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भारतीय राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन स्वाहा

Author: 
दीप्ती भटनागर एवं साम कोस्सार गिल्बर्ट
Source: 
सर्वोदय प्रेस सर्विस, 17 जून, 2016

विश्व व्यापार संगठन ने भारतीय राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन में स्थानीयता को महत्त्व को ‘गैर-कानूनी’ करार दिया है। राष्ट्रों की सार्वभौमिकता का इससे ज्यादा तिरस्कार और क्या हो सकता है। हमारे प्रधानमंत्री अन्तरराष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन का वैश्विक अगुआ बनने का दावा कर उसका संचालनालय भारत में खोल रहे हैं। दूसरी ओर हम अपना सौर ऊर्जा मिशन अपने देश के कानून के हिसाब से नहीं चला सकते।

फरवरी में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू टी ओ) ने भारतीय राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन के खिलाफ निर्णय सुना दिया था। इस मिशन का उद्देश्य था देश की रिन्युएबल (पुनर्चक्रित) ऊर्जा की क्षमता में तेजी से वृद्धि करना और सन 2022 तक 100 गीगावाट बिजली का उत्पादन कर करोड़ों लोगों तक बिजली पहुँचाना। इस विपरीत निर्णय के पीछे का कारण यह था कि यह कार्यक्रम भारतीय पुनर्चक्रित ऊर्जा उद्योग के माध्यम से स्थानीय लोगों को रोजगार उपलब्ध करवाने जा रहा था। इस निर्णय पर विश्वास कर पाना कठिन लग रहा है क्योंकि डब्ल्यू टी ओ के निदेशक राबर्टों अझेवेडो ने हाल ही में कहा था कि ‘चुनौती व्यापार को रोकने की नहीं है। बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि व्यापार जलवायु परिवर्तन के खिलाफ हो रही लड़ाई का हमसफर बन पाए’ परन्तु डब्ल्यू टी ओ के इस निर्णय से भारत के स्वविकसित सौर ऊर्जा पैनल कारखानों पर वित्तीय बुलडोजर चल गया है।

अभी पेरिस जलवायु परिवर्तन सम्मेलन पर हस्ताक्षर की स्याही ठीक से सूखी भी नहीं थी कि यह सिद्ध कर दिया गया कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई का वास्तविक विजेता तो व्यापार ही है। यह निर्णय फ्रेंड्स ऑफ द अर्थ इंटरनेशनल की उस रिपार्ट के बाद आया है जिसमें पाया गया था कि यह सम्भव है कि विश्व की ऊर्जा आवश्यकता की 100 प्रतिशत की पूर्ति अगले 15 वर्षों में रिन्युवेबल ऊर्जा के माध्यम से सम्भव है।

सन 2015 में अमेरिका ने डब्ल्यू टी ओ में भारत के सौर ऊर्जा मिशन के खिलाफ इस आधार पर मुकदमा लगाया कि यह सरकार द्वारा वित्त पोषित कार्यक्रम है और उनका विश्वास है कि यह ‘पक्षपाती’ है क्योंकि इसमें घरेलू उत्पादन सम्बंधी प्रावधान है, जिसके अनुसार जो भी सौर सेल लगाए जाएँगे उनका (मात्र) 10 प्रतिशत देश (भारत में) में ही उत्पादित होना चाहिए। भारत ने यह तर्क देतेे हुए अपना बचाव किया था कि यह कदम संयुक्त राष्ट्र संघ टिकाऊ विकास पहल एवं अन्तरराष्ट्रीय जलवायु समझौतों के प्रति प्रतिबद्धता दर्शाता है। परन्तु इस पर ध्यान नहीं दिया गया।

विश्व व्यापार संगठन भारतीय राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशन के जबरदस्त खिलाफ है और अब वह अमेरिका के साथ समझौता करने के प्रयास में है। भारत को अपने ऊर्जा मिशन को लेकर या तो डब्ल्यू टी ओ से समन्वय बैठाना होगा या अपने खिलाफ बंदिशों का जोखिम उठाना होगा। जाहिर है स्थानीय रिन्युवेबल ऊर्जा उद्योग इस निर्णय के प्रभाव को लेकर अत्यन्त चिंतित है। परन्तु प्रतिबद्ध कॉरपोरेट व्यापारियों के लिये यह ‘प्रभावशाली हरित अर्थ व्यवस्था’ की एक बड़ी विजय है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि माइकल फ्रोमेन का कहना है ‘यह एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है, यह बात केवल इस मामले पर लागू नहीं होती, परन्तु यह संदेश उन तमाम अन्य देशों को भी जाएगा जोकि पक्षपातपूर्ण स्थानीयता आधारित नीतियों’ पर विचार कर रहे थे। अमेरिका सोलर एनर्जी इण्ड्रस्ट्रीज एसोसिएशन का भी कहना है कि ‘डब्ल्यू टी ओ का फैसला सही दिशा में उठाया गया एक कदम है और हमें उम्मीद है कि इससे भारतीय सौर ऊर्जा बाजार में अमेरिका की सकारात्मक उपस्थिति की राह में आने वाले रोड़े हट जाएंगे।’

यह एक खतरनाक और स्वार्थ से परिपूर्ण स्थिति है जोकि विकासशील देशों की रिन्युवेबल ऊर्जा नीति पर हो रहे हमले को न्यायोचित ठहराती है। गौरतलब है कि विकासशील देशों के सामने अपने नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने के लिये तमाम चुनौतीपूर्ण स्थितियाँ पहले से ही मौजूद हैं। इस निर्णय का सबसे विवादास्पद पक्ष यह है कि अनेक अमेरिकी राज्यों ने भी अपने सौर ऊर्जा उद्योग की मदद के लिये इसी तरह की स्थानीय खरीदी का प्रावधान कर रखा है। जलवायु परिवर्तन, बाजार की विफलता का सबसे बड़ा उदाहरण है अतएव बड़े व्यापार को इसके समाधान की जिम्मेदारी नहीं सौंपी जा सकती। सभी सरकारों को अपनी ठोस जलवायु नीति के क्रियान्वयन की पूरी स्वतंत्रता होना चाहिए।

आज पूरे विश्व में बेरोजगारी की भयानक समस्या है। अतएव यह एक महत्त्वपूर्ण कारण है कि सरकार और सामान्य जनता स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में मिलकर कार्य करें और रोजगारों का सृजन भी करें। यदि भारत और अन्य विकासशील देशों को अपने घरेलू उ़़द्योगों के निर्माण में सहयोग नहीं मिलेगा तो इस बात की पूरी सम्भावना है कि हरित नीतियों को कभी भी सफलता नहीं मिले। कार निर्माण उद्योग की जबरदस्त ताकत व प्रभाव है। यह सिर्फ इसलिए नहीं कि लोग कार चलाते हैं परन्तु इसलिए कि कार के निर्णय से रोजगार सृजित होते हैं। जर्मनी जैसे देश जोकि भारी मात्रा में स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन करते हैं, उनकी ऊर्जा नीतियाँ इस प्रकार से निर्मित की गई हैं जिससे रोजगार भी पैदा हों। डब्ल्यू टी ओ का यह निर्णय ऐसे देशों के लिये खतरनाक नजर बन जाएगा जोकि अपने देश में स्वनिर्मित रिन्युवेबल ऊर्जा उद्योग व ऊर्जा का प्रयोग करना चाहते हैं।

जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कार्यवाही में व्यापार समझौते अक्सर रुकावट का कारण बनते हैं। प्रचलित वर्तमान व्यापारिक नियम स्थानीय रिन्युवेबल ऊर्जा के लाभ को कमतर बताते हैं और जीवाष्म ईंधन कम्पनियों को मजबूती प्रदान करते हैं जिससे कि वे गुप्त न्यायालयों में जलवायु संरक्षण पर हमला बोल सकें। व्यापारिक नीतियाँ सुस्थिर (टिकाऊ) भविष्य में रुकावट डाल रही हैं। सन 2012 में डब्ल्यू टी ओ ने ओंटेरियो के अभिनव हरित ऊर्जा अधिनियम के खिलाफ फैसला दिया है। इस कानून का उद्देश्य पुनर्चक्रण (रिन्युवेबल) ऊर्जा को बढ़ावा देना और स्वच्छ ऊर्जा रोजगार निर्मित करना था। भारतीय मामले की तरह इसमें भी ऐसा ‘करारोपण सिद्धांत’ मौजूद था जोकि स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं की मदद करता था। परंतु डब्ल्यू टी ओ के नियमों का पालन करने हेतु नीति ही बदलनी पड़ी।

पिछले तीन महीनों में इक्वेडोर को यह आदेश दिया गया कि वह द्विपक्षीय निवेश संधि के अन्तर्गत एक पेट्रोल ठेके को रद्द करने के एवज में 1 अरब डॉलर का जुर्माना भरे और ट्रांस कनाडा ने घोषणा की है वह एक व्यापार न्यायाधिकरण में अमेरिकी सरकार पर 15 अरब डॉलर के हर्जाने के लिये दावा करेगा क्योंकि उसने गंदे टार सेंड (एक तरह का भारी जीवाश्म तेल) के परिवहन हेतु की स्टोन पाइप लाइन का प्रस्ताव अस्वीकृत कर दिया था। यह सब सुनने में हास्यास्पद जरुर लगता है, पर यह इसलिए घटित होने दिया जाता है क्योंकि बड़े कॉरपोरेट्स व्यापार समझौते में शामिल कथित निवेशक संरक्षण की धारा इस्तेमाल कर सरकारों पर दावा कर सकते हैं। इसमें वे नियम भी शामिल हैं जो सरकारें अपने नागरिकों की स्वस्थ्य की रक्षा, पर्यावरण या जलवायु को ठीक करने के लिये बनाती हैं। भारत को लेकर डब्ल्यू टी ओ के निर्णय ने अधिक व्यापक व्यापार समझौते जैसे समुद्रपारीय भागीदारियाँ (ट्रांसपेसेफिक पार्टनरशिप, टीपीपी) ट्रेड इन सर्विस समझौते और ट्रांस अटलांटिक इन्वेस्टमेंट पार्टनरशिप (टी टी आई पी), जोकि गंदे जीवाश्म ईंधन को अधिक स्वतंत्रता प्रदान करती है और सरकार के पास विकल्पों को सीमित करती हैं, अधिक खतरनाक सिद्ध होगी।

जलवायु आपातकाल के बढ़ते खतरे के चलते हमें एक ऐसी व्यापारिक प्रणाली की आवश्यकता है जोकि स्थानीय अर्थव्यवस्था, टिकाऊ रोजगार, स्वच्छ पर्यावरण और अधिक जिम्मेदार ऊर्जा का समर्थन करे जिससे कि सुस्थिर समाजों के विकास में सहायता प्राप्त हो, न कि उसमें बाधा पड़े।

सुश्री दीप्ती भटनागर मापुतो स्थित फ्रेड्ंस ऑफ इंटरनेशनल में जलवायु न्याय एवं ऊर्जा विभाग की समन्वयक हैं।
श्री साम कोस्सार-गिल्बर्ट, पेरिस स्थित फ्रेडंस ऑफ इंटरनेशनल के नवउदार प्रतिरोध एवं आर्थिक न्याय कार्यक्रम के समन्वयक हैं।


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