पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा से बातचीत के कुछ अंश

Author: 
सुनील नेगी
Source: 
उत्तराखण्ड आज- ई पेपर, 18 जनवरी 2016

सुंदरलाल बहुगुणा देहरादून : 8 जनवरी को अपने बेशकीमती जीवन के 88 वर्ष पूरे करने वाले देश के नामी गिरामी सर्वोदयी नेता और दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण के प्रतीक, हिमालय के गाँधी, सुंदरलाल बहुगुणा उन जानी मानी हस्तियों में से एक हैं जिन्होंने अपना सारा जीवन और सर्वस्व, देश सेवा और हिमालय की सुरक्षा में लगा दिया। दुनिया के सबसे बड़े टिहरी डैम के घोर विरोधी, जिन्होंने लगभग 74 दिनों की भूख हड़ताल कर, केन्द्र व राज्य सरकारों की चूलें हिला दीं और उत्तराखण्ड, हिमालय के जंगलों की सुरक्षा के लिये ऐतिहासिक चिपको आंदोलन की अगुवाई की, ‘सुंदरलाल बहुगुणा’ आज अपनी बढ़ती आयु और अस्वस्थ शरीर के चलते भले ही शारीरिक तौर पर लाचार दिखते हों लेकिन पर्यावरण संरक्षण, देश की नदियों, जंगलों के रख-रखाव व उत्तराखण्ड हिमालय और देश में तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन के प्रति आज भी चिंतनशील दिखाई देते हैं और इन खामियों के लिये विशुद्ध तौर पर सरकारी नीतियों को जिम्मेदार मानते हैं। ‘पहाड़ की जवानी और पानी कभी पहाड़ के काम नहीं आई’ जैसे अपने वर्षों पुराने जुमलों को आज भी दोहराने वाले, जिन्हें समय-समय पर राष्ट्र के पद्मश्री, पद्मविभूषण, जमनालाल बजाज और नोबल प्राइज से एक पायदान नीचे अतिप्रथिष्ठित अन्तरराष्ट्रीय राइट लीवलीहुड जैसे सम्मानों से नवाजा गया, सुंदरलाल बहुगुणा से पिछले दिनों उत्तराखण्ड पत्रकार फोरम के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार सुनील नेगी द्वारा की गई बातचीत के कुछ महत्त्वपूर्ण अंश-

अगले महीने आप अपनी बेशकीमती जीवन सफर के 88 वर्ष पूरे करने जा रहे हैं। इन 9 दशकों के दौरान आपने पर्यावरण संरक्षण के लिये अपना पूरा जीवन दे दिया, आप कैसा महसूस करते हैं?
मैं लम्बे समय से बीमार चल रहा हूँ। मैं अपनी अर्धागनी का बहुत आभारी हूँ जिनके सतत सहयोग के चलते मैं अपने बचे-खुचे जीवन को आगे धकेलने में कामयाब रहा हूँ। मेरे दामाद जो कि स्वयं एक चिकित्सक हैं, मेरी रेगुलर मेडिकल मॉनिटरिंग करते हैं जिसके चलते मैं जीवित हूँ।

दरअसल, चिकित्सकों ने कहा है कि मेरी दो हृदय की नसों में ब्लॉकेज है जिसकी वजह से दिक्कत आ रही है और उम्र के इस पड़ाव में सर्जरी भी सम्भव नहीं है। खैर, जो होगा देखा जायेगा। मुझे आज भी उत्तराखण्ड, हिमालय और देश के पर्यावरण की चिंता सतत रहती है। दुर्भाग्य की बात है कि 15 साल अलग अस्तित्व में आने के बाद भी उत्तराखण्ड में पलायन जारी है और मामूली पलायन नहीं बल्कि व्यापक पैमाने पर। मैं हमेशा से कहता आया हूँ कि पहाड़ की जवानी और पानी कभी पहाड़ के काम नहीं आया। जैसे हमारी नदियों का पानी बाहर और बाहर वालों के काम आता है, ठीक उसी प्रकार पहाड़ों की जवानी भी शहरों की तरफ बह रही है। यह कभी उत्तराखण्ड के काम नहीं आई। बहुत ही दुर्भाग्यजनक पहलू है। दरअसल सच तो ये है कि जब 1960 में डॉक्टर लोगनाथं ने देशभर में इंटर-स्टेट और इंटर-डिस्ट्रिक्ट इकोनॉमिक सर्वे कराया था, उस समय टिहरी आर्थिक तौर पर विकास के सबसे नीचे पायदान पर थी, जबकि अल्मोड़ा दूसरे नंबर पर और दुर्भाग्यवश आज भी। भले ही हम विकास के कितने ही बड़े दावे क्यों न कर लें, हमारा उत्तराखण्ड सरकारों की बेतरतीब, जन और विकास विरोधी नीतियों के चलते आज भी रोजी, रोटी, रोजगार, विकास और स्वास्थ्य सेवाओं के मानदंड पर खरा नहीं उतर रहा है। यही वजह है की आज भी पहाड़ों से बेतहाशा गति से पलायन जारी है। पहले हमारी आमदनी का मुख्य स्रोत तीर्थ यात्रा था, अब सड़कें बन गयी, आम जनता की कमाई का ये साधन भी खत्म हो गया। कितनी विडंबना है कि हमारे उत्तराखण्ड का लैंड एरिया ज्यादा है, प्रति व्यक्ति जमीन अधिक है, लेकिन गरीबी जस की तस बरकरार है। हम भले ही बड़े-बड़े आंकड़े क्यों न पेश करें हमारी आर्थिक स्थिति खराब ही हुई है। वर्षों से पहाड़ों में मनी आॅर्डर अर्थव्यवस्था विद्यमान रही है। अब नौजवान भारी संख्या में शहरों की तरफ पलायन कर चुके हैं, यह एक बहुत ही खतरनाक ट्रेंड है। यदि सरकारों का हमारे पहाड़ों की तरफ यही ढुलमुल रवैया रहा तो निश्चित तौर पर एक दिन समस्त उत्तराखण्ड खाली हो जायेगा और हमारे पास हाथ मल के पछताने के सिवाय कुछ नहीं बचेगा।

आपकी दृष्टि में इसका इलाज क्या है?
देखिये, उत्तराखण्ड में हो रहा बेतहाशा पलायन, सुरक्षा और सामरिक दोनों ही दृष्टि से बेहद खतरनाक है। सभी जानते हैं कि विस्तारवादी चीन हिंदुस्तान को अपना पहला दुश्मन समझता है। 1962 में उसने हमारी पीठ पर कैसे खंजर घोंपा, सभी जानते हैं। आज चीन पड़ोसी मुल्क नेपाल में अपने फौजी अड्डे बना रहा है। वहाँ तक रेल लाइन और सड़कें बिछा चुका है। उत्तराखण्ड में विभिन्न जिलों, गाँवों और शहरों में तथा विभिन्न हिमालयी राज्यों में भी नेपाली बड़ी संख्या में रचे बसे हैं। चीन की सीधी-सीधी नीयत है कि किसी तरह नेपाल और नेपाल वासियों को विश्वास में लेकर वह उत्तराखण्ड हिमालय और देश के अन्य हिमालयी राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्रों पर अपना गैर-कानूनी अधिपत्य अथवा कब्जा जमा लें। यानी जब तक इस देश में एक ठोस हिमालयन नीति नहीं बनेगी तब तक उत्तराखण्ड व हिमालय समेत हिमालयन राज्यों का कल्याण नहीं हो सकता, न विकास की दृष्टि से, न पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से और न ही राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से यही नहीं पहाड़ों का लैंड यूज भी बदलना होगा हमें। सारे उत्तराखण्ड से चीड़ का सफाया करना होगा क्योंकि चीड़ सारी भूमि को एसिडिक व पूर्णत: बंजर बना देता है, जहाँ भविष्य में हम कुछ भी पैदा नहीं कर सकते। ये सब एक ठोस और यूनिफॉर्म हिमालयन नीति के तहत निहित होना चाहिए। दरअसल, सरकार की सभी नीतियाँ अल्प दृष्टि वाली हैं, उन्हें बड़े डैमों में अपना फायदा नजर आता है, भले ही उत्तराखण्ड या देश के अन्य हिमालयी राज्यों की जनता को इनसे भयंकर नुकसान ही क्यों न झेलना पड़े, उन्हें इसकी चिंता कहाँ? कुल मिलाकर मेरा ये कहना है कि जब तक पहाड़ की एक ठोस हिमालयन नीति नहीं बनती और पहाड़ की जवानी और पानी को पहाड़ के ही काम नहीं लाया जाता उत्तराखण्ड हिमालय और देश के हिमालयी राज्यों और वहाँ की जनता का चौमुखी कल्याण संभव नहीं है। जब तक पहाड़ों का लैंड यूज नहीं बदलेगा न पहाड़ों का पानी देश के काम आएगा और न ही वहाँ की जवानी उत्तराखण्ड के काम ही आएगी।

लेकिन अभी हाल ही में उत्तराखण्ड की कांग्रेस सरकार ने यह घोषणा की है कि वे सिद्धान्तत: ऊँचे इलाकों में चीड़ के वृक्षों को क्रमानुसार एक विशेष नीति के तहत काटेंगे अथवा खत्म करेंगे ताकि इनसे धीरे-धीरे छुटकारा पाया जा सके। क्या आप अब भी संतुष्ट नहीं हैं?
देखिये, अगर ये इतना आसान होता तो शायद सरकारें इस समस्या का बहुत पहले ही निराकरण कर चुकी होती। चीड़ के वृक्षों का खात्मा करना एक अलग बात है और उससे अधिक अनुपात में पर्यावरणीय और उत्पादकता की दृष्टि से उपयोगी बांझ या अन्य उपजाऊ प्रजातियों के वृक्ष भारी संख्या में लगाना एक दूसरी बात है। यदि आप तेजी से बगैर वैकल्पिक वृक्ष लगाकर व्यापक पैमाने पर चीड़ के वृक्षों को काटना शुरू कर देंगे तो उत्तराखण्ड में पर्यावरणीय दृष्टिकोण से संकट पैदा हो जायेगा। पहाड़ एकदम नंगे हो जायेंगे और उत्तराखण्ड हिमालय में व्यापक पैमाने पर बाढ़, प्राकृतिक आपदा और भूस्खलन जैसे खतरों का एक नया अध्याय या सिलसिला शुरू हो जायेगा। यही नहीं बल्कि लकड़ी माफिया की नयी प्रजातियाँ भी शुरू हो जाएँगी, वैसे ही जैसे पिछले पंद्रह सालों से नए उत्तराखण्ड राज्य के बनने के बाद गैर कानूनी खनन को लेकर राज्य में हमारे प्राकृतिक संसाधनों का गैर-कानूनी ढंग से शोषण हो रहा है और हिमालय के पर्यावरण और इकोलॉजी को बेतहाशा नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

सरकारें बड़े-बड़े दावे कर रही है कि उन्होंने उत्तराखण्ड में व्यापक पैमाने पर औद्योगीकरण किया है, विकास किया है। आपकी दृष्टि में वो कौन से ठोस कदम होने चाहिए जिनके चलते पहाड़ों से पलायन पर ब्रेक लग सके और पहाड़ की जवानी पहाड़ों के ही काम आ सके?
मेरी नजर में मुख्य समाधान तो यही है की पहाड़ों की जमीन का लैंड यूज बदलना होगा क्योंकि जब तक लैंड यूज नहीं बदलेगा तो पहाड़ों के लोग खाएँगे क्या, रहेंगे कैसे? समस्त उत्तराखण्ड में चीड़ को खत्म करके अन्य उपयोगी प्रजातियों जैसे चेस्टनट, अखरोट, मूंगफली आदि की बड़े पैमाने पर खेती की जानी चाहिए। इसके अलावा पहाड़ों में गृह उद्योग विकेंद्रीकृत स्तर पर लगाने होंगे ताकि लोगों की व्यापक स्तर पर भागीदारी के साथ-साथ उन्हें रोजगार भी मुहैया हो सके। साथ ही जड़ी-बूटियों का संरक्षण, फलों की पैदावार, स्माल एवं कॉटेज इंडस्ट्रीज का व्यापक जाल भी हमें पहाड़ों में बिछाना होगा। सरकार को क्षेत्रीय स्तर पर फलों के संरक्षण के लिये कोल्ड स्टोरेज की भी व्यवस्था करनी होगी। ये सब एक ठोस हिमालयी नीति के तहत ही संभव हो सकेगा।

आप सदैव उत्तराखण्ड हिमालय के पर्यावरण के लिये चिंतित रहे हैं। जून 2013 की प्राकृतिक आपदा को आप किस रूप में देखते हैं? क्या हम भविष्य में इन आपदाओं से कभी निजात पा सकेंगे?
देखिये, प्राकृतिक आपदाओं पर पूर्ण अंकुश लगाना इंसान के बस में कतई नहीं है और न ही हम निश्चित तौर पर ये पता लगा सकते हैं कि ये कब आने वाली हैं? किंतु हाँ हम इन्हें काफी हद तक नियंत्रित अवश्य कर सकते हैं। आज दुर्भाग्य से विकास की तथाकथित अंधी दौड़ और बड़े-बड़े वैज्ञानिक अनुसंधानों के चलते पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग की शिकार है। भारत सहित दुनिया के सभी देशों में लोग व्यापक पैमाने पर अस्थमा, फेफड़ों और हृदय की बीमारियों से ग्रस्त हैं और दूषित पर्यावरण के चलते न सिर्फ मोर्टेलिटी रेट में अनियंत्रित इजाफा हुआ है बल्कि हिमालयी ग्लेशियर भी तेजी से पिघल रहे हैं, जो आने वाले समय में पूरी दुनिया के लिये जबरदस्त खतरा बने हुए हैं। हमारी सिविलाइजेशन निःसंदेह बेहद खतरे में है। जून 2013 की प्राकृतिक आपदा इस दिशा में एक छोटा सा उदाहरण मात्र है, जो हमें भविष्य में होने वाली मानव जनित प्राकृतिक आपदाओं के प्रति सावधान कर रहा है। मेरी व्यक्तिगत नजर में 2013 की केदार घाटी की आपदा विशुद्ध तौर पर एक मानवजनित आपदा ही थी। जब-जब इंसान ने प्रकृति के साथ तथाकथित विकास के नाम पर खिलवाड़ करना शुरू किया तब-तब प्रकृति ने हमारे मुँह पर इस प्रकार की भयंकर आपदाओं के जरियो जबरदस्त तमाचा मारा है। उत्तराखण्ड हिमालयी देव भूमि है जहाँ स्प्रिचुअल टूरिज्म को बढ़ावा मिलना चाहिए लेकिन सरकारों और निजी ठेकेदारों, बिल्डरों, पूँजीपतियों ने इसे बड़ी-बड़ी अट्पलिकाएं, डैम, होटल्स, गैर कानूनी खनन और गैर तर्तीबी विकास मॉडल्स को सिरे चढ़ाकर यहाँ के पर्यावरण, जलवायु और प्रकृति के साथ जबरदस्त खिलवाड़ किया। नतीजतन, हिमालय का पहले से ही नाजुक इकोसिस्टम बुरी तरह गड़बड़ा गया और केदार घाटी में जबरदस्त प्राकृतिक आपदा ने जन्म लिया जिसमें न सिर्फ हजारों बेशकीमती जाने गयी बल्कि उत्तराखण्ड की अर्थव्यवस्था को भी हजारों करोड़ रुपयों का नुकसान हुआ। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए की बड़े डैम पहाड़ी नदियों के अविरल धारा को रोकते हैं और बहुत बड़े पैमाने पर बाढ़ का कारण बनते हैं। विकास के नाम पर सड़कें और डैम बड़े-बड़े डायनामाइट एक्सप्लोशंस के चलते भूस्खलन को जन्म देते हैं और बड़े पैमाने पर जान माल के नुकसान का कारण बनते हैं। ये सभी वजहें हमारे पहाड़ों के इकोलॉजिकल सिस्टम को बुरी तरह प्रभावित कर आपदाओं के निमंत्रण का कारण बन रही हैं।

क्या वजह है की पूरी दुनिया में लोकप्रिय, ‘चिपको आंदोलन’ उत्तराखण्ड और देश के अन्य हिमालयी प्रदेशों के लिये एक बेहतर व ठोस सीख वाला आंदोलन नहीं बन पाया? या फिर आपकी दृष्टि में ये सफल रहा।
देखिये, मेरी दृष्टि में चिपको आंदोलन एक बेहद सफल आंदोलन रहा जिसने पूरी दुनिया को पर्यावरण संरक्षण और डेफरेस्टेशन की तरफ मोड़ा और जनता में एक नयी खलबली और पर्यावरण व पेड़ों के संरक्षण के प्रति नयी सोच और जनजागृति पैदा की। कोई भी आंदोलन तभी सफल होता है जब तक उसमें निरंतरता रहती है और जनता जनार्दन का उससे जुड़ाव रहता है, लेकिन मेरी नजर में चिपको के साथ ऐसा नहीं हो पाया। एक निश्चित समय के बाद जनता इससे ज्यादा नहीं जुड़ सकी। मेरी व्यक्तिगत नजर में अगर आज भी सरकारें चिपको द्वारा दिए गए दो महत्त्वपूर्ण नारों पर अमल करती हैं तो निश्चित तौर पर उत्तराखण्ड, देश के हिमालयी प्रदेश और पर्यावरणीय संरक्षण के प्रति सजग लोग अपने उद्देश्य में निश्चित तौर पर सफल होंगे। ये नारे हैं- धार ऐंच पानी अर्थात पहाड़ों की ऊंचाई तक नदियों से पानी ले जाओ और ढाल पर तपल यानी पहाड़ों के ढलानों पर बड़ी तादाद पर पेड़ लगाओं ताकि हिमालयी प्रदेशों और पहाड़ों में न सिर्फ खुशहाली आएगी बल्कि इन राज्यों के विकास में भी पर्यावरण संरक्षण और हरियाली एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी।

सुनील नेगी, अध्यक्ष, उत्तराखण्ड जर्नलिस्ट फोरम

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