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भारी धातुओं से पर्यावरण प्रदूषण

Author: 
डा. दिनेश मणि
Source: 
योजना, जून 1995

विकासशील देशों में प्रतिवर्ष बीजों को उपचारित करने के लिये हजारों टन पारा जीवनाशियों का प्रयोग होता है जिसके कारण असावधान कृषकों की मृत्यु होती रहती है। कभी-कभी उपचारित बीजों को चिड़िया चुग लेती हैं तो वे भी बड़ी संख्या में मरने लगती हैं। किन्तु गौ पशु इसके प्रति सर्वाधिक संवेदनशील होते हैं। पशुओं में जूं मारने की घरेलू दवाओं तथा कैलोमेल के प्रयोग से पशुओं की मृत्यु हो सकती है। इसकी विषाक्तता से लार गिरना, वमन, खाने में अरुचि तथा पक्षपात के लक्षण देखे जाते हैं। संयुक्त राज्य की पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी (EPA) ने अपने दस्तावेज में कुल छः धातुओं को भारी माना है। ये हैं- कैडमियम, क्रोमियम, काॅपर, लेड, मरकरी तथा निकिल; किन्तु पर्यावरण इंजीनियर की हैंडबुक में केवल पाँच धातुओं को भारी माना गया है। ये हैं- एल्युमीनियम, क्रोमियम, काॅपर, आयरन तथा जिंक।

पर्यावरण प्रदूषण के लिये भारी धातुओं को उत्तरदाई ठहराने के पूर्व भारी धातुओं को परिभाषित करना अधिक उपयुक्त होगा-

भारी धातुओं की सवमान्य परिभाषा के अनुसार धातुएँ जिनका घनत्व 5 से अधिक होता है। परमाणु क्रमांक 20 से अधिक क्रमांक वाले सारे तत्व (क्षारीय, क्षारीय मृदा, लैंथनाइड तथा एैक्टिनाइड तत्वों को छोड़कर) भारी धातु कहलाते हैं। मुख्य भारी धातुएँ हैं- कैडमियम, क्रोमियम, कोबाल्ट, काॅपर, आयरन, मरकरी, मैंगनीज, मोलिब्डिनम, निकिल, लेड, टिन तथा जिंक। कुछ भारी धातुएँ जैसे- काॅपर, आयरन, मैंगनीज, जिंक, मोलिब्डिनम तथा कोबाल्ट की सूक्ष्म मात्रा पौधों के लिये आवश्यक होती है। कुछ भारी धातुएँ जैसे क्रोमियम, निकिल तथा टिन की सूक्ष्म मात्रा जानवरों के लिये आवश्यक होती है, किन्तु कैडमियम, मरकरी तथा लैड न तो पौधों के लिये आवश्यक है और न ही जानवरों के लिये। (अर्थात पर्यावरण में इनकी उपस्थिति वनस्पतियों, जीवों एवं मनुष्य के लिये हानिकारक होती है) ये विषैली भारी धातुएँ अनुमत सान्द्रण सीमा से अधिक होने पर मृदा के धात्विक प्रदूषण का कारण बनती हैं।

कैल्शियम (Ca) मैग्नीशियम (Mg) वेनेडियम (V) क्रोमियम (Cr) लोहा (Fe) तांबा (Cu) आदि भारी धातुएँ शरीर की उपापचयी क्रियाओं के सही संचालन हेतु आवश्यक होती हैं, किन्तु इनकी सान्द्रता अधिकतम अनुमेय सीमा से अधिक होने पर ये जानलेवा सिद्ध हो सकती हैं, आजकल कुछ भारी धातुएँ यथा- कैडमियम (Cd) क्रोमियम (Cr) मरकरी (Hg) काॅपर (Cu) निकेल (Ni) जिंक (Zn) आदि पर्यावरण प्रदूषण के सन्दर्भ में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। इनमें से कुछ तो इतनी अधिक घातक है कि यदि दस लाख भाग में इनका एक भाग भी विद्यमान रहे तो ये घातक बन जाती हैं। इन धातुओं का औद्योगिक महत्त्व होने के नाते रोज नए-नए कारखानों की स्थापना हो रही है फलतः प्रतिदिन अपशिष्ट के रूप में इन धातुओं का ढेर-सा लग जाता है और पर्यावरण में इन धातुओं का प्रचुर अंश विष रूप में मिलता रहता है। इन अपशिष्ट के हवा, नदी-नाले तथा मिट्टी आदि में पहुँचने से वायु, जल तथा मिट्टी के धात्विक प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो जाती है। जल, वायु, मिट्टी ही नहीं अपितु इससे अब खाद्य सामग्री भी प्रदूषित होने लगी है।

एक नवीनतम आकलन के अनुसार अब तक 0.5 मिलियन टन कैडमियम, 20 मिलियन टन निकिल, 240 मिलियन टन लैड, 250 मिलियन टन जिंक तथा 310 मिलियन टन काॅपर उत्खनित (Mined) हो चुके हैं तथा अन्ततः जैवमण्डल में व्यर्थ पदार्थ के रूप में छोड़े जा चुके हैं। जापान में ‘मिनीमाता’ नामक स्थान पर हुई इस दुर्घटना ने सारे विश्व का ध्यान धातु प्रदूषण की ओर आकर्षित किया। इस दुर्घटना में 56 लोगों की मृत्यु हुई थी और काफी लोग विकलांग हो गए थे। माताओं के गर्भ में पल रहे बच्चे भी इस दुर्घटना से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। यह दुर्घटना एक रासायनिक कारखाने की वजह से हुई थी जो अपशिष्ट पदार्थों को मिनीमाता की खाड़ी में फेंक देता था, इन पदार्थों में पारा (मरकरी) के लवण मुख्य थे। इससे खाड़ी का पानी प्रदूषित हो गया था। पारा के लवणों के कारण खाड़ी की मछलियाँ विषैली हो गई थीं। इनके खाने से यह विष मनुष्यों के शरीर में भी पहुँच गया था। उस समय खाड़ी के जल में पारा की मात्रा 1.6-3.6 पीपीबी (अंश/बिलियन) रहता था। वास्तव में अधिकांश उद्योगों (जैसे प्लास्टिक, कागज, रंग पालिश आदि उद्योग) में पारे के कार्बनिक तथा अकार्बनिक यौगिकों का उपयोग किया जाता है, जिन्हें अन्त में बेकार पानी के साथ समुद्र या नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। जब मछलियाँ इस जल में जाती हैं तो वे अधिक पारायुक्त चारा खाती हैं। जिस मछली में प्रति किलो भार पर 1 मि.ग्रा. से अधिक पारा रहता है वह खाने के लायक नहीं रहती। वैज्ञानिक ‘स्टाॅक’ के अनुसार यदि प्रतिदिन लगातार कई सप्ताहों तक ऐसी वायु में साँस ली जाये जिसमें प्रति घन मीटर 0.01 पारा हो तो सिरदर्द, थकान तथा मस्तिष्क शिथिलता का अनुभव होने लगेगा। अनुमान है कि मनुष्य प्रतिदिन भोजन से 0.005 मि.ग्रा. पारा ग्रहण करता है। किन्तु यह भी ध्यान रहे कि प्रति सप्ताह 0.3 मि.गा. से अधिक पारा ग्रहण नहीं किया जा सकता।

विकासशील देशों में प्रतिवर्ष बीजों को उपचारित करने के लिये हजारों टन पारा जीवनाशियों का प्रयोग होता है जिसके कारण असावधान कृषकों की मृत्यु होती रहती है। कभी-कभी उपचारित बीजों को चिड़िया चुग लेती हैं तो वे भी बड़ी संख्या में मरने लगती हैं। किन्तु गौ पशु इसके प्रति सर्वाधिक संवेदनशील होते हैं। पशुओं में जूं मारने की घरेलू दवाओं तथा कैलोमेल के प्रयोग से पशुओं की मृत्यु हो सकती है। इसकी विषाक्तता से लार गिरना, वमन, खाने में अरुचि तथा पक्षपात के लक्षण देखे जाते हैं।

कैडमियम भी एक विषैला भारी धातु है। यह खनन, धातुकर्म, रसायन उद्योग, सुपर फॉस्फेट उर्वरक तथा कैडमियम युक्त जीवनाशी रसायनों के माध्यम से पर्यावरण में प्रवेश पाता है। चाहे कपड़ा धोने की मशीन हो या कि कुकर अथवा फ्रिज हो, सभी में कैडमियम प्लेटिंग रहती है अनुमान है कि मनुष्य के आहार के साथ प्रतिदिन 40 माइक्रोग्राम कैडमियम प्रविष्ट होता है। जापान ‘इटाइ-इटाइ’ रोग कैडमियम की ही विषाक्तता से होता है। हमारे देश में ही कैडमियम बैटरी बनाने वाले उद्योगों में प्रदूषण के कारण 4000 लोगों की मृत्यु हो चुकी है।

मनुष्य में कैडमियम की कुल मात्रा 30 मि.ग्रा. होती है जिसका 1/2 अंश कृषकों में 1/6 अंश यकृत में रहता है। प्रदूषण की स्थिति में यकृत में कैडमियम की मात्रा बढ़ती जाती है किन्तु ‘वृक्कों’ (Kidenys) में इसकी मात्रा आयु के अनुसार बढ़ती है, इसकी विषाक्तता से पथरी पड़ जाती है इसका विषैला प्रभाव इंजाइम के SH (सल्फिड्रिल समूह) पर पड़ता है। सिगरेट पीने वालों के शरीर में कैडमियम की मात्रा अधिक पाई जाती है। इसकी विषाक्तता से तनाव तथा हृदयरोग बढ़ते हैं।

लेड या सीसा एक संचयी विष है। दैनिक मात्रा थोड़ी होने पर भी लम्बे समय में सीसे का काफी संचय हो जाता है। यह पात्रों, मिट्टी और पानी के पादपों से पर्यावरण में आता है। अनुमान है कि प्रतिदिन भोजन के द्वारा मनुष्य को 0.2-0.24 मि.ग्रा. सीसा मिलता है। जल के माध्यम से प्रति लीटर 0.1 मि.ग्रा. सीसा शरीर के भीतर पहुँचता है। मृदु तथा अम्लीय जल में यह मात्रा अधिक हो सकती है।

1977 में आन्ध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के मलप्पडु नामक ग्राम के मवेशी एक बीमारी से ग्रसित हुए थे। मवेशियों को यह बीमारी सीसा मिले रसायनों से प्रदूषित जल पीने के कारण हुई थी। हुआ यह था कि उपर्युक्त ग्राम के निकट की नदी में एक रासायनिक कारखाने द्वारा उक्त रसायन छोड़ दिये जाते थे और मवेशी इस नदी का जल पिया करते थे। फलतः कई पशुओं की जानें चली गईं।

शहरों में वाहनों के पेट्रोल से निकला सीसा वायुमंडल में व्याप्त रहता है। इंजनों की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिये पेट्रोल में लेड के रसायन (यथा- टेट्राइथाइल लैड) मिला दिये जाते हैं। यह सीसा श्वास द्वारा शरीर में प्रविष्ट होता रहता है।

सीसे की विषाक्तता से उल्टी, अरक्कता, गठिया आदि रोग हो जाते हैं। प्राचीन रोम के वासी सीसा से कलई किये गए बर्तनों का अधिक उपयोग करते थे इसके कारण उनके शरीर में सीसा की इतनी अधिक विषाक्तता हो गई थी कि कम आयु में ही उनकी मृत्यु हो जाती थी।

ऐल्युमिनियम का सर्वाधिक प्रयोग नित्य प्रति व्यवहार में आने वाले बर्तनों के बनाने में होता है। यदि पीने के पानी में फ्लोराइड मिला दो तो ऐसे बर्तनों में से पर्याप्त ऐल्युमिनियम शरीर के भीतर प्रविष्ट हो सकता है। इसकी अधिकता से मस्तिष्क की कोशिकाओं को क्षति पहुँचती है।

क्रोमियम निकिल धातुओं से सम्बन्धित कारखानों में काम करने वाले मनुष्यों में चर्म तथा श्वास नली के कैंसर होते देखे गए हैं।

आर्सेनिक एक संचयी तथा जीवद्रव्यीय (प्रोटोप्लाज्मिक) विष है जो इंजाइमों के एस.एच. समुहों को अवरुद्ध करता है। आर्सेनिक का शोषण चमड़ी तथा फेफड़ों से होता है। यह कैन्सरजनक माना जाता है। यह जीवनाशी रसायनों के प्रयोग से पर्यावरण में आता है।

मनुष्यों में भारी धातुओं के सन्दूषण के स्रोत भोजन या पानी हो सकते है। सारणी-1 में भारी धातुओं का सन्दूषण तथा मनुष्यों पर प्रभाव दर्शाया गया है।

सारणी-1 भारी धातुओं का सन्दूषण तथा मनुष्यों पर प्रभाव

 

भारी धातुएँ

सन्दूषण का साधन

मनुष्यों पर शारीरिक प्रभाव

कैडमियम

भोजन द्वारा, जल द्वारा

मिचली, दस्त, हृदय रोग

लेड

जल द्वारा

गम्भीर संचयी तथा उग्र शरीर विष

मरकरी

जल द्वारा

मस्तिष्क तथा केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र को क्षति

मेथिल

भोजन द्वारा

मस्तिस्क तथा केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र को क्षति

आर्सेनिक

जल द्वारा

100 मिग्रा से उग्र शारीरिक प्रभाव

क्रोमियम

जल द्वारा

सांस के साथ जाने पर कैंसर उत्पादक

सेलीनियम

जल द्वारा

बाल झड़ जाते हैं तथा त्वचीय परिवर्तन

 

इस प्रकार स्पष्ट है कि ये भारी धातुएँ कितनी अधिक विषैली हैं। शहरी गन्दे जल (सीवेज-स्लज) से सींची गई मिट्टियों में उपजने वाली फसलों में कैडमियम की उच्च मात्रा पाई जा सकती हैं अतएव पौधे तथा फसलें कम-से-कम कैडमियम ग्रहण करें, इस दिशा में शोध की आवश्यकता बनी हुई हैं

यहाँ प्रस्तुत धातुओं के अतिरिक्त अन्य और भी भारी धातुएँ वे हैं जिनका घनत्व 5 से अधिक हो किन्तु आजकल इस मूल संकल्पना में परिवर्तन हो चुका है। अब भारी धातुएँ उन्हें माना जाता है जिनमें इलेक्ट्रान स्थानान्तरण का गुणधर्म पाया जाता है।

इन विषैली भारी धातुओं के मुख्य स्रोत हैं-
1. कच्चा मल-जल, घरेलू अपशिष्ट, शैलों का अपक्षय तथा शहरी कूड़ा-कचरा एवं कृषि-कार्य
2. औद्योगिक बहिःस्रोव।

दुर्गापुर क्षेत्र में जिंक (Zn) लेड (Pb) क्रोमियम (Cr) आर्सेनिक (As) तथा मरकरी (Hg) की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है जिससे नदी में आर्सेनिक (As) तथा मरकरी (Hg) की पर्याप्त मात्रा पाई गई।

बम्बई तथा पुणे के औद्योगिक क्षेत्रों से निकले बहिःस्राव नदियों में मिलकर काॅपर (Cu) कैडमियम (Cd) तथा मरकरी (Hg) को बढ़ाने वाले हैं।

केरल में पेरियार नदी के अवसाद में लेड (Pb) की हानिकारक सान्द्रता पाई गई है।

तमिलनाडु के कुओं से औद्योगिक क्षेत्र में क्रोमियम (Cr) की मात्रा काफी अधिक (54-1500 पी.पी.एम.) पाई गई है।

अलीगढ़ के आसपास गंगा में भारी धातुओं का संचय पाया गया है।

बिहार में गंगा तथा उसकी सहायक नदियों में आर्सेनिक (As) कैडमियम (Cd) क्रोमियम (Cr) तांबा (Cu) लोहा (Fe) सीसा (Pb) मैंगनीज (Mn) पारा (Hg) निकिल (Ni) तथा जिंक (Zn) भारी धातुएँ पाई गईं किन्तु प्राप्त भारी धातुएँ अधिकतम सहिष्णुता-सीमा से नीचे है।

पीने के जल में भी भारी धातुओं की कुछ-न-कुछ मात्रा रहती है। सारणी-2 में इनकी अधिकतम अनुमत सान्द्रता दर्शाई गई है।

सारणी-2 पीने के जल में भारी धातुओं की अधिकतम अनुमत सान्द्रता (मि.ग्रा./लि.)

 

भारी धातु

अधिकतम अनुमत सान्द्रता (मि.ग्रा./ली.)

मरकरी

0.001

कैडमियम

0.01

सेलीनियम

0.01

आर्सेनिक

0.05

क्रोमियम

0.05

कॉपर

0.05

मैंगनीज

0.05

लेड

0.01

जिंक

5.0

 

औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास की मिट्टी में भारी धातुओं की इतनी प्रचुरता पाई जाती है कि उनमें उगने वाली वनस्पति सन्दूषित हो जाती है। उदाहरणार्थ, पारा उद्योग के आसपास की वनस्पति अत्यधिक पारे से सन्दूषित होती है (वायु प्रदूषण से)। खानों के आसपास उगाई जाने वाली तरकारियों में सीसा, कैडमियम, पारा तथा समुद्री प्लैंकटनों में भी तांबा/जिंक, कैडमियम तथा सीसा का संचय पाया गया है। धातु प्रदूषण का पता लगाना मानीटरन द्वारा सम्भव है किन्तु मानीटरन के लिये बहुत सारे नमूनों का परीक्षण आवश्यक होता है जो बहुत खर्चीला तथा समय लेने वाला है।

यही कारण है कि जब कोई शिकायत आती है तभी परीक्षण किया जाता है किन्तु पूर्व सूचना जल्दी-से-जल्दी तैयार की जानी चाहिए। फिर भी कुछ पौधे और पशु भारी धातुओं के प्रति संवेदनशील होते हैं जिन्हें सूचकों की तरह प्रयुक्त किया जा सकता है। यह साधन सस्ते हैं और स्थानीय रूप से विशेष लाभप्रद हैं। इस विधि को ‘बायोमानीटरन’ कहा जाता है। सारणी-3 में विभिन्न भारी धातुओं के सूचक पौधे दर्शाए गए हैं।

सारणी-3 भारी धातुएँ और सूचक पौधे

 

सूचक पौधा

भारी धातु

थलास्पी अल्पेस्टे

जिंक

मिनुएर्टिया वर्ना

लेड

पियर्सोनिया मेटलीफेरा

क्रोमियम

मिनुएर्टिया वर्ना

कैडमियम

ट्रैकीपोगोन रिचकेटस

कॉपर

 

यह देखा गया है कि शैवालों तथा प्लवकों (प्लैंक्टन) में इन धातुओं का बहुत अधिक संचय होता है अतः इन धातुओं के अस्थायी छुटकारे के लिये शैवालों तथा प्लवकों की खेती पर बल देने की आवश्यकता है। शोधों से पता चला है कि चीड़ का पेड़ मिट्टी से बेरीलियम अवशोषित कर उसे धातु प्रदूषण से मुक्त कर देने की सामर्थ्य रखता है। हैयुमैनिएस्ट्रम नामक वनस्पति जमीन से तांबे एवं कोबाल्ट का अवशोषण करती है। क्रूसीफेरी परिवार की एक वनस्पति थ्लास्पी रोटण्डीफोलिय जस्ते और सीसे को वातावरण से अवशोषित करती है। इनमें इनकी मात्राएँ 1-2 प्रतिशत हो सकती है। इसी प्रकार सेम, मटर आदि के पौधे जमीन से माॅलिब्डिेनम धातु अवशोषित कर लेते हैं।

व्याख्याता, रसायन विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद-211002

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