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उत्तर प्रदेश में वन संसाधन आवश्यकता एवं विकास

Author: 
डा. गजेन्द्र पाल सिंह
Source: 
योजना, दिसम्बर 1994

आज आवश्यकता इस बात की है कि पूरे देश व प्रदेश में इस कार्यक्रम को जन आन्दोलन के रूप में स्वीकार किया जाये। जिस दिन से प्रत्येक व्यक्ति द्वारा एक वृक्ष के आरोपण व उसकी सुरक्षा के लक्ष्य को स्वीकार कर लिया जाएगा, उसी दिन वन विकास पर्यावरण संरक्षण का उद्देश्य बिना किसी सरकारी योजना व अनुदान के ही पूर्णता को प्राप्त कर लेगा।

प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता किसी भी देश के आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान करती है। किसी भी देश के अन्तर्गत उत्पादन की मात्रा, रोजगार का स्तर व स्वरूप, मानव स्तर आदि प्राकृतिक संसाधनों द्वारा निर्धारित होते हैं। जिन राष्ट्रों में प्राकृतिक संसाधनों की बहुलता होती है वे आत्मनिर्भर होते हैं व वहाँ के निवासी समृद्धिशाली होते हैं जबकि इसके विपरीत प्राकृतिक संसाधनों की अनुपलब्धता व कमी वाले राष्ट्र तथा वहाँ के निवासी गरीब होते हैं। अमरीका, इंग्लैण्ड, जर्मनी, जापान आदि राष्ट्र प्राकृतिक व भौतिक संसाधनों की प्रचुरता व अनुकूलता के कारण ही आज विश्व में सर्वाधिक विकसित व समृद्धिशाली हो गये हैं।

प्राकृतिक संसाधनों में वनों की अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण भूमिका पायी जाती है। वन हमारे अतीत के गौरव, संस्कृृति, सभ्यता व विकास के प्रतीक हैं। वनों से हमें एक ओर जहाँ इमारती लकड़ी, ईंधन, चारा, रबर, गोंद, लाख, औद्योगिक विकास के लिये आवश्यक कच्चे माल, जड़ी-बूटियाँ, फल-फूल व विविध प्रकार के रसायन प्राप्त होते हैं, वहीं दूसरी तरफ वन सरकार को विदेशी मुद्रा अर्जन, रोजगार सृजन, जलवायु को समुचित बनाये रखने, भू-क्षरण व रेगिस्तान के फैलाव को नियन्त्रित करने, प्राकृतिक सौन्दर्य को बढ़ाने व पर्यावरण की सुरक्षा में अत्यन्त ही महत्त्वूर्ण योगदान प्रदान करते हैं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश में 6 करोड़ 20 लाख एकड़ क्षेत्र में वन थे जो कुल भू-भाग का 15 प्रतिशत था, अंग्रेजी शासन काल में विदेशी शासन होने के कारण वन विकास व उनके संरक्षण की दिशा में उल्लेखनीय सरकारी प्रयत्न नहीं किए गए जिसके परिणामस्वरूप वनों का क्षेत्रफल निरन्तर सिकुड़ता चला गया। वर्तमान में भी मानव जाति अपनी सुख सुविधाओं में वृद्धि के लिये वनों का अविवेकपूर्ण कटान करती जा रही है जिससे सभी सरकारी व निजी प्रयत्नों के पश्चात देश में कुल वनों का क्षेत्रफल 750 लाख हेक्टेयर रह गया है जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 27 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश में 51,618 वर्ग कि.मी. में वन हैं जो प्रदेश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 2,94,411 वर्ग कि.मी. का 17.4 प्रतिशत है। इसके साथ ही साथ वह भी उल्लेखनीय है कि प्रदेश के सम्पूर्ण क्षेत्र लगभग दो तिहाई भाग पर्वतीय अंचलों में ही सीमित हैं, इस प्रकार प्रदेश के अन्य अंचलों में वनों का क्षेत्रफल लगभग नहीं के बराबर है। प्रदेश में वनों के अविवेकपूर्ण वनों का विनाश न केवल पर्यावरण संतुलन व मौसम को प्रभावित कर रहा है अपितु दिनोंदिन प्रदेश के ही वन उत्पाद भी क्रमशः घटते जा रहे हैं जिसकी पुष्टि निम्न तालिका से हो रही है।

तालिका के अवलोकन से यह स्पष्ट हो रहा है। कि लीसा के उत्पादन को छोड़कर शेष सभी वस्तुओं का उत्पादन क्रमशः घटता जा रहा है जैसे वर्ष 1990-91 में इमारती लकड़ी की उपलब्धता 444 हजार घन मीटर रही जो 1989-90 की तुलना में 0.7 व 12.8 प्रतिशत कम रही। प्रदेश में वनोपज बढ़ाने के लिये शीघ्र विकसित होने वाले वृक्षों के आरोपण के साथ ही साथ अधिकाधिक वाणिज्यिक महत्त्व के वृक्षों का आरोपण उच्च प्राथमिकता के आधार पर वैज्ञानिक प्रबन्ध व्यवस्था के अन्तर्गत संचालित किए जाने की आवश्यकता है।

उत्तर प्रदेश में वनोपन

वर्ष

इमारती लकड़ी (हजार घनमीटर)

जलाने की लकड़ी (हजार घनमीटर)

लीसा (हजार कुं.)

बांसरिंगल (लाख)

1984-85

671

638

138

124

1985-86

704

628

136

125

1986-87

686

619

43

180

1987-88

683

611

85

162

1988-89

699

527

94

159

1989-90

486

268

105

149

1992-91

444

266

110

130

 

प्रदेश में वन विभाग द्वारा वनों के विकास, वन्य जीव संरक्षण व पर्यावरण की सुरक्षा की दिशा में अनेक महत्वाकांक्षी योजनाएं चलायी जा रही हैं जिनमें से कुछ प्रमुख निम्न हैं -

सामाजिकता वानिकी योजना


वन विकास की दिशा में विश्व बैंक द्वारा पोषित, सामाजिक वानिकी योजना, सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योजना है। यह योजना प्रदेश के 55 मैदानी जनपदों में 1979 से चलायी जा रही है। इस योजना के अन्तर्गत ग्राम समाज की भूमि, सड़क, रेल लाइनों व नहरों के किनारे ईंधन, चारा, पत्ती व लघु उद्योगों के लिये काष्ठ आदि के तेजी से विकसित होने वाली प्रजातियाँ जैसे, यूकेलिप्टस सुबबूल, अर्जुन, सिरिस, शीशम, नीम, महुआ, जामुन, शहतूत आदि के वृक्ष आरोपित किए जाते हैं। योजना के प्रथम चरण 1979 से 1985 के बीच 77661.20 हेक्टेयर क्षेत्रफल पर वृक्ष आरोपित किए गए तथा इस योजना अवधि में कृषि वानिकी कार्यक्रम के अन्तर्गत 10.09 करोड़ पौधे वितरित किए गए। योजना के द्वितीय चरण में 1985-31 मार्च 1991 तक 72,005.08 हेक्टेयर क्षेत्रफल पर वृक्ष आरोपित किए गए तथा 43.33 करोड़ पौधे किसानों को वितरित किए गए। वर्ष 1991-92 में इस योजना के अन्तर्गत 11,755 हेक्टेयर क्षेत्रफल में वृक्षारोपण किया गया। वर्ष 1992-93 में इस योजना के अन्तर्गत प्रदेश सरकार द्वारा 4,500 करोड़ रुपये तथा जवाहर रोजगार योजना द्वारा 8 करोड़ रुपया उपलब्ध कराया गया। इस प्रकार इस योजना द्वारा प्रदेश में वनों के विकास की दिशा में सर्वाधिक प्रयास किया जा रहा है।

परती भूमि विकास कार्यक्रम


परती भूमि विकास कार्यक्रम के अन्तर्गत वर्ष 1990-91 में पर्वतीय अंचल के पाँच जनपद नैनीताल, टिहरी, पौड़ी, उत्तरकाशी व देहरादून में भूमि संरक्षण, ईंधन व चारा विकास हेतु वृक्षारोपण, वनों का सघनीकरण तथा चारागाहों के विकास के कार्य अनुमोदित किए गए। इस योजना के अन्तर्गत वर्ष 1991-92 में लगभग 1,800 हेक्टेयर क्षेत्र में वनीकरण, 400 हेक्टेयर में चारागाह विकास,1,890 लघु अभियांत्रिक कार्य व 300 हेक्टेयर क्षेत्रफल में कम घनत्व वाले वनों का सघनीकरण किया गया। वर्ष 1992-93 में इस योजना के अन्तर्गत भारत सरकार के सहयोग से झांसी व जालौन जनपद को वनों के विकास हेतु क्रमशः 98 व 23 लाख रुपया उपलब्ध कराया गया, इस प्रकार परती भूमि विकास परियोजना के द्वारा भी प्रदेश में वनों के विकास में अपेक्षित सहयोग प्रदान किया जा रहा है।

अनुसंधान योजना


वृक्षारोपण कार्यक्रम को अधिक लाभदायक बनाने के लिये प्रदेश सरकार वन अनुसंधान की दिशा में भी सतत प्रयत्नशील है। विगत वर्ष में प्रदेश सरकार ने वन अनुसंधान कार्यक्रम के अन्तर्गत वन प्रकोष्ठ का उत्पादन बढ़ाने के लिये लगभग 19 लाख रुपये व्यय किये। वृक्षारोपण कार्यक्रम में जनता की भागीदारी को सुनिश्चित करने व वनों के प्रति जनसाधारण की रुचि बढ़ाने के लिये ग्राम वन समितियों व वन चेतना केन्द्रों की स्थापना की जा रही है। स्मृति वन योजना के अंतर्गत सरकार द्वारा आरक्षित स्थानों पर कोई भी व्यक्ति अपनी विशेष तिथियों जैसे शादी, पुत्र जन्मोत्सव व किसी अन्य विशेष उपलब्धियों को यादगार के रूप में बनाये रखने के लिये वृक्ष आरोपित कर सकता है। यह योजना प्रदेश के अधिकाधिक जनपदों में संचालित की जा रही है।

विश्व खाद्य कार्यक्रम


सातवीं पंचवर्षीय योजना से यह परियोजना विश्व खाद्य कार्यक्रमों के सहयोग से प्रदेश के 8 पर्वतीय जनपदों व 14 मैदानी जनपदों में संचालित की जा रही है। वानिकी कार्य में कार्यरत श्रमिकों को कम मूल्य पर खाद्यान्न, तेल व दालें, उपलब्ध कराई जाती हैं तथा श्रमिकों की कटौती द्वारा सृजित धनराशि से श्रमिक कल्याणकारी योजनाएं जैसे श्रमिक आवास, पेयजल सुविधा, शिक्षा व चिकित्सा सुविधा तथा आकस्मिक दुर्घटना होने पर बीमा सम्बन्धी सुविधाएं संचालित की जा रही हैं।

वन्य जीव संरक्षण


वन विकास कार्यक्रमों के साथ ही साथ वन्य जीव संरक्षण की दिशा में भी प्रदेश में महत्त्वपूर्ण कार्य किया जा रहा है। वन्य जीव परिरक्षण संगठन के द्वारा वन्य जीवों की सुरक्षा, अवैध शिकार प्रतिबन्ध, वन्य जीवों के मांस, खाल, हड्डी, बाल इत्यादि के व्यापार पर प्रतिबन्ध व वन्य जीवों की संख्या में वृद्धि का कार्य वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के द्वारा प्रभावी ढंग से किया जा रहा है। वर्तमान समय में प्रदेश में 7 राष्ट्रीय उद्यान जो क्रमशः कार्बेट, दुधवा, नन्दादेवी, फूलों की घाटी, राजाजी राष्ट्रीय उद्यान गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान तथा गोविन्द राष्ट्रीय उद्यान के नाम से विख्यात हैं। विन्ध्य क्षेत्र में स्थित कैमूर तथा जीव विहार को भी राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने की सरकार की योजना है। वन्य जन्तुओं के अवैध आखेट तथा इनके आवास स्थलों में कमी के कारण इनकी अनेक प्रजातियाँ प्रदेश में या तो लुप्त हो चुकी हैं या लुप्त होने के कगार पर हैं। अतः इन दुलर्भ वन्य जीवों के विकास व सुरक्षा हेतु प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में 19 वन्य जीव विहारों की स्थापना तथा देशों व प्रदेशों से आने वाले पक्षियों की सुरक्षा की दृष्टि से प्रदेश के विभिन्न अंचलों में 12 पक्षी विहार भी स्थापित किए गए हैं।

वन विकास वन्य जीव संरक्षण व पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रदेश सरकार पूरे मनोयोग व स्वस्थ मानसिकता से जुड़ी हुई है, पर इस दिशा में ये सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं, आज आवश्यकता इस बात की है कि पूरे देश व प्रदेश में इस कार्यक्रम को जन आन्दोलन के रूप में स्वीकार किया जाये। जिस दिन से प्रत्येक व्यक्ति द्वारा एक वृक्ष के आरोपण व उसकी सुरक्षा के लक्ष्य को स्वीकार कर लिया जाएगा, उसी दिन वन विकास पर्यावरण संरक्षण का उद्देश्य बिना किसी सरकारी योजना व अनुदान के ही पूर्णता को प्राप्त कर लेगा।

डा. गजेन्द्र पाल सिंह
अध्यक्ष, अर्थशास्त्र विभाग, कुंवर सिंह महाविद्यालय, बलिया

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