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प्रदूषण व मानव

Author: 
डा. प्रभात कुमार श्रीवास्तव
Source: 
योजना, जून 1995

लेखक ने बढ़ते प्रदूषण पर चिन्ता प्रकट की है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं और यदि यही सिलसिला जारी रहा तो हमारा जीवन असाध्य रोगों से घिर जाएगा। लेखक का कहना है कि यदि प्रदूषण इसी गति से बढ़ता रहा तो इक्कीसवीं सदी के मानव का काल्पनिक चित्र कुछ इस प्रकार होगा- वह कंक्रीट के जंगल में पराबैंगनी किरणों से बचने के लिए अम्लरोधक तथा विशेष रसायनयुक्त प्लास्टिक के कपड़ों से अपने शरीर को ढककर चलेगा और पीठ पर आॅक्सीजन का सिलिण्डर लादे, कंधों पर पानी की बोतल लटकाए, नाक में गैस मास्क लगाए तथा कान में ध्वनित अवरोधक यंत्र कसे, औद्योगिक विकास का कवच ढोयेगा।

जरा कल्पना कीजिये इक्कीसवीं सदी के उस मानव की जो कंक्रीट के जंगल में पराबैंगनी किरणों से बचने के लिए अम्लरोधक तथा विशेष रसायनयुक्त प्लास्टिक के कपड़ों से अपने शरीर को ढककर अवरोधक यंत्र कसे औद्योगिक विकास का कचरा ढोयेगा। क्या यही हम उन्हें विरासत में देने वाले हैं? विश्व में समझदारी की कमी नहीं है परन्तु समझदारी को अमल में लाने की दृढ़ता, साहस व विश्वास की कमी अवश्य है।

जीवन का वह सरस-चित्रण, जिसे हम कविताओं और किताबों के माध्यम से जानते हैं, निरन्तर प्रयासों के बावजूद हमसे दूर होता जा रहा है। जैसे-जैसे हम प्रगति की ओर कदम बढ़ा रहे हैं, हमें पर्यावरण की बढ़ती हुई बरबादी का भी एहसास हो रहा है। प्रगति की इस दौड़ में हम भौतिक खुशहाली का दावा अवश्य कर सकते हैं, परन्तु स्वच्छ प्राकृतिक पर्यावरण में सहज ही मिलने वाले जीवनदायी तत्व की मात्रा कम होती जा रही है। हम ज्यों-ज्यों 20वीं सदी के अन्त के नजदीक पहुँच रहे हैं, त्यों-त्यों हमें पर्यावरण सम्बन्धी अनेक कठिन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

कभी प्रदूषण का अर्थ जल, वायु तथा ध्वनि प्रदूषण से समझा जाता था परन्तु आज प्रदूषण सम्पूर्ण पृथ्वी के पर्यावरण के विनाश का कारण बनकर उभर रहा है। वायुमण्डल, जलमण्डल तथा जीवमण्डल के प्राकृतिक सन्तुलन के कारण पृथ्वी पर पर्यावरण का निर्माण हुआ है, जिसके कारण सभी प्राणी, वनस्पति तथा जीव-जन्तु विकसित होते हैं। आधुनिक राजनीति, उद्योग और विज्ञान ने मिलकर एक नई समस्या को जन्म दिया है जिसे प्रदूषण कह सकते हैं।

हमने अपनी जनसंख्या में इतनी तेजी से वृद्धि की है, जिसे बहुधा विनाश का पर्याय माना जा सकता है। हम बड़ी शीघ्रता से संसार के अपूर्व साधनों का प्रयोग कर रहे हैं तथा अनेक प्रकार से पर्यावरण को क्षति पहुँचा रहे हैं। जैसे-जैसे हमारी आबादी बढ़ती गई, उपजाऊ भूमि व वन सिमटते गये। इसके अलावा सामाजिक व आर्थिक समस्या जैसे भुखमरी, बेरोजगारी व आपराधिक प्रवृत्ति बढ़ती गई। बढ़ती आबादी की माँग को पूरा करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भी अबाध गति से शुरू हुआ। बढ़ती हुई जनसंख्या और घटते हुए संसाधन वास्तव में चिन्ता का विषय हैं। हम प्रकृति से जितना दूर होते जा रहे हैं, उतना ही समस्या के घेरे में आते जा रहे हैं। अगर इसी रफ्तार से हम आधुनिकता की अन्धी दौड़ में शामिल रहे तो निःसन्देह हमारा जीवन असाध्य रोगों से घिर जायेगा।

विश्व के कल-कारखानों के धुएँ से न केवल विश्व का पर्यावरण प्रदूषित होता जा रहा है बल्कि इसका सबसे घातक असर ओजोन की मोटी चादर (कवच) पर पड़ रहा है। ओजोन की मोटी पट्टी सूर्य की परा-बैंगनी किरणों से धरती के जीवन की सुरक्षा करती है। यदि ओजोन की चादर न हो या पतली पड़ जाये तो धरती का समूचा जीवन संकट में पड़ सकता है। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के आकाश में स्थित ओजोन की मोटी चादर में छिद्र हो गये हैं। विश्व के वायुमण्डल और पर्यावरण में जिस तेज गति से कार्बन-डाई-आक्साइड की मात्रा बढ़ती जा रही है वह समूची मानव जाति के लिए खतरे की घंटी है। धरती पर मंडराते सबसे बड़े संकट का नाम है ‘‘ग्रीन हाउस प्रभाव’’ इसके पीछे कार्बन-डाई-आक्साइड गैस का ही हाथ है। आंकड़ों के सांख्यिकी विश्लेषण बताते हैं कि वायुमण्डल में कार्बन-डाई-आक्साइड की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है। कार्बन-डाई-आक्साइड बढ़ने का मुख्य कारण कारखाने और मोटर वाहन हैं।

तमाम कोशिशों के बावजूद इसमें कमी नहीं हो रही है, बल्कि वनों की अन्धा-धुन्ध कटाई के कारण अब धरती के ज्यादा हिस्से पर धूप पड़ती है, जिससे मिट्टी में मौजूद जैविक पदार्थों का ऑक्सीकरण ज्यादा होने लगा है। इस तरह दिन प्रतिदिन कार्बन-डाई-आक्साइड की मात्रा वायुमण्डल में बढ़ती जा रही है। ओजोन के कवच में जो छेद बढ़ रहा है उसका दूसरा कारण है क्लोरो-फ्लोरो-कार्बन (सीएफसी) का व्यापक पैमाने पर उत्पादन। यही वह रसायन है जिसका प्रयोग शीतलीकरण हेतु किया जाता है, विशेषकर रेफ्रीजरेटरों आदि में। विश्व में बढ़ता ‘‘ग्रीन हाउस प्रभाव’’ धरती के जीव-जन्तुओं व वनस्पतियों के लिए भारी विनाशकारी एवं प्रलयकारी साबित होगा। पर्यावरण में बढ़ता प्रदूषण प्रकृति के संतुलन को कभी भी बिगाड़ सकता है।

यह एक कटु वास्तविकता है कि नदियाँ बुरी तरह से प्रदूषित हो चुकी हैं और इनका प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। शायद ही देश की कोई बड़ी नदी इस किस्म के विकार से अछूती हो। इस सिलसिले में किये गये अध्ययन से पता चलता है कि जहाँ गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी जैसी बड़ी नदियां उनके किनारे बसे शहरों की गन्दगी तथा कारखानों के रासायनिक अवशेषों से प्रभावित होती रही हैं

आज हम चारों ओर से स्वयं को प्रदूषित जल, मिट्टी, हवा एवं यहाँ तक कि घरेलू साजो-सामान से भी घिरा पाते हैं। जल एवं मिट्टी का प्रदूषण तो राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय सीमाओं से बँधा रहता है परन्तु वायु प्रदूषकों का इन राजनीतिक सीमाओं से कुछ भी लेना-देना नहीं है। वायु-प्रदूषण एक विश्वव्यापी समस्या है। वायु प्रदूषण सांस के आने-जाने के साथ अनचाहे शरीर में प्रवेश कर जाता है। प्रदूषित जल का उपयोग करना या न करना कुछ हद तक हमारी मर्जी पर निर्भर होता है पर प्रदूषित वायु के साथ यह सम्भव नहीं होता। ठीक यही बात पेड़-पौधों पर भी लागू होती है। इनके शरीर पर पत्तियों की रचना ही कुछ ऐसी है कि प्रदूषक पत्तियों पर बने छिद्रों से इनके शरीर में पहुँच जाते हैं। यदि प्रदूषकों की मात्रा सहन-सीमा से ज्यादा होती है तो उनका प्रभाव पत्तियों पर विभिन्न प्रकार के चकत्तों, धब्बों एवं हरी-पीली धारियों के रूप में प्रकट होने लगते हैं। प्रदूषकों का प्रभाव पत्तियों तक ही सीमित नहीं रहता है। ये पौधे के सुन्दर एवं नाजुक महत्वपूर्ण अंग यानी फूलों को भी प्रभावित करते हैं इससे जनन की क्रिया में भी व्यवधान उत्पन्न हो जाता है। मनुष्य अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रत्यक्ष एवं परेाक्ष दोनों में इस प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। तरह-तरह के फल एवं बीज, जिनका उपयोग भोजन के लिए किया जाता है, वृक्षों की ही देन है।

वनस्पतियों का स्थायित्व और विकास मुख्य रूप से फूलों द्वारा होने वाली प्रजनन क्रिया पर निर्भर होता है। फलधारी और शंकुधारी पौधों में बीज के निर्माण के लिए परागकणों का वीजाण्ड (फूल का मादा भाग) से मिलना जरूरी होता है। हजारों की संख्या में बने ये पराग हवा, कीट और पानी जैसे माध्यमों से फूल के मादा भाग तक पहुँचते हैं। इसी को परागकण कहा जाता है। इसकी सफलता पर ही निर्भर होता है कि बीज बनेंगे या नहीं। इस क्रिया के संदर्भ में किये जा रहे विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि बढ़ते वायु प्रदूषण व ग्रीन हाउस प्रभाव के कारण यह नाजुक क्रिया भी खतरों का सामना कर रही है। मोटे तौर पर वायु प्रदूषकों की उपस्थिति के कारण परागकणेां की अंकुरण क्षमता एवं परागनली की वृद्धि दर कम हो जाती है। फूलों पर इन प्रभावों के कारण फलों में बीज कम संख्या में बनते हैं और उनका आकार एवं भार भी परिवर्तित हो जाता है। इन प्रभावों को दिखाने वाले प्रमुख प्रदूषक हैं- सल्फर-डाई-आक्साइड, नाइट्रोजन आक्साइड, अमोनिया, कार्बन-डाई-आक्साइड और हाइड्रोजन फ्लोराइड।

उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषकों के अलावा सड़कों पर दौड़ने वाले वाहनों से निकले धुएँ का प्रभाव भी फूलों और निषेचन क्रिया पर होता है। मुख्य सड़क और चौराहों पर वाहनों का धुआँ ज्यादा घना होता है। इसमें कार्बन-मोनो-आॅक्साइड के साथ हाइड्रोकार्बन भी होता है। इस धुएँ के साथ सीसा भी निकलता है, जो जहर है। जन्तुओं में यह नाड़ियों में जमा होता रहता है और मानसिक विकारों को जन्म देता है। छोटे-बच्चों पर इसका प्रभाव ज्यादा देखा गया है। सड़कों के किनारे लगे पेड़-पौधों के परागकणों में अन्य भागों की अपेक्षा सीसो का जमाव सबसे ज्यादा पाया गया है। इसका प्रभाव जीवन शक्ति और अँकुरण क्षमता पर भी पड़ता है। वायु प्रदूषक सिर्फ परागकणों की संख्या, आकार, माप एवं उनके अँकुरण को ही प्रभावित नहीं करते, बल्कि इनका प्रभाव आनुवंशिक पदार्थ डी.एन.ए. पर भी होता है। फूलों में स्थित बीजाण्ड अल्पजीवी होता है और केवल कुछ ही घंटों तक परागकण को ग्रहण करने के योग्य रहता है। पौधों में परागकोष पकने, फटने एवं परागण क्रिया के बीच का अन्तराल निश्चित है। इन क्रियाओं में किसी भी प्रकार की देरी या जल्दी बीज बनने की महत्वपूर्ण क्रिया में व्यवधान उत्पन्न कर सकती है जो अन्ततः फलों एवं बीजों की कमी के रूप में परिलक्षित होते हैं।

यह एक कटु वास्तविकता है कि नदियाँ बुरी तरह से प्रदूषित हो चुकी हैं और इनका प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। शायद ही देश की कोई बड़ी नदी इस किस्म के विकार से अछूती हो। इस सिलसिले में किये गये अध्ययन से पता चलता है कि जहाँ गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी जैसी बड़ी नदियां उनके किनारे बसे शहरों की गन्दगी तथा कारखानों के रासायनिक अवशेषों से प्रभावित होती रही हैं, इस बारे में जन-चेतना के अभाव ने इस समस्या को और चिन्ताजनक बनाया है। इससे भी ज्यादा शोचनीय तथ्य यह है कि जल प्रदूषण नियंत्रण कानून के अमल में आने के बावजूद केवल कुछ करखानों ने ही उन्हें अपनाया है। यही वजह है कि अधिकांश उद्योग ही इस किस्म के जल-प्रदूषण के लिए जिम्मेदार होते हैं। ऐसी परिस्थिति में प्रदूषण जनित सभी परिवर्तनों का परिणाम प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों पर गम्भीर होने की सम्भावनाओं से इन्कार नहीं किया जा सकता है।

असल में हुआ यह कि विज्ञान ने इतनी प्रगति कर ली है और मानव के विकास की सम्भावनाओं के इतने द्वार खोल दिये हैं कि मानव तेजी से सारी भौतिक उन्नति पा लेने का लोभ संवरण नहीं कर पाया। जाहिर है कि एक कमरे के अन्दर हम लकड़ी जलाकर यदि खाना पकाएँ तो धुएँ के गुबार से छत तो काली होगी ही धरती से कार्बन-डाई-आक्साइड की इतनी बड़ी मात्रा पर्यावरण में पहुँचती है कि उससे नुकसान होना निश्चित ही है। धरती पर पेड़-पौधों और हरे-भरे जंगल जिस मात्रा में होंगे, उतना ही वे वातावरण से प्रदूषण खीचेंगे और धरती के हवा-पानी को शुद्ध बनाये रखेंगे। हमने अपनी उपभोक्तावादी संस्कृति के उन्माद में जंगलों को बहुत नुकसान पहुँचाया है।

अभी तक प्रदूषण राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर ही वस्तु या व्यक्ति को प्रभावित करते नजर आ रहे थे परन्तु अब हम घरों में भी प्रदूषण से मुक्त कहाँ हैं? सुगन्धित इत्र का आविष्कार करते समय यह घोषण की गयी थी कि इत्र से दुर्गन्धित वायु को सुगन्धित किया जायेगा। इसके प्रयोग से ताजगी आयेगी और लोग तनावमुक्त हुआ करेंगे किन्तु अब यह इत्र कई रोगों का जन्मदाता माना जा रहा है। हेयर स्प्रे, क्लोथ स्प्रे, ऑयल स्प्रे के प्रयोग से श्वसन क्रिया पर बुरा असर पड़ता है। घरों में विभिन्न प्रकार के कीटाणुओं से छुटकारा पाने के लिए कीट रसायनों का प्रयोग आम हो चला है। मक्खी, मच्छर, खटमल को मारने के लिए अक्सर कीटानाशकों का प्रयोग किया जाता है। वैज्ञानिकों ने अपने विश्लेषणों के आधार पर प्रमाणित किया है कि इस रसायन से केवल विषाणु ही नहीं आदमी भी मर सकता है। इस रसायन के प्रयोग से घर की वायु, जल, भोजन यहां तक कि कपड़े भी प्रदूषित हो जाते हैं।

घर में महिलाओं का धुएँ से सबसे अधिक पाला पड़ता है। धुआँ सिगरेट का हो या ईंधन का, दोनों अत्यंत हानिकारक हैं। सिगरेट, बीड़ी, गाँजे का धुआँ घर के वातावरण को विषाक्त बना देता है। परोक्ष रूप से परिवार के अन्य सदस्यों पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। परम्परागत चूल्हों की बात छोड़ भी दी जाये तो गैस चूल्हा भी कम हानिकारक नहीं, गैस जलने से नाइट्रोजन आक्साइड की अल्प मात्रा भी निकलती है। अगर ग चूल्हा अच्छी तरह नहीं जला तो कार्बन-मोनो-आक्साइड भी बाहर आती है। नाइट्रोजन आक्साइड से गले में खराश, जलन तो होती है, ये दमा एवं खाँसी रोग को भी बढ़ाता है धुआँ आंखों पर गहरा असर डालता है जिससे प्रारम्भ में आँखों में जलन और बाद में आँखें खराब हो जाती हैं।

विश्व की आज एक बड़ी समस्या पर्यावरण को स्वच्छ और जीवनोपयोगी बनाने की है। पर्यावरण की सुरक्षा और सुधार सम्बन्धी कानून लगभग प्रत्येक प्रमुख देश ने बनाये हैं। भारत ने भी सन् 1986 में पर्यावरण की विशुद्धि के लिए पर्यावरण संरक्षण अधिनियम बनाया।

अगर आपके घर में रेफ्रिजरेटर, एयर कंडीशनर, वीडियो-टेलीविजन और टेप उपलब्ध है तो सच मानिये ये सारे आरामदायक उपकरण जानलेवा भी हो सकते हैं। फ्रिज-एयरकंडीशनर क्लोरो-फ्लोरो कार्बन उत्सर्जित करते हैं। यह गैस स्वास्थ्य के लिए तो हानिकारक है ही, पर्यावरण के लिए भी घातक है। वीडियो-टेलीविजन के पर्दे कुछ ऐसी घातककिरणों को विसर्जित करते हैं जिनसे आँख, त्वचा बुरी तरह प्रभावित होती है। वीडियो गेम्स, टेलीविजन का पर्दा सभी लगभग एक वाट ऊर्जा पैदा करता है। इससे कैंसर, त्वचा रोग, आँख रोग जनमते हैं। अमरीकी वैज्ञानिकों ने अपने सफल प्रयोग से यह साबित कर दिया है कि वीडियो गेम्स तथा वीडियो चित्र से बच्चों में मिर्गी लग जाने का भय रहता है। इन उपकरणों की कानफोड़ू आवाज से आप बहरे भी हो सकते हैं।

कपड़ों को साफ करने के लिए वाशिंग मशीन में डिटर्जेंट पाउडर का प्रयोग किया जाता है। डिटर्जेंट पाउडर जल समूहों में मिलकर जल को, मिट्टी से मिलकर मिट्टी को तथा कपड़ों से मिलकर कपड़ों में प्रदूषण पैदा कर देते हैं। इन तीनों स्तरों पर मानव किसी न किसी प्रकार से शिकार बन रहे हैं। डिटर्जेंट पाउडर, धुलाई के दौरान अगर कपड़ों से किसी प्रकार से चिपका रह जाए तो चर्मरोग शरीर से चिपक जायेंगे। वाशिंग मशीन कपड़ों पर एक प्रकार से पाउडर का लेप चढ़ा देती है। अगर जल से इसे पूर्णतः साफ नहीं किया गया तो आफत आ पड़ती है। घर में रोजाना प्रयोग होने वाले डिटर्जेंट पाउडर, केक, कीटनाशक, कैरोसिन स्टोव, पेंट आदि में कई विषैले रसायन मिले होते हैं। इन जहरीले रसायनों में एथिलीन, टेट्राक्लोरो, वैजोपायरीन, क्लोरोफार्म, फार्मेल्डीहाइड, मेथिल क्लोराइड, कार्बन मोनोआक्साइड, नेप्थलीन प्रमुख हैं। इन रसायनों से शरीर की यांत्रिक-तंत्रिकायें, फेफड़े, मस्तिष्क, आँत गड़बड़ हो सकते हैं और कई भयानक रोग भी हो सकते हैं।

घरों में विभिन्न प्रकार के रंगीन बल्ब आजकल उपयोग में लाये जा रहे हैं। ये सभी रंगीन बल्ब हमारे लिये हानिकारक हैं। साधरण बिजली बल्ब पीला प्रकाश उत्सर्जित करता है। इस प्रकाश में लाल रंग की मात्रा अधिक होती है। इसी प्रकार साधारणतः ट्यूब लाइट पीला एवं हरा प्रकाश देती है। इस प्रकार का प्रकाश या उजाला आँखों को प्रभावित करते हैं, जिससे आँखों में जलन एवं मानसिक तनाव उत्पन्न हो सकता है। इसके अलावा घरों में प्रयुक्त होने वाले एल्यूमिनियम के बर्तन कम घातक नहीं। एल्यूमीनियम अत्यन्त क्रियाशील धातु है जो हवा में वर्तमान आक्सीजन से भी शीघ्र बने एल्यूमिनियम आक्साइड में आक्सीकृत हो जाती है जो पतली परत के रूप में बर्तन की सतह पर जम जाती है। अगर एल्यूमिनियम की मात्रा शरीर में 10 या 20 प्रतिशत से अधिक होने लगती है, तो मस्तिष्क की कोशिकाएं नष्ट होने लगती हैं। मानव की स्मरण शक्ति नष्ट हो जाती है। यह हृदय रोग को भी आमंत्रित करती है। प्रत्येक सुबह और शाम फ्लोराइडयुक्त टूथपेस्ट का प्रयोग शहरों में आम हो गया है। अधिक फ्लोराइडयुक्त टूथपेस्ट का सेवन, दाँतों, गले में रोग को पैदा करता है।

विश्व की आज एक बड़ी समस्या पर्यावरण को स्वच्छ और जीवनोपयोगी बनाने की है। पर्यावरण की सुरक्षा और सुधार सम्बन्धी कानून लगभग प्रत्येक प्रमुख देश ने बनाये हैं। भारत ने भी सन् 1986 में पर्यावरण की विशुद्धि के लिए पर्यावरण संरक्षण अधिनियम बनाया। इस अधिनियम में ‘‘पर्यावरण’’ की एक विस्तृत और उन्मुक्त परिभाषा दी गई जिसके अंतर्गत जल, वायु और भूमि तो हैं ही परन्तु इससे मनुष्य का सम्बन्ध भी सम्मिलित कर लिया गया है। पर्यावरण प्रदूषित करने वाले पदार्थ प्रदूषक कहलाते हैं जिनके अंतर्गत ऐसे सभी ठोस, द्रवीय और गैसीय पदार्थ आते हैं जो ऐसी सांद्रता में उपस्थित हैं जो पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं या हानिकर हो सकते हैं। इस अधिनियम के अन्तर्गत केन्द्रीय सरकार को ऐसे सभी उपाय अपनाने की शक्ति है जो पर्यावरण संरक्षण, नियंत्रण और उपशमन के लिए आवश्यक हो। इस दिशा में व्यक्तियों के ऊपर भी कुछ दायित्व अधिनियम द्वारा लगाए गए हैं। यदि कोई व्यक्ति प्रदूषण निवारण सम्बन्धी नियमों का उल्लंघन करेगा या ऐसे नियमों का पालन नहीं करेगा तो ऐसे प्रत्येक उल्लंघन या पालन की अवहेलना के लिए उसे कैद या अर्थदण्ड या दोनों की सजा हो सकती है। यह सजा प्रत्येक उल्लंघन और अवहेलना के लिए है अर्थात् यदि ऐसे उल्लंघन और अवहेलना एक से अधिक होते हैं तो सजा उतनी ही बढ़ती जायेगी। पहले उल्लंघन या अवहेलना के लिए पांच वर्ष तक का कारावास या एक लाख रुपए तक अर्थदण्ड या दोनों दिया जा सकता है। यदि इस दण्ड पर भी कोई व्यक्ति उल्लंघन या अवहेलना जारी रखताहै तो उसे प्रत्येक दिन के लिए पांच हजार रुपया जुर्माना देना पड़ेगा। यदि तब भी कोई व्यक्ति उल्लंघन या अवहेलना जारी रखता है तो उसे सात साल तक की सजा हो सकती है।

देश के विकास के लिए अनगिनत योजनाएँ बनती हैं पर उन योजनाओं में पर्यावरण के सवाल को कितना महत्व दिया जाता है, यह बात गम्भीरतापूर्वक नहीं ली जाती है। जंगल कट रहे हैं, प्रदूषण का भयावह प्रसार जारी है, पीने का पानी धीरे-धीरे जहर बनता जा रहा है। हम धुआँ उगल रहे हैं, यह बात किसी को विचलित नहीं करती उस तरह से हमारे मन को बेचैन नहीं बनाती जैसे अन्य समस्याएँ और सुविधाओं का अभाव बनाता है। वायु जहरीली हो रही है चारों ओर शोर बढ़ रहा है पर उस तरफ किसी का ध्यान नहीं। इसको नियंत्रित करने के लिए निम्न उपायों पर गौर किया जा सकता है

1. यदि सचमुच हमें पर्यावरण संरक्षण की चिन्ता है तो इस चिन्ता को प्रत्येक नागरिक की चिन्ता बनाना होगा, साथ ही सरकार और सरकारी एजेंसियों को भी ऐसे कदमों को वापस लेने के लिए तैयार रहना होगा जो राष्ट्रीय पर्यावरण के लिए किसी भी तरह घातक हैं।
2. वृक्षारोपण तथा वन संरक्षण को एक वृहत् राष्ट्रीय अभियान के रूप में गम्भीरता से लिया जाना चाहिए। वनों की रक्षा के साथ प्राणियों की भी रक्षा आवश्यक है।
3. यह ठीक है कि औद्योगिक विकास में नये कारखानों के लिए जमीन चाहिए, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि जो भूमि वन की है, उसका अपहरण किया जाये। योजना ऐसी होनी चाहिए कि वनों का संरक्षण तथा उद्योगों का विकास समन्वित ढंग से हो। बंजर पड़ी भूमि का उपयोग कृषि अथवा कारखानों के लिए होना चाहिए।
4. राजनीति के गलियारों में भी पर्यावरण के अलग-अलग विषयों की गूँज हो। संसद तथा विधान सभाओं में उन पर बहस हो। अलग-अलग तरह से उन विषयों पर लोगों के मत-सम्मत लिये जाएँ।
5. हमें चाहिए कि हम देश में उपलब्ध संसाधनों का दोहन एक सीमित दायरे में करें और कोशिश यह करें कि इनका दुरुपयोग कम से कम हो। इसके लिए हमें अपने सामाजिक दृष्टिकोण में आमूल परिवर्तन करना होगा और सामाजिक मान्यताओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण देना होगा।
6. सामाजिक-राजनीतिक संस्थाएं ऐसा वातावरण पैदा करें जिससे बढ़ती हुई जनसंख्या में तुरन्त कमी की जा सके।
7. पर्यावरण प्रदूषण व जनसंख्या नियंत्रण पर बनाये जाने वाले कानून भारतीय समस्याओं को ध्यान में रखकर भारतीय नागरिक के लिए बनाये जाने चाहिए। इसके प्रति हमारी नीति व नियति दोनों स्पष्ट व स्वच्छ होने चाहिए।

अगर हम लोगों को विरासत में विज्ञान की प्रगति के साथ-साथ जनसंख्या विस्फोट की त्रासदी भी मिली है। हम जनसंख्या की त्रासदी से जूझ रहे हैं। जिसकी वजह से हम रोटी, कपड़ा व मकान जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरी तरह पूरा नहीं कर पा रहे हैं। बेरोजगारी, भुखमरी, संसाधनों में कमी जैसी समस्या का सामना कर रहे हैं। इसके अलावा हिंसा में भी लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। निश्चित जानिये हमारी गरीबी एक हिंसक जीवन को भी नारकीय बना देगी। अब जरा कल्पना कीजिये इक्कीसवीं सदी के उस मानव की जो कंक्रीट के जंगल में पराबैंगनी किरणों से बचने के लिए अम्लरोधक तथा विशेष रसायनयुक्त प्लास्टिक के कपड़ों से अपने शरीर को ढककर अवरोधक यंत्र कसे औद्योगिक विकास का कचरा ढोयेगा। क्या यही हम उन्हें विरासत में देने वाले हैं? विश्व में समझदारी की कमी नहीं है परन्तु समझदारी को अमल में लाने की दृढ़ता, साहस व विश्वास की कमी अवश्य है।

सम्पर्क
एन,15/24, सुदामापुर, वाराणसी-221010

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