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जल, अर्थव्यवस्था और उद्योग

Author: 
ऋषभ कृष्ण सक्सेना
Source: 
योजना, जुलाई, 2016

दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, बंगलुरु या कोई भी दूसरा बड़ा शहर हो पानी की बोतलों का कारोबार जमकर फल-फूल रहा है। कुछ दशक पहले तक बोतलबंद पानी का इस्तेमाल एक छोटा और अमीर कहलाने वाला तबका ही करता था या विदेश से आने वाले सैलानी पानी की बोतलें माँगते थे लेकिन अब शहरों में ही नहीं देहातों में भी सफर के दौरान या दुकानों पर पानी की बोतलें बहुत आराम से मिल जाती हैं

. मानसून की बेरुखी के बीच भीषण सूखे से जूझते महाराष्ट्र के लातूर में इस साल जब पानी से भरी ट्रेन भेजने की नौबत आ गई तो हर किसी को पानी की अहमियत महसूस हुई और यह चर्चा भी जोर पकड़ गई कि पानी का संकट इतना गहरा रहा है। जब इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के मैच महाराष्ट्र से बाहर कराने का आदेश अदालत से आया तो पानी को लेकर और भी हो हल्ला मचा। लेकिन इस बीच किसी का भी ध्यान इस बात पर नहीं गया कि बिजली बनाने वाली सरकारी कम्पनी एनटीपीसी को इसी साल मार्च में पश्चिम बंगाल के फरक्का में अपनी पाँच इकाइयाँ केवल इसीलिये बंद करनी पड़ी थीं क्योंकि उन तक पानी नहीं पहुँच रहा था। महाराष्ट्र के बीड़ जिले में महाराष्ट्र स्टेट पॉवर कॉर्पोरेशन (महाजेनको) का परली बिजली संयंत्र तो पिछले साल जून में ही बंद हो गया था। यह संयंत्र पिछले कई साल से गर्मियों में बंद रहता है और इसकी वजह पानी की किल्लत ही होती है। दक्षिण में कर्नाटक पावर कॉर्पोरेशन का रायचूर संयंत्र भी हाल ही में बंद हुआ। इनमें से सभी संयंत्र पानी की किल्लत के कारण बंद किये गये, जबकि जिन इलाकों में ये हैं, वहाँ पानी का गंभीर संकट नहीं है।

उदाहरण केवल बिजली के उद्योग से ही नहीं है। बम्बई उच्च न्यायालय ने अप्रैल में ही महाराष्ट्र सरकार को आदेश दिया था कि शराब बनाने वाले संयंत्रों को पानी की आपूर्ति में 60 फीसदी कटौती कर दी जाए। यह आदेश 10 मई से लागू होकर 27 जून तक चलना था। कर्नाटक में मंगलूर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड ने भी पानी नहीं मिलने के कारण मई में अपने तीसरे चरण की इकायों को बंद कर दिया। मंगलूर केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स को भी उसी की तर्ज पर अपनी यूरिया बनाने वाली इकाई बंद करनी पड़ी। कर्नाटक में इस्तेमाल होने वाला 80 फीसदी उर्वरक इसी इकाई से आता है। सबसे बड़ी निजी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज को पानी की मनाही होने के बाद गुजरात में अपना दहेज संयंत्र बंद करना पड़ा और जून के दूसरे हफ्ते में ग्रासिम इंडस्ट्रीज ने भी मध्य प्रदेश के नागदा में लुगदी और रेशे बनाने का अपना कारखाना बंद करने का ऐलान कर दिया।

अर्थजगत की प्यास


ऊपर दिये गये उदाहरण जल संकट की ओर तो इशारा करते ही हैं, एक और अहम बात बताते हैं। गौर से देखें तो पता चलता है कि पानी केवल पीने और खेती के लिये ही नहीं है, जिनकी चर्चा हम आमतौर पर करते रहते हैं। असल में पानी की अपनी अलग अर्थव्यवस्था है, जिसका हमें अक्सर अहसास ही नहीं होता है। इस अर्थव्यवस्था में तमाम उद्योग धंधे होते हैं, जो पानी से ही चलते हैं, लाखों रोजगार होते हैं, जो पानी पर ही टिके होते हैं और अगर पानी खत्म कर दिया जाये तो समूची अर्थव्यवस्था ढह जाएगी। कुछ समय के लिये ही पानी बंद कर देने से कम्पनियों पर कितना असर पड़ता है, यह ग्रासिम से पूछिए। विस्कोस स्टेपल फाइबर बनाने की उसकी कुल क्षमता नागदा संयंत्र बंद होने के बाद करीब 33 फीसदी कम हो गई है। इसकी अहमियत कितनी है, यह इसी से पता चलता है कि 2015-16 में 36,600 करोड़ रुपये के उसके कुल राजस्व में इस फाइबर कारोबार का करीब 21 फीसदी योगदान था। जाहिर है कि पानी की कमी उसके बहीखाते पर भी असर डाल सकती है।

पानी के इस अर्थशास्त्र में बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे ही उद्योगों का है, जिनके लिये पानी प्राणवायु से कम नहीं है लेकिन उनकी बात हम आगे करेंगे। पहले इस अर्थशास्त्र का दूसरा हिस्सा देखते हैं, जो आँखों के सामने रहता है, लेकिन जिस पर ध्यान कम ही दिया जाता है। यह हिस्सा पानी से सिक्के बनाने के कारोबार का है, जिसमें बोतलबंद पानी भी आता है, पानी को साफ करने वाले वाटर प्योरिफायर भी हैं और गंदे पानी को साफ करने यानि वेस्टवाटर ट्रीटमेंट का कारोबार भी है। इस कारोबार का बड़ा हिस्सा असंगठित है, लेकिन अरबों रुपये से कम का नहीं है।

बोतलबंद पानी


इस अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा हिस्सा है, बोतलबंद पानी का कारोबार। अब मामला एक कदम आगे निकल गया है और 20 या 40 लीटर की बड़ी बोतलें शहरी घरों में जगह बनाने लगी हैं। इसकी वजह एकदम साफ है। आबादी तेजी से बढ़ रही है, उद्योग बढ़ते जा रहे हैं, पानी की खपत तेजी से बढ़ रही है, लेकिन उसकी आपूर्ति की समुचित व्यवस्था नहीं है। ऐसी सूरत में 200 मिलीलीटर के पाउच से लेकर 50 लीटर तक की पानी की बोतलें धड़ल्ले से बिक रही हैं। शुरुआत में पारले, बिसलेरी, पेप्सी, नेस्ले, माउंट एवरेस्ट और किनली जैसे कुछ ब्रांडों की बोतलें ही दिखती थीं, लेकिन अब बड़े आकार की बोतलें स्थानीय स्तर पर भी बनने लगी हैं। अब कमोबेश हरेक शहर में वहाँ के स्थानीय ब्रांड होते हैं, जो पानी की बड़ी बोतलें तैयार करते हैं। उनकी बोतलें 20 रुपये से शुरू होकर 50 रुपये तक में बिकती हैं, जबकि बिसलेरी जैसे बड़े ब्रांड 20 लीटर पानी की बोतल 70-80 रुपये में बेचते हैं।

इनके कारोबार में तेज रफ्तार से बढ़ोतरी होनी भी तय ही है क्योंकि अभी तक देश की जनसंख्या का बहुत कम हिस्सा बोतलबंद पानी का रोजाना इस्तेमाल करता है। लेकिन जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ही इनका इस्तेमाल भी बढ़ रहा है। इस कारोबार से जुड़ी कम्पनियों के मुताबिक उनका बड़ा ग्राहक वर्ग वे कम्पनियाँ हैं, जिनके दफ्तर पानी की किल्लत वाले इलाकों में हैं। वहाँ से एक-एक दफ्तर में हर महीने लाखों रुपये का बोतलबंद पानी पिया जाता है। इससे यह अंदाजा तो मिलता है कि यह कारोबार बहुत बड़ा है, लेकिन इसका काफी हिस्सा असंगठित होने के कारण बोतलबंद पानी का सालाना कारोबार ठीक से नहीं बताया जा सकता। अलबत्ता शोध फर्म वैल्यूनोट्स के मुताबिक इस समय इसका आकार 10,000 करोड़ रुपये तक हो सकता है। उसने कुछ अरसा पहले आई अपनी रिपोर्ट पैकेज्ड बॉटल्ड वाटर इंडस्ट्री इन इंडियाः 2013-18 में कहा था कि लगातार बढ़ रहा भारतीय बोतलबंद पानी का बाजार 2013 में करीब 6,000 करोड़ रुपये का था, जो 22 फीसदी सालाना की रफ्तार से बढ़कर 2018 में 16,000 करोड़ रुपये तक पहुँच सकता है।

अगर 1,000 मेगावाट का कोयले से बिजली बनाने का संयंत्र लगाया जाता है तो साल भर में वह करीब 2,800 करोड़ लीटर पानी खर्च कर देता है। हालाँकि ज्यादातर उद्योगों में पानी का इस्तेमाल गर्म हो चुकी मशीनों को ठंडा करने में ही होता है। ऐसे उद्योग अक्सर रिसाइकल किये गये पानी यानि गंदे पानी का शोधन करने के बाद तैयार पानी का इस्तेमाल करते हैं। कारोबार बढ़ने का बहुत बड़ा कारण असंगठित उद्योग है। पानी के असंगठित उद्योग से जुड़े लोगों के मुताबिक 2,000 लीटर प्रतिघंटा की क्षमता वाला पानी का संयंत्र लगाने के लिये महज 2,000 वर्गफुट की इमारत समेत 30-35 लाख रुपये का निवेश करना पड़ता है। इसका बड़ा हिस्सा कारोबारी ऋण के तौर पर मिल जाता है। अगर बड़ी बोतलें तैयार की जा रही हैं तो असंगठित कारोबार करीब 60 फीसदी मार्जिन दे देता है। कुल मिलाकर एक छोटे संयंत्र से करीब 25-30 फीसदी मुनाफा हासिल हो जाता है। बाजारी आँकड़ों से अनुमान तो यही है कि दिल्ली के करीब नोएडा और साहिबाबाद की तंग गलियों में या मुम्बई के मीरा रोड-भायंदर जैसे इलाकों में तो और भी छोटी रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) इकाइयों में पानी तैयार किया जा रहा है, जिसके लिये बमुश्किल 5 लाख रुपये का निवेश करना पड़ता है। यह बात सही है कि इससे जमीन के नीचे मौजूद पानी तेजी से कम होता जा रहा है, लेकिन यह भी सच है कि शहरों में प्यास बुझाने का यह बड़ा जरिया बन गया है और प्रशासन इसका कोई विकल्प नहीं दे पा रहा है।

वाटर प्युरिफायर


पानी को साफ करने का कारोबार इस अर्थव्यवस्था की दूसरी अहम कड़ी है। जमीन का पानी इतना दूषित होता जा रहा है कि छोटे-बड़े तमाम शहरों में घरों में वाटर फिल्टर होना आम बात हो गई है। ये फिल्टर कैंडल वाले बेहद मामूली फिल्टर भी हो सकते हैं और आरओ तथा अल्ट्रा वॉयलेट तकनीक (यूवी) तकनीक वाले अत्याधुनिक फिल्टर भी। इनकी कीमत भी 1,500 रुपये से 50,000 रुपये तक होती है और दफ्तरों में लगवाए जाने वाले आरओ संयंत्र लाखों रुपये कीमत के होते हैं। इस बाजार में भी असंगठित क्षेत्र तेजी से पाँव पसार रहा है, लेकिन अनुमान यही है कि यह कारोबार 5,000 करोड़ रुपये सालाना का आँकड़ा पार कर गया है। तमाम शोध फर्म यही अनुमान लगाती हैं कि 2019 तक यह बाजार 9,000 करोड़ रुपये के पार चला जाएगा।

इस बाजार में यूरेका फोर्ब्स, केंट आरओ, हिंदुस्तान यूनीलीवर, टाटा समूह, एलजी, पैनासोनिक जैसी भारतीय और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का वर्चस्व है लेकिन कुछ स्थानीय ब्रांड भी छोटे बाजारों में पैठ बना रहे हैं। इनमें से कमोबेश हरेक बड़ी कम्पनी फिल्टर के बाजार में अपना सालाना कारोबार 1,000 करोड़ रुपये तक पहुँचाने की उम्मीद कर रही है और जिस तेजी के साथ फिल्टर अपनाए जा रहे हैं, उसे देखते हुए यह बहुत बड़ी बात नहीं लगती।

हालाँकि कुछ अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएँ अक्सर आरओ तकनीक का विरोध करती रही हैं। दरअसल इस तकनीक में करीब 60 फीसदी पानी की बर्बादी होती है। इसका मतलब है कि अगर आपका आरओ फिल्टर 10 लीटर साफ पानी आपको दे रहा है तो उसने 15 से 20 लीटर पानी नाली में बहाया होगा। एक तरह से देखा जाये तो पानी की किल्लत से जूझते इलाकों में यह अभिशाप ही कहलाएगा लेकिन भारत में सबसे ज्यादा बीमारियाँ गंदे पानी की वजह से ही होती हैं। ऐसे में साफ पानी के लिये यह कमीत चुकाने से भी कोई परहेज नहीं करता।

प्रदूषित जल शोधन


गंदे पानी के शोधन यानि उसे साफ करने का कारोबार भी तेजी से बढ़ रहा है। हालाँकि आम आदमी को इसके बारे में बहुत कम पता रहता है और यह कारोबार भी सीधे उसके सम्पर्क में नहीं आता है, लेकिन वास्तव में यह जनसामान्य के लिये ही अहमियत रखता है और इसी वजह से यह पानी की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बनता जा रहा है। दरअसल धरती पर रहने वाले लोग रोजमर्रा की अपनी जरूरतें पूरी करते हुए पानी को उतना दूषित नहीं करते हैं, जितना उद्योग बेहद कम समय में कर देते हैं। विभिन्न संस्थाओं के आँकड़े बताते हैं कि देश में रोजाना 620 करोड़ लीटर गंदा पानी कारखानों से नदियों में मिल जाता है। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक कोयम्बटूर में कपड़ा इकाइयों ने नोयल नदी में इतना दूषित पानी मिलाया कि 95 गाँवों में करीब सवा लाख लोगों को साफ पानी ही मयस्सर नहीं हुआ और नारियल तथा गन्ना उगाने वाली जमीन एक तरह से बंजर हो गई। मद्रास उच्च न्यायालय ने भी 2011 में इसी वजह से तिरूपुर की कपड़ा रंगने वाली सभी इकाइयों को एक बूँद तरल पदार्थ भी नदियों में नहीं जाने देने का आदेश दिया था। ओडिशा, बिहार और कर्नाटक में खनन उद्योग ने भी आस-पास के पानी में आर्सेनिक मिला दिया है। ऐसे में पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता और अदालती सख्ती के कारण उद्योग दूषित पानी को साफ करने के संयंत्र तेजी से लगवा रहे हैं। इसी तरह मानवीय कचरे को पानी से अलग करने के लिये नगरीय प्रशासन भी ऐसे संयंत्रों को गा रहे हैं।

यह कारोबार कोई छोटा-मोटा नहीं है। अर्न्स्ट एंड यंग की एक रिपोर्ट बताती है कि छोटे शहरों में तो महज 3.7 प्रतिशत गंदा पानी साफ किया जाता है। ऐसे में घटते भूजल को देखते हुए प्रशासन और आम जनता भी गंदे पानी को साफ करने पर जोर दे रही है। नगर पालिकाओं को भी संयंत्र लगवाने में एक बार ही मोटा खर्च करना पड़ता है। इसके बाद 3-3.5 करोड़ रुपये में साल भर संयंत्र चल जाता है। यही वजह है कि लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी), वीए टेक वाबैग, त्रिवेणी इंजीनियरिंग जैसी कम्पनियाँ इस कारोबार में जमकर मुनाफा कमा रही हैं। इनमें से किसी के भी पास 1,000 करोड़ रुपये से कम के ठेके नहीं हैं और इनमें लगातार वृद्धि ही हो रही है।

जल परिवहन


जल की अर्थव्यवस्था की बात करें तो जल परिवहन छूट ही नहीं सकता। वास्तव में आवाजाही और सामान की ढुलाई का यह सबसे पुराना तरीका है और अब भी यह सबसे सस्ता तरीका है। असम और पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में तो अब भी पानी के जरिये आवाजाही या माल ढुलाई बहुत अधिक होती है। केरल जैसे राज्यों में जल परिवहन ने पर्यटन की रीढ़ का काम किया है। दरअसल इसमें बहुत अधिक पूँजी लगाने की जरूरत नहीं होती है और बाद में भी खर्च बहुत कम होते हैं। भारी सामान को दूर तक ले जाना है तो इससे अच्छा साधन कोई और हो ही नहीं सकता और इसमें दुर्घटना का डर भी बहुत कम होता है।

2011 से 2030 के बीच भारत में पानी के क्षेत्र में 13,000 करोड़ डॉलर निवेश करने होंगे। इनमें भी सबसे ज्यादा निवेश गंदे पानी को साफ करने में होगा। फिलहाल महज 60 प्रतिशत औद्योगिक जल और 26 प्रतिशत घरेलू पानी को साफ किया जाता है। हालाँकि पानी का बहाव कम होने और गाद जमा होने पर नौकाओं की रफ्तार कम हो जाती है और यह परिवहन उन्हीं स्थानों के बीच हो सकता है, जो नदियों या नहरों के जरिये जुड़ते हों लेकिन इसके कई फायदे भी हैं। सबसे पहले तो 1 किलोमीटर की सड़क बनाने या रेल लाइन बिछाने पर सरकार को 1 करोड़ से 2 करोड़ रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं, लेकिन नदियाँ प्राकृतिक रूप से बहती हैं और उनके लिये सरकार को एक पाई भी खर्च नहीं करनी पड़ती। इसके अलावा सड़कों की मरम्मत करनी पड़ती है और रेलवे लाइन भी रख-रखाव माँगती है मगर नदियों में ऐसी कोई जरूरत नहीं होती। यूँ भी देश में गंगा, यमुना, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, महानदी, कृष्णा, कावेरी, गोदावरी, ताप्ती और नर्मदा जैसी लम्बी, चौड़ी एवं गहरी नदियों का भरपूर फायदा नहीं उठाने का कोई मतलब ही नहीं होता। भारतीय आंतरिक जलमार्ग प्राधिकरण भी बताता है कि करीब 14,500 किलोमीटर लम्बा जलमार्ग परिवहन के लायक है, लेकिन उसमें से केवल 2,000 किलोमीटर का सही से इस्तेमाल हो रहा है।

यही देखकर वर्तमान सरकार देश के भीतर जल परिवहन पर खासा जोर दे रही है और गंगा में इसके लिये बड़े स्तर पर काम किया जा रहा है। संसद में इसी वर्ष मार्च में एक विधेयक पारित किया गया, जिसमें 111 नदियों को राष्ट्रीय जलमार्ग में बदलने का प्रावधान है। इस विधेयक में पश्चिम बंगाल की 15 नदियों, असम तथा महाराष्ट्र की 14-14 नदियों, कर्नाटक की 11, उत्तर प्रदेश की 12, तमिलनाडु की 9, बिहार तथा गोवा की 6-6 और गुजरात, मेघालय, ओडिशा एवं तेलंगाना की 5-5 नदियों को राष्ट्रीय जलमार्ग में बदलने का प्रावधान है। इसके अलावा यमुना को दिल्ली और हरियाणा के बीच जलमार्ग में बदलने की भी बात है।

नौवहन मंत्रालय संभाल रहे नितिन गडकरी ने संसद में बताया भी था कि भारत में जल परिवहन को बिल्कुल भुला दिया गया है और व्यापार का कुल 3.5 प्रतिशत हिस्सा इसके जरिये किया जाता है। इसके उलट चीन में व्यापारिक परिवहन में 47 प्रतिशत हिस्सेदारी नदियों की है। यूरोप में यही आँकड़ा 40 प्रतिशत, जापान और कोरिया में 44 प्रतिशत तथा बांग्लादेश में 35 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि भारत में माल ढुलाई की लागत 18 प्रतिशत तक है, जिसे पानी के जरिये बहुत कम किया जा सकता है क्योंकि देश में दिल्ली से मुम्बई सामान पहुँचाने में जितनी रकम खर्च करनी पड़ती है, उससे कम किराये में सामान समुद्र के रास्ते मुम्बई से लंदन पहुँचा दिया जाता है। उन्होंने बताया कि जो सामान सड़क के रास्ते पहुँचाने में 1.5 रुपये और रेलगाड़ी से पहुँचाने में 1 रुपये लगते हैं, वही सामान पानी के रास्ते केवल 30 पैसे में पहुँचाया जा सकता है।

पानी निगलने वाले उद्योग


पानी की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ी जगह उन उद्योगों की भी है, जिन्हें पानी निगलने वाले कहकर कोसा जाता है। लेकिन उनमें से ज्यादातर उद्योग भारी संख्या में रोजगार भी देते हैं और उनके उत्पादों के बगैर काम भी नहीं चल सकता। इसीलिये उन्हें खारिज करना भी मुमकिन नहीं है। आम तौर पर हम पानी की बर्बादी की सबसे अधिक तोहमत शीतल पेय बनाने वाली कम्पनियाँ पेप्सिको और कोका कोला आदि पर जड़ते हैं। बात कुछ हद सही भी है क्योंकि इनमें वाकई पानी की बर्बादी होती है। लेकिन आपको यह जानकर हैरत होगी कि पानी का सबसे अधिक इस्तेमाल इनमें नहीं बल्कि कोयले से बिजली बनाने में होता है। दिल्ली के सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वॉयरनमेंट (सीएसई) तथा ग्रीनपीस इंडिया ने अलग-अलग अध्ययनों में बताया है कि देश में उद्योगों में पानी की जो भी खपत होती है, उसमें 70 फीसदी हिस्सेदारी इन्हीं की होती है। सबसे ज्यादा बिजली भी ताप बिजली संयंत्रों में ही बनाई जा रही है। इसका मतलब है कि हम जो बिजली रोज इस्तेमाल करते हैं, उसे बनाने में सबसे ज्यादा पानी की जरूरत पड़ती है। सूखे से जूझ रहे सात राज्यों का अध्ययन कर जून में आई एक रिपोर्ट में बताया गया कि जितना पानी वहाँ बिजली बनाने में इस्तेमाल होता है, उससे करीब 5 करोड़ लोगों की प्यास पूरे साल बुझ सकती है। यही वजह है कि एनटीपीसी की कई इकाइयाँ पानी की कमी के कारण बंद करनी पड़ी है।

इस्पात उद्योग पर नजर डालें तो केवल 1 टन इस्पात बनाने के लिये 7,000 से 10,000 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। 1 टन कागज तो 75,000 से 1 लाख लीटर पानी लील लेता है। 1 मेगावाट प्रति घंटा बिजली बनाने के लिये भी 3,000 से 5,000 लीटर पानी की दरकार होती है। शीतल पेय बनाने वाली कम्पनियाँ हमेशा से भूजल में कमी और पानी के अंधाधुंध दोहन के लिये निशाने पर रही हैं। वहाँ जितना शीतल पेय बनाना होता है, उससे 3 से 5 गुना पानी इस्तेमाल होता है। इसका मतलब है कि 1 लीटर कोका कोला या पेप्सी आदि बनाने के लिये 3 से 5 लीटर पानी इस्तेमाल किया जाता है। कुल मिलाकर इंजीनियरिंग, कागज और लुगदी, लोहा-इस्पात, सीमेंट, चीनी और उर्वरक बहुत ज्यादा पानी पर आश्रित रहते हैं। हालाँकि यह एक अलग मुद्दा है कि सीएसई के मुताबिक भारत में कागज और लोहा-इस्पात कम्पनियाँ इसी उद्योग की विदेशी कम्पनियों के मुकाबले दोगुना पानी इस्तेमाल करती हैं।

अगर 1,000 मेगावाट का कोयले से बिजली बनाने का संयंत्र लगाया जाता है तो साल भर में वह करीब 2,800 करोड़ लीटर पानी खर्च कर देता है। हालाँकि ज्यादातर उद्योगों में पानी का इस्तेमाल गर्म हो चुकी मशीनों को ठंडा करने में ही होता है। ऐसे उद्योग अक्सर रिसाइकल किये गये पानी यानि गंदे पानी का शोधन करने के बाद तैयार पानी का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन कागज, शीतल पेय जैसे कुछ उद्योगों को एकदम ताजे और साफ पानी की ही जरूरत होती है। इन उद्योगों पर निशाना तो तमाम संगठन साधते रहे हैं, लेकिन समस्या यह है कि हमारी रोजमर्रा की जरूरतों के लिये ये सभी अनिवार्य हैं और इनके लिये पानी मुहैया कराना ही होगा।

लेखक परिचय


लेखक आर्थिक दैनिक समाचार पत्र बिजनेस स्टैंडर्ड में डिप्टी एडिटर हैं। इससे पूर्व संवाद समिति ‘यूनीवार्ता’ में काम कर चुके हैं। गुरु जांभेश्वर विश्वविद्यालय और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से सम्बद्ध मीडिया संस्थानों में अध्यापन कर चुके हैं। ईमेलः rishabhakrishna@gmail.com


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