पर्वतीय क्षेत्रों में प्रवास की समस्या: प्रभाव एवं निराकरण

Submitted by Hindi on Sat, 05/14/2016 - 11:16
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योजना, अक्टूबर, 1994

उत्तराखंड हिमालय में रोजगार का प्रमुख साधन कृषि है किन्तु कृषि की न्यून उत्पादकता एवं औद्योगिक क्षेत्र के पिछड़ेपन के कारण पर्वतीय क्षेत्र में सेवाक्षेत्र, आय एवं रोजगार सृजन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। परन्तु क्षेत्र के पिछड़ेपन के कारण सेवा क्षेत्र का भी पर्याप्त विस्तार नहीं हुआ है।

प्रवास सामान्य रूप से एक विश्वव्यापी घटना है, परन्तु कुछ क्षेत्रों में यह अप्रत्याशित रूप से अधिक पाया जाता है। वाह्य प्रवास के अत्यधिक शिकार वे क्षेत्र हुए हैं जहाँ पर मानव जीवन के लिये सामाजिक तथा आर्थिक परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं हैं। सामान्यतः वाह्य प्रवास से पर्वतीय क्षेत्र सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। पर्वतीय क्षेत्र में जीवन निर्वाह साधनों की कमी और रोजगार के अवसरों की अनुपलब्धता के कारण यहाँ से पुरुष श्रमशक्ति का महत्त्वपूर्ण भाग प्रवास कर गया है और कर रहा है। जिसके कारण यहाँ की अर्थव्यवस्था स्थानीय उत्पादन के स्थान पर प्रवासित व्यक्तियों से प्राप्त होने वाले धनादेशों पर निर्भर हो गयी है परिणाम स्वरूप पर्वतीय अर्थव्यवस्था को धनादेश अर्थव्यवस्था कहा जाता है।

प्रवास की समस्या


प्रवास पर्वतीय क्षेत्र की भयंकर त्रासदी बन चुका है और यह यहाँ के लिये कोई नवीन घटना नहीं है। इस क्षेत्र में जीवन निर्वाह सम्बन्धी आवश्यक सुविधाएँ विशेष रूप से रोजगार के अवसर नगण्य होने के कारण वाह्य प्रवास अधिक मात्रा में होता है। पहले जहाँ प्रवास एकांकी प्रवृत्ति का था अब यह सामूहिक रूप ले चुका है परिणामस्वरूप पर्वतीय ग्राम धीरे-धीरे खाली हो रहे हैं। प्रवास की समस्या अब पर्वतीय ग्रामों की सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरी है। 1984 में डा. रावत द्वारा जनपद गढ़वाल में कुल जनसंख्या का 40 प्रतिशत तथा पुरुष जनसंख्या का 67 प्रतिशत भाग प्रवासित पाया गया था। वर्तमान सर्वेक्षण 1991-92 में जनपद गढ़वाल के सर्वेक्षित विकास खण्डों के ग्रामों की कुल जनसंख्या का 38.51 प्रतिशत भाग प्रवासित पाया गया है, जिसमें पुरुष एवं स्त्री जनसंख्या का क्रमशः 50.27 एवं 27.09 प्रतिशत भाग प्रवासित है। विगत वर्षों में यहाँ विकास कार्यक्रमों के क्रियान्वित होने के कारण प्रवास की दर में कमी आयी है। परन्तु पारिवारिक प्रवासिता बढ़ी है। पहले प्रवास जहाँ एकांकी प्रकृति का था आज पारिवारिक स्वरूप ले चुका है। सर्वेक्षण से ज्ञात होता है कि 1981-91 के दशक में 13.20 प्रतिशत परिवार प्रवासित हुए हैं। इस प्रकार जो परिवार पूर्णतः ग्रामों से प्रवासित हो चुके हैं उनकी जनसंख्या उपलब्ध न होने के कारण प्रवासित जनसंख्या में उनकी जनसंख्या को सम्मिलित नहीं किया गया है।

प्रवास की प्रकृति


सामान्यतः पर्वतीय क्षेत्र से हो रहा प्रवास अस्थाई एवं एकांकी प्रकृति का है। यहाँ प्रवास के मुख्यतः दो कारण पाये जाते हैं- प्रथम- आर्थिक कारणों से- जिसमें रोजगार समस्या प्रमुख है। पर्वतीय क्षेत्र से प्रवासित व्यक्तियों का अधिकांश भाग भारतीय सेनाओं, पुलिस बल एवं राजकीय सेवाओं में संलग्न है। चूँकि ये लोग एक स्थान से दूसरे स्थान को स्थानान्तरित होते रहते हैं फलस्वरूप स्थाई रूप से प्रवासित नहीं हो पाते, और इनके परिवार गाँवों में निवास करते हैं, जिसके कारण ये लोग समय-समय पर गाँव लौटते रहते हैं। दूसरे, गाँव से सपरिवार प्रवासित होने वाले व्यक्ति अपनी जमीन, जायदाद मकान आदि को अपने निकट व दूसरे रिस्तेदारों को सौंपकर बाहर चले जाते हैं तथा सेवाकाल में बाहर रहकर सेवानिवृत्ति के पश्चात गाँव लौटते हैं।

इस प्रकार प्रवासित व्यक्ति का उद्देश्य स्थाई स्थान परिवर्तन न होकर जीविकोपार्जन होता है। प्रारम्भिक अवस्था में प्रवास नितान्त एकांकी होता है, किन्तु शनैः-शनैः यह सामूहिक रूप लेने लगता है। जनपद गढ़वाल में किये गये सर्वेक्षण से स्पष्ट होता है कि कुल प्रवासित जनसंख्या का 72.75 प्रतिशत प्रवास अस्थाई है और मात्र 27.25 प्रतिशत प्रवास ही स्थाई स्वभाव का है।

प्रवास के कारण


प्रवास मानव इतिहास की एक सार्वभौमिक घटना है। प्राचीन काल से ही मनुष्य में प्रवास की प्रवृत्ति पायी जाती है जो वर्तमान में भी विद्यमान है तथा भविष्य में भी रहेगी। प्रवास के लिये अनेक कारण उत्तरदायी होते हैं। जनांकिकी वेत्ताओं ने प्रवास के कारणों को दो प्रमुख वर्गों में विभक्त किया है प्रथम वे कारक जो व्यक्ति को उस स्थान की ओर आकर्षित करते हैं जिनमें, रोजगार के अवसर, शिक्षा सुविधाएँ स्वास्थ्य एवं मनोरंजन सुविधाएँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती हैं। इन्हें आकर्षक कारक कहा जाता है। दूसरे कारक वह होते हैं, जो व्यक्ति को अपने मूल-निवास स्थान को छोड़ने को बाध्य करते हैं। इनमें, आर्थिक सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं जनांकिकी कारक सम्मिलित होते हैं। इन्हें प्रत्याकर्षण कारक भी कहा जाता है।

उत्तराखंड हिमालय में प्रवास के कारणों में प्रत्याकर्षण कारण प्रमुख हैं जिनमें आर्थिक कारण सर्वोपरि है। कृषि मुख्य व्यवसाय होने पर भी उसमें जीवन यापन सम्भव नहीं है। औद्योगिक क्षेत्र की पूर्णतः अनुपस्थिति या अत्यधिक पिछड़े होने के कारण जीवनयापन का मुख्य साधन सेवा क्षेत्र रह जाता है, जो यहाँ पर शैशवावस्था में है। फलस्वरूप रोजगार प्राप्ति का एक मात्र साधन प्रवास ही रह जाता है। यही कारण है कि कुल प्रवासित जनसंख्या का 62.0 प्रतिशत प्रवास शहरी क्षेत्र में रोजगार प्राप्ति के लिये हुआ है। जबकि मात्र 6.0 प्रतिशत प्रवास ही शहरी क्षेत्र के प्रति आकर्षण के कारण हुआ है।

प्रवास की विशेषताएँ


प्रवास मुख्यतः आकर्षण एवं प्रत्याकर्षण कारकों का परिणाम है। सामान्यतः व्यक्ति उच्च जीवन की लालसा में प्रवास करता है, परन्तु सभी व्यक्ति इस आकर्षण से प्रभावित नहीं होते। वास्तव में प्रवास की कुछ विशेषताएँ होती हैं जो क्षेत्रीय विशिष्टता से पूर्ण होती हैं।

(अ) प्रवास की आयु


कृषि एवं औद्योगिक क्षेत्र में पर्याप्त रोजगार एवं आय प्राप्त न होने के कारण पर्वतीय क्षेत्र से कार्यशील युवक विशेष रूप से शिक्षित युवक प्रवास कर जाते हैं। जैसे ही बच्चा बालिग होता है अथवा काम करने योग्य होता है, रोजगार की तलाश में प्रवास कर जाता है। यही कारण है कि उत्तराखंड हिमालय से अधिकांश व्यक्ति 15 से 60 वर्ष आयु वर्ग के अन्तर्गत आते हैं, सर्वेक्षण के अनुसार कुल प्रवासित जनसंख्या का 81.77 प्रतिशत भाग 15 से 60 आयु वर्ग का है।

प्रवासित जनसंख्या का शैक्षिक स्तर


रोजगार एवं आय प्राप्ति के उद्देश्य से जो कार्यशील युवक पर्वतीय क्षेत्र से मैदानी क्षेत्र की ओर प्रवास करते हैं, वे अधिकांशतः शिक्षित होते हैं, निरक्षर व्यक्ति मुख्यतः व्यवसाय करते हैं इसलिए उनमें प्रवास की प्रवृत्ति नहीं पायी जाती है, अथवा बहुत कम होती है। सर्वेक्षण से विदित होता है कि कुल प्रवासित जनसंख्या का मात्र 11.82 प्रतिशत भाग ही निरक्षर था, जिसमें स्त्री जनसंख्या अधिक है। शेष प्रवासित जनसंख्या साक्षर थी, जिसमें 77.42 प्रतिशत माध्यमिक स्तर एवं 10.76 प्रतिशत जनसंख्या उच्चशिक्षा प्राप्त है।

प्रवास का ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव


(अ) आयु एवं लिंगानुपात पर प्रभाव: आयु एवं लिंगानुपात पर प्रवास के प्रभाव का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि उसका सर्वाधिक प्रभाव 25 से 60 वर्ष के आयु वर्ग पर पड़ा है। फलस्वरूप इस आयु वर्ग में लिंगानुपात अत्यधिक विषम हो गया है। सर्वेक्षित विकासखंडों में प्रवास से पूर्व प्रति हजार स्त्री पुरुषों के पीछे 1091 स्त्रियाँ थीं, लेकिन प्रवास के परिणामस्वरूप लिंगानुपात 1633 हो गया है। स्वाभाविक रूप से इसका विभिन्न आयु वर्ग में लिंगानुपात पर गंभीर प्रभाव पड़ा है 0-15 आयु वर्ग में प्रति हजार पुरुषों पर 1023 स्त्रियाँ हैं, जबकि 15 से 25 तथा 25 से 60 वर्ष के आयु वर्ग में लिंगानुपात क्रमशः 2321, 3584 प्रति हजार पाया गया है।

(ब) रोजगार पर प्रभाव: उत्तराखंड हिमालय में रोजगार का प्रमुख साधन कृषि है किन्तु कृषि की न्यून उत्पादकता एवं औद्योगिक क्षेत्र के पिछड़ेपन के कारण पर्वतीय क्षेत्र में सेवाक्षेत्र, आय एवं रोजगार सृजन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। परन्तु क्षेत्र के पिछड़ेपन के कारण सेवा क्षेत्र का भी पर्याप्त विस्तार नहीं हुआ है। इसलिए बढ़ती बेरोजगारी को इस क्षेत्र में भी पूर्ण रूप से नहीं खपाया जा सकता है। फलस्वरूप रोजगार की तलाश में अधिकांश शिक्षित युवक प्रवास कर जाते हैं। यही कारण है कि सेवा क्षेत्र में कार्यरत व्यक्तियों में प्रवासित व्यक्तियों की संख्या अधिक है। सर्वेक्षण के अनुसार सेवा क्षेत्र में संलग्न 560 व्यक्तियों में से 451 व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हें प्रवासित होने पर ही रोजगार प्राप्त हुआ है। जो सेवा क्षेत्र में कार्यरत जनसंख्या का 80.53 प्रतिशत है।

(स) पारिवारिक आय पर प्रभाव: उत्तराखंड हिमालय की पारिवारिक आय में प्रवासित व्यक्तियों द्वारा भेजे गए धनादेश महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। पारिवारिक आय पर प्रवास का प्रभाव ज्ञात करने के लिये आवश्यक है कि कृषि व्यवसाय में संलग्न परिवारों की वार्षिक आय का अध्ययन किया जाए, क्योंकि कृषि ही यहाँ का मुख्य व्यवसाय है। सर्वेक्षण से प्रति परिवार कृषि व्यवसाय से औसत वार्षिक आय 6313 रुपये प्राप्त हुई है। यदि इसमें धनादेश से प्राप्त आय को सम्मिलित कर लिया जाए, तो प्रति परिवार औसत वार्षिक आय 13719 रुपये हो जाती है।

(द) उत्पादन पर प्रभाव: उत्तराखंड हिमालय की कृषि अर्थव्यवस्था में प्रवास का उत्पादन पर दो प्रकार से प्रभाव परिलक्षित होता है।

1. श्रमशक्ति में कमी के रूप में ऋणात्मक प्रभाव।
2. प्रवासियों द्वारा भेजी गई आय का धनात्मक प्रभाव।

निदान हेतु सुझाव: प्रवास के उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि प्रवासिता सम्पूर्ण उत्तराखंड हिमालय की सामान्य घटना है। न्यून उत्पादक एवं अलाभदायक कृषि व्यवसाय में काम करने की अनिच्छा, औद्योगिक क्षेत्र के अत्यधिक पिछड़े होने, सेवा क्षेत्र में रोजगार के अवसरों की सीमितता ग्रामीण क्षेत्र में सामान्य अवस्थापन्न सुविधाओं की कमी तथा कष्टकर जीवन के कारण शिक्षित ग्रामीण श्रमशक्ति बड़े शहरों की ओर निरन्तर प्रवासित होती रही हैं, जिसके निदान के लिये आवश्यक है कि बेरोजगार व्यक्तियों को क्षेत्र में ही रोजगार उपलब्ध कराया जाए। क्षेत्रीय रोजगार में वृद्धि के लिये कृषि, उद्योग एवं अवस्थापन्न सेवाओं, शिक्षा, परिवहन, संचार आदि का विकास किया जाए, साथ ही उत्तराखण्ड में सृजित रोजगार के अवसरों में, क्षेत्र के ही बेरोजगारों को प्राथमिकता दी जाए, तब ही प्रवास की समस्या का समाधान हो पाएगा। कृषि विकास के लिये कृषि स्वरूप में परिवर्तन किया जाए, कृषि स्वरूप में परिवर्तन मुख्यतः परिवहन एवं सिंचाई सुविधाओं में वृद्धि पर निर्भर करेगा। इसके साथ ही संग्रहण भंडारण तथा विपणन सुविधाओं का विकास भी करना पड़ेगा। उल्लेखनीय है कि इस आधार पर कृषि क्षेत्र के स्वरूप में वांछित परिवर्तन करने पर कृषि में ही व्यापार एवं वाणिज्य का विकास सम्भव हो पायेगा। औद्योगिक विकास के लिये क्षेत्रीय कच्चे पदार्थों की उपलब्धतानुसार लघु उद्योग विकसित किये जाएं। कृषि एवं औद्योगिक क्षेत्र का क्षेत्रीय संसाधनों एवं आवश्यकतानुसार विकास करने पर सेवा क्षेत्र का विकास हो सकेगा। औद्योगिक विकास के लिये क्षेत्रीय कच्चे एवं औद्योगिक क्षेत्र का क्षेत्रीय संसाधनों एवं आवश्यकतानुसार विकास करने पर सेवा क्षेत्र का विकास हो सकेगा और भविष्य में पर्वतीय क्षेत्र से होने वाला वाह्य प्रवास नियमित हो सकेगा।

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