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जमीनी हकीकत के सामने दम तोड़ता सरकारी दावा


प्रख्यात कवि अदम गोंडवी की एक मशहूर कविता की दो पंक्तियाँ कुछ यूँ हैं-
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है,
मगर ये आँकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है।


.पश्चिम बंगाल में आर्सेनिक को लेकर राज्य सरकार के दावे और उन दावों की जमीनी हकीकत को देखें तो ये पंक्तियाँ काफी मौजूँ लगती हैं।

पश्चिम बंगाल सरकार बड़े गर्व से यह दावा कर रही है कि आर्सेनिक प्रभावित 91 प्रतिशत लोगों तक आर्सेनिक मुक्त पेयजल मुहैया करवाया जा रहा है लेकिन राज्य सचिवालय से महज 70 किलोमीटर दूर उत्तर 24 परगना जिले के सुटिया ग्राम पंचायत के गाँवों में इस दावे की हकीकत दम तोड़ती दिखी।

यहाँ के मधुसूदन काठी, तेघरिया व अन्य गाँवों में रहने वाले सैकड़ों लोग अब भी आर्सेनिक मिश्रित पानी पीने को विवश हैं। तेघरिया में तो आर्सेनिक युक्त पानी के सेवन के कारण कई लोग कैंसर की चपेट में आ गए और उन्होंने दम तोड़ दिया।

मुख्य सड़क से फूटी एक पगडंडी के किनारे अपने टूटे-फूटे टीन के एसबेस्टस से बने घर में रह रही 41 वर्षीया नमिता विश्वास की आँखों में कातरता साफ देखी जा सकती है। उसने अपनी आँखों के सामने आर्सेनिक से पनपे कैंसर की चपेट में आकर अपने पिता ईश्वर प्रभात चंद्र दास, माँ तरुलता दास और भाई ईश्वर विधानचंद्र दास को दम तोड़ते देखा है।

.नमिता उन लोगों की फेहरिस्त में शामिल है जिसे आर्सेनिक ने अपना शिकार बनाया है। उसके घर में अजीब-सी मुर्दनी छाई हुई रहती है। उसकी हथेली में आर्सेनिक द्वारा दिये गए काले धब्बे आसानी से देखे जा सकते हैं। ये धब्बे और गहरे हुअा करते थे लेकिन दवाइयाँ ले रही हैं तो हालत में सुधार आया है। नमिता कहती है, ‘30 वर्ष पहले मेरे पिताजी की कैंसर से मौत हो गई थी। इसके बाद मेरी माँ और भाई की मृत्यु हुई। मेरे शरीर में भी घाव हो गए थे। शरीर में कमजोरी आ गई थी और अंग-अंग में दर्द समाया रहता था लेकिन अभी इलाज करवा रही हूँ तो ठीक हूँ।’ नमिता को इलाज करवाने के लिये 70 किलोमीटर दूर कोलकाता में स्थित एसएसकेएम अस्पताल जाना पड़ता है।

नमिता की बहन विशाखा दास भी आर्सेनिक की चपेट में हैं और उसका भी उपचार चल रहा है। इसी गाँव के निवासी मनोतोष विश्वास के शरीर पर काले-काले धब्बे साफ देखे जा सकते हैं। 50 वर्षीय मनोतोष अपने दाहिने हाथ में काले धब्बे और धब्बे के बीच उठे बुंदिया के आकार के दो-तीन घावों को दिखाते हुए कहते हैं, ‘इन घावों से पहले पानी रिसता रहता था। शरीर के दूसरे हिस्सों में भी ऐसे ही गुलाबी जख्म थे लेकिन जब से दवा खा रहा हूँ तब से जख्म सूखने लगे हैं।’

मनोतोष की आँखों में कुछ उम्मीद बची है और वह इसलिये है कि वह मरते-मरते बचा है। मनोतोष बताते हैं, ‘लगभग दो दशकों से मुझे यह रोग है। शुरुअाती दौर में थोड़ा-बहुत था तो पता नहीं चला लेकिन धीरे-धीरे यह बढ़ने लगा और एक वक्त तो ऐसा आया कि लग रहा था, कैंसर ही मेरी भी जान ले लेगी लेकिन जब मैंने इलाज करवाना शुरू किया तो हालात में सुधार आने लगा। मुझे एक नियमित अन्तराल पर कोलकाता जाना पड़ता है इलाज के लिये।’

मनोतोष ने कहा कि राज्य सरकार ने 2-3 ट्यूबवेल गड़वाए जरूर लेकिन इन ट्यूबवेलों से कैसा पानी आ रहा है इसकी जाँच नहीं की लिहाजा ये ट्यूबवेल यूँ ही पड़े हुए हैं।

सम्प्रति, मनोतोष, नमिता आदि आर्सेनिक से बुरी तरह प्रभावित बीसियों लोग फिलहाल आर्सेनिक मुक्त पानी पी रहे हैं लेकिन यहाँ यह बता देना जरूरी है कि पानी राज्य सरकार नहीं बल्कि मधुसूदन काठी के रहने वाले कुछ लोगों द्वारा बनाया गई मधुसूदन काठी समन्वय कृषि उन्नयन समिति मुहैया करवा रही है।

.समिति ने एक एनजीओ सुलभ इंटरनेशनल की मदद से वर्ष 2014 में वाटर प्यूरिफायर प्लांट स्थापित करवाया जहाँ रोज 4 हजार लीटर पानी का शुद्धिकरण किया जाता है। समिति के सदस्यों ने इस प्लांट के लिये कुल 3 बीघा जमीन दी जिनमें से 2 बीघा जमीन पर तालाब बनाया गया। इस तालाब में बारिश का पानी संग्रह कर रखा जाता है और इन्हें प्लांट में प्यूरिफाई कर लोगों तक पहुँचाया जाता है।

मधुसूदन काठी समन्वय कृषि उन्नयन समिति के सलाहकार कालीपद सरकार कहते हैं, ‘आर्सेनिक से बुरी तरह प्रभावित 25 परिवारों को हम लोग निःशुल्क शुद्ध पेयजल मुहैया करवाते हैं जबकि अन्य इच्छुक लोगों को 11 रुपए में 20 लीटर पानी दिया जा रहा है।’ सरकार के मुताबिक 400 परिवारों को हर महीने 1,20, 000 लीटर शुद्ध पेयजल मुहैया करवाया जा रहा है।

अनुमानतः एक परिवार एक महीने में 300 लीटर पेयजल का सेवन करता है और इसके लिये उसे महीने में 165 रुपए खर्च करने पड़ते हैं। किसानी कर किसी तरह गुजारा करने वाले इन गरीब लोगों के लिये यह अतिरिक्त खर्च है जिसके लिये उन्हें खाने और अन्य जरूरी खर्चों में कटौती करनी पड़ रही है। एक ग्रामीण ने कहा-हम किसानी कर अपना गुजारा करते हैं। हमें हर महीने तयशुदा आय नहीं होती है फिर भी कैंसर से बच सकें इसके लिये किसी तरह हर महीने 165 रुपए खर्च कर पानी पीते हैं। समन्वय समिति के अन्तर्गत आने वाले 4 मौजा में 1600 परिवार रहते है लेकिन शुद्ध पेयजल 400 परिवार ही इस्तेमाल करते हैं यानी 1200 परिवार अब भी आर्सेनिक युक्त पानी पीने को विवश हैं और वे अनचाहे कैंसर को दावत दे रहे हैं।

.इन दिनों गर्मी बढ़ गई है और इस वजह से कालीपद सरकार के माथे पर चिन्ता की लकीरें साफ देखी जा सकती हैं। वे इस बात से चिन्तित हैं कि धूप व गर्मी के कारण निर्धारित समय से पहले ही तालाब सूख सकता है फिर प्रभावित लोगों को शुद्ध पेयजल कहाँ से मुहैया करवाएँगे लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार को कोई चिन्ता नहीं है।

पश्चिम बंगाल सरकार ने 4 वर्ष पहले 'जल धरो जल भरो' परियोजना शुरू की थी जिसके तहत राज्य में लाखों पोखरे खोदे जाने थे ताकि बारिश का जल संग्रह कर रखा जा सके। पश्चिम बंगाल सरकार ने अपने घोषणापत्र (पृष्ठ 71) में कहा है कि 50,000 जलाशयों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया था।

इस लक्ष्य को पीछे छोड़ते हुए 1 लाख 40 हजार पोखरे खोदे जा चुके हैं लेकिन मधुसूदन काठी के स्थानीय निवासी निखिल मंडल के मुताबिक मधुसूदन काठी और तेघरिया गाँव में एक भी पोखरा नहीं खोदा गया है। कालीपद सरकार कहते हैं, ‘राज्य सरकार से कई बार सम्पर्क कर यहाँ के किसानों की दुर्दशा के बारे में अवगत करवाया गया लेकिन नतीजा सिफर रहा। जब भी हमने सम्पर्क किया, हमें कोरे आश्वासन ही मिले और इसी वजह से हमने सोचा कि खुद प्लांट स्थापित कर शुद्ध पेयजल लोगों को देंगे।’

.सुटिया ग्राम पंचायत के गाँवों में आर्सेनिक के मरीजों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। मधुसूदन काठी गाँव में हर महीने चेकअप कैम्प लगाने वाले चर्मरोग विशेषज्ञ डॉ. एसके चौधरी ने कहा, ‘मैं हर महीने आर्सेनिक की जद में आये 15 से 20 मरीजों को देखता हूँ जिनमें 3 से 4 मरीज नए होते हैं जिसका मतलब है कि आर्सेनिक पीड़ितों की संख्या में इजाफा हो रहा है। इस कैम्प में मधुसूदन काठी के आसपास के गाँवों के मरीज भी आते हैं। डॉ. चौधरी ने कहा, ‘आर्सेनिक युक्त पेयजल के सेवन से फेफड़े, किडनी व ब्लाडर में कैंसर हो सकता है। इससे चर्मरोग हो जाता है और बदहजमी तथा ब्लड सर्कुलेशन भी बुरी तरह प्रभावित होता है।

मधुसूदन काठी और तेघरिया तो महज एक बानगी है। पश्चिम बंगाल के जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग की वेबसाइट के अनुसार पश्चिम बंगाल के कुल 9 जिलों के 79 ब्लॉकों में रहने वाले लगभग 1 करोड़ 66 लाख 54 हजार लोग आर्सेनिक के शिकंजे में हैं। इन ब्लॉकों में भी राज्य सरकार की ओर से कुछ खास काम नहीं किया गया है जबकि आर्सेनिक की शिनाख्त 3 दशक पहले वर्ष 1983 में ही कर ली गई थी। हालांकि बंगाल सरकार दावे खूब किया करती है।

राज्य सरकार के जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के आला अफसरों के मुताबिक हाबरा-गायघाटा ब्लॉक (जिसके अन्तर्गत मधुसूदन काठी, तेघरिया व अन्य प्रभावित गाँव आते हैं) के आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्रों में सतह के पानी को परिशुद्ध कर लोगों तक पहुँचाने के लिये 578.94 करोड़ रुपए की परियोजना हाथ में ली गई थी।

इस परियोजना के अन्तर्गत ब्लॉक के 327 मौजा में रहने वाले 18.04 लाख लोगों तक शुद्ध पेयजल मुफ्त मुहैया करवाना था लेकिन इस भारी-भरकम राशि का 5 प्रतिशत हिस्सा भी उन तक पहुँच जाता तो आज वे इतने लाचार न होते। पश्चिम बंगाल की सरकार ने अन्य 5 ब्लॉकों के लिये कुल 549.83 करोड़ रुपए मंजूर किये लेकिन हाबरा-गायघाटा की सूरत देख लगता नहीं है कि सरकारी मदद इन ब्लॉकों को मयस्सर हुई होगी। अगर ऐसा हुअा होता तो राष्ट्रीय हरित पंचाट (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) राज्य सरकार की कड़े शब्दों में भर्त्सना करते हुए सख्त हिदायतें नहीं देता।

.पर्यावरणविद सुभाष दत्ता द्वारा पिछले दिनों आर्सेनिक को लेकर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए गत 7 सितम्बर 2015 को राष्ट्रीय हरित पंचाट (पूर्वी जोन) ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का जिक्र करते हुए वर्ष 1991 में सुभाष कुमार बनाम बिहार सरकार तथा वर्ष 1998 के एम. सी. मेहता बनाम केंद्र सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गए फैसलों का हवाला दिया था और कहा था, ‘सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा है कि शुद्ध पानी और हवा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आम लोगों का अधिकार है।’

हरित पंचाट (पूर्वी क्षेत्र) के जस्टिस प्रताप कुमार राय और न्यायिक सदस्य पीसी मिश्रा ने आगे कहा था-सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश था कि आम लोगों को शुद्ध पानी और हवा मुहैया करवाना राज्य का दायित्त्व है। जस्टिस राय और पीसी मिश्रा ने कम-से-कम आधा दर्जन मामलों का सन्दर्भ पेश करते हुए पश्चिम बंगाल सरकार को कई हिदायतें दी थी।

पंचाट ने राज्य सरकार से कहा था कि वह आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्रों का मानचित्र तैयार करे और जिन नलकूपों से आर्सेनिक युक्त पेयजल निकल रहा है उन्हें सील किया जाये। पंचाट ने यह भी कहा था कि आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्रों में रोज दिन में दो बार शुद्ध पेयजल मुहैया करवाया जाये और एक स्कीम तैयार की जाये ताकि स्थायी तौर पर लोगों को शुद्ध पेयजल मिल सके। और-तो-और पंचाट का यह भी आदेश था कि राज्य सरकार आर्सेनिक से प्रभावित लोगों को निःशुल्क औषधियाँ दे और उनकी एक सूची तैयार कर हलफनामा दायर करे।

28 नवम्बर 2015 को पश्चिम बंगाल सरकार ने हलफनामा दायर कर कहा था कि आर्सेनिक प्रभावितों में से 89.22 प्रतिशत लोगों को पोटेबल (पीने योग्य) पानी मुहैया करवाया जा रहा है लेकिन आर्सेनिक प्रभावितों और अन्य तथ्यों के बारे में कोई जिक्र नहीं था जिस पर पंचाट ने नाराजगी जताई थी। हाल ही में बंगाल सरकार की ओर से जारी घोषणापत्र (पृष्ठ 70) में कहा गया है- आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्र में 91 प्रतिशत लोगों को शुद्ध पेयजल की आपूर्ति की जा रही है। आगामी महीने के भीतर 97 फीसदी लोगों को शुद्ध पेयजल प्रदान किया जाएगा।

पश्चिम बंगाल में क्यों है आर्सेनिक का इतना असर? इस सवाल जादवपुर यूनिवर्सिटी के स्कूल अॉफ एनवायरमेंट स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर व आर्सेनिक पर ही पीएचडी करने वाले प्रोफेसर डॉ. तरित रायचौधरी कहते हैं- गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना नदी के मैदानी क्षेत्र आर्सेनिक से प्रभावित हैं। पश्चिम बंगाल भी इसी क्षेत्र में है। वे आगे कहते हैं-आर्सेनिक मानव निर्मित नहीं है बल्कि भौगोलिक-रासायनिक प्रतिक्रिया के चलते तलछट में आर्सेनिक जमा हो गया और जब भूगर्भ से ट्यूबवेल के जरिए पानी निकाला जाने लगा तो पानी के साथ आर्सेनिक भी बाहर आने लगा।

.प्रो. रायचौधरी ने कहा, ‘लगभग 3 दशक पूर्व सबसे पहले उत्तर 24 परगना के बारासात और दक्षिण 24 परगना जिले के बारुईपुर में आर्सेनिक युक्त पानी मिला था। इसके बाद मुर्शिदाबाद, मालदह, नदिया व अन्य जिलों में इसकी मौजूदगी पाई गई। महानगर का दक्षिणी हिस्सा भी आर्सेनिक से अछूता नहीं है। कई ब्लॉकों में पानी में आर्सेनिक की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक से कई गुना अधिक पाई गई है।

आर्सेनिक पर आधा दर्जन से अधिक शोध कर चुके प्रो. रायचौधरी भूजल के इस्तेमाल के सम्बन्ध में कहते हैं, ‘पहले लोग सतह पर मौजूद पानी का इस्तेमाल किया करते थे लेकिन सतह पर मौजूद पानी में कई तरह की गन्दगी होने के कारण पेट सम्बन्धी रोग होने लगे तो लोगों ने भूजल का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। यह 70 के दशक की बात होगी। ट्यूबवेल के जरिए लोगों ने पानी निकालना तो शुरू कर दिया लेकिन पानी कितना भीतर से निकालना चाहिए यह लोगों को पता नहीं था।’

ये तो रही पीने के पानी की बात लेकिन एक अन्य शोध में ऐसे चौंकाने वाले तथ्य सामने आये हैं जो सिरदर्द और बढ़ा सकते हैं। यह शोध वर्ष 2002 में एक अन्तरराष्ट्रीय जर्नल फूड एंड केमिकल टॉक्सिकोलॉजी में छपा था। इस शोध में प्रो. रायचौधरी के साथ ही कई विदेशी प्रोफेसर शामिल थे। इस शोध के अनुसार, आर्सेनिक युक्त पानी द्वारा सिंचाई किये जाने के कारण आलू, साग-सब्जियों, चावल, गेहूँ आदि खाद्यानों में भी आर्सेनिक पाये जा रहे हैं। रायचौधरी ने कहा, ‘हाल के शोध में भी यह बात सामने आई है कि आर्सेनिक युक्त पानी से सिंचित खाद्यानों में आर्सेनिक है।’

बहरहाल, आर्सेनिक को लेकर राज्य सरकार का ढुलमुल रवैया राष्ट्रीय हरित पंचाट और मधुसूदन काठी तथा तेघरिया गाँव में दिख ही चुका है अतः यह उम्मीद करना कि आने वाले दिनों में हालात सुधरेंगे, मुर्खों के स्वर्ग में विचरण करने जैसा होगा। विशेषज्ञों की मानें तो कुछ ऐसे उपाय हैं जिनके जरिए लोग पानी से आर्सेनिक निकाल सकते हैं। इसमें खर्च भी मामूली होगा।

रायचौधरी के मुताबिक 800 से 1000 फीट भीतर से पानी निकाला जाये तो उसमें आर्सेनिक की मात्रा नहीं के बराबर रहती है लेकिन अभी जो लोग ट्यूबवेल लगवा रहे हैं उनकी गहराई महज 100 से 150 फीट ही होती है। भूगर्भ में 100 से 150 फीट गहरे पानी में आर्सेनिक की मात्रा अधिक पाई जाती है। उन्होंने कहा-लोगों को चाहिए कि वे 1000 फीट नीचे से ट्यूबवेल से पानी निकालें। पानी से आर्सेनिक निकालने की एक और विधि है लेकिन वह विधि तभी कारगर हो सकेगी जब पानी में आयरन हों। वे गुजरे जमाने की बात करते हुए कहते हैं, ‘पहले बड़े-बुजुर्ग रात को बर्तन में पानी रख दिया करते थे और सुबह वही पानी पिया करते थे, इसके पीछे वैज्ञानिक कारण था। दरअसल 12 घंटे तक पानी को रखने से आयरन के साथ आर्सेनिक व अन्य गन्दगी नीचे बैठ जाती थी और पानी साफ हो जाता था।’

रायचौधरी ने कहा, ‘पानी को भरकर रात भर छोड़ दिया जाये और सुबह में उसे छानकर उसका सेवन किया जाये तो काफी हद तक आर्सेनिक से बचा जा सकता है।’

.इससे अलहदा भी एक उपाय है जिससे पानी से आर्सेनिक को बाहर किया जा सकता है। इस पर इंडियन इंस्टीट्यूट अॉफ टेक्नोलॉजी (अाईअाईटी) खड़गपुर के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. शीर्षेंदु दे ने एक दशक से अधिक समय तक शोध किया है। यह है पानी के परिशोधन में लेटराइट सॉइल (लाल मिट्टी) का इस्तेमाल। प्रो. दे ने अपने शोध में पाया कि जहाँ लाल मिट्टी होती है वहाँ पानी में आर्सेनिक की कोई समस्या नहीं देखी जा रही है।

जब उन्होंने और गहराई से शोध किया तो पता चला कि लाल मिट्टी में आर्सेनिक को अवशोषित करने की क्षमता होती है। प्रो. शीर्षेंदु दे बताते हैं, ‘वर्ष 2002 में हमने देखा कि गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना के मैदानी क्षेत्रों में पानी में आर्सेनिक है लेकिन मिदनापुर, बांकुड़ा और अन्य जिलों में आर्सेनिक की समस्या नहीं है। इन जिलों में लाल मिट्टी पाई जाती है। तभी हमें पता चला कि लाल मिट्टी की वजह से ही यहाँ आर्सेनिक की समस्या नहीं है।’ वे आगे कहते हैं, ‘लाल मिट्टी में आयरन और एल्युमिनियम की मात्रा अधिक होती है जो आर्सेनिक को अवशोषित कर लेती है। मिट्टी का केमिकल ट्रीटमेंट कर हमने इस लायक बना दिया कि वह आर्सेनिक को शत-प्रतिशत अवशोषित कर ले।’

अाईअाईटी खड़गपुर की मदद से राजारहाट और मालदह में प्रायोगिक तौर पर लाल मिट्टी आधारित वाटर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किया गया है। यहाँ से लोगों को न्यूनतम कीमत पर पानी मुहैया करवाया जा रहा है। आम लोग भी चाहें तो इस विधि का प्रयोग कर पानी से घातक आर्सेनिक को बाहर निकाल सकते हैं। प्रो. शीर्षेंदु दे ने कहा, ‘गाँवों में रहने वाले लोग भी यह प्रयोग कर सकते हैं लेकिन इसके लिये उन्हें पहले लाल मिट्टी का केमिकल ट्रीटमेंट करवाना होगा।’ दे के मुताबिक एक कम्पनी केमिकली ट्रीटेड लाल मिट्टी को बाजार में उतारने की तैयारी भी कर रही है।

जहाँ तक बात है फसलों की सिंचाई की तो इसके लिये पोखरों और तालाबों के पानी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। आर्सेनिक प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोगों को चाहिए कि वे सरकार से कोई उम्मीद न कर खुद पहल कर पोखरें खुदवाएँ और बारिश का पानी संचित कर उन्हें सिंचाई के काम में लायें क्योंकि पश्चिम बंगाल सरकार तो फाइलों में ही आर्सेनिक प्रभावितों को राहत पहुँचा रही है।

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