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विज्ञान की कहानी ‘पानी की जुबानी’

Author: 
श्रीमति मुनेश पंवार
Source: 
जल चेतना तकनीकी पत्रिका, जनवरी, 2013

मेरी नम्र शक्ति से पत्थर भी टूट जाता है:-
. ‘टप-टप-टप-मुन्ना राजा, आ जा बाहर।’ तुम कौन हो? मैं तुम्हारा बड़ा भाई हूँ। मेरा नाम पानी दादा है। पानी दादा तुम कहाँ रहते हो? मैं बादल से आ रहा हूँ। पानी दादा तुम्हारा घर बादल पर है। नहीं मेरा घर नदी में, तालाब में, समुद्र और कुँओं में है। मैं तुम्हारे घर की बाल्टी, लोटा, गिलास, और घड़े में भी रहता हूँ। मगर आज बादल पर कैसे गये थे ?

मुन्ना तुम सूरज चाचा को जानते हो, वह बहुत गर्म हैं। उनकी तेज किरणें जब हमारे घर, समुद्र, नदी, तालाब आदि पर पड़ती हैं, तब उनकी गर्मी मैं सह नहीं पाता। भाप बन जाता हूँ। हल्का होकर ऊपर उठने लगता हूँ और बादल बनकर ऊपर छा जाता हूँ। ‘इसके माने सूरज चाचा के कारण ही तुम बादल बनते हो।’

नहीं मुन्ना। तुम्हारे घर में जो भगोने में पानी खौलता है। मैं वहाँ से भी भाप बनकर उड़ जाता हूँ। रेलगाड़ी के इंजन से भी भाप निकलती है। वह भाप ऊपर जाकर बादल बन जाती है।

फिर मुन्ना बादल घूमने चल पड़ता है। रास्ते में उसे पहाड़ मिलते हैं। वे कहते हैं बादल रूक जाओ। मैं पहाड़ के ऊपर धीरे-धीरे चढ़ने लगता हूँ। उसके ऊपर बहुत ठंढक होती है। मुझे भी ठंड लगती है। फिर मेरी भाप की छोटी-छोटी बूँदे एक दूसरे से मिलकर बड़ी बूँदे बन जाती है।

‘‘फिर क्या होता है? हवा दीदी, हमें अपने ऊपर सँभाल नहीं पातीं, छोड़ देती हैं। मैं वहाँ से लड़खड़ाता हुआ नीचे गिर जाता हूँ। मुन्ना-इसी को बरसात कहते हैं। जाड़े के दिनों में मैं जिद के कारण और ऊपर चल देता हूँ। तब तुम्हे ठंड लगती है। मैं जमकर बर्फ बन जाता हूँ और लाचार होकर नीचे गिर जाता हूँ। रास्ते में हवा की नमी से अपनी बूँदें बर्फ पर लपेटता, उन्हें बड़ा करता, आकर जमीन पर गिरता हूँ।” इसका मतलब बादल पर जमकर तुम बर्फ बनते हो जिसे ओले कहते हैं।

. मुन्ना-पानी दादा-इतना पानी बरसता है, वह कहाँ चला जाता है। मुन्ना-गर्मी के दिनों में यह बरसात का पानी कहाँ चला जाता है ? यह गर्मी के दिनों में सूरज चाचा की तेज किरणों से ताल-तलैया से मुझे भाप बनाकर उड़ा ले जाते हैं। फिर पेड़-पौधें, आदमी, कीड़े-मकोड़े मारे प्यास के तड़पने लगते हैं। फिर मैं पहाड़ लाँघता हुआ ठंडा होकर बरस जाता हूँ। सब खुशी से नाचने लगते हैं। फिर रास्ते में धूल के कणों को साथ लेकर नदी, तालाब कुँओं नालों में चला जाता हूँ। मुन्ना-पहाड़ पर जब हमारी बूँदें पड़ती हैं तो मैं चट्टानों को भी तोड़ देता हूँ। मुन्ना-जब मैं चट्टानों पर बार-2 गिरता हूँ वह टूट पड़ती है।

मुन्ना-जो लगातार मेहनत करता है वह अवश्य ही सफल होता है। फिर नीचे चट्टानों को तोड़ता, धकेलता बढ़ता जाता हूँ। फिर जगह मिलने पर मैं ऊपर से धार के रूप में गिरता हूँ। शोर मचाता हूँ। जिसे लोग ‘झरना‘ कहते हैं।

मैसूर राज्य की कावेरी नदी में एक झरना इतना सुन्दर है कि उसे दूर-दूर से लोग देखने आते है। सवेरे जब सूरज की किरणें झरने पर पड़ती है, तो सात रंग की होकर चमकती है।

अफ्रीका में एक झरना है, उसका नाम है (विक्टोरिया जलप्रपात) वह संसार का सबसे बड़ा झरना माना जाता है। तुम पानी दादा इतने ऊपर से गिरते हो तब तो तुम्हें बहुत चोट लगती होगी। मैं बड़ी-बड़ी चट्टानों को अपने साथ लेकर आगे बढ़ता हूँ वैसे मैं-बहुत ही ‘‘देखने में कोमल, निर्मल, सत्यनिष्ठ, सुन्दर, कल-कल की वाणी हूँ-कभी हिम्मत नहीं हारता।” मैं दृढ़ निश्चय वाला हूँ।

. पानी कहता है-मेरे बारे में सन्त तुकाराम ने कहा है ‘‘कि पानी तो इतना मृदु होता है कि आँखों में जाने पर भी तकलीफ नहीं देता, फिर भी सत्यनिष्ठ इतना कि पत्थर को फोड़ता है। वह सामने वाले पर प्रहार नहीं करता। पानी पत्थर पर गिरता है तो वह स्वयं ही बूँद-बूँद बिखर जाता है और पत्थर को फोड़ता है। वह बिन्दु बनता है, वह नम्र होता है, मृदु नम्र शक्ति से पत्थर से भी टूट जाता है।” इसी तरह तुम्हें भी होना चाहिए। जो तुम्हें सतायें, आगे बढ़ने न दें, उन्हें प्यार करो, मगर रूको नहीं। मैं कितना नम्र, मृदु, स्वच्छ निर्मल और शीतल होता हूँ। तुम भी मेरी तरह रहोगे तथा ऐसा ही करोगे तो सारे संसार में यश पाओगे।

मैं ढ़ाल देखकर दौड़ता हूँ, काटता और पाटता हूँ:-
पानी कहता है- मेरे अन्दर बहने का गुण है। मैं जहाँ ढ़ाल देखता हूँ। वहीं चल देता हूँ। बरसात के बाद मैं जमीन के अन्दर घुस जाता हूँ। नीचे पत्थर की कड़ी चट्टानें होने के कारण मैं ज्यादा नीचे नहीं जा पाता। मैं चट्टानों की ढ़ाल के सहारे अंदर-अंदर ही नीचे उतरता हूँ। जहाँ मेरी साँस फूलने लगती है वहाँ मैं फुहारा बनकर निकलने लगता हूँ। इसे पाताल-तोड़ कुएँ कहते हैं। मैं नालियों से होता हुआ तुम्हारें खेतों में जाता हूँ।

मुन्ना आओ तुम्हें एक खेल दिखाये : साइफन किसे कहते है? एक बाल्टी में पूरा पानी भर कर बाल्टी को मेज पर रख दो। एक रबर की नली लो उसका एक सिरा बाल्टी में पानी के अन्दर डुबो दो। दूसरा मेज के एक टब में लटका दो। एक बार मुँह से ट्यूब की हवा खींच लो। देखो क्या होता है। दादा-यह बाल्टी से पानी नीचे बर्तन में गिरने लगता है। इसे ‘साइफन’ कहते है। मेरे अंदर ये बहने का गुण होने के कारण आज के वैज्ञानिक मुझे पहाड़, नदी-नाले, सड़क ऊपर व नीचे जहाँ चाहते हैं, वहाँ ले जाते हैं।

मैं जहाँ तेज बहता हूँ वहाँ अपने साथ मिट्टी बहाकर ले जाता हूँ काटता हुआ चला जाता हूँ। जहाँ धीरे व रूक कर बहता हूँ। वहाँ किनारे-किनारे पाटता जाता हूँ।

मैं रंग, गंध व स्वादहीन हूँ:
मैं तो भैया रंग, गंध व स्वादहीन हूँ। निथारकर, उबालकर स्वच्छ करते हो स्वच्छ हो जाता हूँ। चीनी व गंध की वस्तु मिलाते हो तो मैं मीठा, खुशबूदार महक वाला हो जाता हूँ। मिट्टी, साबुन मिला दो तो मैं गन्दा हो जाता हूँ।

हर जानदार को मेरी जरूरत है:
मुन्ना-जैसे तुम मुझे पीते हो। पेड़-पौधें बिना मुँह और हाथ के कैसे पानी पीते हैं। मुन्ना-वे अपनी जड़ों से पानी पीते हैं। जड़ों का पहला काम है पौधों को हवा के झोकों से बचाना दूसरा काम है अन्दर से खूराक लेना। ये कार्बनडाई आॅक्साइड खींचते हैं। आॅक्सीजन छोड़ते हैं। जिससे हम साँस लेते हैं। रेगिस्तानी जमीन में पानी की कमी होती है। वहाँ वृक्ष कटीली टहनियों वाले होते हैं, नागफनी भी ऐसी ही होती है। अब तो सरकार का कहना है कि पेड़ अधिक लगाओ नहीं तो सूखा पड़ जायेगा। वर्षा नहीं होगी।

मुझे लोग अपने खेतों में तरह-तरह से ले जाकर सिंचाई करते हैं। कहीं सरकारी ट्यूबवेल व नहरों से मैं जाता हूँ। छोटी-छोटी नालियाँ बनाकर मुझे अपने खेतों तक ले जाते हैं, बाँध बनाना तो बहुत खर्चीला होता है। मेरे द्वारा बिजली भी पैदा की जाती है। फिर मैं तुम्हें तरह-तरह की सुविधाएँ देता हूँ। पेड़-पौधें भी मुझे जरूरत से ज्यादा नहीं रखते हैं। पानी अधिक होने से वे गल जाते हैं और सड़ जाते हैं।

मेरे द्वारा पनचक्की भी चलायी जाती है। पनचक्की आटा पीसने के काम आती है। आज कल तो इंजन वाली चक्की से आटा पीसा जाता है। जिससे गेहूँ की अधिक शक्ति जल जाती है। मुन्ना-अच्छा पानी दादा तुम तो बहुत ही गुण वाले हो मैं लोगों को कहूँगा। तुम्हें तरह-तरह से बचायें फालतू न बहाये।

आओ हम सब मिलकर पानी बचायें, खुशी मनायें:
. मुन्ना हमें इस बात को अब ध्यान में रखना है कि हम सब मिलकर हौज बनाकर, घड़ों में पानी भरकर, पेड़ अधिक से अधिक लगाकर अपने देश को सूखा व अकाल पड़ने से बचायें। नलों को फालतू न चलायें। टंकी खुली न छोड़े नहीं तो पानी बेकार ही बहता रहेगा। हाथ भी ऐसी जगह धोये जहाँ वह पानी पेड़-पौधों के उपयोग में आ सके। उपयोग किया हुआ पानी भी पेड़-पौधों में डाल दें। कपड़े धोने, बर्तन साफ करने, दाल वगैरा धोने वाला पानी गन्दा होने पर भी काम आ सकता है। कपड़ों धोकर या पशुओं को नहलाकर पानी को गंदा न करें। इसके लिये उपयुक्त स्थान का चुनाव करें। पाॅलीथीन की थैलियाँ नदियों में न बहायें, नहीं तो पानी दूषित हो जायेगा। जिससे तरह-तरह की बीमारियाँ फैलेगी। हर स्थान पर लोगों को समझाने की आवश्यकता है। तभी हम सब अपने देश को हरा-भरा रख सकते हैं और खुशी मना सकते हैं। यदि हम सब इन बातों का ध्यान नहीं रखेगें तो परिणाम घातक ही होगें।

सम्पर्क
श्रीमति मुनेश पंवार, (अध्यापिका) वि.:- रा.प्रा.वि. हल्दी, पन्तनगर वि.वि, उत्तराखण्ड

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