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साल-दर-साल होता मौसम का गर्म मिज़ाज


.इस बार जनवरी माह का औसत तापमान पिछले सारे रिकॉर्ड को तोड़ दिया है। यदि इसकी तुलना पिछले 15 सालों के जनवरी माह के औसत तापमान से की जाये तो यह साबित होता है कि इस बार जनवरी सबसे अधिक गर्म बना हुआ है।

जबकि इस सबके बीच यह आँकड़ा भी हमारे सामने है कि पिछले साल जून में गर्मी ने 48 डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर पहुँच कर सभी रिकॉर्ड तोड़ दिये थे। जिससे हमारे देश में दलहन, तिलहन और चावल की खेती प्रभावित हुई।

अब मौसम की मार से इस बार देश में 20 लाख हेक्टेयर कम गेहूँ की बुआई हुई है। कम ठंड से रबी की प्रमुख फसल गेहूँ के खराब होने का खतरा बना हुआ है। जबकि पिछले साल गर्मी ने खूब रुलाया था।

जून की गर्मी से लोग बेहाल हो गए थे। केवल भारत में ही 2,300 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। भारत-पाकिस्तान में तो पारा 50 डिग्री सेल्सियस के पास पहुँच गया था।

वर्ष 2015 की बात की जाये तो वैश्विक तापमान में 0.70 डिग्री की बढ़ोत्तरी हुई है। औसत तापमान में हर साल वृद्धि हो रही है। नया साल भी इसी राह पर बढ़ता नजर आ रहा है। इसका परिणाम यह है कि इस समय जाड़े के मौसम से सर्दी ग़ायब है।

दिसम्बर-जनवरी में उत्तर भारत ठंड से ठिठुर जाता था लेकिन अब कड़ाके की ठंड ग़ायब है। एक के बाद एक वातावरण के ऐसे बदलाव देखने को मिल रहे हैं जो मौसम के बदलते मिज़ाज और इसके ख़तरों की ओर इशारा करती हैं। ठंड के मौसम में भारी बारिश से चेन्नई में बाढ़ आ जाती है।

मौसम विज्ञानी भी प्रकृति के इस मिज़ाज को भाँप नहीं पा रहे हैं। अगले महीने के तापमान को लेकर कोई आकलन करना अब सम्भव नहीं हो पा रहा है। सर्दियों के दो-तीन महीनों में तापमान लगातार सामान्य से ऊपर चल रहा है।

मौसम में आ रहे बदलावों को लेकर विश्व मौसम संगठन की रिपोर्ट भावी खतरे की ओर भी संकेत करती है। यह रिपोर्ट बताती है कि पिछले चार सालों से औसत वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, जिसकी वजह ग्रीन हाउस गैसों के उर्त्सजन में बढ़ोत्तरी होना है। हवा में कार्बन की औसत मात्रा 400 पार्ट प्रति मिलियन तक के खतरनाक स्तर पर पहुँच गई है।

यह तय मानकों से 43 फीसदी ज्यादा है। रिपोर्ट के अनुसार पहले 2014 को सबसे गर्म वर्ष माना गया था, क्योंकि उस दौरान औसत वैश्विक तापमान 0.61 डिग्री बढ़ा था। लेकिन 2015 में यह बढ़ोत्तरी कहीं ज्यादा 0.70 डिग्री दर्ज की गई।

इस प्रकार बीता वर्ष सदी का सबसे गर्म वर्ष रहा है। नया साल भी इसी राह पर बढ़ता दिख रहा है। भारत के सन्दर्भ में यदि मौसम विभाग की रिपोर्ट को देखें तो 1901 से अब तक हाल के तीन वर्ष सबसे ज्यादा गर्म रहे हैं।

सबसे गर्म साल भारत में वर्ष 2009 रहा है जब तापमान औसत से 0.77 डिग्री ज्यादा रहा। जबकि 2010 में यह 0.75 डिग्री और 2015 में सामान्य से 0.67 डिग्री ज्यादा था। लेकिन इस साल भी जनवरी में तापमान लगातार सामान्य से ऊपर चल रहा है। इससे लगता है कि शुरू हुआ नया साल गर्मी के पुराने रिकॉर्ड तोड़ देगा।

मौसम विभाग का आरम्भिक विश्लेषण यह भी बताता है कि अक्टूबर-से-दिसम्बर 2015 के दौरान औसत तापमान 1.1 डिग्री ज्यादा रहा है।

भारत के सन्दर्भ में यदि मौसम विभाग की रिपोर्ट को देखें तो 1901 से अब तक हाल के तीन वर्ष सबसे ज्यादा गर्म रहे हैं। सबसे गर्म साल भारत में वर्ष 2009 रहा है जब तापमान औसत से 0.77 डिग्री ज्यादा रहा। जबकि 2010 में यह 0.75 डिग्री और 2015 में सामान्य से 0.67 डिग्री ज्यादा था। लेकिन इस साल भी जनवरी में तापमान लगातार सामान्य से ऊपर चल रहा है। इससे लगता है कि शुरू हुआ नया साल गर्मी के पुराने रिकॉर्ड तोड़ देगा। इस समय कर्क रेखा के ऊपर पड़ने वाले उत्तर-पश्चिमी राज्यों में तापमान सामान्य से ज्यादा है। वैसे, इसके संकेत मानसून के दौरान ही मिल गए थे। जुलाई में प्रशान्त महासागर में अलनीनो के सक्रिय होने के बाद अगस्त एवं सितम्बर में मानसून कमजोर पड़ गया। नतीजा यह हुआ कि सितम्बर में बारिश लगभग नहीं हुई। इससे खेतों से नमी ग़ायब हो गई।

असर रबी की फसल पर पड़ा और करीब 20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूँ कम बोया गया। क्योंकि खेतों में नमी नहीं थी और बीज उगने के लिये नमी चाहिए। सिर्फ सिंचाई वाले क्षेत्रों में ही गेहूँ बोया जा सका। लेकिन खतरा यहीं तक सीमित नहीं है।

आगे यदि मौसम गर्म बना रहा तो गेहूँ की फसल झुलस सकती है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यदि फरवरी में तापमान दो-तीन डिग्री ज्यादा रहा तो गेहूँ के उत्पादन में 25 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। क्योंकि गर्मी से गेहूँ में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया गड़बड़ा जाती है और पर्याप्त पोषण के अभाव में गेहूँ के दाने उचित आकार नहीं ले पाते हैं।

दूसरे, इस बार बारिश नहीं होने से किसानों पर गेहूँ की अतिरिक्त सिंचाई करने का बोझ पड़ा है। अगेती गेहूँ में जनवरी के दूसरे पखवाड़े में बालिया लगनी शुरू होती हैं जबकि पछेती किस्में फरवरी में फलने लगती हैं।

मौसम में आ रहे हालिया बदलाव भारतीय कृषि को संकट में डाल सकते हैं और खाद्यान्न में हमारी आत्मनिर्भरता प्रभावित हो सकती है। सिर्फ गर्मी ही नहीं बल्कि कई अन्य बदलाव भी देखे गए हैं। मसलन, मानसून के आने की तिथियाँ गड़बड़ाने लगी हैं।

राजस्थान के उन क्षेत्रों में अब ज्यादा मानसूनी बारिश होती है, जहाँ पहले कम बारिश होती थी। बादल फटने की घटनाएँ बढ़ रही हैं।

पिछले कुछ साल के दौरान अप्रैल में तापमान सामान्य से कम रहने का भी रिकॉर्ड रहा है। देश के ज्यादातर बड़े राज्यों में पिछले साल से ही सूखे-से हालात पैदा हो गए हैं। मौसम विभाग के मुताबिक, देश के 14 राज्यों में सामान्य से 60 से 90 प्रतिशत तक कम वर्षा दर्ज की गई है।

सिर्फ कर्नाटक, तटीय आन्ध्र प्रदेश और तटीय महाराष्ट्र, गोवा में मानसून सामान्य रहा है, जबकि तमिलनाडु, केरल, आन्ध्र के रायलसीमा इलाके व जम्मू-कश्मीर में सामान्य से बहुत अधिक बारिश दर्ज की गई।

स्काईमेट के आँकड़ों के मुताबिक, नवम्बर 2015 में चेन्नई में 1218.6 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी, जबकि सामान्य 407.4 मिलीमीटर ही मानी जाती है। दिसम्बर के सिर्फ पहले दिन ही 374 मिलीमीटर वर्षा हुई थी।

इस बारिश से पिछले सौ वर्षों का रिकॉर्ड टूट गया। इसके बाद अब सर्दियों में तापमान सामान्य से ऊपर बना हुआ है। जो आने वाले दिनों में वातावरण के सम्भावित खतरे को दर्शाता है।

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