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फ्लोराइड की अधिकता से अस्थि विकृति एवं पोषण आहार से सम्बन्ध

Author: 
तपस चकमा, एस बी सिंह, पीवी राव एवं प्रदीप मेश्राम
Source: 
भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसन्धान पत्रिका, 01जून 2004

.भारत के विशेष क्षेत्रों में विगत कुछ वर्षों में फ्लोरोसिस एक नई जन-स्वास्थ्य समस्या के रूप में प्रकट हुई है। फ्लोरोसिस, लम्बे समय तक फ्लोराइड विषाक्तता के अन्तर्ग्रहण का एक रूप है जो फ्लोराइड की अत्यधिक मात्रा मुख्यतः पीने के पानी के माध्यम से ग्रहण किये जाने से होती है। इस अध्ययन के पूर्व मध्य प्रदेश का मंडला जिला देश के फ्लोराइड चिन्हित मानचित्र में नहीं था।

सन 1995 में पहली बार मध्य प्रदेश में इस केन्द्र द्वारा इस बीमारी की पहचान की गई। फ्लोराइड की अधिकता के कारण, समस्या की गम्भीरता एवं विस्तार का आकलन करने हेतु क्षेत्रीय जनजाति आयुर्विज्ञान अनुसन्धान केन्द्र (भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसन्धान परिषद), जबलपुर (मध्य प्रदेश) द्वारा मंडला जिला (मध्य प्रदेश) के 5 गाँवों (2263 व्यक्तियों) में यह अन्वेषण किया गया। अस्थि विकृति (गेनुवेलगम) के कारणों की खोज के लिये क्लिनिकल परीक्षण, रेडियोलॉजिकल परीक्षण, आहार सर्वेक्षण तथा पीने के पानी एवं व्यक्तियों के मूत्र में फ्लोराइड की मात्रा की जाँच की गई।

शोधान्तर्गत नमूनों में वयस्क व्यक्तियों में दन्त फ्लोरोसिस 11.1% पाया गया जबकि 20 वर्ष से कम आयु के किशोरों एवं बच्चों में 21.2% था। गेनुवेलगम वयस्क व्यक्तियों में 7.5% था जबकि कम आयु के बच्चे एवं किशोर (20 वर्ष से कम) ज्यादा प्रभावित थे और उनमें गेनुवेलगम का प्रतिशत 10.9 था। पीने के पानी के मुख्य स्रोतों में फ्लोराइड की मात्रा अधिक पाई गई (5.2 से 13.2 पीपीएम तक)। आहार से सम्बन्धित शोध से ज्ञात हुआ है कि उनके आहार में माइक्रोन्यूट्रिएन्ट की कमी थी।

विशेष रूप से कैल्शियम एवं विटामिन-सी की मात्रा आरडीए (आईसीएमआर) की तुलना में कम पाई गई जो कि सांख्यिकीय दृष्टि से अर्थपूर्ण है। अन्वेषण का निष्कर्ष था कि फ्लोराइड की अधिकता के कारण अस्थि विकृति उत्पन्न हुई और पोषण सम्बन्धी अपूर्णता विशेषतः कैल्शियम, विटामिन-सी एवं आयरन की कमी, बीमारी की उग्रता में सहायक रही।

प्रस्तावना


लम्बे समय तक निर्धारित से अधिक मात्रा में फ्लोराइड के अन्तर्ग्रहण से ‘फ्लोरोसिस’ होता है। इसके बहुस्तरीय प्रभाव शरीर के ऊतकों, अंगों और विभिन्न प्रणालियों पर होते हैं और इसके कारण विभिन्न रोगों के लक्षण दिखाई देने लगते हैं, जैसे दाँतों पर चितकबरापन, जठराव सम्बन्धी रोगों की समस्या का होना तथा अस्थि संरचना में कड़ापन आदि।

स्थानिक ‘फ्लोरोसिस’ हाल के वर्षों में भारत में नई जन-स्वास्थ्य समस्या के रूप में सामने आया है। भारत समेत अनेक देशों में भूजल में फ्लोराइड के अत्यधिक मात्रा में संकेन्द्रित होने का पता लगाया गया है। वर्ष 1990 तक भारत में 19 राज्यों में स्थानिक फ्लोरोसिस होने की घोषणा की गई थी। तथापि, मध्य प्रदेश, विशेषकर मंडला और उससे लगे हुए क्षेत्र वर्ष 1995 के पूर्व देश के फ्लोराइड मानचित्र पर नहीं थे।

ग्रामीण जनसंख्या, जो पेयजल के एकमात्र स्रोत मुख्यतः गहरे खुदे हैण्डपम्पों पर निर्भर रहती है, उन पर सर्वाधिक बुरा असर पड़ा था। सन्तुलित आहार, विशेष रूप से कैल्शियम और विटामिन सी की प्रचुरता वाला आहार फ्लोराइड के दुष्प्रभावों से लड़ने का सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है। इस प्रकार इस समस्या की गम्भीरता और विस्तार का आकलन करने एवं आहार-ग्रहण पद्धति से उसके सम्बन्ध की जानकारी प्राप्त करने के लिये यह अध्ययन किया गया था।

अध्ययन विधि


इससे मंडला जिले के पाँच गाँवों का क्रास-सेक्शनल विधि से अध्ययन किया गया था, जिसमें कुल 2663 व्यक्तियों को लिया गया। दन्त-फ्लोरोसिस, गेनुवेलगम, कंकाल सम्बन्धी फ्लोरोसिस तथा इनसे जुड़ी स्वास्थ्य सम्बन्धी शिकायतों का आकलन करने के लिये प्रशिक्षित अन्वेषकों द्वारा प्रत्येक व्यक्ति से प्राप्त जानकारी पूर्व-कोडित एवं पूर्व-परीक्षित प्रोफार्मा में दर्ज की गई। पेयजल का विश्लेषण उसमें मौजूद फ्लोराइड, कैल्शियम और क्षारीयता की मात्रा पर ध्यान केन्द्रित करते हुए किया गया।

जिन लोगों के अस्थितंत्र यानी कंकाल में कुछ परिवर्तन हुए थे, उनके मूत्र का नमूना उसी स्थान पर लेकर फ्लोराइड की जाँच हेतु ‘आईओएन’ अभिमुखीय इलेक्ट्रोड प्रौद्योगिकी से उसका विश्लेषण किया गया था। प्रत्येक दसवें परिवार से, 24 घंटे की स्मरण विधि का प्रयोग कर आहार सर्वेक्षण किया गया।

भारतीय भोज्य-सामग्रियों की पोषक मान तालिकाओं का प्रयोग कर आहार एवं पोषण अन्तर्ग्रहण के माध्य मूल्यों की गणना की गई आहार एवं पोषक तत्वों के अन्तर्ग्रहण की तुलना भारतीयों के लिये अनुशाषित सन्तुलित आहार से की गई। सांख्यिकीय अर्थवेत्ता जानने के लिये ‘टी’ परीक्षण का प्रयोग कर यूनीवेरिएट विश्लेषण का प्रयोग किया गया। स्थानीय घटनाओं के कैलेण्डर का प्रयोग कर स्कूल-पर्व बच्चों की आयु का आकलन किया गया।

परिणाम


कुल तीन हजार की जनसंख्या में लगभग 2263 व्यक्तियों का चिकित्सकीय परीक्षण किया गया। 11.1% व्यक्तियों में दन्त- फ्लोरोसिस पाया गया। पीड़ितों में अधिकतर 20 वर्ष से कम आयु के बच्चे थे (21.1%)। गेनुवेलगम अथवा ‘नॉक-नी’ से पीड़ित लोगों की कुल संख्या 7.5% थी, किन्तु इनमें सर्वाधिक प्रभावित आयु-समूह बच्चों और युवा वयस्कों का था। कंकाल सम्बन्धी फ्लोरोसिस 13.4% व्यक्तियों में देखा गया (सारणी 1) फ्लोराइड की मात्रा 0.14 से 10.6 पीपीएम के मध्य थी।

कुल 120 व्यक्तियों के मूत्र के नमूने लिये थे, इनमें से 40.8 मूत्र नमूनों में फ्लोराइड 2 पीपीएम से अधिक था। पौष्टिक-तत्वों का औसत अन्तर्ग्रहण सारणी 3 में दर्शाया गया है। सभी पोषक तत्व जैसे कैलोरी, कैल्शियम, आयरन, विटामिन-सी, कॉपर, जिंक एवं मैगनीशियम तत्वों का अन्तर्ग्रहण इनके अनुशंसित स्तर की तुलना में विचारणीय रूप से कम पाया गया (सारणी 5)।

खनिज तत्वों की मात्रा देखने के लिये कुल 66 जल-नमूनों का विश्लेषण किया गया था, इनमें से 16 नमूनों में कैल्शियम कठोरता इसके अनुशंसित स्तर 75 mg/L से अधिक पाई गई। लगभग 18 नमूनों में पाई गई मैगनीशियम की मात्रा भी निर्धारित स्तर (30 mg/L) से अधिक थी। कॉपर एवं जिंक की मात्रा सभी जल नमूनों में डिटेक्टेबिल लिमिट (डीएल) से कम थी (कॉपर की डी एल 0.04 mg/L एवं जिंक ++ 2 mg/L)। सभी जल-नमूनों की क्षारीयता सामान्य सीमाओं के अन्दर थी।

फ्लोरोसिस रोगियों की आयु एवं लिंग सम्बन्धी विवरण

विभिन्न गाँवों में फ्लोराइड सम्बन्धी विवरण

खाद्य पदार्थों का औसत उपभोग

पोषक तत्वों का औसत अन्तग्रहण

मंडला जिले में फ्लोराइड से अत्यन्त प्रभावित पाँच गाँव का विवरण

व्याख्या


. उपर्युक्त परिणामों के आधार पर निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि इस क्षेत्र में फ्लोरोसिस के लिये केवल जल में पाया जाने वाला फ्लोराइड जिम्मेदार है, बहुत से पोषक तत्वों की कमी इसे और जटिल बना देती है। प्रस्तुत अध्ययन के परिणामों की तुलना जब राजस्थान और तमिलनाडु के रोगियों से की गई तो यह पाया गया कि यद्यपि फ्लोराइड का स्रोत और स्तर समान है, परन्तु रोग के लक्षणों की अभिव्यक्ति भिन्न है। मध्य प्रदेश में वयस्क आयु के लोगों में दन्त-फ्लोरोसिस की व्यापकता बहुत कम है। ऐसा सम्भवतः फ्लोराइड के सम्पर्क में कम अवधि तक रहने के कारण है।

कंकाल सम्बन्धी फ्लोरोसिस के लक्षण मुख्यतः राजस्थान और तमिलनाडु के वयस्कों में देखे गए। तमिलनाडु के बच्चों में कंकाल सम्बन्धी फ्लोरोसिस के रोगी नहीं देखे गए थे, जबकि मध्य प्रदेश में इसकी व्यापकता 5.7% तथा राजस्थान में 27.8% थी। गेनुवेलगम के रूप में पाया जाने वाला कंकाल-फ्लोरोसिस मध्य प्रदेश के 20 वर्ष से कम आयु के 13.5% बच्चों में देखा गया था।

तमिलनाडु और राजस्थान में 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों में गेनुवेलगम का कोई रोगी नहीं पाया गया। सामान्य, स्वस्थ एवं मजबूत अस्थियों एवं दाँतों के निर्माण के लिये कैल्शियम सबसे अधिक आवश्यक है। विटामिन-सी, प्रोटीन की हाइड्रोक्सीलेशन की प्रक्रिया में एक सह-घटक अवस्था सह-एंजाइम की तरह कार्य करता है, जो कोलाजन प्रोटीन के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अमीनों अम्लों में से एक है।

यह अस्थियों और दाँतों की संरचना की मूलभूत निर्माण सामग्री है। प्रस्तुत अध्ययन में कैल्शियम और विटामिन-सी अनुशंसित स्तर से विचारणीय रूप से कम (p<0.05) था। इस प्रकार, कैल्शियम और विटामिन-सी का कम मात्रा में अन्तर्ग्रहण भी फ्लोरोसिस की समस्या को और गम्भीर बनाने का जिम्मेवार एक अन्य कारण हो सकता है। तथापि इन तथ्यों को प्रमाणित करने के लिये इस क्षेत्र में केस-कंट्रोल अध्ययन किये जाने की आवश्यकता है।

आभार


लेखक इस परियोजना के लिये वित्तीय सहयोग प्रदान करने हेतु ‘राजीव गाँधी राष्ट्रीय पेयजल मिशन’ के प्रति आभारी हैं। लेखकगण फ्लोरोसिस रिसर्च एंड रूरल डेवलपमेंट फाउंडेशन, नई दिल्ली की डॉ. एके सुशीला द्वारा प्रदान किये गए तकनीकी मार्गदर्शन तथा यह अध्ययन प्रारम्भ करने के पूर्व अन्वेषकों को दिये गए प्रशिक्षण के लिये उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं।

सन्दर्भ


1. राजीव गाँधी नेशनल ड्रिंकिंग वाटर मिशन, ग्रामीण क्षेत्र विकास मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली, प्रिवेन्शन एंड कंट्रोल ऑफ फ्लोरोसिस इन इण्डिया, 1993.

2. जेरनोवस्की डब्ल्यू एवं अन्य, द इम्पेक्ट ऑफ वाटर वोर्न फ्लोराइड ऑन वोन डेन्सिटी, पोलैण्ड, फ्लोराइड, 32 (2) (1999) 91-95.

3. चकमा टी, सिंह एस बी, गोडबोले एस, तिवारी आर एस, एण्डेमिक फ्लोरोसिस विद गेनुवेलगम सिण्ड्रोम इन ए विलेज ऑफ डिस्ट्रिक्ट मंडला, मध्य प्रदेश, इण्ड पीडि, 34 (1997) 232-236.

4. चकमा टी, राव पी विनय, सिंह एस बी एवं तिवारी आर एस, एण्डेमिक गेनुवेलगम एंड अदर बोन डिफॉर्मिटीज इन टू विलेजेस ऑफ मंडला डिस्ट्रिक्ट इन सेंट्रल इण्डिया, फ्लोराइड, 33 (2000) 187-198.

5. विला अलबर्टो एनरिक, रेपिड मेथड फॉर डिटरमाइनिंग फ्लोराइड इन वेजीटेशन यूजिंग ऑयन सिलेक्टिव इलेक्ट्रोड, एनालिस्ट, 104 (1979) 545-551.

6. तिम्मायमा बी वी एस, ए हैण्डबुक ऑफ शेड्यूल्ड एण्ड गाइडलाइन्स इन सोशियो-इकोनॉमिक एंड डाइट सर्वे, राष्ट्रीय पोषण संस्थान (भाआअप), हैदराबाद, भारत, 1981.

7. गोपालन सी, रामाशास्त्री बी वी एवं बालसुब्रमनियन ईएससी, रिवाइज्ड एण्ड अपडेटेड बाइ नरसिंग राव बी एस, डियोस्थले वाइ जी एवं पंत के सी, न्यूट्रीटिव वेल्यू ऑफ इंडियन फूड्स, राष्ट्रीय पोषण संस्थान, हैदराबाद, 1995.

8. एक्सपर्ट ग्रुप ऑफ इण्डियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च, नई दिल्ली, न्यूट्रएंट रिक्वायरमेंट्स एण्ड रिकमैण्डेड डायटेश एलाउन्सेस फॉर इंडियन, 1990.

9. चौबीसा एस एल, चौबीसा डी के, जोशी एस सी एवं चौबीसा लीला, फ्लोरोसिस इन सम ट्राइबल विलेजेस ऑफ डोंगरपुर डिस्ट्रिक्ट ऑफ राजस्थान, इण्डिया, फ्लोराइड, 30 (4) (1997) 223-228.

10. कार्तिकेयन जी, पिअस ए, अपरबो बी वी, कंट्रब्यूशन ऑफ फ्लोराइड इन वाटर एंड फूड टू द प्रिविलेन्स ऑफ फ्लोरोसिस इन एरियाज ऑफ तमिलनाडु इन साउथ इण्डिया, फ्लोराइड, 29 (1996) 151-155.

क्षेत्रीय जनजाति आयुर्विज्ञान अनुसन्धान केन्द्र, (भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसन्धान परिषद) जबलपुर 482003 (मध्य प्रदेश)

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