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बुन्देलखण्ड पैकेज : केन्द्र तथा राज्यों को जारी करना होगा श्वेत पत्र – राजेन्द्र सिंह

Author: 
अनिल सिंदूर
1. उजाड़, सुखाड़ तथा बिगाड़ बचाना है तो बुन्देलखण्ड के तालाबों को संरक्षित करना होगा।
2. सदियों से चले आ रहे पानी संचयन तरीके आज भी कारगर



. बुन्देलखण्ड को सूखे तथा असमय वर्षा त्रासदी से बचाने को मिले पैकेज पर केन्द्र तथा राज्यों को श्वेत पत्र जारी करना होगा तभी मालूम हो सकेगा कि असलियत में पैकेज की हकीकत क्या है। यह बात मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित जलपुरुष खिताब प्राप्त राजेन्द्र सिंह ने 150वीं जयंती पर आयोजित मूर्ति अनावरण समारोह में एक औपचारिक वार्ता के दौरान कही।

उन्होंने बताया कि जल संरक्षण को यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार ने 7266 करोड़ रुपए उ.प्र. तथा म.प्र. के 13 जनपदों को दिये थे यदि सरकारों की नीयत अच्छी होती तो आज बुन्देलखण्ड की जो स्थिति है वह न होती। देश में 70 प्रतिशत खेती वर्षा आधारित है जिससे 38 प्रतिशत उत्पादन होता है और 30 प्रतिशत खेती सिंचाई आधारित है जिससे 55 प्रतिशत उत्पादन होता है उस पर बदलते पर्यावरण ने वर्षा आधारित खेती का उत्पादन और कम कर दिया है।

बुन्देलखण्ड की भौगोलिक परिस्थितियों को दृष्टिगत रख नेशनल रेनफिड अथॉरिटी को यह काम सौंपा गया था कि वह वर्षा आधारित खेती के रकबे को कम करने की दिशा में इस पैकेज से कार्य करवाए लेकिन देखा जा रहा है कि पैकेज की राशि तो ख़त्म हो गई लेकिन समस्या जस-की-तस खड़ी है। देखा गया है कि किसी भी राजनैतिक दल की सरकार रही हो इस ओर ध्यान किसी ने भी नहीं दिया।

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि बुन्देलखण्ड को उजाड़, सुखाड़ तथा बिगाड़ से बचाना है तो अब बुन्देलखण्ड के तालाबों को संरक्षित कर उनमें वर्षाजल का संचयन करना होगा। इस वर्ष औसत वर्षा के सापेक्ष 54 प्रतिशत वर्षा हुई है भले ही वो असमय हुई हो, उस वर्षाजल का संचयन किया होता तो तस्वीर बदलने की ओर हम पहला कदम उठा चुके होते।

बुन्देलखण्ड के लोगों को सरकारों की ओर देखना बंद करें। जिन तालाबों पर अतिक्रमण है उन्हें वो आपसी सहमति बना खाली करवाएँ। तालाबों को वर्षाजल से भरने को रास्ते बनाएँ जिससे जब भी वर्षा हो वो पानी से भर जाये।

उन्होंने कहा कि पैकेज से ठेकेदारों का भला होता है अब ठेकेदार राजनैतिक संरक्षण पा चुके हैं ऐसे में अपेक्षाएँ करना बेमानी है। सभी राजनैतिक दल एक जैसे हैं कोई सांपनाथ है तो कोई नागनाथ हैं। देखा जाता है कि आधे से ज्यादा काम कागजों पर हो जाते हैं पारदर्शिता के नाम पर मज़ाक हो रहा है।

उन्होंने कहा कि बुन्देलखण्ड में सुखा और आवर्षण से उत्पन्न हालात दिन-प्रतिदिन कठिन होते जा रहे हैं। क्षेत्र में सूखा अब अकाल में तब्दील होता जा रहा है। कई वर्षों से चले आ रहे सूखे की विभीषिका के कारण ही ये हालात उत्पन्न हुए हैं। उन्होंने कहा कि जल संकट के प्रभावों से निपटने के लिये पुरातन काल से जल प्रबन्धन को कार्य किये हैं लेकिन वर्तमान सरकारें पुरातन काल में किये गए जल प्रबन्धन को भी संजो कर नहीं रख सकी। बुन्देलखण्ड क्षेत्र के 80 प्रतिशत लोगों की आजीविका खेती है और खेती का सबसे बड़ा घटक पानी है।

उन्होंने कहा कि बुन्देलखण्ड क्षेत्र के किसान हमेशा से ही पानी की माँग करते रहे हैं पानी के आलावा उनकी कोई माँग नहीं रही है। बुन्देलखण्ड का भूजलस्तर तेजी से नीचे जा रहा है जो आने वाले समय में पीने के पानी का बड़ा संकट पैदा करेगा। नासा की रिपोर्ट के अनुसार यदि इसी तेजी से जलस्तर गिरता रहा तो वर्ष 2050 तक पानी एक विकराल समस्या बनकर सामने खड़ा होगा क्योंकि पानी को किसी कारखाने में बनाया भी नहीं जा सकता है।

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि सब कुछ सरकारों पर नहीं छोड़ा जा सकता है। देश के नागरिकों की भी ज़िम्मेदारी है कि वो पानी का दोहन बन्द करें। वर्षाजल के संचयन की आदत डाले, भूगर्भ से जितने जल का उपयोग करें उसका 80 प्रतिशत जल वापस जमीन को दें। वाटर हार्वेस्टिंग पर ध्यान दें। सरकारों में बैठे अधिकारी भी ध्यान दें कि उच्चतम न्यायालय के आदेशों का पालन करें। जलस्रोतों पर अतिक्रमण करने वालों पर सख्ती से कार्यवाही करें।

उन्होंने बताया कि विदर्भ और बुन्देखण्ड के सूखे में बहुत अन्तर है। विदर्भ में सूखे के दौरान क्रय करने की गति रुकती नहीं है लेकिन बुन्देलखण्ड में लोंगों की क्रय शक्ति खत्म हो जाती है। सरकारों को चाहिए कि बुन्देलखण्ड में रोजगार के साधन उपलब्ध करवाएँ जिससे उनकी आजीविका चलती रहे। उन्होंने बताया कि जल संकट पैदा करने में नदियों से खनन बन्द न होना भी है। सरकारें खनन को सख्ती से बन्द करें नदियों का जल प्रभावित न हो। जल संकट दूर करने के लिये केन्द्र तथा राज्य सरकारों को चाहिए कि वे सकारात्मक दिशा में कार्य करें।

बुन्देलखण्ड पैकेज धनराशि इन मदों में व्यय होनी थी


मध्य प्रदेश

बीस हज़ार नए कुओं का निर्माण

200 करोड़

पुराने कुओं और तालाबों का गहरीकरण

440 करोड़

खेत का पानी खेत में रोकने के लिये

30 हज़ार

तालाबों का निर्माण

180 करोड़

चार लाख हेक्टेयर भूमि को कृषि योग्य पानी उपलब्ध कराने में

480 करोड़

पशु पालन में वृद्धि, मीट तथा दूध प्रसंस्करण यूनिट

100 करोड़

जल संरक्षण नहरों का गहरीकरण एवं निर्माण

118 करोड़

उद्यानीकरण बगीचों का क्षेत्रफल, फूलों की खेती तथा नीबू की खेती बढ़ाने के लिये

50 करोड़

बेरियाल प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिये

236 करोड़

उत्तर प्रदेश

30 हज़ार नए कुओं का निर्माण/पुनरुद्धार

300 करोड़

खेतों का पानी खेत में रोकने को खेत में 60 हज़ार तालाबों का निर्माण

300 करोड़

राजघाट नहर विकास के लिये

200 करोड़

तालाबों तथा पानी के टैंकों का पुनरुद्धार एवं निर्माण

100 करोड़

वेयरहाउस एवं एकीकृत बाज़ार के इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास

700 करोड़

पुरानी नहरों का पुनरुद्धार एवं नई नहरों का निर्माण

284 करोड़

ग्रामीण क्षेत्र में पीने का पानी

100 करोड़

दुग्ध डेयरी विकास

26 करोड़ 74 लाख

कृषि तथा पशु

58 करोड़ 96 लाख

 



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