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जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव एवं समाधान : एक तकनीकी विवेचना (Side effects and remedies of climate change-a technical analysis)

Author: 
अपर्णा टण्डन
Source: 
अनुसंधान (विज्ञान शोध पत्रिका) अक्टूबर 2014

सारांश


जलवायु परिवर्तन के कारण पृथ्वी का दूषित होता पर्यावरण आज सम्पूर्ण विश्व के समक्ष एक ज्वलंत समस्या है। कोई भी राष्ट्र या व्यक्ति इसके दुष्प्रभावों से मुक्त नहीं रह सकता है। इसके परिणामस्वरूप आज विस्थापन, संघर्ष, भुखमरी, प्राकृतिक सौंदर्य एवं संस्कृति का विनाश तथा राष्ट्रीय असुरक्षा की भावना को पोषण देने वाली समस्याएं दृष्टिगोचर हो रही है। ये समस्याएं देश की सीमाओं के बंधन से मुक्त हैं। अत: इन विकराल समस्याओं के समाधान के लिये राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय साझा प्रयासों की आवश्यकता है ताकि हम विरासत में अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ एवं स्वस्थ पर्यावरण दे सकें।

Abstract


Change in climate is a burning issue for the whole world. No country or person can be immune from its effects. With this effect, today the world is facing the problem of displacement, starvation, struggle, disaster of natural beauty and culture, lack of national insecurity etc. these are the problems which do not consider the country’s borders. Hence, for the solution of these dangerous problems, a joint effort should be taken nationally and internationally so that we can provide our generations or inherit a clean and hygienic environment.

प्रस्तावना


जलवायु परिवर्तन आज विश्व के समक्ष एक विकराल समस्या है जो भूमण्डलीय ऊष्मीकरण के रूप में मनुष्य के साथ-साथ इस भूमंडल पर रहने वाले प्रत्येक प्राणी को प्रभावित कर रही है क्योंकि हमारे आस-पास के वातावरण का हमारे स्वास्थ्य पर निश्चित और प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है। इस विकराल समस्या के समाधान के लिये विश्व भर में प्रयत्न किये जा रहे हैं लेकिन समस्या साल दर साल कम होने के स्थान पर बढ़ती ही जा रही है। यह अभी अपनी आरम्भिक अवस्था में है। यदि इस पर ध्यान न दिया गया तो भविष्य में यह और भी विकराल हो सकती है।

क्या है भूमंडलीय ऊष्मीकरण?


पृथ्वी के वातावरण के तापमान में निरन्तर हो रही वृद्धि ही भूमडलीय ऊष्मीकरण है। प्राकृतिक रूप से पृथ्वी सूर्य की किरणों से ऊष्मा प्राप्त करती है और यह किरणें वायुमंडल से होकर पृथ्वी की सतह पर पहुँचती हैं तथा परावर्तित होकर पुन: लौट जाती हैं। पृथ्वी का वायुमंडल विभिन्न गैसों से मिलकर निर्मित हुआ है जिसमें कुछ ग्रीन हाउस गैसें भी हैं। इनमें से अधिकतर गैसें पृथ्वी के ऊपर एक प्रकार का प्राकृतिक आवरण निर्मित करती हैं। यह आवरण वापस जाती किरणों के एक भाग को रोक लेता है और पृथ्वी के वातावरण को गर्म बनाये रखता है। अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि ग्रीन हाउस गैसों में निरन्तर वृद्धि से यह आवरण और भी सघन हो जाता है तथा सूर्य की अधिक किरणों को रोकने लगता है और भूमंडलीय ऊष्मीकरण की समस्या आरंभ हो जाती है।

क्या है भूमंडलीय ऊष्मीकरण के कारण?


भूमंडलीय ऊष्मीकरण के लिये अपने आप को इस पृथ्वी का सबसे बुद्धिमान प्राणी समझने वाला मनुष्य और उसकी गतिविधियाँ ही पूर्ण रूप से उत्तरदायी हैं। मनुष्य के क्रिया-कलापों से कार्बन डायऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रोजन अॉक्साइड आदि ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा में निरन्तर वृद्धि हो रही है, जिस कारण इन गैसों का आवरण सघन होता जा रहा है और यह सूर्य की परावर्तित किरणों को रोक रहा है जिस कारण पृथ्वी के तापमान में वृद्धि हो रही है। वाहनों, हवाई जहाजों, बिजली बनाने के संयत्रों, उद्योगों आदि की संख्या में निरन्तर वृद्धि से इनसे होने वाले गैसीय उत्सर्जन में भी वृद्धि हो रही है जिससे वातावरण में कार्बन डाइआक्साइड की मात्रा भी बढ़ रही है। जंगल कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करते हैं लेकिन जंगलों की अंधाधुंध कटाई से यह प्राकृतिक नियंत्रक भी इसको नियंत्रित करने में असहाय है।

हैलोजेनेटेड हाइड्रोकार्बन्स पूर्ण रूप से उद्योगों की ही देन है। इनमें सबसे चर्चित है क्लोरो फ्लोरो कार्बन (सीएफसी) जो रेफ्रीजरेटर्स, एयरकण्डीशन, अग्निशामक आदि यंत्रों में प्रयोग की जाती है। यह पृथ्वी के ऊपर निर्मित प्राकृतिक आवरण ओजोन परत को नष्ट करने का कार्य करती है। सूर्य से निकलने वाली घातक पराबैंगनी किरणों को ओजोन परत पृथ्वी पर आने से रोकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ओजोन परत में एक बड़ा छिद्र हो चुका है जिससे पराबैंगनी किरणें सीधे पृथ्वी पर पहुँच कर इसके तापमान में निरन्तर वृद्धि कर रही हैं जिससे ध्रुवों पर जमी बर्फ भी पिघलने लगी है। ऐशोआराम के साधन बढ़ने से आज विश्व के सभी राष्ट्रों में ऊर्जा की आवश्यकता में निरन्तर वृद्धि हो रही है। बिजली उत्पादन के लिये जीवाश्म ईंधन का अत्यधिक मात्रा में प्रयोग किया जाता है जिसके जलने पर कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न होती है जो ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव में वृद्धि कर भूमंडलीय ऊष्मीकरण को बढ़ावा देती है।

भूमंडलीय ऊष्मीकरण के प्रभाव


विश्व के जलवायु परिवर्तन पर दृष्टि रखने वाली संस्था इंटरगवर्नमेंटल पैनल अॉफ क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की मैराथन बैठक मार्च 2014 में जापान के याकोहामा में एक सप्ताह चली। यह इस तरह की दूसरी बैठक थी। इसमें भूमंडलीय ऊष्मीकरण के कारण प्रभाव और निदान पर चर्चा की गई। दुनिया भर के वैज्ञानिकों और अधिकारियों ने जलवायु परिवर्तन से हुए प्रभाव के बारे में 32 खण्डों का 2610 पेज का अब तक का सबसे व्यापक दस्तावेज पेश किया। इस नये दस्तावेज में इस बात को स्पष्ट किया गया है कि वर्ष 2007 में आई रिपोर्ट की तुलना में पूरे विश्व में भूमंडलीय ऊष्मीकरण के बढ़ते खतरे को दर्शाने वाले साक्ष्य पहले से लगभग दोगुने हो चुके हैं। इस रिपोर्ट के सारांश में कहा गया है कि दुनिया के बढ़ते हुए तापमान से लोगों के स्वास्थ्य, रहन-सहन, आहार तथा सुरक्षा को व्यापक खतरा है।

मनुष्य के स्वास्थ्य पर प्रभाव


तापमान में तीव्र गति से हो रही वृद्धि जहाँ हमारे स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रही है साथ ही हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम कर रही है। मानव समाज नित नई बीमारियों से ग्रसित हो रहा है। वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और पराग कणों की मात्रा बढ़ने से विभिन्न प्रकार की एलर्जी व दमे के रोगियों की संख्या बढ़ रही है। वह समय भी जल्द ही आ सकता है जब हम में से अधिकांश को पीने के लिये स्वच्छ जल व खाने के लिये ताजा भोजन भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न हो सके। ऐसा अनुमान है कि 2050 तक मक्का, चावल और गेहूँ के उत्पादन में 25 फीसदी तक नुकसान हो चुका होगा तथा 2050 के बाद फसलों को और ज्यादा नुकसान पहुँचेगा तब तक विश्व की जनसंख्या लगभग 9 अरब तक पहुँचने का अनुमान है।

पशु-पक्षियों व वनस्पितियों पर प्रभाव


माना जा रहा है कि तापमान में वृद्धि से पशु-पक्षी, मछलियाँ, वनस्पतियाँ एवं अन्य जीव धीरे-धीरे ध्रुवों तथा पहाड़ी इलाकों की ओर पलायन करेंगे। इस प्रक्रिया में कुछ का अस्तित्व ही नष्ट हो जायेगा। मूँगे की चट्टानें समाप्त होती जा रही हैं। मात्र 2 सेंटीग्रेड तापमान बढ़ने से ही समुद्र पहले से ज्यादा अम्लीय हो जायेंगे और मूँगे की चट्टानों सहित समुद्र में पाई जाने वाली कई प्रजातियों को खतरा और बढ़ने के आसार उत्पन्न हो जायेंगे।

समुद्र के जलस्तर में वृद्धि


तापमान में वृद्धि से ग्लेशियरों पर जमी बर्फ पिघलने लगेगी। कई स्थानों पर यह प्रक्रिया आरंभ भी हो चुकी है। ग्लेशियरों की बर्फ पिघलने से समुद्र के जलस्तर में वृद्धि होगी। समुद्र की सतह में वृद्धि से प्राकृतिक तटों का कटाव शुरू हो जायेगा जिस कारण एक बड़ा भूभाग जल में समा जायेगा और तटीय इलाकों में निवास करने वाले अधिकांश लोग बेघर हो जायेंगे।

रोजगार के अवसरों में कमी


समुद्र के जलस्तर में वृद्धि से रोजगार के लाखों अवसर समाप्त हो सकते हैं। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव मत्स्य उद्योग और पर्यटन उद्योग पर पड़ेगा। किसानों और निर्माण कार्य में लगे मजदूरों के लिये खतरे उत्पन्न होंगे। मत्स्य उद्योग पर विश्व के करीब 40 करोड़ लोग आश्रित हैं।

ग्रीन हाउस गैसों की उत्पत्ति को कम करने के लिये कतिपय सुझाव


1. विद्युत ऊर्जा को किफायत से उपयोग किया जाये तथा विद्युत उत्पादन के लिये कोयले के स्थान पर प्राकृतिक गैस को ईंधन के रूप में पावर प्लाण्ट में उपयोग किया जाये जिससे परमाणु भट्ठी की गर्मी को सीमित और कोयले की राख को कम किया जा सकेगा।

2. ऊर्जा के गैर परम्परागत स्रोतों जैसे कि पवन ऊर्जा, हाइड्रोइलेक्ट्रिक ऊर्जा और सौर ऊर्जा को प्रमुखता से उपयोग किया जाये।

3. वस्तुओं को रिसाइकिल करने की प्रक्रिया आरंभ की जाये क्योंकि किसी उत्पाद को रिसाइकिल करके पुन: उत्पादन में उसे नये सिरे से उत्पादन करने की अपेक्षा कम ऊर्जा खर्च होती है।

4. मीथेन (सीएच-4), क्लोरोफ्लोरो कार्बन (सीएफसी), सोडियम डाइअॉक्साइड (एनओ-2), ट्रायअॉक्साइड (ओ-3), कार्बन मोनोअॉक्साइड (सीओ) आदि गैसों की मात्रा को नियंत्रित करना होगा। यह नियंत्रण इनके मित्र पदार्थों के उपयोग में वृद्धि कर ही किया जाना संभव है।

5. वनों का संरक्षण तथा वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाकर जलवायु पर नियंत्रण, वर्षा के जल को आकर्षित करना, प्रकृति में विभिन्न हानिकारक गैसों की मात्रा को नियंत्रित करना तथा अॉक्सीजन की मात्रा को बढ़ाया जा सकता है।

6. दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु मानव जाति प्रकृति में पाये जाने वाले जीव-जन्तुओं एवं वनस्पतियों पर ही निर्भर है। मानव प्रागैतिहासिक काल से जैव विविधता का शोषण करता आया है, जिस कारण अनेक प्रजातियाँ विलुप्त हो चुकी हैं। अत: पर्यावरण संरक्षण के लिये जैव विविधता का संरक्षण आवश्यक है।

7. पर्यावरण संरक्षण के लिये परिस्थितिकी कृषि एक उत्तम विकल्प है। परिस्थितिकी कृषि मानव जीवनदायिनी कृषि भी कहलाती है। इसका उद्देश्य रासायनिक उर्वरक तथा कृषि में अधिक रसायनों के उपयोग को रोकना है।

सामान्य जन द्वारा भी इस त्रासदी को कम करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है जैसे-

1. लोगों के द्वारा कार पूलिंग या सार्वजनिक वाहन का उपयोग किया जाए तथा अत्यधिक पुराने हो गये वाहनों का प्रयोग बंद कर दिया जाए।

2. सीएफएल या एलईडी बल्ब ही उपयोग किये जायें।

3. अधिक स्टार वाले उपकरणों का उपयोग किया जाये जिससे ऊर्जा की बचत हो सके।

4. टेलीविजन व अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को उपयोग के पश्चात पूर्ण रूप से बंद कर दिया जाये, उन्हें स्टैण्डबाई मोड पर न छोड़ा जाये।

5. खाना पकाने के लिये कुकिंग गैस या सोलर कुकिंग का प्रयोग किया जाये।

6. जन साधारण में भूमंडलीय ऊष्मीकरण तथा इसके दुष्प्रभावों के प्रति जागरूकता उत्पन्न की जाये।

निष्कर्ष


ऊष्मीकरण के कारण पृथ्वी का दूषित होता पर्यावरण आज संपूर्ण विश्व के समक्ष एक ज्वलंत समस्या है। इस कारण आज पृथ्वी से करोड़ो जीव-जन्तु एवं वनस्पतियाँ विलुप्त हो चुकी हैं और कई विलुप्त होने की कगार पर हैं। कोई भी राष्ट्र या व्यक्ति इसके दुष्प्रभावों से मुक्त नहीं रह सकता है। परिणामस्वरूप आज विस्थापन, संघर्ष, भुखमरी, प्राकृतिक सौंदर्य एवं संस्कृति का विनाश तथा राष्ट्रीय असुरक्षा की भावना को पोषण देने वाली समस्याएं दृष्टिगोचर हो रही हैं। ये समस्याएं देश की सीमाओं के बंधन से मुक्त हैं। अत: इन विकराल समस्याओं के समाधान के लिये राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय साझा प्रयासों की आवश्यकता है ताकि हम विरासत में अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ एवं स्वस्थ पर्यावरण दे सकें। हालाँकि जलवायु परिवर्तन का जो क्रम आरंभ हो चुका है उस पर पूर्ण रूप से विराम लगा पाना तो संभव नहीं है परंतु सावधानी रखकर उसे और परिवर्तित होने से अवश्य रोका जा सकता है।

. अपर्णा टण्डन
असिस्टेंट प्रोफेसर, वाणिज्य विभाग, बीएसएनवी पीजी कॉलेज, लखनऊ-226001, यूपी, भारत aparnashrish@gmail.com

Aparna Tandon
Assistant Professor, Department of Commerce, B.S.N.V. P.G. College, Lucknow-226001, U.P., India aparnashrish@gmail.com

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