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लघु जल स्रोतों से ऊर्जा

Author: 
राजेन्द्र प्रसाद
Source: 
योजना, दिसम्बर 1994

हमारे देश में विभिन्न तराइयाँ तथा कृषि जलवायु क्षेत्र हैं, लघु जल विद्युत विकास सम्बंधी अवसरों तथा क्षेत्रों की भी भरमार है। अतः सिंचाई नहर प्रपातों तथा बाँधों पर स्थित जल विद्युत केन्द्रों से जो अधिकांशतः पहाड़ियों के नीचे तथा मैदानों में हैं, आसानी से सम्पर्क रखा जा सकता है।

पर्यावरणीय संरक्षण का सम्बंध पृथ्वी संरक्षण से है। प्राकृतिक सुरक्षा के लिये पर्यावरणीय संरक्षण अनिवार्य है। यह कोई नवीन तथ्य नहीं अपितु सार्वकालिक सच है, परन्तु वर्तमान परिवेश में इसकी आवश्यकता बढ़ गयी है, क्योंकि आज मानव और प्रकृति के बीच तालमेल घटता जा रहा है।

किसी भी देश के आर्थिक और सामाजिक विकास के लिये ऊर्जा एक महत्त्वपूर्ण निवेश है। देश में बढ़ते हुए औद्योगिक एवं कृषि कार्यकलापों के साथ ऊर्जा की मांग भी बढ़ती जा रही है। इस पृष्ठभूमि में यह भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि ऊर्जा के सभी स्रोत निरन्तर संपन्न और प्रदूषण रहित हों। आज वातावरण में प्रदूषण का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ गया है। अतएव इस खतरे को समाप्त करने तथा संकलित विकास के लिये प्रदूषण मुक्त ऊर्जा संसाधन को विकसित करने की अनिवार्यता है। यही कारण है कि आज अपारंपरिक ऊर्जा स्रोत की विविध प्रणालियों की खोज की जा रही है। इसे हम नवीनतम अक्षय ऊर्जा स्रोत कहते हैं। इसके दोहन से न केवल ऊर्जा की अतिरिक्त मांग को पूरा करने में सहायता मिलेगी अपितु पर्यावरण तथा वातावरण सुरक्षित रखने में भी सहायता मिलती है। यह स्थानीय रूप में उपलब्ध है, इसलिए उनके विकास और उपयोग से देश के ग्रामीण तथा पर्वतीय क्षेत्र के स्वरूप में निखार आएगा तथा जीवन स्तर में सुधार होगा।

नवीनीकरण, पुनः चक्रण तथा निरंतर के रूप में वैकल्पिक ऊर्जा संसाधन अपनी अनुपम विशेषता प्रदर्शित करता है। इन स्रोतों को अक्षय ऊर्जा स्रोत कहा जाता है। इसके महत्व के आलोक में ही भारत सरकार ने 1982 में एक पृथक मंत्रालय की स्थापना की, जिसे अपारंपरिक ऊर्जा स्रोत विभाग कहा जाता है। यह विभाग अक्षय ऊर्जा के मुख्य क्षेत्रों में जैसे बायोगैस, उन्नत चूल्हा, सौर ऊर्जा, सूक्ष्म लघु पन बिजली और ऊर्जा के रासायनिक स्रोतों के क्षेत्रों में कार्य करता है।

परिकल्पना


भारत में माइक्रो-मिनी जल-विद्युत परियोजनाओं के माध्यम से विकेन्द्रीकृत रूप से विद्युत उत्पादन की काफी संभावना है। देश के विभिन्न भागों में सामान्य भौगोलिक और अन्य अनुकूल दशाओं के कारण ऐसे जल विद्युत केन्द्रों से दूरदराज और अलग-थलग पड़े क्षेत्रों के लिये विद्युत आपूर्ति करना एक व्यावहारिक कदम है, जिसके रख-रखाव व चालू होने पर ताप विद्युत केन्द्रों की तुलना में कम खर्च होता है।

स्वाधीनता प्राप्ति के समय से अब तक विद्युत उत्पादन की क्षमता 500 गुना से अधिक बढ़ गयी है। इसी अवधि के दौरान उत्पादित यूनिटें भी 4 अरब यूनिटों से बढ़कर लगभग 280 अरब यूनिटों से अधिक हो गयी हैं, एक विकासशील अर्थव्यवस्था के लिये यह आवश्यक है कि वह विद्युत उत्पादन क्षमता में भी प्रत्येक वर्ष काफी मात्रा में वृद्धि करे। पूरे देश में 1991-92 की स्थिति के अनुसार, वर्तमान में यह कमी लगभग 8.5 प्रतिशत है। व्यस्ततम समय में यह कमी (विद्युत क्षमता) 17.7 प्रतिशत है। लघु जल विद्युत स्रोत, ऊर्जा के चिरपरिचित अक्षय स्रोतों में से एक है जिससे देश के विशेषतः ग्रामीण दूर-दराज के क्षेत्रों और पहाड़ी क्षेत्र में लागत प्रभावी और पर्यावरण की दृष्टि से हितकर तरीके से बिजली की व्यवस्था की जा सकती है। लघु जल संसाधन से करीबन 5000 मे.वा. बिजली की संभावना का पता चलाया गया है जिसमें से अब तक केवल थोड़े से हिस्से का ही उपयोग किया गया है। लघु जल विद्युत ऊर्जा क्षमता (3 मे.वा.) के विकास को अपारंपरिक ऊर्जा स्रोत मंत्रालय द्वारा आठवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में निर्धारित किया गया है।

मानकीकरण


हमारे देश में विभिन्न तराइयाँ तथा कृषि जलवायु क्षेत्र हैं, लघु जल विद्युत विकास सम्बंधी अवसरों तथा क्षेत्रों की भी भरमार है। अतः सिंचाई नहर प्रपातों तथा बाँधों पर स्थित जल विद्युत केन्द्रों से जो अधिकांशतः पहाड़ियों के नीचे तथा मैदानों में हैं, आसानी से सम्पर्क रखा जा सकता है। वे क्षेत्रीय बिजली ग्रिडों से नजदीक हैं और उनके शीर्ष नीचे हैं किन्तु दूर-दराज स्थित केन्द्रों में अधिक प्रवाह के लिए ग्रिडों से जोड़ने की समस्या आती है और जिनका शीर्ष अपेक्षाकृत बड़ा किन्तु जल प्रवाह कम होता है। नहर प्रपात और सिंचाई बाँध स्थलों पर 3 से 30 मीटर के बीच शीर्ष और 5 से 50 क्यूसेक के बीच जल निस्सार पाया गया है। छः प्रकार के अभिकरणों को अपनाकर 3, 4, 25, 7, 10, 13, 15, 21 और 30 मीटर के डिजाइन शीर्ष ड्रापों का मानकीकरण किया गया है, जबकि 5, 7, 12, 22, 30, और 50 क्यूमेक्स का डिजाइन जल निस्सार अपनाया गया है। इसी के अनुरूप 350, 650, 1,000, 1,250, 1,500, 2,000 और 3,500 किलोवाट की शृंखला में जेनरेटर साइजों का मानकीकरण किया गया है। ग्रिड से जुड़ी प्रणालियों के लिये अब इंडक्शन जेनरेटरों को निर्धारित किया जाता है।

पर्यावरणीय प्रभाव


विश्वव्यापी पर्यावरण सुधार में लघु जल ऊर्जा का उल्लेखनीय योगदान है। इस हेतु अन्तरराष्ट्रीय पर्यावरण सुविधा निधि ने भारत की इस परियोजना को अपने पोर्टफोलियो के एक भाग के रूप में 12.52 करोड़ डॉलर की सहायता दी है। इस प्रकार इस सुविधा कोष का उद्देश्य पर्यावरण को स्वच्छ बनाने, प्रदूषण हटाने तथा परियोजनाओं के कार्यान्वयन में विश्वव्यापी सहायता प्रदान करना है। अन्तरराष्ट्रीय पर्यावरण सुविधा कोष का सम्बंध निम्नलिखित चार क्षेत्रों से है:

1. ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी करना।
2. जैव विविधता का संरक्षण
3. अन्तरराष्ट्रीय जल प्रदूषण पर नियंत्रण
4. ओजोन परत को बनाए रखना

विश्वस्तर पर ऐसी 50 परियोजनाएँ अनुमोदिन की गयी हैं जिनसे कीगों के उष्ण कटिबंधीय वनों के संरक्षण, पूर्व अफ्रीका, उत्तरी प्रशांत क्षेत्र तथा पोलैंड में जैव विविधता की सुरक्षा, चीन में समुद्री प्रदूषण पर नियंत्रण और ब्राजील में राष्ट्रीय संरक्षण यूनिटों को मजबूत बनाने में सहायता मिली है।

प्रवाहित जलज से उत्पन्न ऊर्जा मनुष्य को ज्ञात अक्षय ऊर्जा प्रतिविधियों में सबसे प्राचीन तकनीक है। संसार का प्रथम जल विद्युत संयुक्त राज्य अमरीका (1982) में स्थापित किया गया था। भारत में 103 मेगावाट क्षमता का इस प्रकार का केन्द्र 1897 में दार्जिलिंग में प्रारम्भ किया गया था। स्वाधीनता प्राप्ति के बाद दिसम्बर 1991 तक 3 मेगावाट से 82 मेगावाट यूनिट तक के लघु जल विद्युत संयंत्रों की 113 परियोजनाएँ भारत में संचालित की गयी हैं। हाल के वर्षों में पर्यावरण प्रदूषण के खतरे जलाशयों में गाद भर जाने तथा विस्थापितों के पुनर्वास की पृष्ठभूमि में इस प्रकार की विद्युत परियोजनाओं का महत्व बढ़ गया है।

इन सभी बातों को ध्यान में रखकर सम्बद्ध विभाग ने आठवीं पंचशाला योजना में 821.60 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। जिसका उद्देश्य लगभग 831 मेगावाट लघु जल विद्युत क्षमता का विकास करना है। इस प्रकार विशेषकर पर्यावरण की दृष्टि से यह परियोजना बेहतर उपलब्धि की परिचायक है। इससे वन संरक्षण को बढ़ावा मिलता है। आप्लावन दलदली भूमि पुनर्वास व ग्रीन हाउस गैस (प्रदूषण) आदि की कोई समस्या इसमें नहीं आती है और न समताप मंडल ओजोन परत को कोई क्षति पहुँचती है, इसलिए नहर प्रपातों और सिंचाई बाँधों तथा देश के पहाड़ी इलाकों में प्राकृतिक जल प्रपातों पर लघु और सूक्ष्म जल विद्युत विकास योजनाओं पर काफी बल दिया जा रहा है। इस योजना की पूँजीगत तथा आवर्ती लागतों में निकट भविष्य में कमी होने से अच्छे परिणाम सामने आएँगे।

काली तालिका रोड, मुंगेर (बिहार)

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