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मध्य एशिया में होलोसीन के दौरान आर्द्रता विकास- एक समीक्षा (Moisture evolution in Central Asia during Holocene- A review)

Author: 
रणधीर सिंह, बिनीता फर्त्याल एवं बिंध्याचल पाण्डेय
Source: 
अनुसंधान (विज्ञान शोध पत्रिका), 2015

सारांश


होलोसीन काल के आर्द्रता इतिहास पर प्रकाशित साहित्य के निष्कर्षों पर आधारित1,2 सामान्य समीक्षा प्रस्तुत की गई है। सभी अध्ययन भारतीय मानसून प्रभावित क्षेत्र में पूर्व होलोसीन के दौरान उच्च प्रभावी आर्द्रता दर्शातें हैं, जोकि होलोसीन इष्टतम जलवायु परिस्थितियों को परिलक्षित करती है। इसके विपरीत, उन क्षेत्रों में इष्टतम परिस्थितियाँ मध्य होलोसीन के दौरान व्याप्त रहीं, जोकि दक्षिण-पूर्वी एशियाई मानसून और पछुआ पवन के प्रभाव के अंतर्गत आते हैं। ये विरोधाभास होलोसीन में हवा संहति (द्रव्यमानों) के क्षेत्रीय चढ़ाव और उतार से समझाया जा सकता है। पूर्व होलोसीन के दौरान प्रबल परिणामस्वरूप ग्रीष्म मानसून का तीव्रीकरण हुआ। तिब्बतीय पठार में हवा का तीव्र चढ़ाव बना जिसके कारण वर्षण बढ़ा और ऊपरी क्षोभ मंडल में हवा का अपसरण बना। पठार के ऊपर बने इस अपसरण ने हवा संहति में तीव्र उतार का निर्माण किया, जिसके परिणामस्वरूप उत्तर से लगे हुए क्षेत्रों में शुष्कता बढ़ गई। पुराजलवायु के अधिकांश अध्ययन क्षेत्र में पश्च होलोसीन से घटती हुई प्रभावी आर्द्रता सुझाते हैं।

Abstract


A general review account of the late-Quaternary moisture history of monsoonal Central Asia, inferred from the published literature is given. All studies show high effective moisture from the area dominated by the Indian Monsoon during the early Holocene, suggesting Holocene optimal climate conditions. In contrast, areas which are dominated by the South-East Asian monsoon and the Westerlies, optimal conditions prevailed there during the mid-Holocene. These apparent contradictions can possibly be explained by the regional uplift and descent of air masses in the Holocene. Strengthened insolation during the early Holocene, possibly caused an enhanced low-level convergence over the Tibetan Plateau which results in the intensification of the summer monsoon. Tibetan Plateau experienced strong air uplift which caused intensified precipitation and air divergence in the upper troposphere. This divergence over the plateau led an intensified descent of air masses and consequently increased aridity in the areas adjacent to the north. The majority of the palaeoclimatic records suggest reduced effective moisture since the late Holocene in the region.

प्रस्तावना


प्रस्तुत समीक्षा में लिये गए 50 स्थल ऐसे क्षेत्र में (तिब्बतीय पठार, उत्तर-पश्चिम, उत्तर-मध्य चीन और मंगोलिया) स्थित हैं, जो अपनी दो मुख्य विशेषताओं की वजह से जलवायु अध्ययनों के लिये खास महत्व रखते हैं। पहली विशेषता यह है कि यह क्षेत्र भारतीय मानसून, दक्षिण पूर्वी एशियाई मानसून और पछुवा पवनों के त्रिकोण में स्थित हैं (चित्र-1)। दूसरी विशेषता यह है कि इस इलाके में प्रबल जलवायवी भिन्नता खासतौर पर प्रभावी आर्द्रता से जुड़ी हुई, बहुत पाई जाती है।

अध्ययन क्षेत्र में प्रभावी मानसून तंत्र

विधि


उपरोक्त क्षेत्र के स्थलों की सूखी झीलों-अनावृत परिच्छेदिकाओं, वर्तमान झीलों, नदीय निक्षेप, पीट दलदल और लोएस परिच्छेदिकाओं में कई पुराजलवायु अध्ययन हुए हैं, जिनमें विभिन्न विधियों द्वारा जलवायु की स्थितियों (शुष्क या आर्द्र) का निर्धारण मृत्तिका खनिज अध्ययन, स्थाई समस्थानिक विश्लेषण-अॉक्सीजन स्थाई समस्थानिक तथा कार्बन स्थाई समस्थानिक, कण अमाप विश्लेषण, कार्बन मात्रा विश्लेषण, कार्बन और नाइट्रोजन अनुपात विश्लेषण, चुंबकीय प्रभाव्यता, परागकण, औस्ट्राकॉड अध्ययन और डायटम अध्ययन से किया गया है। किसी क्षेत्र में जब 50 प्रतिशत से अधिक अध्ययन स्थलों में नम/आर्द्र स्थितियाँ मिली हैं, तब उस क्षेत्र में अनुकूलतम/इष्टतम आर्द्रता मानी गई है। सभी अध्ययनों में आयु निर्धारण 14C विधि द्वारा किया गया है।

होलोसीन आर्द्रता स्थितियों के प्रभावी परिसंचरण तंत्र से जुड़े क्षेत्रीय पहलुओं को स्पष्ट करने के लिये उत्तरीय भारत, उत्तरीय यूनान और तिब्बतीय पठार (100 डिग्री पूर्व के पश्चिम) के क्षेत्रों से हुए अध्ययनों को भारतीय मानसून के तहत रखा गया है। इसमें भारत में थार मरूस्थल की डिडवान झील, लुकरानसर झील, तिब्बतीय पठार से जाबुये झील, हिडन झील, रेन त्सो (त्सो=झील), सेलिंग त्सो, बैंगगोंग/पैंगगोंग त्सो, सुम्क्सी त्सो, अक्साय्चिन झील, होंग्यान पीट दलदल, वासोंग पीट दलदल, हक्सी लोएस, दुन्दे हिमाच्छादन तथा चीन से चिलू, क्सिन्ग्युं हु, शयेमा झील, वाकी झील में हुए पुराजलवायु अध्ययन शामिल हैं। इसी तरह, ग्रीष्म मानसून की आधुनिक सीमा के दक्षिण के और 100 डिग्री पूर्व के सभी अध्ययनों को दक्षिण पूर्व एशियन मानसून के साथ रखा गया है, जिससे चीन के लोएस पठार की युआन्बो लोएस, विनान लोएस, योक्सियन लोएस, ददिवान लोएस, शाजिंपिंग लोएस, जिन्ग्बियन लोएस, दाजीयू झील, अॉरडोस पठार की हेइमुगो लोएस, मिदिवान लोएस, यांग्तोमाओ लोएस और मध्य आंतरिक मंगोलिया से यान्हैजी झील, दहाई झील, साचुकी झील, होलुकु लोएस, लिउज्हौवन लोएस प्रांत में हुए अध्ययन शामिल हैं।

उत्तर से लगे हुए क्षेत्र मुख्यत: जिंजिआंग से बोस्टन झील, तरिम नदी, पश्चिमी आंतरिक मांगोलिया से होंग्शुई नदी, संजिओचेंग झील, येमा झील, शिंगटू झील, बैजियन झील, दुअंतौलिअन्ग झील, जुयांजे झील और मंगोलिया के डबा नुर (नुर=झील), होतोन नुर, बयान नुर, गुन नुर, दूद नुर, होव्स्गोल झील, तेल्मेन झील, ज्हालैआईनोर झील और ओजेरकी पीट दलदल में हुए अध्ययन शामिल हैं। जिंजिआंग पश्चिमी आंतरिक मंगोलिया और मंगोलिया के स्थल सामान्यत: ग्रीष्म मानसून और अधिक पैमाने में पछुवा/पश्चिमी हवाओं से प्रभावित माने जाते हैं, इसलिए इन स्थलों के अध्ययन मध्य एशिया में पछुवा हवाओं की सक्रियता की जानकारी देते हैं।

परिणाम


होलोसनी काल के पूर्व आर्द्रता स्थितियाँ
सबसे अधिक अनुकूल आर्द्रता स्थितियाँ आज से 43 और 37.6 हजार वर्ष पूर्व सुझाई गई हैं। आज से 25.5 हजार वर्ष पूर्व के बाद, माध्य आर्द्रता मान में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। संपूर्ण क्षेत्र में आर्द्रता न्यूनतम आज से 21.3-19.8 हजार वर्ष पूर्व के बीच पाई गई है। आज से 19.8-17.2 हजार वर्ष पूर्व के बीच माध्य आर्द्रता मान धीरे-धीरे बढ़ता है। आज से 17.2 और 15.4 हजार वर्ष पूर्व स्थाई या थोड़ी सी घटी हुई आर्द्रता सुझाई गई है। परवर्ती समय (आज से 15.4-13.0 हजार वर्ष पूर्व), में प्रभावकारी आर्द्रता में तीक्ष्ण बढ़त प्रदर्शित होती है। आज से 13.0 और 11.6 हजार वर्ष पूर्व के समय अंतराल में कमतर आर्द्रता प्राप्यता की तरफ सुस्पष्ट वापसी दिखाती है। प्लेस्टोसीन-होलोसीन संक्रमण (11.5 हजार वर्ष पूर्व) पर नमी की स्थितियाँ उल्लेखनीय ढंग से आर्द्रतर हो गई थी।

होलोसीन काल की आर्द्रता स्थितियाँ


भारतीय मानसून क्षेत्र, पूर्व होलोसीन (10.9-7.0 हजार वर्ष पूर्व) के दौरान अनुकूलतम आर्द्रता स्थितियों को स्पष्ट करता है और आज से 4.3 हजार वर्ष पूर्व तक अधिक आर्द्र स्थितियाँ दर्शाता है। दक्षिण पूर्व एशियन मानसून क्षेत्र पूर्व होलोसीन से लेकर पश्च होलोसीन के मध्य तक, यानि आज से 11.5-1.7 हजार वर्ष पूर्व अधिक आर्द्र स्थितियाँ दर्शाता है, पर भारतीय मानसून क्षेत्र के विपरीत इस क्षेत्र में अनुकूलतम आर्द्रता पूर्व मध्य होलोसीन (आज से 8.3-5.5 हजार वर्ष पूर्व) के दौरान दर्ज की गई है। पछुवा प्रदेश, सुस्पष्ट अधिकतम आर्द्रता व्यक्त नहीं करता, बल्कि आज से 12.1 और 2.7 हजार वर्ष पूर्व लगभग स्थिर मान दिखाता है। लघु अधिकतम मान आज से 7.5 और 6.8 हजार वर्ष पूर्व के बीच प्राप्त होता है। पूर्व होलोसीन के दौरान क्षेत्र में एक साथ अधिक शुष्क, आर्द्र और अधिक आर्द्र स्थितियाँ होने के असंगत परिणाम मिले हैं। यद्यपि मानसून प्रभावी इलाकों के विपरीत, अधिक शुष्क स्थितियों के प्रमाण विशेषत: होलोसीन के पहले दो हजार सालों के दौरान पछुवा प्रदेश में सर्वाधिक मिले हैं।

होलोसीन के दौरान आर्द्रता विकास पर परिचर्चा


अरब सागर के अवसादों पर हुए पुराजलवायवी अध्ययनों से पता चला है कि भारतीय मानसून शताब्दी और दशक पैमाने पर आतपन अंतर के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं। 23 हजार वर्ष पूर्व न्यूनतम आतपन के बाद आतपन ‘‘लास्ट टर्मिनेशन’’ काल के दौरान लगातार बढ़ता जाता है और प्लेस्टोसीन-होलोसीन संक्रमण पर अपने अधिकतम मान में पहुँच जाता है। मानसून प्रभावित एशिया भर से स्थलीय अवसादों और घिरे हुए समुद्रों के अध्ययनों से स्पष्ट है कि भारतीय और दक्षिण पूर्वी एशियाई मानसून का प्रबल तीव्रीकरण प्लेस्टोसीन-होलोसीन संक्रमण (लगभग 11.5 हजार वर्ष पूर्व) में घटित हुआ। अरब सागर और दक्षिण चीन सागर से हुए लगभग सभी उच्च विभेदन समुद्रीय पुराजलवायवी अध्ययनों से यह स्पष्ट होता है कि निम्न अक्षांशों के समुद्रीय क्षेत्रों में ग्रीष्मकालीन मानसून होलोसीन के पहले आधे भाग (आज से लगभग 11.5-6 हजार वर्ष पूर्व) के दौरान सबसे प्रबलतम था।

समुद्रीय रिकार्ड्स के विपरीत मानसूनी मध्य एशिया के सभी अध्ययन इष्टतम आर्द्रता स्थितियों को प्लेस्टोसीन-होलोसीन संक्रमण के तुरंत बाद के समय में नहीं स्वीकारते हैं बल्कि अध्ययन स्थलों के एक दूसरे के बहुत समीप होने पर भी होलोसीन अनुकूलतम में अत्यधिक भिन्नता मिलती है। इसके साथ ही पूर्व होलोसीन (आज से 11-5 हजार वर्ष पूर्व) के लिये उच्चतम झील स्तर और अनुकूलित वनस्पति परिस्थितियाँ तिब्बतीय पठार की कई झीलों (सुमक्सी सो (सो=झील), सीलिंग सो, जोइगी बेसिन) से भी उल्लेखित हैं। उत्तर-मध्य और उत्तरीय चीन से हुए पुराजलवायवी अध्ययन मध्य होलोसीन अनुकूलतम को स्पष्ट दर्शाते हैं। भारत में थार मरुस्थल की कई झीलों (डिडवान झील : आज से 8.3-7.3 हजार वर्ष पूर्व; लुकरानसर झील : आज से 7.1-5.8 हजार वर्ष पूर्व) से भी सबसे अधिक आर्द्र परिस्थितियों के प्रारम्भिक मध्य होलोसीन के दौरान रहे होने के संकेत दर्ज किए गए हैं। मंगोलिया के पुराजलवायु प्रॉक्सी आँकड़ों के संकलन से पूर्व होलोसीन के, एक अधिक शुष्क प्रावस्था होने का पता चलता है, जबकि मध्य होलोसीन में अधिक आर्द्र परिस्थितियों का संकेत मिला है।

आम पुराजलवायवी पूर्वानुमान के अनुसार, इस क्षेत्र को, ग्रीष्मकालीन मानसून और पछुवा हवाओं के संबंध में अपनी सीमान्त स्थिति के चलते प्रभावी परिसंचरण तंत्रों के स्थानिक फैलाव या सिकुड़न को बहुत अधिक संवेदनशीलता के साथ प्रतिबिंबित करना चाहिए। इस मान्यता के अनुसार, पूर्व होलोसीन के दौरान उच्चतर आर्द्रता मान के लिये तिब्बतीय पठार में बढ़े हुए भारतीय मानसून को जिम्मेदार ठहराया जाता है, जबकि उत्तर और उत्तर-पूर्व के तरफ के क्षेत्र इस समय के दौरान पूरी तरह से शुष्क पछुवा हवाओं और कमजोर दक्षिण पूर्वी एशियाई ग्रीष्मकालीन मानसून से प्रभावित रहे। यह समझाया नहीं जा सका है कि क्यों मजबूत भारतीय मानसून ने अपना प्रभाव और उत्तर की तरफ नहीं फैलाया। इसके अलावा, दक्षिण चीन समुद्र और अरब सागर से हुए अध्ययनों की तुलना करने पर यह स्पष्ट होता है कि दक्षिण पूर्वी एशियाई मानसून में अल्पावधिक घटनाएं और दीर्घावधि परिवर्तन भारतीय मानसून दौर में हुए विचरण के समकालीन हैं।

निष्कर्षत: आर्द्र प्रावस्थाओं से संबंधित रखने वाली क्षेत्रीय भिन्नताएं महाद्वीपों में परिसंचरण प्रक्रियाओं के बीच अंतर होने से संभव नहीं है। पूर्व होलोसीन के दौरान तिब्बतीय पठार पर आर्द्र और गर्म परिस्थितियों और इसके साथ ही उत्तर के पास के इलाकों में शुष्क परिस्थितियों के लिये एक अन्य स्पष्टीकरण शायद हवा संहति (द्रव्यमान) के चढ़ाव और उतार में क्षेत्रीय भिन्नता से जुड़ा हुआ है। गर्मियों में आतपन हवा संहति के तीव्र उत्थान को बढ़ावा देता है (जो गुप्त उष्मा की निर्मुक्ति करता है और इसलिए इलाके में वर्षा हो जाती है) जो निम्न दबाव सेल का निर्माण करता है (जिसे ‘‘तिब्बतन लो’’ कहा जाता है)। इसके चलते तिब्बतीय पठार के ऊपर निचले क्षोभ मंडल में बड़े पैमाने के अभिसरण (चक्रवाती परिसंचरण) का निर्माण होता है, जिसके परिणाम स्वरूप ऊपरी क्षोभ मंडल में एक प्रति चक्रवाती परसंचरण और अपसरण बनाता है। यह परिसंचरण तिब्बतीय पठार के उत्तर के पास के इलाकों के निचले भागों में हवा संहति के अवतलन को बढ़ाता है जो क्षेत्र में शुष्कता को बढ़ाता है।

इन परिसंचरण तरीकों की तीव्रता, आतपन की तीव्रता और इसलिए मानसून गतिविधि का लगभग अनुसरण करती है। अत: परिणामस्वरूप पूर्व और मध्य होलोसीन के दौरान तिब्बतीय पठार पर तीव्रतर मानसून गतिविधि और बढ़े हुए वर्षण का संयोजन, दूर उत्तर में स्थित निचले भू-भागों में बढ़ी हुई शुष्कता का कारण रही होगी। इस तथ्य का क्षेत्र से संकलित अध्ययनों से भी संकेत होता है जो पठारीय क्षेत्रों में अनुकूल आर्द्रता परिस्थितियाँ और आंतरिक मंगोलिया, जिंजिआंग और मंगोलिया में शुष्क परिस्थितियाँ स्पष्ट करते हैं।

निष्कर्ष


सामान्यत: मानसून प्रभावित एशिया में जलवायु परिवर्तन भारतीय मानसून के शिथिलन या सुदृढ़ीकरण के अनुक्रिया में हुई क्रमश: ठंडे और शुष्क या गर्म और आर्द्र परिस्थितियों के संयोजन के रूप में जान पड़ता है। यद्यपि भिन्न संयोजन भी देखे गए हैं, पर वे प्रबल उतार-चढ़ाव और जलवायु अस्थिरता के परिणाम हैं। एशिया में अधिकांश होलोसीन महाद्वीपीय जलवायु के अध्ययन सरोवरी अवसादों पर हुए हैं, जो झील स्तर के परिवर्तनों और वनस्पति गतिशीलता की जानकारी देते हैं। जलवायु परिवर्तन प्रभावी आर्द्रता में परिवर्तनों जोकि तापमान और वर्षण परिवर्तनों के संयुक्त संकेत को दर्शाते हैं, के अनुरूप होता है। खासतौर पर अत्यंत शुष्क प्रदेशों में अनियमित वर्षण के साथ प्रबलतर ग्रीष्मकालीन मानसून कम प्रभावकारी आर्द्रता (बढ़े वाष्पन के कारण) में परिणति होती है।

इसके विपरीत आर्द्र क्षेत्रों में वाष्पन केवल हल्का सा बढ़ जाता है चूँकि हवा पहले से ही जल वाष्प से पूरी तरह संतृप्त होती है। प्रबलतम मानसून की वजह से झीलों का स्तर बढ़ता है और पादप वृद्धि के लिये प्राप्य आर्द्रता बढ़ती है। अत: यह निष्कर्ष दिया जा सकता है कि होलोसीन के पहले आधे भाग के दौरान प्रबलतर ग्रीष्मकालीन मानसून के परिणामस्वरूप एशिया के अंदरूनी शुष्क देशों में प्रभावकारी आर्द्रता घटी होगी और आर्द्र क्षेत्रों में विशेषत: पूर्वी तिब्बतीय पठार में अधिक अनुकूल परिस्थितियाँ बनी होंगी।

आभार


यह अध्ययन कार्य बीरबल साहनी पुरावनस्पति विज्ञान संस्थान, लखनऊ में संपन्न हुआ। डा. देवव्रत पाठक भाषाई सुधार में सहायता और श्री अजय कुमार श्रीवास्तव टंकण में मदद के लिये धन्यवाद के पात्र हैं।

संदर्भ


1. लॉन्ग, हा.; लाई, ज.पी.; वांग ना. एवं ली, यू (2010) होलोसीन क्लाइमेट वेरिएशंस फ्रॉम ज्हुयुजी टर्मिनल लेक रिकॉर्ड्स इन ईस्ट एशियन मानसून मार्जिन इन एरिड नोर्दर्न चाइना, क्वॉटनरी रिसर्च अंक, खण्ड-74, मु.पृ. 46-56।

2. हर्जच्यू, यू. (2006) पेलियो-मोइस्चर एवल्यूशन इन मानसूनल सेंट्रल एशिया ड्यूरिंग दि लास्ट 50,000 इयर्स, क्वॉटनरी साइंस रिव्यूज, खण्ड-25, मु.पृ. 163-178।

3. इनमें प्रयुक्त संदर्भ।

रणधीर सिंह, बिनीता फर्त्याल एवं बिंध्याचल पाण्डेय
बीरबल साहनी पुरावनस्पति विज्ञान संस्थान, 53-विश्वविद्यालय मार्ग, लखनऊ-226007, यूपी, भारत काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी-221005, यूपी, भारत, randheer.singh@gmail.com, binitaphartiyal@gmail.com, drbpandey@yahoo.co.in

Randheer Singh, Binita Phartiyal an Bindhyachal Pandey
Birbal Sani Institute of Palaeobotany, 53-University Road, Lucknow-226007, U.P., India Banarash Hindu University, Varansi-221005, U.P., India randheer.singh@gmail.com, binitaphartiyal@gmail.com, drbpandey@yahoo.co.in

प्राप्त तिथि - 10.04.2015, स्वीकृत तिथि- 20.05.2015

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