ऐतिहासिक बेतवा नदी पर माफियाओं की कुत्सित नज़र

Submitted by RuralWater on Sun, 01/17/2016 - 10:03
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1. हाईकोर्ट तथा एनजीटी के आदेशों को ठेंगा दिखा माफ़िया कर रहे अवैध खनन
2. शासन-प्रशासन मौन
3. जालौन जिले के एक ही गाँव में खनन को लगभग 500 ट्रक



.प्राचीन नदियों में से एक मध्य प्रदेश से चलकर उत्तर प्रदेश के बुन्देखण्ड के झाँसी, जालौन तथा हमीरपुर जनपदों से होती हुई यमुना में समाहित होने वाली बेतवा नदी से मोरंग खनन पर उच्च न्यायालय तथा एनजीटी ने रोक लगा रखी है के बावजूद रोक के शासन–प्रशासन की अनदेखी के चलते खनन जारी है।

मध्य प्रदेश से चलकर उत्तर प्रदेश के झाँसी, जालौन तथा हमीरपुर के समतल क्षेत्र में बहने वाली बेतवा नदी में जून 2015 को उच्च न्यायालय तथा एनजीटी ने पर्यावरण को दृष्टिगत रखते हुए मोरंग खनन पर रोक लगा दी थी।

पट्टाधारकों को सख्त निर्देश दिये थे कि वह अब खनन नहीं करेंगे साथ ही झाँसी, जालौन तथा हमीरपुर के जिला प्रशासन तथा खनन विभाग को आदेश दिये थे कि वह आदेश का सख़्ती से पालन करवाएँ लेकिन ग़ौरतलब है कि खनन बदस्तूर प्रशासन के संरक्षण में जारी है।

जनपद जालौन एक ऐसा जनपद है जहाँ शासन किसी भी राजनैतिक पार्टी का रहा हो यहाँ खनन कभी बन्द नहीं हुआ है। जनपद मुख्यालय से 10-15 किमी दूर एक गाँव डकोर ऐसा है जहाँ लगभग 500 ट्रक हैं जो मोरंग खनन में दिन-रात लगे रहतेहैं।

जिले में एक ही माफ़िया ऐसा है जो लगभग 25 सालों से प्रभावी है खास बात यह है कि यह माफ़िया खुद कभी अपने नाम से पट्टे नहीं लेता है लेकिन ज्यादातर पट्टों पर उसी का अधिपत्य है। मोरंग लादे ट्रकों की आवाजाही से एक तरफ का राष्ट्रीय राजमार्ग भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया है।

बेतवा नदीपर्यावरणविदों का मानना है कि यदि इसी तरह नदी से खनन होता रहा तो एक समय ऐसा आएगा कि नदी की स्वच्छता नष्ट हो जाएगी। उनका मानना है कि जिस तरह शरीर में फेफड़ों का काम होता है उसी तरह नदी में मोरंग का काम होता है नदी का जीवन बनाए रखना। ऐसा नहीं है कि मोरंग खनन का कार्य चोरी से चल रहा हो शासन, प्रशासन तथा विभाग के अधिकारियों की जानकारी में यह काम धड़ल्ले से चल रहा है।

बिगड़ते पर्यावरण तथा गिरते जलस्तर को दृष्टिगत रखते हुए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने करोड़ों पेड़ों को रोपने तथा जल संरक्षण को मुख्यमंत्री जल बचाओ योजना प्रदेश में लागू की है।

प्रदेश में वर्ष 2000 में जहाँ 22 विकासखण्ड क्रिटिकल श्रेणी में रखे गए थे उनकी संख्या बढ़कर 179 पहुँच चुकी है। जो एक गम्भीर स्थिति है। और बुन्देलखण्ड में पानी कितना महत्त्वपूर्ण है किसी से छिपा नहीं है।

बुन्देलखण्ड का किसान पानी की कमी के चलते खेती नहीं कर पा रहा और वह आत्महत्या जैसे जघन्य अपराध करने पर मजबूर है। जल संरक्षण को आने वाली धनराशि भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है ऐसे में कैसे जल संरक्षण होगा और कैसे बचेगी खेती ये सवाल एक यक्ष प्रश्न सा सभी के सामने खड़ा है।
 

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