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संकट में कार्यक्रम

Author: 
जयति घोष
Source: 
राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप), 13 फरवरी 2016

लाभान्वित होने वाले परिवारों की संख्या 55 मिलियन के साथ 2010-11 में शीर्ष पर थी, जबकि सृजित रोजगार के व्यक्ति-दिवसों की संख्या उससे पिछले वर्ष 2009-10 में 2.8 बिलियन के साथ सर्वोच्च स्तर पर रही। लेकिन शीर्ष पर रहने के बावजूद यह कार्यक्रम किसी परिवार के लिये 100 दिन के काम उपलब्ध कराने के वायदे के आसपास भी नहीं रही, बल्कि देश भर में इसका औसत प्रति परिवार केवल 54 दिन का रहा। अब इसमें भी गिरावट आ गई है और इस कार्यक्रम के तहत पिछले कुछ वर्षों के दौरान प्रति परिवार कार्य दिवसों की संख्या 40 से भी कम रही है। केन्द्र सरकार मनरेगा के प्रति अपनी कानूनी बाध्यताओं को पूरी तरह नजरअन्दाज करते हुए इस योजना के लिये परिव्यय को सीमित करने की लगातार कोशिश कर रही है जबकि इस कार्यक्रम के कई सकारात्मक प्रभाव रहे हैं। पिछले कुछ समय से यह स्पष्ट दिख रहा है कि केन्द्र में एनडीए की सरकार, खासकर जहाँ अधिकार-आधारित कानूनों का सवाल आता है, अपनी कानूनी बाध्यताओं के प्रति बहुत सचेत नहीं है।

केन्द्र सरकार लगातार और मनमाने तरीके से आँगनवाड़ी केन्द्रों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वर्णित आवश्यकताओं, शिक्षा के अधिकार एवं राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम का उल्लंघन कर रही है। ऐसा अनिवार्य रूप से निम्न बजटीय प्रावधानों एवं इन कार्यक्रमों के सुचारु कामकाज को सुनिचित करने के लिये आवश्यक वित्तीय परिव्ययों में कटौती के जरिए किया जा रहा है। लेकिन इन सब में भी सबसे खराब बर्ताव महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के साथ किया जा रहा है।

मनरेगा को 2005 में भारतीय जनता पार्टी समेत सभी दलों एवं एनडीए के वर्तमान सभी घटकों के समर्थन से संसद में पारित किया गया था।

इस अधिनियम में स्पष्ट रूप से यह वर्णित है कि इसका क्रियान्वयन अनिवार्य रूप से सार्वजनिक कार्यों से प्रेरित ग्रामीण परिवारों से काम की माँग के साथ माँग आधारित होना चाहिए और इन कार्यों के संचालन के लिये आवश्यक वित्तीय प्रवाह स्वाभाविक रूप से केन्द्र से राज्य सरकारों की तरफ आना चाहिए। इसे सुनिश्चित करने के लिये कार्यवाहियों एवं प्रक्रियाओं का स्पष्ट रूप से अधिनियम के नियमों एवं दिशा-निर्देशों में उल्लेख किया गया था।

वास्तव में, पहले के दिशा-निर्देशों में ही इसे स्पष्ट कर दिया गया था कि जैसे ही संवितरित फंड का 60 फीसद किसी राज्य में खर्च कर दिया जाएगा, फंड हस्तान्तरण का अगला दौर जारी कर दिया जाना चाहिए जिससे कि इसमें किसी प्रकार का व्यवधान या रुकावट न आने पाये।

व्ययों में कटौती


इसलिये मनरेगा के तहत केन्द्र सरकार के व्यय को सीमित करने का विचार अजीबोगरीब है और सबसे महत्त्वपूर्ण बात है कि यह गैरकानूनी है। फिर भी इस कार्यक्रम पर खर्च को सीमित करने की कोशिश यूपीए की पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल के दौरान भी स्पष्ट होने लगी थी, जब इसके वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने इसके लिये परिव्यय में कटौती करना प्रारम्भ किया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासन काल में तो अब यह एक नियम ही बन गया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने बजटीय भाषण में घोषणा की कि अगर कर राजस्व में पर्याप्त बढ़ोत्तरी हुई तो वह इस कार्यक्रम के लिये घोषित परिव्यय के अतिरिक्त 5,000 करोड़ रुपए मुहैया कराएँगे। मनरेगा के लिये उनके मन में कितनी हिकारत भरी है, यह मोदी के वक्तव्य से प्रकट हुआ जब उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम पिछली सरकार की विफलताओं का एक स्मारक स्थल है।

एनडीए शासन काल के प्रथम वर्ष में काफी कटौती की गई। चालू वित वर्ष की पहली छमाही में मनरेगा व्यय में जरूर कुछ सुधार किया गया, जिसे सरकार ने काफी प्रचारित भी किया। फिर भी उनका स्तर 2010-11 जैसे पिछले वर्षों की तुलना में अभी भी कम है। जाहिर है, इसका कार्यक्रम की प्रभावोत्पादकता एवं व्यवहार्यता पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा।

इस कार्यक्रम से लाभान्वित होने वाले परिवारों की संख्या 55 मिलियन के साथ 2010-11 में शीर्ष पर थी, जबकि सृजित रोजगार के व्यक्ति-दिवसों की संख्या उससे पिछले वर्ष 2009-10 में 2.8 बिलियन के साथ सर्वोच्च स्तर पर रही। लेकिन शीर्ष पर रहने के बावजूद यह कार्यक्रम किसी परिवार के लिये 100 दिन के काम उपलब्ध कराने के वायदे के आसपास भी नहीं रही, बल्कि देश भर में इसका औसत प्रति परिवार केवल 54 दिन का रहा। अब इसमें भी गिरावट आ गई है और इस कार्यक्रम के तहत पिछले कुछ वर्षों के दौरान प्रति परिवार कार्य दिवसों की संख्या 40 से भी कम रही है।

नवीनतम नाटक


यही वह परिप्रेक्ष्य है, जिसमें मनरेगा को लेकर नवीनतम नाटक खेला जा रहा है। जैसा कि पहले ही जिक्र किया जा चुका है, 2014-15 ही वह वर्ष था, जब फंडों में तेज कटौती की गई थी और राज्यों को कार्यक्रम को बनाए रखने के लिये अनिवार्य फंडों की मनाही कर दी गई थी।

नौबत ऐसी आ गई कि हाल के वर्षों में सबसे अच्छा करने वाले राज्य त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार को वास्तव में नई दिल्ली आकर जन्तर-मन्तर पर धरने पर बैठने और इस कार्यक्रम के संचालन के लिये केन्द्र द्वारा धन मुहैया कराने की कानूनी बाध्यताओं को पूरा करने को मजबूर होना पड़ा। हालांकि विवशता में उठाए गए ऐसे कदमों का भी मोदी सरकार पर कुछ खास प्रभाव नहीं पड़ा जो शासन के अपने पहले वर्ष में सत्ता के मद में डूबी हुई थी।

बहरहाल, वर्ष 2015 केन्द्र सरकार, खासकर, भाजपा के लिये मर्यादित प्रभाव वाला वर्ष था। जिसे दिल्ली एवं बिहार में भारी पराजय का सामना करना पड़ा और संसद में अपनी पसन्द के कानूनों को पारित करने में विफल रही। इसी वर्ष के दौरान कृषि का संकट एक बार फिर व्यापक हो गया।

किसानों की बढ़ती दिक्कतें एवं ग्रामीण क्षेत्रों में वास्तविक आय में गिरावट का प्रभाव देश के अधिकतर हिस्सों में दृष्टिगोचर होने लगा, जिस पर लोगों का काफी ध्यान गया। शायद यही वजह थी कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2015) तक इस कार्यक्रम के प्रति चिड़चिड़ा रवैया अपनाए रखने के बावजूद दूसरी तिमाही में केन्द्र सरकार के बर्ताव में कुछ सुधार नजर आया और अधिक फंड जारी किये गए, जिससे ग्रामीण मजदूरों की आय में बढ़ोत्तरी हुई।

ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा वित्त मंत्री को लिखे गए दो पत्रों से यह स्पष्ट होता है। जिन पत्रों को दो कार्यकर्ताओं अरुणा रॉय एवं निखिल डे ने सूचना का अधिकार अधिनियम का उपयोग कर प्राप्त किया। इन पत्रों से वित्त मंत्रालय की मनरेगा व्यय के प्रति अनिच्छा साफ जाहिर होती है।

2015 के आखिर में लिखे गए इस पत्र के अनुसार इस मद में 95 फीसद राशि का व्यय किया जा चुका है और अतिरिक्त फंड न आने की सूरत में कार्यक्रम ठप हो सकता है। पत्र में यह भी कहा गया है कि वित्त मंत्रालय का राज्य सरकार से न केवल अतिरिक्त व्यय की पूर्ति के लिये बल्कि लम्बित बाध्यताओं के लिये भी कई आग्रह प्राप्त हो चुके हैं।

खतरे अभी हैं


इन सबके बावजूद, जनवरी 2016 के पहले सप्ताह तक धन उपलब्ध नहीं कराया गया था-वह अतिरिक्त 5,000 करोड़ रुपए भी नहीं जिसके बारे में अरुण जेटली ने ‘उदारतापूर्वक’ वादा किया था कि उम्मीद से बेहतर कर संग्रह होने पर उपलब्ध कराएँगे।

ऐसी उम्मीद भी की जा रही थी कि मीडिया में इस पत्र तथा सम्बन्धित तथ्यों के आने के बाद वित्त मंत्रालय इस राशि को पहले ग्रामीण विकास मंत्रालय तथा बाद में राज्यों को उपलब्ध कराएगा। लेकिन आश्चर्यजनक है कि अभी तक वित्त मंत्रालय ने इस पर ध्यान नहीं दिया है और यह खतरा बदस्तूर है कि अगर पर्याप्त दबाव नहीं पड़ा तो सरकार इस पर अपने वायदे से पीछे हट जाये और मनरेगा पर कटौती किये जाने की इच्छा जताए।

एनडीए सरकार के आम रुझान को देखते हुए, यह शायद आश्चर्यजनक नहीं है। लेकिन राजनीतिक एवं आर्थिक दोनों ही लिहाज से यह बेवकूफी होगी। राजनीतिक लिहाज से इसलिये कि ग्रामीण परेशानियों एवं उत्पादक रोजगार अवसरों की कमी को देखते हुए, इसमें रोजगार की विशाल सम्भावनाएँ हैं। जिनका लाभ प्रत्यक्ष लाभार्थियों से कहीं अधिक है।

आर्थिक लिहाज से इसलिये कि ऐेसी अर्थव्यवस्था में जिसमें माँग सृजन निवेश दरों के लिहाज से बहुत कम गतिविधियाँ हो रही हैं और यहाँ तक कि कम्पनियाँ भी अधिक वित्तीय पैकेज की माँग करने लगी हैं, मनरेगा व्यय वास्तविक व्यय की तुलना में कहीं अधिक आय सृजित करता है। जिसे मजदूरी प्राप्त होती है, वह स्थानीय रूप से अधिक व्यय करता है और इससे एक बार फिर सुस्त पड़ी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन मिल सकता है। यह वास्तव में बड़े दुख की बात है कि ऐसे कार्यक्रम, जिसके इतने अधिक सकारात्मक प्रभाव हैं, के लिये हर मोड़ पर लड़ाई लड़नी पड़ रही है।

लेखक, जेएनयू में अर्थशास्त्र संकाय की प्रोफेसर हैं।

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