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प्लास्टिक संस्कृति यानी पर्यावरण की विकृति

Author: 
राजेन्द्र कुमार राय
Source: 
योजना, अक्टूबर, 1994

kachra banata karodo tan bhojan आज दूध की थैली से लेकर सब्जी तक के लिये प्लास्टिक का इस्तेमाल हो रहा है। बाजार से कोई भी सामान खरीदें, वह प्लास्टिक के थैलों में मिलता है। लेकिन ये थैले धीरे-धीरे धरती पर बोझ बनते जा रहे हैं। भूमि पर प्लास्टिक का प्रभाव बहुत विस्तृत है। पर्यावरणविदों को डर है कि जमीन में फैली सिंथेटिक कूड़-करकट की मात्रा प्रकाश संश्लेषण की महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है, जिससे कार्बनडाई ऑक्साइड, कार्बोहाइडेट और पेड़ पौधे प्रभावित हो सकते हैं। पानी में भी यह प्लास्टिक की रद्दी कई गम्भीर समस्यायें पैदा कर सकती है। एक अमरीकी डाॅक्टर डी. लाइस्ट का कहना है कि प्लास्टिक उतना ही खतरनाक है जितना समुद्र में बहता हुआ तेल, भारी वस्तुएँ और विषाक्त रसायन।

केवल अमरीका में ही एक करोड़ किलो प्लास्टिक प्रत्येक वर्ष कूड़ेदानों में पहुँचता है। इटली में एक खरब प्लास्टिक के थैलों का प्रतिवर्ष इस्तेमाल किया जा रहा है। इटली आज विश्व में सर्वाधिक प्लास्टिक उत्पादक देशों में एक है। भारत सहित कई विकासशील देशों में प्लास्टिक का उत्पादन बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। नये शोधों से तो ऐसा लगता है कि शीघ्र ही प्लास्टिक के ऐसे मकान तैयार हो जाएँगे जिनसे रात बिताने के बाद उन्हें दिन में समेटा जा सकेगा। आज प्लास्टिक से तताम घरेलू वस्तुएँ भी बना ली गई हैं जो देखने में बड़ी आकर्षक हैं। ऐसी वस्तुएँ विशेष रूप से रसोईघर की शोभा बढ़ाने के लिये इस्तेमाल की जा रही हैं। लकिन नये शोधों से यह भी पता चल रहा है कि जिन आकर्षक वस्तुओं के पीछे लोग दौड़ रहे हैं, वे कैंसर सहित कई अनेक रोगों का कारण बन सकती हैं।

पिछले कुछ वर्षों में प्लास्टिक तथा पॉलीथीन के बने सामान बाजार में छा गये, लेकिन पर्यावरणविदों का कहना है कि प्लास्टिक के थैले अधिक सुविधाजनक तो हो सकते हैं लेकिन पर्यावरण जैसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य के समक्ष यह एक छोटा सा त्याग होगा। इससे प्लास्टिक कचरे से उत्पन्न समस्या के गम्भीर खतरनाक परिणामों का अनुमान लगाया जा सकता है। कई देशों से प्लास्टिक के बेतहाशा इस्तेमाल के विरुद्ध आवाज उठाई जाने लगी है। अमरीका सहित कई देशों से जैविक रूप से नष्ट न हो सकने वाले प्लास्टिक के इस्तेमाल को वर्जित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इटली में उत्पादकों, उपभोक्ताओं और पर्यावरणविदों से विवाद के फलस्वरूप एक राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम की रूप रेखा उभरकर सामने आई है। वास्तव में कोई एक समूह प्लास्टिक प्रदूषण के लिये जिम्मेदार नहीं हैं। उत्पादक, उपभोक्ता और सरकारें सभी इसके लिये दोषी हैं। लेकिन अब उपभोक्ता और संगठनों ने बेतहाशा वृद्धि के खिलाफ आवाज उठाना शुरू किया है।

पिछले कुछ दशक के दौरान विश्व बाजार में प्लास्टिक के सामानों की पकड़ काफी मजबूत हुई है। इस दौरान कुछ अच्छी वस्तुएँ बाजार में आई तो कुछ बहुत ही घटिया प्लास्टिक से बनी वस्तुएँ भी बहुत बड़ी मात्रा में उपभोक्ता के सामने एक सस्ते विकल्प के रूप में बाजार में आ गईं। दैनिक जीवन में इस्तेमाल के लिये ऐसी वस्तुओं की ही पकड़ अधिक है। आज प्लास्टिक से बनी वस्तुएँ हर शहर, कस्बे या गाँव में भी आसानी से उपबध हैं, इसका सबसे बड़ा कारण, लागत मूल्य का कम होना है। हमारे यहाँ तो रसोई घर में प्रयुक्त होने वाले प्लास्टिक के डिब्बों के बारे में भी कभी गम्भीरता से सोचा ही नहीं गया। आज यह जान लेना आवश्यक है कि प्लास्टिक के डिब्बे और अन्य जो सामान जुटा रहे हैं, वह कहीं दूसरे दर्जे का अस्वास्थ्यकर प्लास्टिक तो नहीं है।

साधारणतया पुराने प्लास्टिक को घरों से खरीद कर ले जाने वाले प्लास्टिक को गलाकर उससे नई वस्तुएँ तैयार करते हैं। आमतौर पर यह प्लास्टिक अस्वास्थ्यकर होता है। वास्तव में प्लास्टिक अनेक रासायनिक तत्वों से मिलकर बनने वाला जटिल पदार्थ है। प्लास्टिक के कठोर एवं लचीलेपन के आधार पर कई तत्व उसमें मिलाये जाते हैं। लेकिन उसमें रासायनिक तत्व किस मात्रा में मिलाया जाता है, इसका कोई परीक्षण नहीं होता और ना ही उपभोक्ता को ऐसी कोई जानकारी दी जाती है।

. प्लास्टिक से होने वाले रोगों की मार बड़ी घातक है। साधारणतया इसका अनुमान आम आदमी नहीं लगा सकता है। सन 1974 में अमरीका में पी.वी.सी. (पालिविनाइल क्लोराइड) बनाने वाले एक प्लासिटक उद्योग के कई दर्जन कर्मचारी एंजिआसकौमा नामक बीमारी के शिकार हो गये। इन पर पी.वी.सी. विषैली गैस का असर हो गया था। ये कर्मचारी एक प्राणघातक रोग यकृत कैंसर की चपेट में आ गये। जैसे ही इस घटना के बारे में पता चला अमरीका में पी.वी.सी. के उत्पाद पदार्थ पर रोक लगा दी गई और चाय आदि सामग्री के लिये इस्तेमाल में लाई जाने वाली प्लास्टिक के पैकिंग के लिये नये नियम बना दिये गये।

आजकल कुछ बड़ी रसायन कंपनियाँ नष्ट होने योग्य प्लास्टिक के निर्माण की दौड़ में शामिल हो गई हैं। प्लास्टिक की एक विशेष बात यह भी है कि इससे कूड़े की तरह नष्ट करने के लिये बहुत मात्रा में ऊर्जा खर्च होती है। लेकिन इससे पुनः प्रचालित करने से, भट्ठी में जला देने की अपेक्षा दुगुनी ऊर्जा की बचत होती है। वैज्ञानिकों के कुछ दलों ने प्लास्टिक कचरे को ऊर्जा स्रोत में बदलने का प्रयोग भी शुरू कर दिया है। प्रारम्भिक प्रयोगों से पता चला है कि रद्दी प्लास्टिक को जलाकर ऊर्जा पैदा की जा सकती है। इस ऊर्जा को सुरक्षित और लाभप्रद रूप से लाने के लिये आधुनिक तापीय निर्दाहक की आवश्यकता होती है। क्योंकि इस क्रिया से पी.वी.सी. अन्य सामग्री के साथ मिश्रित करने पर अत्यधिक हानिकारक डाइऑक्सीजन-सेवसो नामक विष उत्पन्न करता है।

यद्यपि प्रकृति द्वारा तैयार अन्य तुलनीय पदार्थों की अपेक्षा मानव संश्लेषित प्लास्टिक मानवीय उपयोगों की दृष्टि से कहीं अधिक सक्षम सिद्ध हो रहा है, प्राकृतिक रूप से विघटित न होने की इसकी क्षमता ही इसे वरदान से अभिशाप में बदल रही है। हर जगह, हर कोने से, कचरे के हर ढेर में प्लास्टिक ही प्लास्टिक नजर आने लगा है। इसके निपटान की हर दिन विकराल होती जा रही समस्या वैज्ञानिकों के लिये एक चुनौती बन गई है। ऐसी स्थिति से जापान की तोशिबा कम्पनी द्वारा किये जा रहे अनुसंधान आशा के केन्द्र बन गये हैं। इन अनुसंधानों के परिणाम स्वरूप क्लोराइड आधारित पी.वी.सी. जैसे थर्मोप्लास्टिक अवशेष ईंधन तेल से बदलने की विचारधारा को काफी बल मिला है। वास्तव में पृथ्वी को प्रदूषित करने वाले प्लास्टिक कचरे का लगभग 20 प्रतिशत क्लोराइड आधारित थर्मोप्लास्टिक ही है। प्लास्टिक के पूर्ण एकीकरण के लिये प्लास्टिक अवशेष में से इसके एक सामान्य घटक स्पोक्सी रेजिन का अलग किया जाना अत्यंत आवश्यक होता है क्योंकि इसे विघटित किया जाना आसानी से संभव नहीं होता। तोशिबा कम्पनी द्वारा विकसित की जा रही इस विधि में थर्मोप्लास्टिक को चूर करके इसे काफी तापक्रम पर तेलबाथ में गर्म किया जाता है। जिस पर वे विघटित हो जाते हैं। इसमें सोडियम हाइड्रोक्साइड मिलाकर विघटित होते थर्मोप्लास्टिक में से निकल रही क्लोरिन को सोडियम क्लोराइड के रूप में बाहर निकाल लिया जाता है। सामान्य वायुमंडलीय दाब पर ये प्लास्टिक टूटकर लगभग सामान्य अनुपात में विभिन्न लम्बाईयों की कार्बन शृंखलाएँ बनाते हैं। लेकिन लगभग दस वायुमंडलीय दाब छः से आठ कार्बन परमाणु की शृंखलायें अधिक बनती हैं। इसी प्रकार की हाईड्रोकार्बन शृंखलायें पेट्रोल और डीजल से होती हैं। तोशिबा कम्पनी की विधि की विशेषता यह है कि इसे सभी प्रकार के थर्मोप्लास्टिक के उपचार के लिये प्रयुक्त किया जा सकता है।

तोशिबा के अनुसंधानकर्ताओं के अनुमान के अनुसार इस प्रणाली में जितनी ऊर्जा प्रारम्भ में खर्च की जाती है उसकी लगभग तिगुनी अंतिम उत्पादन से प्राप्त होती है, इसलिये इस विधि को व्यावहारिक दृष्टि से व्यवहार्य माना जा रहा है।

अब एक प्रश्न यह है कि पॉलीथीन थैलों का विकल्प क्या हो सकता है? कागज थैलों की लागत भी लगभग प्लास्टिक थैलों के बराबर ही है। परन्तु प्लास्टिक के थैले सुविधाजनक अधिक हैं, इसलिए यह आवश्यक हो गया है कि हम विकल्पों की तलाश आरम्भ कर दें। सबसे बड़ी बात यह है कि ये विकल्प सस्ते और सहज होने चाहिए।

आज प्लास्टिक द्वारा उत्पन्न खतरों ने उपभोक्ताओं के सामने इसके अंधाधुंध इस्तेमाल पर एक प्रश्न चिन्ह तो लगा दिया है, लेकिन साथ ही एक बात निश्चित है कि जब तक हम प्लास्टिक के बेहतर उपयोग से लेकर इसके सस्ते और सुरक्षित विकल्प नहीं खोज लेते, तब तक इसका उपयोग बढ़ता ही जाएगा और सवाल हमारे सामने रहेगा कि हम इन रद्दी प्लास्टिक के थैलों का क्या करें।

डी-690, सरस्वती विहार, दिल्ली-110034

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