सशक्तीकरण का कारगर उपाय

Submitted by RuralWater on Tue, 02/23/2016 - 09:07
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राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 13 फरवरी 2016

ग्रामीण परिवारों के एक चौथाई हिस्से को मनरेगा हर साल 40-45 दिनों का रोजगार मुहैया कराती है। रुझानों से यह संकेत भी मिलता है कि गैर-मनरेगा कार्य-अवसर न होने की स्थिति में यह योजना ग्रामीण परिवारों का बड़ा सम्बल बनती है। ग्रामीण आय बढ़ाने में इस योजना की महत्त्वपूर्ण भूमिका की आँकड़ों से पुष्टि हो जाती है। लेकिन ग्रामीण सशक्तिकरण को लेकर भिन्न-भिन्न मत उभरते हैं क्योंकि तमाम राज्यों में इस बाबत कानून को अलग-अलग तरीकों से क्रियान्वित किया गया। आज मनरेगा को आरम्भ हुए दस साल हो गए हैं। यह व्यवस्था स्तर, स्वरूप और सरोकार के लिहाज से बेजोड़ है। इसका माँग-आधारित वैधानिक स्वरूप इसके कार्यान्वयन के लिये अबाध बजट सुनिश्चित करता है। इस दृष्टि से यह योजना आवंटन-चालित सामाजिक क्षेत्र की अन्य योजनाओं के सर्वथा विपरीत है।

मनरेगा वामपंथियों को जँची तो दक्षिणपंथियों को भी झकझोर डाला और इस समूचे घटनाक्रम में यह विकास को तरजीह दिये रही। अब इस योजना को दस वर्ष पूरे हो चुके हैं। ज्यादातर ग्रामीण विकास की योजनाओं की तुलना में दस वर्ष की यह अवधि अधिक है।

यह अवसर है कि तीन महत्त्वपूर्ण सवालों के जवाब जान लिये जाएँ। ये सवाल हैं : पहला, क्या मनरेगा कारगर रही? दूसरा, आज इसकी क्या स्थिति है?; तथा तीसरा, क्या इसकी आज भी जरूरत है? हम मनरेगा का मूल्यांकन दो तरीकों से कर सकते हैं। पहले तो यह पूछा जा सकता है कि क्या इसने ग्रामीणों की आजीविका सम्बन्धी सुरक्षा को बढ़ाया है और दूसरा यह कि क्या ग्रामीण सशक्तिकरण का जरिया बन सकी है?

ग्रामीण परिवारों के एक चौथाई हिस्से को मनरेगा हर साल 40-45 दिनों का रोजगार मुहैया कराती है। रुझानों से यह संकेत भी मिलता है कि गैर-मनरेगा कार्य-अवसर न होने की स्थिति में यह योजना ग्रामीण परिवारों का बड़ा सम्बल बनती है। ग्रामीण आय बढ़ाने में इस योजना की महत्त्वपूर्ण भूमिका की आँकड़ों से पुष्टि हो जाती है।

लेकिन ग्रामीण सशक्तिकरण को लेकर भिन्न-भिन्न मत उभरते हैं क्योंकि तमाम राज्यों में इस बाबत कानून को अलग-अलग तरीकों से क्रियान्वित किया गया। लेकिन इसके बावजूद इस कानून को क्रियान्वित किये जाने से स्पष्ट सफलताएँ हासिल हुई। उदाहरण के लिये छह वर्षों से चली आ रही मजदूरी में ठहराव का ढर्रा टूट गया। ऐसा मजदूरी में बढ़ोत्तरी के कारण हो सका।

कटु आलोचक भी यह मानने को विवश हैं कि मनरेगा ने अपने तई पाँच किलोमीटर की परिधि में रोजगार, समान मजदूरी आदि के प्रावधानों के चलते महिलाओं के लिये बेहतर कामकाजी अवसर मुहैया कराए। लैंगिक समानता की दृष्टि से भी यह योजना कारगर रही। मनरेगा नहीं होती तो ये महिलाएँ या तो बेरोजगार रह जातीं या प्रछन्न रोजगार में होतीं।

आँकड़ों से यह पता चलता है कि पारम्परिक रूप से विस्थापन के लिये जाने गए इलाकों से श्रमिकों के विस्थापन की दर में कमी आई है। मनरेगा को प्राय: पारिस्थितिकीय प्रयास माना गया है, जिसने ग्रामीण क्षेत्र का कायाकल्प कर दिया है। जल-संरक्षण जैसे कार्य पर ध्यान केन्द्रित करके ग्रामीण क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों को प्रचुर कर दिया है।

मनरेगा का गरीबी पर प्रभाव की बाबत कुछ ज्यादा निष्कर्ष नहीं मिले हैं। हालांकि एनसीएईआर के एक हालिया पैनल सर्वे से पता चलता है कि मनरेगा ने आदिवासियों और दलितों में गरीबी को क्रमश: 28 तथा 38 प्रतिशत तक कम कर दिया है। मनरेगा के विस्तार से इसके सम्भावित हितग्राहियों के लिये सांस्थानिक परिवर्तनों में भी तेजी आई है।

उदाहरण के लिये 2008 से 2014 के मध्य दस करोड़ से ज्यादा बैंक और डाकघर खाते खुलवाए गए और अस्सी प्रतिशत मनरेगा मजदूरी खातों के माध्यम से दी गई। यह अभूतपूर्व वित्तीय समावेशन कहा जाएगा क्योंकि इन खातों के नियमित परिचालन से भ्रष्टाचार और हकमारी में कमी आएगी।

तो आज मनरेगा किस स्थिति में है? शुरुआत में इसे उल्लेखनीय नाकामी करार देने के पश्चात अब इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट हो गया है। मनरेगा की न्यूनतम मजदूरी बढ़ने और कृत्रिम हदबन्दी वाली बजटीय व्यवस्था के चलते माँग में कमी दर्ज की गई है।

वर्ष 2013-14 में कुल व्यक्ति-दिन रोजगार 220 करोड़ था, जो 2014-15 में कम होकर 166 करोड़ रह गया। मौजूदा वर्ष में मजदूरी के भुगतान में 40 प्रतिशत विलम्ब भी हुआ है। मोटा-मोटी कह सकते हैं कि मनरेगा सम्बन्धी सरकार की नीति डांवाडोल होती जा रही है।

वर्ष 2014-15 में मजदूरी-सामग्री के अनुपात को मौजूदा 60:40 से बदलकर 51:49 करने का प्रयास भी किया गया। विचार यह था कि इस योजना की श्रमोन्मुख प्रवृत्ति को बदला जाये। अगर ऐसा होता है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य ही बिला जाएगा। हालांकि इस प्रस्ताव पर केन्द्र सरकार ने ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया। नतीजन, यह बदलाव सिरे नहीं चढ़ सका। अबलत्ता, धन का आवंटन जरूर अनिश्चित रहा।

इस साल राज्यों के समक्ष धन की कमी बन गई है और वे नए कार्य आरम्भ कराने में असमर्थ हैं। न ही वे मजदूरी का भुगतान ही कर पा रहे हैं। यह स्थिति जनवरी, 2016 को है, जब 14 राज्यों ने नकारात्मक कोष दिखा दिया है।

केन्द्र में सरकार बदलने से मनरेगा की सफलता में सहायक कारकों का सन्तुलन ही डगमगा गया है। राजनीतिक इच्छाशक्ति और मनरेगा को लेकर विश्वास की स्थिति पहले सी नहीं रह गई है। मनरेगा के खिलाफ जो प्रमुख तर्क दिया जाता है, वह यह है कि इस योजना में तमाम छीजन हैं। और किसी प्रकार की सम्पत्ति बनाने में इसका कोई योगदान नहीं रहा। लेकिन ये दोनों तर्क बढ़ा-चढ़ा कर पेश किये जा रहे हैं। बौद्धिक सुस्ती और वैचारिक धुंधलके के चलते इन्हें उच्चारा जा रहा है। कतई स्पष्ट है कि मनरेगा कोई प्लेट में परोस कर दी जाने वाली वस्तु नहीं है। फिर, इसमें भी वे तमाम खामियाँ हैं, जो अन्य विकास योजनाओं में विद्यमान हैं।

मनरेगा सूचना प्रोद्योगिकी तथा सामाजिक अंकेक्षण तरीकों जैसे समुदाय-आधारित जवाबदेही के जरिए भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ता रहा है। सच तो यह है कि यह उन कुछेक योजनाओं में शुमार है, जिसने करीब-करीब समस्त जानकारियों को डिजिटलाइज कर लिया है। ऐसा डेटाबेस तैयार कर लिया है, जो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है।

सम्पत्तियों के टिकाऊपन और उपयोगिता का जहाँ तक सवाल है, तो इन समस्याओं का 2013 में नए अनुमय कार्य को आरम्भ करके समाधान खोजने के प्रयास किये गए। फलस्वरूप मनरेगा के पचास प्रतिशत कार्य ऐसे हैं जो उत्पादक ग्रामीण ढाँचागत आधार तैयार करने वाले हैं। इनमें शौचालयों का निर्माण जैसे कार्य शामिल हैं। कोई 23 प्रतिशत कार्य ऐसे हैं, जो हाशिए पर पड़े समुदायों के लिये सम्पत्तियों का निर्माण करने से जुड़े हैं।

मनरेगा की बाबत किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले हमें इस योजना की सम्भावनाओं और इसके क्रियान्वयन में आने वाली अड़चनों को जान लेना होगा। दूसरे शब्दों में कुछ राज्यों/जिलों में योजना के खराब क्रियान्वयन या भ्रष्टाचार की घटनाओं से इस योजना की उपयोगिता या जरूरत किसी भी लिहाज से कम नहीं हो जाती। सच तो यह है कि इस प्रकार की घटनाएँ योजना को सुदृढ़ करने की जरूरत दर्शाती हैं।

मनरेगा का आकलन करते समय यह एक अकेली ऐसी महत्त्वपूर्ण योजना है जो ग्राम पंचायतों के सशक्तिकरण का जरिया बनी। इसने ग्राम सभाओं को अवसर दिया कि अपने स्तर पर कार्य निर्धारित करके प्रदत्त धन की सहायता से उन्हें पूरा करें। किसी अन्य योजना में ऐसा नहीं है कि ग्रामसभा को सीधे इस स्तर (औसतन 15 लाख रुपए सालाना) पर धन मुहैया कराए। जाहिर है कि अगर ऐसी व्यवस्था है, तो सतत निगरानी और मूल्यांकन जरूरी हो जाता है।

मनरेगा बना सम्बल


1. एनसीएईआर के एक हालिया पैनल सर्वे से पता चलता है कि मनरेगा ने आदिवासियों और दलितों में गरीबी को क्रमश: 28 तथा 38 प्रतिशत तक कम कर दिया है
2. 2008 से 2014 के मध्य दस करोड़ से ज्यादा बैंक और डाकघर खाते खुलवाए गए और अस्सी प्रतिशत मनरेगा मजदूरी खातों के माध्यम से दी गई
3. ग्रामीण परिवारों के एक चौथाई हिस्से को मनरेगा हर साल 40-45 दिनों का रोजगार सबको मुहैया कराता है

जयराम रमेश, पूर्व केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री हैं।
नीलाक्षी मान, ग्रामीण विकास मंत्रालय से सम्बद्ध हैं।


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