीते हैं, जिसमें प्रति लीटर पानी में 1.5 मिलीग्राम से भी ज्यादा फ्लोराइड है। यहाँ रहने वाले सभी लोग बीमार हैं।

फ्लोरोसिस विस्तार


फ्लोरोसिस एक दर्दनाक और पंगु कर देने वाला रोग है जो अधिक मात्रा में फ्लोराइड ग्रहण करने की वजह से होता है। फ्लोराइड हमारे शरीर में पेयजल और भोजन के जरिए जाता है और शरीर के कैल्सियम यानी हड्डियों को प्रभावित करता है।

टेबल-3; शीर्ष 10 राज्य जहां फ्लोराइड प्रभावितों की संख्या सर्वाधिक है..

राज्य

जनसंख्या

खतरे का क्षेत्र

राजस्थान

40,04,613

बड़ा क्षेत्र

तेलंगाना

19,22,783

बड़ा क्षेत्र

कर्नाटक

13,29,602

बड़ा क्षेत्र

आंध्र प्रदेश

10,91,394

मध्यम क्षेत्र

महाराष्ट्र

6,72,939

मध्यम क्षेत्र

बिहार

4,91,923

मध्यम क्षेत्र

मध्य प्रदेश

4,54,054

मध्यम क्षेत्र

केरल

2,75,557

मध्यम क्षेत्र

उत्तर प्रदेश

1,43,967

मध्यम क्षेत्र

गुजरात

90,704

लघु क्षेत्र

19 राज्यों में कुल

117 लाख लोग प्रभावित

 

स्रोत- प्रश्न-संख्या 3296 का उत्तर, लोकसभा 1 अगस्त 2014  (आंकड़े 1 अप्रैल 2014, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय )

 


फ्लोरोसिस परिचय-


फ्लोरीन प्रकृति में विपुल मात्रा में उपलब्ध है, और मानव शरीर में मौजूद फ्लोराइड की 96 फीसदी मात्रा हड्डियों और दांतों में पायी जाती है. फ्लोरीन हड्डियों के सामान्य खनिजीकरण और दांतों पर एनामेल के निर्माण के लिए आवश्यक होता है।

फ्लोरोसिस 24 मुल्कों के लिए एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संबंधी समस्या है, इनमें भारत भी शामिल है. भारत उस भौगोलिक फ्लोराइड बेल्ट में आता है जो तुर्की से चीन और जापान तक इराक, ईरान और अफगानिस्तान होते हुए फैला है. धरती के क्रस्ट में 85 मिलियम टन फ्लोराइड पाया जाता है, इनमें से 12 मिलियन टन फ्लोराइड भारतीय इलाके में स्थित है. ऐसे में यह स्वाभाविक है कि फ्लोराइड का फैलाव भारत में व्यापक, सघन और चेतावनी भरा है. फ्लोरोसिस के खतरे की पहचान भारत में 1937 से ही हो चुकी है. अनुमानतः देश में 6.6 करोड़ से अधिक की आबादी पेयजल के जरिये मानक स्तर से अधिक फ्लोराइड का सेवन कर रही है. भूजल में फ्लोराइड की सांद्रता अधिक होने की वजह से होने वाला गंभीर फ्लोरोसिस रोग भारत के लिए एक जन स्वास्थ्य समस्या है.

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक भारत के 19 राज्य फ्लोरोसिस की जद में हैं (पेयजल में फ्लोराइड का स्तर 1.5 मिग्रा/ली से अधिक). यहां तकरीबन 6.2 करोड़ लोग डेंटल, स्केलेटल और नॉन स्केलेटल फ्लोरोसिस से पीड़ित हैं. इनमें से 60 लाख लोग बच्चे हैं जिनकी उम्र 14 साल से कम है. दुनिया में पेयजल का सबसे बड़ा स्रोत भूमिगत जल है. भारत फ्लोरोसिस से सबसे बुरी तरह प्रभावित मुल्कों में से एक है, यहां बड़ी संख्या में लोग इस रोग से पीड़ित हैं. यह इस वजह से है क्योंकि भारत में बड़ी आबादी शुद्ध पेयजल के लिए भूमिगत जल पर विश्वास करती है और कई इलाकों में भूमिगत जल में फ्लोराइड की मात्रा अधिक है. भारत में फ्लोराइडयुक्त पानी पीने की वजह से 6.2 करोड़ लोग गंभीर किस्म की स्वास्थ्य समस्याओं के शिकार हैं, जिनमें 60 लाख बच्चे हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पेयजल के जरिये फ्लोराइड ग्रहण करने की उच्च सीमा 1.5 मिग्रा/लीटर निर्धारित की है, जबकि भारतीय मानक ब्यूरो ने भारतीय जनता के लिए इसे घटा कर 1.0 मिग्रा/लीटर कर दिया है, इस टिप्पणी के साथ कि ‘कम ही बेहतर है’. मानक स्तर से अधिक फ्लोराइड का सेवन ही डेंटल और स्केलेटल फ्लोरोसिस की असली वजह है. भूमिगत जल में फ्लोराइड की अधिक मात्रा वे चट्टान हैं, जिनमें फ्लोराइड की अधिक मात्रा पायी जाती है. भूमिगत जल में फ्लोराइड की उच्च सांद्रता से प्रभावित होने वाले अधिकतर लोग उष्ण कटिबंधीय मुल्कों के रहने वाले होते हैं, जहां लोग गर्म जलवायु की वजह से अधिक पानी पीते हैं (13). उत्तर पश्चिमी और दक्षिणी भारत के कुछ इलाके फ्लोरोसिस से गंभीर रूप से पीड़ित हैं.(,) उसी तरह दक्षिण भारत में चट्टानों में फ्लोराइड की अधिक मात्रा पायी जाती है जो भूमिगत जल में फ्लोराइड के प्रदूषण का प्रमुख कारण हैं (13), आंध्र प्रदेश के नलगौंडा में ग्रेनाइट चट्टान में फ्लोराइड की मात्रा वैश्विक औसत 810 मिग्रा/किग्रा से काफी अधिक है.

डेंटल फ्लोरोसिस


टूथ एनामेल का निर्माण प्रमुखतः हाइड्रोक्साइपेटाइट(87%) से होता है जो क्रिस्टल स्वरूप में कैल्सियम फॉस्फेट होता है. फ्लोराइड जो हाइड्रोक्साइपेटाइट से अधिक स्थायी होता है, हाइड्रोक्साइड को उससे स्थानांतरित कर देता है और फ्लोरोपेटाइट का निर्माण करता है. डेंटल एनामेल का फ्लोरोसिस उत्पन्न होता है जब फ्लोराइड की अधिक मात्रा

टेबल 4- डीन्स फ्लोरोसिस इंडेक्स के मानक

स्कोर

मानक

सामान्य-

एनामेल सामान्य पारभासी सेमीवर्टिफार्म किस्म की संरचना का प्रदर्शन करता है. सतह मुलायम, चमकीली और सामान्यतः सफेद-पीले रंग की होती है.

संदिग्ध-

एनामेल में सामान्य स्थिति से थोड़ा बदलाव आता है. कभी-कभार सफेद धब्बे भी नजर आने लगते हैं. यह वर्गीकरण उन मामलों के लिए है जहां फ्लोरोसिस अपने हल्के स्वरूप में भी नहीं होता है और यह भी नहीं कह सकते हैं कि दांत सामान्य है.

बहुत हल्के-

छोटे धब्बे, बिल्कुल कागज की तरह सफेद अनियमित तौर पर यहां वहां छितरे होते हैं, ये दांतों के 25 फीसदी हिस्से पर छा जाते हैं. इस वर्गीकरण में 1-2 मिमि के आकार के सफेद धब्बे बाइकस्प्स के कस्प्स पर या दूसरे मोलर पर नजर आते हैं.

हल्के-

एनामेल पर सफेद धब्बे काफी गहरे होने लगते हैं, हालांकि यह दांतो के 50 फीसदी हिस्से को शामिल नहीं करते.

मॉडरेट-

दांतों की पूरी एनामेल सतह प्रभावित हो जाती है, भूरे धब्बे लगातार दिखने लगते हैं.

गंभीर-

पूरी एनामेल सतह प्रभावित हो जाती है और हाइपोलेप्सिया इस कदर धब्बों भरा हो जाता है कि सामान्य किस्म के दांत भी प्रभावित होने लगते हैं. इस प्रकार में सबसे महत्वपूर्ण चिह्न यह होता है कि दांतों पर कुछ स्पष्ट आकार के गड्ढे नजर आने लगते हैं. भूरे धब्बे चारो तरफ फैले होते हैं और अक्सर सड़े हुए प्रतीत होते हैं.

स्रोत- माथुर एससी. इंडेमियोलॉजी ऑफ इंडेमिक फ्लोरोसिस. http://www.pptuu.com/show_22473_1.html

 


भारत के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में डेंटल फ्लोरोसिस की प्रबलता टेबल-5 में बतायी गयी है.

टेबल-5: भारत के विभिन्न हिस्सों में आयु वर्ग के अनुसार डेंटल फ्लोरोसिस की प्रबलता(%)

राज्य/क्षेत्र

आयु वर्ग

प्रबलता

लेखक

कुड्डलोर, टीएन

5-12

31.4

सर्वनन एट एल. इंडियन जे कम्युनिटी मेड. 2008, 33(3): 146-150.

अलपुजा, केरल

10-17

35.6

गोपालकृष्णन एट एल. नेट्ल मेड जे इंडिया. 1999, 12(3) : 99-103.

वडोदरा, गुजरात

वयस्क

39.2-59.3

कोटचा एट एल. इंडियन जे मेड रिस. 2012 जून, 135(6): 873-877.

देवंगरे, कर्नाटक

12-15

13-100 

चंद्रशेखर एंड अनुराधा. इंट डेंट जे. 2004, 54(5) : 235-9.

झज्जर, हरियाणा

7-15

30-94.9

यादव एट एल. इन्वायरॉन गोइकेम हेल्थ, 2009, 31(4) : 431-8

बीरभूम, प. बंगाल

वयस्क

61-66.7

मजूमदार, इंडियन जे पब्लिक हेल्थ 2011, 55: 303-8

पंजाब

5-60

91.1

शशि एंड भारद्वाज. बायोसा. बायोटेक रिस. कम. 2011, 2: 155-163

नलगौंडा, एपी

12-15

71.5

शेखर एट एल. इंडियन जे पब्लिक हेल्थ. 2012, 56(2) : 122-8.

दुर्ग, छत्तीसगढ़

वयस्क

8.2

पांडे, ट्रॉप डॉक्ट. 2010, 40(4) : 217-9.

डुंगरपुर-उदयपुर,राज.  

सभी उम्र   

39.2-72.1

चौबसिया एट एल. इन्वा सा इंजी 2010, 52(3) : 199-204.

पलामू, झारखंड

बच्चे

83.2

श्रीकांत एट एल. रिसर्च रिपोर्ट फ्लोराइड, 2008, 41(3) 206-211.

असम

सभी उम्र

31.3

चक्रबर्ती एट एल. करेंट साइंस. 2000, 78(12) : 1421-1423.

उत्तर प्रदेश

सभी उम्र

28.6

श्रीवास्तव एट एल. इंट जे ओरल एंड मैक्सिलोफासियल पैथो, 2011: 2(2) : 7-12

शिवपुरी, मप्र

13-50

86.8

सक्सेना एंड नरवारिया. इंट जे इन्वा सा. 2012, 3(3).

रायगढ़, महाराष्ट्र

0-23

91.7

बावस्कर एंड बावस्कर. ट्रॉप डॉक्ट. 2006, 36 : 221.

नलगौंडा, एपी

वयस्क

30.6     

निरगुडे एट एल. इंडियन जे पब्लिक हेल्थ. 2010, 54(4) : 194-6

स्रोत- माथुर एससी. इंडेमियोलॉजी -----

 


स्केलेटल फ्लोरोसिस


अत्यधिक उच्च सांद्रता वाले फ्लोराइड के लंबे अंतराल तक सेवन करने से गंभीर स्केलेटल फ्लोरोसिस की बीमारी हो जाती है. 1993 में यह बताया गया कि रोजना 10 से 20 मिग्रा प्रति लीटर फ्लोराइड का सेवन 10 से 20 साल तक लगातार करने से लोगों में हड्डियां टेढ़ी करने वाला स्केलेटल फ्लोरोसिस हो सकता है. स्केलेटल फ्लोरोसिस के शुरुआती चरण में हड्डियों और जोड़ों में दर्द, मांसपेशियों में कमजोरी, जोड़ों में कड़ापन और बहुत गंभीर किस्म की थकावट शुरू हो जाती है. बाद के चरण में हड्डियों का कैल्सिफिकेशन, लंबी हड्डियों में ऑस्टियपोरोसिस और जहां हड्डियां सघन हों वहां ऑस्टियोपोरोसिस के लक्षण दिखने लगते हैं और असामान्य क्रिस्टल सरीखी संरचना बनने लगती है. एडवांस स्टेज में हड्डियां और जोड़ पूरी तरह कमजोर हो जाते हैं और इन्हें घुमा पाना बहुत मुश्किल हो जाता है. रीढ़ की हड्डियों में वर्टिब्रेन आपस में मिल जाते हैं और आखिरी चरण में रोगी बिल्कुल मुड़ा हुआ रह जाता है. स्केलेटल फ्लोरोसिस की पहचान तब तक नहीं हो पाती है जब तक रोगी एडवांस स्टेज में न पहुंच जाये (13). सामान्य स्केलेटल फ्लोरोसिस गांव की अर्थव्यवस्था को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है ( अधिकांशतः आदिवासी आबादी में) क्योंकि इसकी वजह से बीमारी न सिर्फ इंसानों को होती है बल्कि उनके पालतू पशु भी इसके शिकार हो जाते हैं, जो उनकी आजीविका के आधार होते हैं. स्केलेटल फ्लोरोसिस प्रभावितों को शारिरिक रूप से अक्षम और आगे चलकर विकलांग बना देता है. इसकी वजह से इन्हें रोजगार नहीं मिलता और अपना जीवन दूसरों के सहारे जीना पड़ता है. उसी तरह स्केलेटल फ्लोरोसिस से प्रभावित युवा बेहद गंभीर स्थिति में फंस जाते हैं, उनकी शादी गैर-फ्लोराइड प्रभावित इलाकों में नहीं होती और उन्हें मजबूर अपने जैसे व्यक्ति से ही शादी करनी पड़ती है. भारत में स्केलेटल फ्लोरोसिस की प्रबलता विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में टेबल-6 में बतायी गयी है.

टेबल-6: भारत के विभिन्न हिस्सों में आयु वर्ग के अनुसार स्केलेटल फ्लोरोसिस की प्रबलता(%)

राज्य/क्षेत्र

आयु वर्ग    

प्रबलता

लेखक

नलगौंडा, एपी

सभी उम्र

24.9

निरगुडे एट एल. इंडियन पब. जे हेल्थ. 2010 ऑक्ट-दिस, 54(4) : 194-6

दुर्ग, छत्तीसगढ़

वयस्क

6.3-38.1

पांडे, ट्रॉप डोक्ट. 2010, 40(4) : 217-9

डुंगरपुर-उदयपुर(राज)

सभी उम्र

12-27.6

चौबसिया एट एल. जे इन्वाय सा इंजी 2010, 52(3) : 199-204

बिहार

1-5

20

खंडारे एट एल. केल्सिफ टिश्श्यू इंट. 2005 76(6) : 412-8

पलामू, झारखंड

वयस्क

47.4

श्रीकांत एट एल. रिसर्च रिपोर्ट फ्लोराइड. 2008, 41(3) 206-211

असम

वयस्क

1.74

चक्रबर्ती एट एल. करेंट साइंस. 2000, 78(12) : 1421-1423.

उत्तर प्रदेश

सभी उम्र 

14.2

श्रीवास्तव एट एल. इंटर जे ऑफ ओरल एंड मैक्स पैथ 2011: 2(2)7-12

करेका, शिवपुरी(मप्र)

13-50

39.2

सक्सेना एंड नरवारिया. इंट जे इंवायर सा. 2012, 3(3).

स्रोत- माथुर एससी. इंडेमियोलॉजी -----

 


फ्लोराइड की रोकथाम में जल संसाधन प्रबन्धन की भूमिका


चूंकि फ्लोरोसिस का इलाज कठिन है, बचाव ही इसका समाधान है, इसके लिए कई उपाय अपनाये जाते हैं. फ्लोरोसिस विष से बचा जा सकता है या इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है, इसके लिए वैकल्पिक जलस्रोत का सहारा लिया जा सकता है, पेयजल से फ्लोराइड को हटाया जा सकता है और खतरे की जद में आने वाले लोगों के लिए सामान्य हस्तक्षेप में सतही जल, वर्षा जल उपलब्ध कराना और कम फ्लोराइड वाले पानी का सेवन कराना है।

समाधान


जल-प्रबंधन को अगर प्राथमिकता दी जाए तो फ्लोराइड नियंत्रण में बेहतरीन समाधान ये हैं :

(क) हाइड्रोलॉजी के ज्ञान का इस्तेमाल करते हुए एक्वीफर आधारित हस्तक्षेप। साथ ही सुरक्षित पेयजल स्रोतों को चिन्हित करना जिसमें बहुत कम या न के बराबर फ्लोराइड हो। फ्लोराइड संदूषित जल स्रोतों को भी चिन्हित करना।
(ख) वैकल्पिक भूजल स्रोत की पहचान करना और उसे विकसित करना। साफ किये हुए जल, सतह पर मौजूद जल की आपूर्ति
(ग) वर्षाजल पुनर्भरण से भूजल को उस स्तर तक लाने की कोशिश जहाँ खतरा कम हो जाए।
(घ) अगर किसी मामले में उपर्युक्त इन तीनों को लागू नहीं किया जा सकता हो तो वाटर ट्रीटमेंट ही विकल्प बचता है।
(ङ) लक्ष्य आधारित जल-प्रबंधन
(च) रासायनिक खादों के इस्तेमाल पर रोक और जैविक खेती को प्रोत्साहन

(क) हाइड्रोलॉजी के ज्ञान का इस्तेमाल करते हुए एक्वीफर आधारित हस्तक्षेप। साथ ही सुरक्षित पेयजल स्रोतों को चिन्हित करना जिसमें बहुत कम या न के बराबर फ्लोराइड हो। फ्लोराइड संदूषित जल स्रोतों को चिन्हित करना।

भूजल का अत्यधिक दोहन भी फ्लोराइड के संदूषण का एक कारण है इसलिये जरूरत है लोगों को इस बात के लिये जागरूक किया जाए और भूजल अतिदोहन को रोका जाए, साथ ही अत्यधिक वाष्पीकरण को भी रोकने की आवश्यता है इसके लिये ज्यादा से ज्यादा भूभाग पर पौधारोपण करने की आवश्यकता है।

एक्विफर पहचान और मॉनिटरिंग


यूं तो स्वच्छपेयजल के लिये भूजल के कईं सस्ते वैकल्पिक स्रोतों को खोजा जा सकता है फिर भी स्थान और गहराई की दृष्टि से ऐसे एक्विफर को चिन्हित करना उच्च प्राथमिकता होनी चाहिये जिनमें फ्लोराइड संदूषण है और जिनमें फ्लोराइड संदूषण नहीं है.

साथ ही निर्माण की गुणवत्ता और नियमों को ध्यान में रखते हुए अच्छे से डिजाइन किये गए कुओं और भूजल एक्विफर की नियमित मॉनिटरिंग को विशेष तवज्जो दी जानी चाहिये विशेषकर ऐसे इलाकों में जहां भूजल पर निर्भरता के लिये ड्रिलिंग ज्यादा की जाती है।

फ्लोराइड संदूषित इलाकों में ठोस कचरे का सुरक्षित निपटान और लोगों में जागरूकता की कमीं के चलते स्थाई भूजल प्रबंधन अपने आप में एक चुनौती बन गया है. ऐसे इलाकों में अधिक फ्लोराइड संदूषित जल स्रोतों को चिन्हित करके प्रतिबंधित किया जा सकता है. और स्थानीय निवासियों को जागरूक किया जाए कि वें ऐसे जल स्रोतों का पानी पेयजल के रूप में प्रयोग न करें.

(ख) वैकल्पिक भूजल स्रोत की पहचान करना और उसे विकसित करना। साफ किये हुए जल, सतह पर मौजूद जल की आपूर्ति

वैकल्पिक स्रोतों का प्रबंध और जानकारी


फ्लोराइड की अधिकता वाले इलाकों में फ्लोराइड संदूषित जल स्रोतों को प्रतिबंधित करने के बाद वहां के निवासियों को साफ पेयजल मुहैया कराया जाना चाहिये. इसके लिये विभिन्न वैकल्पिक उपाय सरकार द्वारा किये जा सकते हैं, पाइप लाइन, टैंकर या अन्य साफ जल स्रोतों का पानी मुहैया करवाकर।

लम्बी अवधि के फ्लोराइड सम्बन्धी सामाजिक पहलुओं जैसे बेहतर पानी की सुविधाओं तक पहुँच और हैसियत के मुताबिक बेहतर पोषण, कूड़ा-करकट (चारा, पानी या ईंधन) कम करने से भी पोषण में बढ़ोत्तरी होती है। जल संरक्षण के जरिए स्वच्छ जल की उपलब्धता सुनिश्चित होती है, भूजल प्रशासन का लक्ष्य जल स्रोतो में स्वच्छ जल की सुरक्षा होना चाहिए। गरीबी का फ्लोरोसिस के खतरे से बहुत नज़दीकी रिश्ता होता है।

(ग) वर्षाजल पुनर्भरण और भूजल को उस स्तर तक लाने की कोशिश जहाँ खतरा कम हो जाए।

वर्षाजल संग्रहण और भूजल पुनर्भरण


जहां भूजल के अतिदोहन की रोकथाम अनिवार्य है वहीं वर्षाजल संग्रहण और भूजल रीचार्ज का भी बड़ा महत्त्व है. वर्षाजल संग्रहण और भूजल पुनर्भरण से भूजल का लेवल ऊपर ही रहेगा और स्थानीय निवासियों को नीचे के एक्विफर से अतिदोहन की आवश्यकता नहीं होगी.साथ ही वर्षाजल फ्लोराइड संदूषित जल में मिलकर डाल्यूशन का भी काम करेगा. अतः भूजल पुनर्भरण से फ्लोराइड के नियंत्रण करने में काफी मदद होगी।

पानी और भोजन के जरिए फ्लोराइड की ग्राह्यता को कम करने की कोशिश करना, यह फ्लोराइड मुक्त जलस्रोत को अपनाकर या असुरक्षित स्रोत से फ्लोराइड को हटाकर किया जा सकता है। इसके लिये स्थानीय स्तर के मुताबिक जो सबसे बेहतर विकल्प हैं उसे अपनाना चाहिए। जहाँ मुमकिन हो वर्षाजल पुनर्भरण और संरक्षण के विकल्प को अपनाना चाहिए।

(घ)अगर किसी मामले में इन तीनों को लागू नहीं किया जा सकता हो तो वाटर ट्रीटमेंट ही विकल्प बचता है।

डीफ्लोराइडेशन


फ्लोराइड युक्त जल का डीफ्लोराइडेशन भी किया जा सकता है. इसके लिये एलम और लाइम का इस्तेमाल किया जाना चाहिये. एलम और लाइम की उचित मात्रा का इस्तेमाल करके पानी का डीफ्लोराइडेशन किया जा सकता है. लेकिन इसके लिये ध्यान रखना होगा कि इनकी उचित मात्रा का ही प्रयोग हो अन्यथा यह तकनीक कारगर साबित नहीं होगी.

आधुनिक तकनीक


एक्टीवेटेड एल्यूमिना (ऊर्जा की जरूरत नहीं) और रिवर्स ओस्मोसिस (ऊर्जा जरूरी) आधुनिक तकनीक वाले उपाय हैं जिनसे उच्च फ्लोराइडयुक्त जल को स्वच्छ किया जा सकता है. एक महीने तक शुद्ध किया हुआ पानी पिएँ। इसके बाद शुद्ध जल के साथ 10 फीसदी सामान्य जल मिलाएँ ताकि कुछ लवण भी हासिल हो. लम्बे समय तक लवणमुक्त पानी पीना भी अच्छा नहीं है. इस प्रयोग के जरिए हम सन्तुलित तरीके तक पहुँच सकते हैं.

फ्लोराइड हटाने के लिये जल शुद्धिकरण (वाटर ट्रीटमेंट)


फ्लोराइड हटाने के लिये जल शुद्धिकरण का उपाय कई दशकों से अपनाया जाता रहा है। पुरानी तकनीक का प्रयोग किया गया और वह नाकाम भी हो गई, फिर नीरी (एनईईआरई) ने नलगोंडा तकनीक को प्रोमोट किया। रेजिन और इलेक्ट्रो-कॉगुलेशन पर आधारित विभिन्न तकनीकें भी सामने आईं, मगर उन्हें अब तक व्यवहार में नहीं लाया जा सका है।

फ्लोराइड को हटाने के वैकल्पिक तकनीकों के मद्देनज़र पानी को कुछ खास किस्म की ईटों के ऊपर से बहाया गया और उनमें तुलसी के पत्ते भी डाले गए. आज की तारीख में, केवल दो तकनीक ही विभिन्न अपेक्षित कारकों पर खरी उतरी हैं. वैसे, इनका भी फैलाव ढँग से नहीं हुआ है और ये व्यावहारिक भी साबित नहीं हो पाई हैं.

एक्टिवेटेड एल्युमीना (एए)


यहाँ फ्लोराइड के साथ एल्युमीनियम के नाते को ध्यान में रखा गया है, जैसा कि नलगोंडा तकनीक में है, फर्क सिर्फ इतना है कि यह डिहाइड्रोक्सीलेटेड एल्युमीनियम हाइड्रोक्साइड है जो पोरस मेटेरियल का निर्माण करता है। बीडेड पार्टिकिल का आकार जितना स्पष्ट होगा, सरफेस एरिया जितना बड़ा होगा, फ्लोराइड का अवशोषण उतना ही बेहतर होगा और एल्युमीनियम फ्लोराइड यौगिक के रूप में उसका निर्माण होगा। सामान्यतः 0.4-1.2 एमएम व्यास का पार्टिकल साइज एए के स्टैंडर प्रैक्टिस के लिये आवश्यक होता है, यह तत्व की गुणवत्ता पर निर्भर करता है और जल के दूसरे तत्व जैसे पीएच और अल्केलिनिटी पर भी, यह 3000 से 5000 मिग्रा प्रतिकिलो की दर से फ्लोराइड का अवशोषण करता है. रिजेनेरेशन की प्रक्रिया आवश्यक होती है, उसके बाद अवशोषण की दर 10-15 फीसदी कम हो जाती है.

एए का लाभ यह है कि अगर उच्च सान्द्रता युक्त फ्लोराइड जल एक मीटर की ऊँचाई वाली परत के आकार में 20 मिनट तक गुजरे तो फ्लोराइड का स्तर गिरकर 0.1 मिग्रा/लीटर तक रह जाता है या उससे भी कम हो जाता है. इसके लिये किसी ऊर्जा स्रोत की जरूरत नहीं होती है. इस तकनीक के साथ ये परेशानियाँ जरूर हैं कि एक तो अगर पानी का पीएच वैल्यू अधिक हो, उसमें एल्केनिलिटी हो और कार्बोनेट की मौजूदगी हो तो इसके अवशोषण की क्षमता कम हो जाती है. दूसरी, रिजेनेरेशन एक कठिन प्रक्रिया है और तीसरी, शुरुआती दिनों में पानी में अवांछित स्वाद आ जाता है.
1990 के दशक में एए आधारित फ्लोराइड हटाने वाले फिल्टर का भारत में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता रहा है. व्यापक स्तर पर इनका परीक्षण किया गया मगर ये लम्बी अवधि में सफल नहीं हो पाए। कुछ समूह के लोगों को छोड़कर जो 10-15 साल से आज भी इसका इस्तेमाल कर रहे हैं. अब एए फिल्टर में फिर से रुचि जगने लगी है भारत में इसको लेकर फिर से कुछ प्रयोग होने लगे हैं.

रिवर्स ओस्मोसिस (आरओ)


1990 के दशक के मध्य से ही आरओ तकनीक भारतीय फिल्टर बाजार में छाने लगा है. आरओ मेंबरेन फ्लोराइड को हटा सकता है. हालाँकि इससे जो अपशिष्ट जल बाहर आता है उसमें फ्लोराइड की अत्यधिक मात्रा होती है, इसलिये इस अपशिष्ट जल का निष्पादन एक बड़ी समस्या हो जाती है. ग्रामीण क्षेत्रों में आरओ को सामुदायिक वाटर ट्रीटमेंट प्लांट के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है, इसका आकार सौ लीटर प्रति घंटे से लेकर 10 हजार लीटर प्रति घंटे तक होता है. गुजरात और आन्ध्र प्रदेश इस क्षेत्र के अगुआ हैं, वहाँ उद्योगों, समुदायों और सरकारी कार्यक्रमों के साथ गठजोड़ कर बड़े पैमाने पर ऐसे प्लांट लगाए गए. ऐसे अधिकतर प्रयास वाटर एंटरप्राइजेज के रूप में संचालित हो रहे हैं और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हैं.

आरओ का लाभ यह है कि इसमें किसी अतिरिक्त कैमिकल के इस्तेमाल की आवश्यकता नहीं होती। चूँकि यह डिमिनरलाइज भी करता है, इसलिये इसका स्वाद बेहतर होता है, खासतौर पर भारी जल वाले इलाकों में। हालाँकि आरओ तकनीक के साथ परेशानी यह है कि इसको चलाने के लिये ऊर्जा की जरूरत होती है, क्योंकि इसी के जरिये मेंबरेन पर फोर्स के साथ पानी डाला जा सकता है. अवशिष्ट जल में फ्लोराइड की काफी मात्रा होती है, डिमिनरलाइजेशन की वजह से आवश्यक पोषक तत्व भी निकल जाते हैं और कीमत अधिक होने की वजह से यह हर जगह इस्तेमाल नहीं हो पाता और हर किसी की पहुँच से बाहर होता है। मेंबरेन आयात किये जाते हैं और हर 3-4 साल में इसे बदला जाना जरूरी होता है.

(ङ) लक्ष्य आधारित जल-प्रबंधन
विभिन्न विभाग और सरकारी कार्यक्रमों के माध्यम से जलप्रबंधन करके फ्लोरोसिस से मुकाबले की नीति तैयार की जा सकती है। यहाँ हम कुछ बिन्दुओं को रख रहे हैं जिन्हें लागू किया जा सकता है..

स्थानीय स्तर पर सुरक्षित फ्लोराइड मुक्त जल स्रोतों की पहचान, उनका संरक्षण और समान वितरण की व्यवस्था सुनिश्चित करना.
भोजन और पोषाहार से सम्बन्धित सभी कार्यक्रमों में सुरक्षित फ्लोराइड मुक्त जल की व्यवस्था करना, जैसे आँगनबाड़ी, स्कूल, मध्याह्न भोजन आदि (फिल्टर, वर्षाजल पुनर्भरण जैसी तकनीकों को प्रोत्साहित करके)
सभी स्वास्थ्य केन्द्रों जैसे, सीएचसी, पीएचसी और स्थानीय उप स्वास्थ्य केन्द्र में सुरक्षित फ्लोराइड मुक्त जल की व्यवस्था.
फ्लोरोसिस रोकथाम अभियान के तहत गर्भवती और धातृ महिलाओं और पाँच साल से छोटे बच्चों पर विशेष ध्यान देना- फ्लोराइड मुक्त जल और बेहतर पोषण उपलब्ध कराना.

(च) रासायनिक खादों के इस्तेमाल पर रोक और जैविक खेती को प्रोत्साहन
फ्लोराइड की अधिकता वाले इलाकों में यह भी देखना आवश्यक है कि क्या वह क्षेत्र कृषि क्षेत्र है. यदि हां तो कहीं किसान खेतों में अधिक रासायनिक फर्टीलाइजरों का इस्तेमाल तो नहीं कर रहे हैं. फॉस्फेट की अधिकता वाली फर्टीलाइजर फ्लोराइड का कारण है इसलिये रासायनिक खादों के इस्तेमाल पर तुरंत रोक लगानी चाहिये और किसानों को इसके प्रति जानकारी मुहैया करानी चाहिये ताकि वें स्वयं रासायनिक खादों का इस्ताल कम से कम करने के लिये प्रेरित हों.

जैविक खेती को प्रोत्साहन


फ्लोराइड संदूषण के खतरों को कम करने और भूजल में फ्लोराइड को फर्टलाइजरों के माध्यम से मिलने से रोकने के लिये आवश्यक है कि किसानों को जैविक खेती करने के लिये प्रेरित किया जाए. जैविक खेती से भूजल में फ्लोराइड मिलने के खतरे को न केवल कम किया जा सकता है बल्कि जैविक खाद्य पद्धार्थों से स्थानीय निवासियों को अधिक पोषक आहार भी उपलब्ध कराया जा सकता है जो फ्लोरोसिस से प्रभावितों के लिये अनिवार्य है. अतः जैविक खेती भूजल में फ्लोराइड की रोकथाम के लिये एक अहम कदम साबित हो सकती है.

सन्दर्भ


1. स्रोत – के वृन्दा, एल इलैंजो, 2011, फ्लोराइड इन ग्राउंड वाटर : कॉजेज, इंप्लीकेशन्स एंड मिटिगेशन मेजर्स, एकेडेमिया.एडू
2. स्रोत – के वृन्दा, एल इलैंजो, 2011, फ्लोराइड इन ग्राउंड वाटर : कॉजेज, इंप्लीकेशन्स एंड मिटिगेशन मेजर्स, एकेडेमिया.एडू
3. स्रोत – के वृन्दा, एल इलैंजो, 2011, फ्लोराइड इन ग्राउंड वाटर : कॉजेज, इंप्लीकेशन्स एंड मिटिगेशन मेजर्स, एकेडेमिया.एडू
4. सेंटर फार साइंस एण्ड इन्वायरमेंट, नई दिल्ली का प्रकाशन (अमृत बन गया विष), पृष्ठ संख्या 51-58
5. पार्क के पार्क की पुस्तक टेक्स्ट बुक ऑफ प्रिवेंशन एंड सोशल मेडीसीन. एड 21. बनारसीदास भानोट पब्लिशर्स, 1167. प्रेमनगर, जबलपुर, भारत. 2011. पेज 577.
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11. https://www.novapublishers.com/catalog/product_info.php?products_id=15895
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13. अंदेझाथ एसके, घोष जी. फ्लोरोसिस मैनेजमेंट इन इंडिया: द इम्पेक्ट ड्यू टू नेटवर्किंग बिटविन हेल्थ एंड रूरल ड्रिंकिंग वाटर सप्लाई एजेंसीज. आइएएसएच-एआइएसएच पब्लिकेशन. 2000, 260 : 159-165.
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20. डीन, हेल्थ इफेक्ट्स ऑफ इनजेस्टेड फ्लोराइड, नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज, 1993 : पीपी. 169.
21. नेशनल रिसर्च काउंसिल, हेल्थ इफेक्ट्स ऑप इनजेस्टेड फ्लोराइड, नेशनल एकेडमी प्रेस, वाशिंगटन डीसी. 1993.
22. यूनिसेफ्स पोजीशन ऑन वाटर फ्लोराइडेशन. फ्लोराइड इन वाटर : एन ओवरव्यू. http://www.nofluoride.com/Unicef_fluor.cfm

लेखक का कोई कॉंफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट नहीं है.
1. मीनाक्षी अरोड़ा, इंडिया वाटर पोर्टल हिंदी, दिल्ली एनसीआर. ईमेल-minakshi@indiawaterportal.org
2. केसर सिंह, इंडिया वाटर पोर्टल हिंदी, दिल्ली एनसीआर. ईमेल-kesar@indiawaterportal.org

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