जलवायु परिवर्तन से फल एवं अनाज हो रहे हैं बेस्वाद

Submitted by RuralWater on Tue, 12/29/2015 - 09:19
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जबसे रासायनिक खाद और विदेशी बीज आने लगे तब से पैदावार भले बढ़ा हो लेकिन फलों, सब्जियों एवं अनाजों के स्वाद पहले जैसा नहीं रह गए हैं। गाँवों में गोभी, आलू, मटर, धनिया आदि से पुराने महक गायब हैं। यह सब जलवायु परिवर्तन के साथ ही रासायनिक उर्वरकों का असर है। लेकिन आने वाले दिनों में इसका असर व्यापक होने वाला है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह बदलाव हमारे जीवन को प्रभावित करेगा। ग्लोबल वार्मिंग अब अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। कल तक जो बात सिर्फ बहस तक सीमित थी अब उसके दुष्परिणाम हमारे सामने आने लगे हैं। बेमौसम बारिश, सूखा,बाढ़, अत्यधिक ठंडी और गर्मी से मानव जीवन तो क्या जीव-जन्तु और वनस्पतियाँ तक प्रभावित हो रहे हैं।

यह केवल कुछ देशों तक सीमित नहीं है। प्रकृति की मार ने भौगोलिक सीमा को बेमानी कर दिया है। बाढ़, गर्मी और ठंडी से हर कोई परेशान होने लगा है। प्राकृतिक आपदाओं की बाढ़ ने विकसित और विकासशील देशों को एक श्रेणी में ला दिया है। वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये बड़े-बड़े समझौते किये जा रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन ने जहाँ पर्यावरण को प्रभावित किया हैं वहीं पर अनाज और फल भी अछूते नहीं हैं। एक तरफ तो अनियंत्रित प्रकृति ने पैदावार पर असर डाल रही है तो दूसरी ओर फलों एवं अनाजों को बेस्वाद कर रही है। दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के खतरों का अध्ययन किया जा रहा है। अभी तक जो भी अध्ययन सामने आया है उसका परिणाम मानव जीवन के लिये लाभदायक नहीं होने वाला है।

जलवायु परिवर्तन सिर्फ मौसम को ही क्षति नहीं पहुँचा रहा है बल्कि समूचा पारिस्थितिकी तंत्र इससे प्रभावित हो रहा है। पर्यावरण में हुए परिवर्तन के चलते हम कई आहार विशेष और पेय पदार्थ भी खो रहे हैं। विज्ञान और तकनीकी के इतने प्रगति के बाद भी दुनिया की आबादी में करीब 1.7 अरब लोग आज भी कृषि पर निर्भर हैं।

कृषि और पशुपालन मानव सभ्यता का पहला विकास है। जब मनुष्य जंगलों से निकलकर सभ्य जीवन जीने के लिये तैयार हुआ। तब से अब तक कृषि ही मानव सभ्यता को पोषित कर रही है। औद्योगिक विकास को इस कड़ी में सिर्फ पूरक है। इसलिये जलवायु परिवर्तन की कोई भी सार्थक बातचीत करते समय हम कृषि को नजरअन्दाज नहीं कर सकते हैं।

हालांकि, जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान पर नियंत्रण के बड़े-बड़े दावे भी किये जा रहे हैं। इंटरनेशनल सेंटर फॉर ट्रॉपिकल एग्रीकल्चर द्वारा किये गए एक अध्ययन से यह बात सामने आई है कि अगले कुछ दशकों में कई अनाजों, फलों के पैदावार में कमी और उनके स्वाद पर असर पड़ने वाला है।

देश के गाँवों में आम कहावत है कि जबसे रासायनिक खाद और विदेशी बीज आने लगे तब से पैदावार भले बढ़ा हो लेकिन फलों, सब्जियों एवं अनाजों के स्वाद पहले जैसा नहीं रह गए हैं। गाँवों में गोभी, आलू, मटर, धनिया आदि से पुराने महक गायब हैं। यह सब जलवायु परिवर्तन के साथ ही रासायनिक उर्वरकों का असर है। लेकिन आने वाले दिनों में इसका असर व्यापक होने वाला है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह बदलाव हमारे जीवन को प्रभावित करेगा।

आने वाले दिनों में कोको बीन्स के उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है। परिणामस्वरूप बाजार में चॉकलेट दिखने कम हो सकते हैं। असल में चॉकलेट कोको बीन्स से ही बनते हैं। यदि जलवायु परिवर्तन के चलते कोको बीन्स का उत्पादन में कमी आई तो निश्चित रूप से चॉकलेट का टेस्ट स्वप्न बनकर रह जाएगा।

मूँगफली के उत्पादन में कमी आ रही है जिससे इनकी कीमत में उछाल आ सकता है। दरअसल मूँगफली के उत्पादन को सही अनुपात में बरसात और सूरज की रोशनी की आवश्यकता होती है। लेकिन बदलते तापमान के चलते मूँगफली को अब यह सब नहीं मिल पाता। नतीजतन मूँगफली के पैदावार, खपत से ज्यादा है जो इसकी कीमत को बढ़ाने के लिये काफी है।

मूँगफली से तेल के साथ ही कई उपयोगी चीजें मिलती हैं। खाद्य तेलों में मूँगफली का तेल बहुत ही अहम स्थान रखता है।

इसी तरह से पानी की कमी और बढ़ते तापमान के चलते मक्के की खेती में कमी आ रही है। मक्का भी पूरे विश्व में खाद्य पदार्थों में अपना प्रमुख स्थान रखता है। इससे भी बुरी खबर यह है कि तापमान में जरा भी वृद्धि से मक्के का उत्पादन प्रभावित होता है। यदि तापमान मौजूदा अनुपात में बढ़ता रहा तो इससे मक्के का उत्पादन कम होगा।

मक्के की कमी न सिर्फ खाने में दिखेगी बल्कि बाजार को भी पूरी तरह हिलाकर रख सकता है। इन सबके इतर यह भी सच है कि मक्के की दिन प्रतिदिन कमी हमें इसके स्वाद से भी वंचित कर सकती है। जलवायु में हो रहे परिवर्तन का असर समुद्रों के बढ़ते स्तर में भी देखा जा सकता है।

दरअसल जलवायु परिवर्तन के चलते समुद्र में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है। नतीजा समुद्र तेजाबी होता जा रहा है। यह न सिर्फ इंसानों के लिये खतरे की बात है बल्कि समुद्र में रह रहे तमाम जीव के लिये जानलेवा है। मसलन समुद्र में रह रहे जीव आयस्टर आदि कम पैदा होंगे जिससे समुद्री दुनिया प्रभावित होगी।

नमीयुक्त ठंड और सूखी गर्मी के चलते शुगर मैपल पर भारी असर पड़ रहा है। तापमान में हुए बढ़ोत्तरी के चलते मैपल या चिनार के पेड़ प्राकृतिक प्रक्रिया को सही ढंग से अंजाम नहीं दे पाते।

परिणामस्वरूप उनका उत्पादन कम होने लगता है। विशेषज्ञों की मानें तो तापमान मौजूदा समय अनुकूल बदलता रहा तो मैपल का बाजार जैसे पेनसिलवेनिया जैसे क्षेत्रों से खिसकने की भय बढ़ सकता है।

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About the author

.पत्रकारिता को बदलाव का माध्यम मानने वाले प्रदीप सिंह एक दशक से दिल्ली में रहकर पत्रकारिता और लेखन से जुड़े हैं। दिल्ली से प्रकाशित होने वाले कई अखबारों और पत्रिकाओं से जुड़कर काम किया।

वर्तमान में यथावत पाक्षिक पत्रिका में बतौर प्रमुख संवाददाता कार्यरत हैं। प्रदीप सिंह का जन्म 13 जुलाई 1976 को प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। प्राथमिक से लेकर बारहवीं तक की शिक्षा प्रतापगढ़ में हुई।

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