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वनों का महत्त्व, भारतीय अर्थव्यवस्था एवं संस्कृति के सन्दर्भ में

Author: 
ज्योति शंकर मिश्र एवं रजनीश कुमार सिंह
Source: 
योजना, जून 1995

प्राचीन काल से ही भारत में वनों का आर्थिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व रहा है। वनों की छत्रछाया में ही भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति का उद्भव एवं विकास हुआ। प्राकृतिक संसाधनों में वनों का महत्त्व आज भी किसी से छिपा नहीं है। आज भी करीब एक करोड़ भारतीय प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपनी जीविका के लिये वनों पर निर्भर हैं। किन्तु वनों के बड़ी मात्रा में दोहन के फलस्वरूप इनके क्षेत्रफल में भारी कमी आ रही है। इस दिशा में कई योजनाएँ बनने के बावजूद उनका सही ढंग से क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। लेखक के विचार में भारतीय अर्थव्यवस्था एवं संस्कृति में वनों के महत्त्व को देखते हुए यह आवश्यक है कि हम वनों के दोहन को रोकने तथा नए वनों की स्थापना की दिशा में ईमानदारी, समर्पण एवं अन्तरभावना से कार्य करें। सुनने में यह भले ही अतिश्योक्तिपूर्ण लगे, परन्तु यह सत्य है कि एक सामान्य वृक्ष अपने औसत जीवन काल में हमें लगभग 22 लाख रुपए का लाभ पहुँचाता है। जबकि इस लाभ में उस वृक्ष से प्राप्त लकड़ी, फल, औषधि, छाल, पुष्प एवं पत्ते शामिल नहीं है। वन आर्थिक रूप से काफी महत्त्वपूर्ण है। भारतीय वनों से जहाँ पाँच सौ प्रकार की महत्त्वपूर्ण लकड़ियाँ प्राप्त होती है वहीं भारतीय वनों से चन्दन की लकड़ी, बीड़ी के पत्ते, लाख, गोंद, रेशम, मधु, कत्था, कुनैन, चिरौंजी, दालचीनी, चर्म शोधन की वस्तुएँ, सेमल रंग-रोगन के सामान और अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियाँ प्राप्त होती हैं।

लगभग एक करोड़ भारतीयों को प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से अपनी जीविका के लिये वनों पर निर्भर रहना पड़ता है। वन उपजों से सूचीबद्ध किये गए 69 लघु एवं कुटीर उद्योग कच्चा माल प्राप्त करते हैं। इनमें से माचिस, कागज, कृत्रिम रेशम, फर्नीचर, लाख तथा रबर उद्योग प्रमुख हैं। पशु संसाधन में संख्या की दृष्टि से भारत का प्रथम स्थान है और वन कुल पशुओं में से लगभग 17 प्रतिशत पशुओं के आहार का प्रमुख स्रोत है।

वन, स्रोतों को अधिक स्थायी रूप से जल देने में, प्रबल बाढ़ों को रोकने में, नदियों में पानी के बहाव को निरन्तर बनाये रखने में, भूमि की ऊपरी सतह में नमी बनाए रखने में, भू-क्षरण को रोकने में, रेगिस्तान के फैलाव को नियंत्रित करने में सहायता प्रदान करता है।

एक परीक्षण से पता चला है कि वनीकरण से गर्मी के महीनों में तापमान 10 डिग्री सेल्सियस तक कम हो सकता है। वर्षा पर भी वनों का काफी प्रभाव पड़ता है, वनीकरण से वर्षा में 10 से 20 प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है।

आज वायुमण्डल उद्योगों और वाहनों की संख्या में लगातार वृद्धि के फलस्वरूप इतना दूषित हो गया है कि ताजमहल पर भी इसका कुप्रभाव परिलक्षित है। इस समस्या का निवारण वनों पर बहुत हद तक निर्भर है।

भारत में वनों का कुल क्षेत्रफल 677.6 लाख हेक्टेयर है, जो सम्पूर्ण क्षेत्रफल का 20.6 प्रतिशत है। जबकि जापान में देश के कुल भू-भाग के 2 प्रतिशत भाग में, ब्राजील में 57 प्रतिशत, रूस में 45 प्रतिशत तथा अमेरिका व कनाडा में 33 प्रतिशत भू-भाग में वन है। भारत में प्रतिव्यक्ति वन क्षेत्रफल लगभग 0.2 हेक्टेयर है। जबकि रूस में 3.5 अमरीका में 1.8 और स्वीडन में 4 हेक्टेयर है। सकल राष्ट्रीय उत्पादन (एन.एन.पी.) में वनों का योगदान एक प्रतिशत है। सकल स्वदेशी उत्पादन (जी.डी.पी.) में वनों का योगदान 1990-91 में 2,950 करोड़ था, जबकि 1970-71 में यह 3,580 करोड़ रुपए था। भारतीय वनों से इमारती लकड़ी का उत्पादन वर्ष 1982 में 232.3, 1986 में 254.3, 1990 में 274.3 और 1991 में 279.8 मिलियन क्यूबिक मीटर हुआ।

सरकारी वन नीति


भारत में वनों की विनाशलीला का प्रारम्भ ब्रिटिश काल में हुआ। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात रेलवे, सड़क, बाँध, कृषि, उद्योग तथा आवास के विकास के लिये काफी मात्रा में वनों का दोहन हुआ है। इस दोहन के फलस्वरूप वनों के क्षेत्रफल में भारी कमी आने लगी। अतः स्वतंत्र भारत में वन विकास के महत्त्व को ध्यान में रखकर अनेक योजनाओं को लाया गया।

1952 में राष्ट्रीय वन नीति की घोषणा की गई, जिसके तहत कुल भू-भाग के 33 प्रतिशत क्षेत्रफल वनों का विस्तार करना था। इसमें पहाड़ी क्षेत्र में 60 प्रतिशत तथा मैदानी क्षेत्र में 20 प्रतिशत क्षेत्र को वनों के अधीन करना था। यह नीति प्रभावी साबित नहीं हुई और असफल रही, अतः 1988 में एक नई नीति सरकार द्वारा लाई गई। नई नीति का भी करीब-करीब 1952 वाली नीति सा ही लक्ष्य है। अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि और वनों के दोहन के कारण नीति भी अब तक असफल ही कही जा सकती है। हालांकि विगत वर्षों में छिटपुट सफलता मिली है। वनों के विकास हेतु सन 1979 से विश्व बैंक की सहायता द्वारा सामाजिक-वानिकी योजना प्रारम्भ की गई।

पंचवर्षीय योजनाओं में वनों पर व्यय


 

पंचवर्षीय योजना

आबंटित राशि (करोड़ रुपए में)

व्यय प्रतिशत में (कुल योजना के)

प्रथम (1951-95)

8.5

0.43

द्वितीय (1956-61)

21.2

0.46

तृतीय (1961-66)

45.5

0.54

चतुर्थ (1969-74)

93.0

0.56

पांचवीं (1974-79)

206.0

0.56

छठी (1980-85)

863.0

0.67

सातवीं (1985-90)

18590.0

1.03

आठवीं (1992-97)

4082.0

1.13

प्रस्तावित व्यय

 

सांस्कृतिक महत्त्व


हमारे पूर्वजों ने वनों की महत्ता को बहुत पहले ही आँक लिया था। वृक्षों की उपयोगिता को दृष्टिगत रखते हुए ही धार्मिक पुस्तकों, लोक-कथाओं व प्राचीन ग्रन्थों में वृक्षों की विशिष्टता को देवत्व प्रदान किया गया है। यही कारण है कि आज वन विनाश की समस्या किसी वन मानव का अरण्य रोदन न रहकर सभ्य एवं विकसित समाज का नगर रोदन बन गया है।

भारतीय संस्कृति को अगर वन संस्कृति कहा जाये तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। प्रारम्भ से ही कृषि प्रधान देश होने के कारण वनों का भारतीय समाज से अनन्य सम्बन्ध रहा है। यही कारण है कि ऋषि-मुनियों से लेकर नृपों और सामन्तों तक ही नहीं, वरन आधुनिक समाज तक में वनों को महत्त्वपूर्ण समझा जाता रहा है। दुर्लभ एवं अतिआवश्यक वृक्षों की वृद्धि, पोषण एवं संवर्धन ही नहीं बल्कि उनकी उपयोगिता को ध्यान में रखकर, उन्हें धार्मिक विश्वासों की परिधि में कसकर उनके वंश को अमर कर दिया गया। इस प्रकार वृक्षों की पूजा प्रारम्भ हो गई। इन अति उपयोगी वृक्षों की शृंखला में महुआ, पीपल, नीम, तुलसी, आँवला, बड़, अर्जुन आदि वृक्ष शीर्ष पर रखे गए।

इससे स्पष्ट होता है कि वृक्षारोपण धर्म महान एक वृक्ष दस पुत्र समाज कहने वालों ने इसके महत्त्व को कितनी गहराई से लिया था। वनांचलों में ही अनगिनत महापुरुषों का बचपन बीता एवं असंख्य शोध कार्य सम्पन्न हुए। अनगिनत सभ्यताओं ने अपनी विकास यात्रा की। इतना ही नहीं विश्व की प्रथम कविता भी वन प्रान्त में प्रस्फूटित हुई और विश्व का पहला महाकाव्य भी वन में ही सृजित हुआ। अनेक भारतीय शासकों ने प्राचीन काल से ही वृक्षारोपण की ओर अत्यधिक ध्यान दिया जिनमें सम्राट अशोक, शेरशाह सूरी एवं मुगल बादशाह प्रमुख हैं। मुगल बादशाहों द्वारा लगाए गए बाग आज भी श्रीनगर, लाहौर, इलाहाबाद एवं दिल्ली आदि नगरों में देखे जा सकते हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था एवं संस्कृति में वनों के महत्त्व को देखते हुए यह आवश्यक हो गया है कि हम वनों के दोहन को रोकने तथा नए वनों की स्थापना की दिशा में ईमानदारी, समर्पण एवं अन्तरभावना से कार्य करें क्योंकि वृक्ष तो क्षण भर में मर जाते हैं परन्तु विकसित होते हैं वर्षों में। भारत में वनों के संरक्षण एवं उन्नति के लिये जो कुछ किया जाना चाहिए और जो कुछ किया जा रहा है, उसमें अन्तराल निरन्तर बढ़ता जा रहा है। कृषि प्रधान भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये यह एक बुरी खबर है, अगर इस पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया तो स्थिति भयावह हो सकती है।

ज्योति शंकर मिश्र, एन 14/67 ए-4सी, कृष्णदेव नगर कालोनी, सरायनंदन (दशमी) खोजवां, वाराणसी-221010

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