साइबर सिटी बंगलुरु के झीलों का संरक्षण

Submitted by Hindi on Sun, 07/03/2016 - 09:40
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वनों के कटने एवं जैव विविधता के समाप्त होने से हमारे आस-पास के कई जीव-जन्तु भी समाप्त हो रहे हैं। ऐसे में वन, जैव विविधता को बचाने के लिये वन्य जीवों को भी बचाना होगा। केन्द्र सरकार वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने और वन्य जीवों की तस्करी से निपटने के लिये भारत और अमरीका के बीच सहमति ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने को मंजूरी प्रदान की।

साइबर सिटी बंगलुरु इस समय चर्चा में है। केन्द्र सरकार ने बंगलुरु में झीलों के संरक्षण और बचाव के लिये कई कार्यक्रम शुरू करने जा रही है। बंगलुरु के झीलों में सीवरेज का गंदा पानी और कल-कारखानों के अपशिष्ट नहीं गिरेंगे। गंदे पानी को साफ करने के लिये सीवेज शोधन संयंत्र लगाए जाएंगे।

इसके साथ ही ऐसे संयंत्र सही काम कर रहे हैं कि नहीं इस पर कड़ी निगरानी भी रखी जाएगी। केन्द्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने ऐसा निर्देश जारी किया है। केन्द्र सरकार ने प्रदूषण की रोकथाम और बंगलुरु में झीलों के संरक्षण और बचाव के लिये अभी हाल ही में एक बैठक बुलाई थी। जिसमें केन्द्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री अनंत कुमार और केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रकाश जावड़ेकर के साथ कर्नाटक के वन और पर्यावरण मंत्री रामनाथ राय और राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी भाग लिया।

बैठक की अध्यक्षता प्रकाश जावड़ेकर ने किया। बैठक में जावड़ेकर ने कहा कि सभी सीवेज शोधन संयंत्रों के साथ-साथ बंगलुरु में सम्बंधित प्राधिकरणों द्वारा सातों दिन चौबीसों घंटे पानी की गुणवत्ता की निगरानी करने का निर्णय लिया गया है। बंगलुरु में झीलों के संरक्षण और बचाव के प्रयासों में कार्पोरेट सेक्टर को भी सम्मिलित किया जाएगा। इस सम्बंध में हर 6 महीने में प्रगति की निगरानी की जाएगी।

अनंत कुमार ने कहा कि बंगलुरु में झीलों का जैविक-विकास किया जाएगा। उन्होंने कहा कि झीलों को सार्वजनिक-निजी भागीदारी रूप में, जैव विविध रूप में फिर से पुरानी अवस्था में लाया जाएगा। शहरी विकास मंत्रालय के अमरूत कार्यक्रम के अंतर्गत बंगलुरु में गंदे पानी और सीवेज शोधन संयंत्रों के लिये 887.97 करोड़ रूपए की परियोजनाओं को शुरू किया गया है। अन्य लाभों के साथ-साथ इन परियोजनाओं से बंगलुरु में प्रदूषण तत्वों की झीलों में सम्मिलित होने वाली मात्रा में कमी कर झीलों को पुनर्जीवन प्रदान किया जा सकेगा।

इसके साथ ही केन्द्र सरकार ने राजस्थान एवं तेलंगाना राज्यों को क्षतिपूरक वनरोपण के लिये एक बजट जारी किया है। दोनों राज्यों में खत्म हुए वनों के स्थान पर फिर से पौध लगाने के लिये राजस्थान को 164 करोड़ रुपये और तेलंगाना को 156 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत हुई है। केन्द्र सरकार ने क्षतिपूरक वनरोपण कोष प्रबंधन और नियोजन प्राधिकरण की राजस्थान और तेलंगाना के साथ हुई बैठक के बाद यह राशि आवंटित की है।

केन्द्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि स्वीकृत राशि दोनो राज्यों में वनरोपण, पुनर्वास और अन्य जैवविविध कार्यों के लिये स्वीकृत की गई है। फिलहाल, ऐसा नहीं है कि केन्द्र सरकार अचानक वनों की रक्षा एवं जैव विविधता के प्रति सचेत हो गई है। दोनों राज्यों में वनों की कमी और नष्ट हो रहे जैव विविधता को देखते हुए लंबे समय से पर्यावरणविद आवाज उठाते रहे हैं। जिसके कारण उच्चतम न्यायालय ने औसत से कम वनों वाले राज्यों के लिये एक कोष बनाने का आदेश दिया था। जिसमें वनारोपण के लिये एक साथ ही पूरी राशि नहीं बल्कि साल दर साल कुद देने का दिशा-निर्देश है। उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद केन्द्र सरकार ने यह निर्णय लिया है। वनारोपण न्यायालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार इस वर्ष निधि का केवल 10 प्रतिशत जारी किया जा सकता है। पर्यावरण एवं वन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने आशा व्यक्त की संसद के मानसून सत्र में क्षतिपूरक वनरोपण विधेयक पारित हो जाएगा जिससे वनरोपण और अन्य सम्बंधित गतिवधियों के लिये अधिक धनराशि उपलब्ध हो सकेगी।

जैव विविधता में वन्य जीवों का खासा योगदान है। वनों के कटने एवं जैव विविधता के समाप्त होने से हमारे आस-पास के कई जीव-जन्तु भी समाप्त हो रहे हैं। ऐसे में वन, जैव विविधता को बचाने के लिये वन्य जीवों को भी बचाना होगा। केन्द्र सरकार वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने और वन्य जीवों की तस्करी से निपटने के लिये भारत और अमरीका के बीच सहमति ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने को मंजूरी प्रदान की। इस मंजूरी के साथ ही, भारत वन्यजीव संरक्षण और वन्यजीव क्षेत्रों के प्रबंधन तथा वन्यजीवों और उनसे बनने वाले उत्पादों के अवैध कारोबार से निपटने से जुड़े अमरीकी संस्थानों की विशेषज्ञता से लाभान्वित होगा। भारत और अमरीका समृद्ध जैव विविधता और प्राकृतिक धरोहर से संपन्न हैं और उन्होंने अपने यहाँ संरक्षित क्षेत्रों का एक नेटवर्क स्थापित किया है। वन्यजीव संरक्षण से जुड़ी प्राथमिक चिन्ताओं को मिटाने के लिये दोनों देशों के पास अपनी व्यावसायिक कुशलता को साझा करने की संभावनाएं मौजूद हैं, ऐसे में यह सहमति ज्ञापन सहयोग का सुविधाजनक मंच उपलब्ध कराएगा।

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About the author

.पत्रकारिता को बदलाव का माध्यम मानने वाले प्रदीप सिंह एक दशक से दिल्ली में रहकर पत्रकारिता और लेखन से जुड़े हैं। दिल्ली से प्रकाशित होने वाले कई अखबारों और पत्रिकाओं से जुड़कर काम किया।

वर्तमान में यथावत पाक्षिक पत्रिका में बतौर प्रमुख संवाददाता कार्यरत हैं। प्रदीप सिंह का जन्म 13 जुलाई 1976 को प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। प्राथमिक से लेकर बारहवीं तक की शिक्षा प्रतापगढ़ में हुई।

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