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सड़क/राजमार्ग परियोजनाओं में जैवविविधता अध्ययन का महत्व (Importance of biodiversity study in road/highway projects)

Author: 
संजीव कुमार सिंहा, नीरज शर्मा, रजनी ध्यानी एवं अनिल सिंह
Source: 
भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान पत्रिका, 01 जून, 2012

सारांश:


भारतीय उपमहाद्वीप अपनी अनोखी भौगोलिक संरचना एवं जैविक विविधता के लिये प्रसिद्ध है। भारतीय क्षेत्रों की भौगोलिक विविधता एवं उष्णकटिबंधीय मानसूनी मौसम विभिन्न प्रकार के पौधों एवं जीवों के लिये सर्वदा अनुकूल रहा है। जैविक विविधता से परिपूर्ण विश्व के 34 हॉट स्पॉट क्षेत्रों में से 4 क्षेत्र भारत में स्थित है। विगत कुछ वर्षों में भारत में औद्योगिक विकास एवं शहरीकरण तीव्र गति से हुआ है। निर्माण सामग्रियों के परिवहन एवं शहरों को नये एवं बेहतर रास्तों द्वारा जोड़ने हेतु व्यापक रूप में सड़क/राजमार्गों का निर्माण हुआ है। इन निर्माण कार्यों के कारण पौधों एवं जंतुओं के प्राकृतिक आवास सिकुड़े एवं विखंडित हुए हैं। सड़क/राजमार्गों के विभिन्न दुष्प्रभावों, पर्यावरण संतुलन एवं विभिन्न प्रकार के अनुसंधानों में जैवविविधता का महत्व देखते हुए विश्व समुदाय के साथ भारत सरकार ने भी जैवविविधता संरक्षण हेतु पिछले कुछ वर्षों में गंभीर प्रयास किये हैं। केन्द्र सरकार ने सड़क निर्माण परियोजनाओं/गतिविधियों के पर्यावरणीय एवं जैवविविधता संबंधित दुष्प्रभावों को देखते हुए इनको पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिये 14 सितम्बर 2006 को लागू पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (ई.आई.ए.) अधिसूचना के अंतर्गत पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त करना अनिवार्य किया है। ई.आई.ए. अधिसूचना वर्गीकरण की निर्धारित शर्तों के अंतर्गत आने वाली सड़क एवं अन्य निर्माण परियोजनाओं के लिये पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट में जैवविविधता के अध्ययन को शामिल करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है। प्रस्तुत लेख में जैवविविधता संरक्षण/प्रबंधन हेतु उठाये गये विभिन्न राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय नियमों, कानूनों और संधियों के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। साथ ही भारत की विभिन्न सड़क/राजमार्ग परियोजनाओं के जैवविविधता संबंधित दुष्प्रभावों पर भी संक्षिप्त चर्चा की गई है।

Abstract


Indian subocontinent is famous for its unique geographic location and its biodiversity. India diverse geography and tropical monsoon climate has always been congenial for the growth of varieties of plants and animals. Out of world’s thirty-four mega diversity hot-spots, India is home for four hot-spots. In the past few years, India has been experiencing rapid increase in industrialization and urbanization. for the better connectivity of cities/towns and for transportation of consgtruction materials , expansion of existing roads and construction of new roads/ highways have taken place in past few years. This unabated pace of roads and highway development has led to segregation/reduction in natural habitat of flora and fauna and even eradiction of several species. Over the years, throughtout the world (including India) several steps have been taken to abate and minimize adverse impacts of these activities on fragile biological setup. Indian government has introduced several legislations for conservation and protection of biodiversity including flora and fauna. In Indian under the Environment Impact Assessment Notification (EIA) of 14 September, 2006 it is compulsory for road/highway projects to carry out EIA study and get prior environmental clearance if the project falls under the criteria as stipulated in the EIA notification. In EIA study, it is important to carry out comprehensive study of flora and fauna in and around the project site and make it an integral part of EIA report. In the present paper, an effort has been made to highlight various national and international rules/regulations/treaties which are being implemented for the conservation and management of biodiversity. The paper further discusses the various issues related to biodiversity conservation with particular reference to road/highways projects in India.

प्रस्तावना


आधुनिक युग में भारत ने एक तेजी से उभरते हुए राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बनाई है। आधुनिक विज्ञान की सहायता से भारत ने तीव्र गति से विकास किया है। भारत की बढ़ती हुई जनसंख्या एवं उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति, उसकी विकास के मार्ग की प्रमुख चुनौतियों में से एक है। इन्हीं चुनौतियों से सामना करने के लिये नये उद्योगों की स्थापना और नये शहरों का निर्माण किया जा रहा है। अत्यधिक और अनियंत्रित औद्योगिक विकास के कारण प्राकृतिक संसाधनों का तेजी से दोहन हुआ जिसका पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। वन क्षेत्रों का ह्रास, हरित क्षेत्रों का सिमटना एवं वन्य प्राणियों के विलुप्त होने का असर सीधे पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन पर पड़ता है। औद्योगिक विकास एवं शहर निर्माण हेतु व्यापक मात्रा में भूमि, जल एवं अन्य निर्माण सामग्रियों की आवश्यकता होती है जिनका विभिन्न स्थानों से खनन एवं परिवहन किया जाता है। निर्माण सामग्रियों के परिवहन हेतु सुचारु परिवहन व्यवस्था का होना अति आवश्यक है। इसके लिये नई सड़कों और राजमार्गों का निर्माण करना आवश्यक होता है। राजमार्गों के निर्माण के लिये अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता होती है जिसके कारण कई बार पेड़-पौधों को काटना एवं वनस्पतियों को हटाना/काटना भी अनिवार्य हो जाता है। इन सबका दुष्प्रभाव आज उन क्षेत्रों के प्राकृतिक असंतुलन के रूप में सामने आ रहा है। जब सड़क किसी पारिस्थितिकी तंत्र के मध्य से गुजरती है तब संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र विभिन्न प्रकार से प्रभावित होता है क्योंकि उस तंत्र के सभी जीव-जन्तु एवं पेड़ पौधे एक जटिल संबंध से एक दूसरे से जुड़े होते हैं जिसके प्रत्येक भाग का प्राकृतिक एवं पर्यावरण संतुलन में अपना एक विशेष महत्व एवं योगदान होता है। पारिस्थितिकी तंत्र का असंतुलन एवं पर्यावरणीय गुणवत्ता में ह्रास उस क्षेत्र की जैवविविधता (Biodiversity) को प्रभावित करता है।

भारत कोे बहुमूल्य प्राकृतिक संसाधन विरासत के रूप में मिला है। अतः इनका संरक्षण करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी ही नहीं बल्कि हमारी आवश्यकता है। विगत कुछ वर्षों में अन्तरराष्ट्रीय समुदाय ने जैवविविधता संरक्षण हेतु अनेक उपाय किये हैं। इसका प्रमाण है विभिन्न अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन, जिनमें जैवविविधता संरक्षण चर्चा का केन्द्र बिंदु रहा है। भारत में भी पिछले कुछ वर्षों में जैवविविधता के संरक्षण हेतु कई गंभीर प्रयास किये हैं। इन्हीं प्रयासों के तहत भारत में जैवविविधता अधिनियम (2002) लागू किया है और साथ ही साथ बहुत-सी अन्तरराष्ट्रीय संधियों को स्वीकार कर उनका हिस्सा बना है। इसके अलावा भी भारत में विभिन्न नियमों एवं कानूनों की मदद से भी जैवविविधता का संरक्षण सुनिश्चित किया जा रहा है। भारत सरकार ने पर्यावरणीय मंजूरी हेतु उन सभी परियोजनाओं के लिये पर्यावरण प्रभाव मूलयांकन (ई.आई.ए.) अनिवार्य किया है जिनके द्वारा पर्यावरण पर दुष्प्रभाव की आशंका होती है। इसके अंतर्गत विभिन्न परियोजनाओं के कारण होने वाले प्रदूषण, प्राकृतिक आवास में कमी एवं वन्य-जीवों की संख्या में ह्रास के कारण जैवविविधता पर पड़ने वाले प्रभाव का पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन के द्वारा विशेष रूप से अध्ययन/मूल्यांकन किया जाता है। सड़क परियोजनाओं के पर्यावरण पर दुष्प्रभाव को देखते हुए सड़क निर्माण के सभी क्रिया-कलापों के दुष्प्रभाव का जैवविविधता के परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन करना जरूरी है। जैवविविधता प्रभाव मूल्यांकन में स्थानीय लोगों का स्थानीय जैवविविधता के विषय में परम्परागत ज्ञान का अधिकतम उपयोग करते हुए उसका संरक्षण करना चाहिए। पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (ई.आई.ए.) का प्रमुख लक्ष्य परियोजना के कारण होने वाले दुष्प्रभाव को नगण्य करना है जिससे कि अधिक से अधिक लाभ मिल सके। परियोजनाओं से उत्पन्न होने वाले पर्यावरणीय दुष्प्रभावों को कम करना तथा पर्यावरणीय कानूनों तथा नियमों का पालन करते हुए सतत विकास सुनिश्चित करना ही पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन अध्ययन का मुख्य उद्देश्य है।

जैवविविधता का महत्व


पारिस्थितिकी तंत्र प्रकृति द्वारा पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने की एक जटिल संरचना है। और इसके प्रत्येक अंग का एक विशेष महत्व होता है। सुदृढ़ पारिस्थितिकी तंत्र के लिये जैवविविधता अति आवश्यक है। साथ ही जैवविविधता किसी भी क्षेत्र की पारिस्थितिकी तंत्र एवं पर्यावरण संतुलन की स्थिति को भी दर्शाती है। जैवविविधता में कमी उन क्षेत्रों की ह्रास होती पर्यावरणीय संतुलन की परिस्थिति को इंगित करती है। वास्तव में जैवविविधता किसी भी प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्त्वपूर्ण उत्पाद है। परम्परागत जनजातियों की अर्थव्यवस्था एवं सामाजिक व्यवस्था पूरी तरह इनके प्राकृतिक उत्पादों पर ही निर्भर होती हैं। जैवविविधता प्राधिकरण (नेशनल बायोडायवर्सिटी अथॉरिटी 2010) के अनुमान के अनुसार, भारत में जैवविविधता से संबंधित निर्यात की बहुत संभावना है। साथ ही साथ, जैवप्रौद्योगिकी (बायोटेक्नोलॉजी) के विकास में जैवविविधता का महत्त्वपूर्ण स्थान है। आनुवंशिक अभियान्त्रिकी (जेनेटिक-इंजीनियरिंग) वर्तमान समय में एक उद्योग का दर्जा हासिल कर चुकी है। आनुवांशिक अभियान्त्रिकी में विभिन्न प्रकार के उपयोगी जीन का पौधों एवं जानवरों की गुणवत्ता सुधारने में इस्तेमाल होता है। अनुसंधान में उपयोगी जीन प्राप्त करने के लिये विभिन्न जंगली प्रजातियों (वाइल्ड स्पीशीज), जिनमें प्रतिरोधक क्षमता अधिक रहती है, का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह जैवविविधता एक प्राकृतिक जीन बैंक (Gene bank) का कार्य करती है। विभिन्न प्रकार के आनुवंशिक परिवर्तित (जेनेटिकली मोडीफाइड) पौधे इसी का उदाहरण हैं। भारत प्राचीन काल से ही चावल गेहूँ एवं अन्य फसलों की विविधता में अग्रणी रहा है। इन्हीं फसलों की विभिन्न प्रजातियों को आनुवंशिक अभियान्त्रिकी द्वारा गुणवत्ता में सुधार कर भारत में हरित क्रांति को सफल बनाया गया है।

जैवविविधता किसी क्षेत्र विशेष के प्राकृतिक सौंदर्य को भी दर्शाता है। जैवविविधता वाले क्षेत्र, प्राकृत प्रेमी एवं प्राकृतविदों का पसंदीदा भ्रमण एवं अनुसंधान क्षेत्र होने के कारण हमेशा से ही सैलानियों को आकर्षित करते रहे हैं। वर्षा वन क्षेत्र (rain forest) एवं द्वीप अपने अनोखे जैवविविधता के कारण भ्रमण एवं विभिन्न प्रकार के अनुसंधानों हेतु हमेशा से ही आकर्षण का केंद्र रहे हैं। इस तरह की जैवविविधता एवं पर्यावरण युक्त क्षेत्र संबंधित देशों की अर्थव्यवस्था में इको-टूरिज्म (Eco-tourism) द्वारा महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। इसी संदर्भ में राष्ट्रीय पार्क एवं वन्यजीव अभयारण्य सिर्फ वन्यजीवों का संरक्षण ही नहीं करते अपितु सैलानियों को हमेशा से ही आकर्षित करते हैं एवं वहाँ पर रहने वाले लोगों के जीविका के स्रोत भी होते हैं।

भारत में जैवविविधता की स्थिति


भारत की समृद्ध प्राकृतिक जैवविविधता उसकी एक अमूल्य विरासत है। भारत संसार की 17 वृहद जैवविविधता (मेगा बायोडाइवर्सिटी) वाले देशों में शामिल है। राष्ट्रीय जैव प्राधिकरण (National Biodiversity Authority) द्वारा भारतीय जैविविविधता सम्मेलन की रिपोर्ट के अनुसार, विभिन्न प्रजातियों की जैवविविधता सम्मेलन की रिपोर्ट के अनुसार, विभिन्न प्रजातियों की जैवविविधता में भारत प्रथम दस स्थानों में आता है (सारणी 1) भारत में पौधों की 45,968 जंतुओं की 91,364 एवं सूक्ष्मजीवों की लगभग 2,78,900 प्रजातियाँ पायी जाती हैं। (रा.जै.प्रा. रिपोर्ट, 2009-10)। इस प्रकार भारत के पास लगभग संसार की पौधों एवं जंतुओं की दर्ज कुल प्रजातियों 7-8 प्रतिशत भाग उपलब्ध है। भारत की विस्तृत भौगोलिक विविधता इसकी प्राकृतिक जैवविविधता को बनाये रखने एवं उसे संरक्षण देने में सहायता करती है।

 

सारणी 1- विभिन्न प्रजातियों की जैवविविधता में भारत की तुलनात्मक स्थिति

समूह

वृहद जैव विविधता वाले देशों के मध्य स्थान

उच्च पौधे (Higher Plant)

नौवां

स्तनपायी (Mammalian)

सातवां

पक्षी (Bird)

नौवां

सरीसृप (Reptilian)

पाँचवा

उभयचर (Amphibian)

नौवां

मछली (Fishes)

प्रथम

 

विश्व में जैवविविधता संरक्षण के लिये प्राकृतविद एवं प्रख्यात वैज्ञानिक नार्मन मायर ने ह्रास होती जैवविविधता से परिपूर्ण क्षेत्रों की पहचान की ताकि इनका अच्छी तरह से संरक्षण किया जा सके। इन क्षेत्रों को हॉट स्पॉट (Hot-Spot) कहा गया। हॉट स्पॉट वे क्षेत्र होते हैं जहाँ वास्कुलर (Vascular) पौधों की कम से कम 1500 स्थानिक (ईंडेमिक) प्रजातियाँ पायी जाती हों परन्तु उनके मूल आवास (Original habitat) का 70 प्रतिशत भाग नष्ट हो चुका है अभी तक विश्व में कुल 34 हॉट स्पॉट क्षेत्रों की पहचान की गई है जिनका विस्तार कुल भू-भाग के लगभग 15.70 प्रतिशत क्षेत्र में है।

वर्तमान स्थिति और भी चिंताजनक है क्योंकि सभी 34 हॉट स्पॉट क्षेत्रों के 86 प्रतिशत भाग पहले ही नष्ट हो चुके हैं। इस प्रकार वर्तमान में 34 हॉट स्पॉट का विस्तार कुल भू-भाग पर सिर्फ 2.3 प्रतिशत तक ही सीमित रह गया है। भारत में जैवविविधता से संबंधित चार हॉट स्पॉट के क्षेत्रों की पहचान की गई है जिनमें कि हिमालय क्षेत्र, इंडो-बर्मा क्षेत्र वेस्टर्न घाट क्षेत्र एवं सुंडालैंड क्षेत्र (निकोबार द्वीपसमूह) शामिल हैं (चित्र 1)

Fig-1 एशिया महाद्वीप के इन क्षेत्रों में पौधों की लगभग 54416 प्रजातियाँ पायी जाती हैं जिनमें से 28209 प्रजातियाँ स्थानिक (Endemic species) (सारणी 2)। स्तनपायी की कुल 1253 प्रजातियाँ पायी जाती हैं जिनमें से 275 प्रजातियाँ स्थानिक हैं।

सरीसृप (रेप्टाइल) एवं उभयचर (एम्फीबियन) की कुल 2230 प्रजातियाँ पायी जाती हैं जिनमें से 1191 प्रजातियाँ स्थानिक हैं। इसी प्रकार ताजे पानी की मछलियों की 2672 प्रजातियाँ पायी जाती हैं जिनमें से 1075 प्रजातियाँ स्थानिक हैं। भारत के जलक्षेत्र में 13 हजार लुप्तप्राय प्रजातियों की गणना की गई है।

जैवविविधता संरक्षण (Biodiversity Conservation)


भारतीय समाज एवं संस्कृति में प्रकृति को हमेशा से ही एक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति में पौधों एवं जानवरों को पूज्यनीय माना गया है एवं इनके संरक्षण को हमेशा से ही सर्वोच्च महत्ता दी गई है। वास्तव में कई जन-जातियों एवं आदिवासी समाज का ताना-बाना पूर्ण रूप से प्रकृति एवं इन जीव जंतुओं पर ही निर्भर रहता है। आज भी बहुत से वन स्थल एवं जीव-जन्तु धार्मिक आस्था के कारण ही संरक्षित है। जैवविविधता की महत्ता एवं विभिन्न मानवजनित कार्यों के इन पर दुष्प्रभाव को देखते हुए जैवविविधता संरक्षण आज का एक ज्वंलत एवं गंभीर मुददा है। जैवविविधता संरक्षण हेतु अन्तरराष्ट्रीय समुदाय हमेशा से ही गम्भीर एवं प्रयासरत रहा है। जैवविविधता से संबंधित विभिन्न प्रमुख अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन (कन्वेंशन) अन्तरराष्ट्रीय समुदाय के इन्हीं प्रयासों का परिणाम हैं। इन अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों ने सम्पूर्ण विश्व जगत को जैवविविधता संरक्षण के साथ सतत विकास हेतु प्रेरित किया है (सारणी 3)। रियो डी जेनेरियों (ब्राजील) में जैवविविधता से संबंधित संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (Convention on Biological Diversity or CBD) पर भारत ने 5 जून 1992 को हस्ताक्षर किये एवं इसका एक पक्षकार (पार्टी) बना। संयुक्त राष्ट्र का यह सम्मेलन मुख्यतः पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन (UNCED) के एजेंडा -21 के तहत निर्धारित किए गए सतत विकास के लक्ष्य की प्राप्ति के लिये एक व्यवहारिक कदम था।

 

सारणी 2- घोषित हॉट स्पॉट क्षेत्रों का विवरण जिनमें भारतीय क्षेत्र सम्मिलित हैं

 

हिमालय क्षेत्र

इंडो-बर्मा क्षेत्र

वेस्टर्न घाट क्षेत्र

सुंडालैंड क्षेत्र (निकोबार द्वीप समूह)

मूल क्षेत्र (किमी2.)

741,706

 

2,373,057

189,611

शेष हरित क्षेत्र (किमी2.)

 

185,427

 

118,653

स्थानिक पौधों की प्रजातियाँ

3,160

7,000

3,049

15,000

स्थानिक पक्षियों की संकटग्रस्त प्रजातियाँ

8

18

10

43

स्थानिक स्तनपायीयों की संकटग्रस्त प्रजातियाँ

4

25

14

60

स्थानिक उभयचरों की संकटग्रस्त प्रजातियाँ

4

35

87

59

विलुप्त प्रजाति

0

1

20

4

जनसंख्या घनत्व (व्यक्ति/किमी.)

123

134

261

153

संरक्षित क्षेत्र (किमी.2)

112,578

235,758

26,130

179,723

संरक्षित क्षेत्र वर्ग I-IV* (किमी.2)

77,739

132,283

21,259

77,408

 

सम्मेलन में इस तथ्य को उल्लेखित किया गया कि जैविविविधता सिर्फ पौधों, जानवरों एवं सूक्ष्म जीवों तक ही सीमित नहीं है अपितु वहाँ के नागरिक एवं उनके भोजन, सुरक्षा, दवाईयाँ, शुद्ध वायु एवं जल तथा शुद्ध एवं स्वस्थ पर्यावरण की आवश्यकता की भी पूर्ति करती है।

इन सम्मेलनों का प्रमुख उद्देश्य संबंंधित राष्ट्रों के अपने संसाधनों पर संप्रभु अधिकार की पुष्टि करना है। सम्मेलन का एक जिम्मेदार एवं महत्त्वपूर्ण भागीदार राष्ट्र होने के कारण भारत ने जैवविविधता संरक्षण के लिये जैवविविधता जैवविविधता अधिनियम (2002) और जैवविविधता नियम (2004) को लागू कर अपना उत्तरदायित्व निभाया है। इस तरह भारत जैवविविधता संरक्षण संबंधी नियम एवं कानून बनाने वाले चुनिन्दा राष्ट्र मंे से एक है। भारत ने जैवविविधता संरक्षण संबंधी नियम एवं कानून बनाने वाले चुनिन्दा राष्ट्रों में से एक है। भारत ने जैवविविधता अधिनियम (2002) के अंतर्गत चेन्नई में जैवविविधता प्राधिकरण को जैवविविधता अधिनियम एवं जैवविविधता नियम के प्रावधानों एवं नियमों को क्रियान्वयन/लागू करने का कार्य सौंपा गया। जैवविविधता की समग्र वृद्धि (Holistic growth) हेतु जैवविविधता नियम में यह सुनिश्चित किया गया है कि पारंपरिक जैवविविधता की बुद्धिमत्ता पूर्ण हस्तान्तरण (Intellectual transfer) की व्यवस्था की जाए। जैवविविधता से संबंधित परम्परागत ज्ञान पर नियंत्रण रखते हुए उनके प्रयोग से होने वाले लाभ को संबंधित लोगों के मध्य समान रूप से वितरित करने की व्यवस्था की गई है। इसी के तहत भारत सरकार ने कई महत्त्वपूर्ण फसलों एवं पौधों की प्रजातियों को संरक्षित करने के लिये दिल्ली में एक नेशनल जीन बैंक की भी स्थापना की है।

जैवविविधता से संबंधित संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के भागीदार देशों के मध्य पार्टी के सम्मेलन (Convention of Parties) का आयोजन किया जाता है। जिनमें जैवविविधता संरक्षण से संबंधित मुद्दों पर चर्चा की जाती है। पार्टी के सम्मेलन (Convention of Parties) की पहली बैठक 28 नवम्बर से 9 दिसम्बर 1994 को बहामास में संपन्न हुई थी। तब से अब तक उसकी कुल 11 बैठकें संपन्न हो चुकी हैं। जापान के आयेची (Aichi) प्रान्त के नागोया (Nagoyaa) में 18-29 अक्तूबर 2010 को संपन्न हुए पक्षकारों के सम्मेलन (Conference of Parties or COP) की दसवीं बैठक में जैवविविधता के लिये एक नई एवं संशोधित सामरिक (स्ट्रैटीजिक) योजना को अपनाने का निर्णय लिया गया। इसी के तहत वर्ष 2010 में अन्तरराष्ट्रीय जैवविविधता वर्ष एवं 2011-2020 को जैवविविधता दशक के रूप में घोषित किया गया है। साथ ही इस बैठक में 2011-2012 की अवधि के लिये आयेची जैवविविधता लक्ष्य (Aichi Bio-diversity target) को भी सम्मिलित किया गया है।

आयेनी जैवविविधता लक्ष्य के अनुसार, सभी प्राकृतिक निवास जिसमें जंगल भी शामिल हैं, की ह्रास की दर को जहाँ तक संभव हो न्यूनतम किया जाए या ह्रास की दर को कम से कम आधा किया जाय। स्थलीय एवं अंतर्देशीय जल क्षेत्र के 17 प्रतिशत और समुद्री एवं तटीय क्षेत्र के 10 प्रतिशत भाग के संरक्षण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। साथ ही साथ संरक्षण एवं पुनर्स्थापना की सहायता से अवक्रमित (डीग्रेडेड) क्षेत्र के कम से कम 15 प्रतिशत भाग की पुनर्स्थापना का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। प्रवाल भित्तियों (Coral reef) पर से दबाव को न्यूनतम करने हेतु विशेष प्रयास करने की प्रतिबद्धता (Commitment) भी इसमें जताई गई है।

11वीं पार्टी का सम्मेलन (COP) हैदराबाद (भारत) में अक्तूबर, 2012 को संपन्न हुआ जिसमें निर्माण एवं विकास की अन्य परियोजनाओं (Other developmental project) के ई.आई.ए. में जैवविविधता के नए पैमाने को समाहित करने का निर्णय लिया गया। साथ ही वैश्विक समुदाय ने जैवविविधता ह्रास को रोकने के लिये वित्तीय सहायता पर भी चर्चा की। आयेची जैवविविधता लक्ष्य की समीक्षा की गई एवं इसके प्राप्ति के प्रति प्रतिबद्धता पुनः दुहराई गई।

 

सारणी 3 -  जैवविविधता संरक्षण हेतु प्रमुख अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलन एवं उनका उद्देश्य

सम्मेलन

तिथि

उद्देश्य/विषय

रामसर सम्मेलन  

फरवरी 2, 1971

वर्ष 1971 में संपन्न हुये अन्तरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्र भूमि पर सम्मेलन को रामसर सम्मेलन कहते हैं। यह एक अन्तरशासकीय (Intergovernmental) संधि है। रामसर सम्मेलन का उद्देश्य आर्द्र भूमि एवं इसके संसाधनों (रिर्सोसेर्ज) का स्थानीय एवं राष्ट्रीय कार्य योजनाओं और अन्तररष्ट्रीय सहभागिता के द्वारा संरक्षण और बुद्धिमता पूर्ण उपयोग करते हुये सतत विकास हेतु एक ढाँचा उपलब्ध कराना है।

 

विश्व विरासत सम्मेलन

नवम्बर 16, 1972

वर्ष 1972 में यूनेस्कों की आम सम्मेलन में विश्व की प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विरासत को सहेजने/संरक्षण पर एक अन्तरराष्ट्रीय संधि को स्वीकृति प्रदान की गई है। यह सम्मेलन इस तथ्य पर आधारित है कि पृथ्वी के कुछ स्थान उत्कृष्ट सार्वभौमिक महत्व के हैं एवं मानवजाति की साझी विरासत का हिस्सा है। अतः इनका संरक्षण देश की सीमाओं के परे अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर किया जाना चाहिए।

 

वन्य जीव एवं पौधों की संकटग्रस्त प्रजातियों के अन्तरराष्ट्रीय व्यापार पर सम्मेलन

जुलाई 1, 1975

वन्य जीव और वनस्पति की लुप्तप्राय प्रजातियों के अन्तरराष्ट्रीय व्यापार पर सम्मेलन एक संधि/सहमति है जो विश्व की विभिन्न सरकारों के मध्य वन्य जीवों और वनस्पतियों के अन्तरराष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित करने हेतु की गई है। इस संधि में यह सुनिश्चित किया गया है कि जीवों के अन्तरराष्ट्रिय व्यापार को नियंत्रित करने हेतु की गई है। इस संधि में यह सुनिश्चित किया गया है कि जीवों के व्यापार को सीमित या पूर्ण रूप से प्रतिबंधित किया जा सकता है।

प्रवासी पक्षी पर सम्मेलन

जून 23, 1979

प्रवासी पक्षी पर सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र संघ आधारित एक वैश्विक मंच तैयार करना था जिसके द्वारा प्रवासी जीवों की विभिन्न प्रजातियों का समुचित तरीके से संरक्षण एवं प्रबंधन सुनिश्चित किया जा सके। इस सम्मेलन पर जर्मनी के बोन शहर में हस्ताक्षर किये गये थे इसलिये इसे बोन कन्वेशन भी कहते हैं।

जैविक विविधता पर सम्मेलन

दिसम्बर 29,1993

इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य जैविक विविधता का संरक्षण करना एवं इसके अवयव का सतत तरीके से उपयोग करना है। विभिन्न आनुवंशिक स्रोतों से उत्पन्न लाभों का समान एवं न्यायपूर्ण तरीके से साझा करना है। साथ ही  संबंधित तकनीकियों का उचित तरीके से हस्तानान्तरण करना भी शामिल है।

खाद्य और कृषि के लिये पादप आनुवंशिक संसाधन पर अन्तरराष्ट्रीय संधि

नवम्बर 3, 2001

इस संधि का मुख्य उद्देश्य विश्व के किसानों का फसलों की विविधता के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान की पहचान करना एवं किसानों, पौधों के प्रजनकों और वैज्ञानिकों को पौधों के आनुवंशिक सामग्री के उपयोग के लिये एक वैश्विक प्रणाली की स्थापना करना है। इस संधि में इस बात का आश्वासन दिया गया है कि आनुवंशिक सामग्री के उपयोग से प्राप्त हुये लाभ को उस देश के साथ साझा किया जाये जहाँ से वह आनुवंशिक सामग्री मूल रूप से प्राप्त की गई है।

 

जैवविविधता संरक्षण हेतु भारत सरकार द्वारा किये गये महत्त्वपूर्ण उपाय


भारत ने जैवविविधता संरक्षण के लिये जैवविविधता अधिनियम (2002) और नियम (2004) लागू करने के अतिरिक्त आयेची जैवविविधता लक्ष्य (2011-12) को प्राप्त करने के लिये अपने लगभग 4.8 प्रतिशत भौगोलिक हिस्से को सुरक्षित क्षेत्र में रखा है तथा इन क्षेत्रों को वन जीवन (संरक्षण) अधिनियम (1972) के तहत संरक्षण एवं कानूनी मान्यता प्रदान की है। इस समय भारत में लगभग 102 नेशनल पार्क एवं 515 वाइल्डलाइफ सेंचुरी एवं अन्य वन्य जीव संरक्षित क्षेत्र शामिल हैं। भारत के संरक्षण प्रयासों के फलस्वरूप देश भर में वयस्क बाघों की संख्या वर्ष 2006 में 1411 थी जोकि वर्ष 2011 में बढ़कर 1706 हो गई। इन्हीं संरक्षण प्रयासों के तहत शेर जैसी पूछ वाले बंदरों की संख्या में संतोषजनक वृद्धि दर्ज होने पर आईयूसीएन (IUCN) ने इन्हें लुप्तप्राय जानवरों की सूची से हटा दिया है। दूसरी तरफ तटीय क्षेत्रों में पौधों एवं जीव-जंतुओं की सिर्फ एक प्रतिशत प्रजातियों का ही संरक्षण किया जा सका है। जैविक विविधता पर सम्मेलन (Convention on Biological Diversity or CBD) को किए गए वादे के अनुसार यह लक्ष्य 10 फीसदी होना चाहिये था।

जैवविविधता संरक्षण में उपयोगी कुछ प्रमुख नियम एवं कानून


जैवविविधता अधिनियम (2002) के लागू होने से पहले जैवविविधता के संरक्षण का कार्य वन संरक्षण अधिनियम (1980), वन्य जीव (सुरक्षा) अधिनियम तथा प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्व स्थान और अवशेष अधिनियम (1958) के प्रावधानों के अंतर्गत किया जाता था। वन्य जीव (सुरक्षा) अधिनियम (1972) वन्य जीवों के सुरक्षा के कवच का कार्य करती है। वन्य जीव (सुरक्षा) अधिनियम (1972) के प्रावधानों के अंतर्गत राष्ट्रीय वन्य जीव बोर्ड ने वन्यजीवों को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर इनके आवास स्थलों को संरक्षित किया है। इसी प्रावधान के अंतर्गत महत्त्वपूर्ण एवं विलुप्त होते जीव जंतुओं की प्रजातियों जैसे घड़ियाल, बाघ, हाथी और एक सृगी गैंडा इत्यादि को संरक्षित प्रजाति का दर्जा दिया गया है। एवं इनके आवासों को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है। भारत ने जैवविविधता संरक्षण से संबंधित विभिन्न नियम एवं कानून बनाये हैं (सारणी 4)।

 

सारणी 4- भारत के जैवविविधता संरक्षण में उपयोगी प्रमुख नियम एवं कानून एवं उनके प्रमुख उद्देश्य/उपयोगिताएँ

क्रमांक

नियम/कानून

उद्देश्य/उपयोगिताएँ

1.

भारतीय वन अधिनियम (1927)

इस अधिनियम का उपयोग जंगल से संबंधित समेकित कानून बनाने में  किया जाता है लकड़ी एवं अन्य वन से प्राप्त उत्पादों पर कर एवं शुल्क निर्धारण और इन उत्पादों का परिवहन भी इसी के तत्वाधान में किया जाता हैं।

 

2.

वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम (1972), संशोधन (2003)

वन्य जीवों के संरक्षण एवं इनके अवैध शिकार को रोकने के प्रावधान इस  अधिनियम में किये गए हैं। इस अधिनियम के तहत वन्य जीवों एवं वन्य जीवों के किसी भी अंग का व्यापार प्रतिबंधित है। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण संरक्षित क्षेत्रों एवं महत्त्वपूर्ण वनस्पतियों और जीवों को सुरक्षा प्रदान करना है।

3

वन (संरक्षण) अधिनियम (1980), संशोधन (1988) एवं (2003)

भारतवर्ष के वनों का संरक्षण इसी अधिनियम के तहत किया जाता है। वनों को  नुकसान पहुँचाने वाले कार्यों को प्रतिबंधित एवं नियंत्रित किया जाता है। वन क्षेत्रों का उपयोग गैर-वन (Non-Forest) कार्य के लिये वन संरक्षण अधिनियम के तहत केन्द्र सरकार की अनुमति प्राप्त करना होता है। इससे संबंधित प्रक्रिया इसमें वर्णित की गई हैं।

4

पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम (1986), संशोधन (1991)

पर्यावरण संतुलन को बनाये रखने के साथ पर्यावरण संरक्षण/पर्यावरण गुणवत्ता एवं पर्यावरण प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिये इस अधिनियम के तहत ही पर्यावरण एवं वन मंत्रालय औद्योगिक इकाइयों के कार्य को आवश्यकतानुसार किसी क्षेत्र में सीमित या प्रतिबंधित करता है, भाग-3(2)(V)

4.1

पर्यावरण (संरक्षण) नियम (1986)

केंद्र सरकार औद्योगिक इकाइयों के कार्य या कार्य क्षेत्र को जैविक विविधता दुष्प्रभावित होने की स्थिति में (उपबंध-V) क्षेत्र में विभिन्न प्रदूषणकारी तत्वों की मात्रा स्वीकार्य सीमा से अधिकतम होने की स्थिति में (उपबंध-II), पर्यावरण के अनुकूल भूमि उपयोग होने पर (उपबंध-VI) एवं संरक्षित क्षेत्र से निकटता (उपबंध-VIII) के आधार पर पर्यावरण (संरक्षण) नियम (1986) के तहत सीमित या प्रतिबंधित करता है, भाग-5 (I) ।

5

जैवविविधता अधिनियम (2002) एवं जैवविविधता नियम (2004)

जैवविविधता पर सम्मेलन द्वारा संबंधित राष्ट्रों के अपने संसाधनों पर संप्रभु अधिकार की मान्यता देती है। इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति हेतु भारत सरकार ने जैवविविधता अधिनियम (2002) एवं नियम (2004) को लागू किया है। इस अधिनियम के तहत जैवविविधता एवं इससे संबंधित ज्ञान का संरक्षण किया जाता है साथ ही सतत तरीके से इनके उपयोग को भी सुनिश्चित किया जाता है। जैवविविधता अधिनियम के अंतर्गत चेन्नई में राष्ट्रीय जैवविविधता प्राधिकरण की स्थापना की गई है।

6

अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वनवासी (वन्य अधिकारों की मान्यता) अधिनियम (2006)

यह अधिनियम अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वनवासियों को उनके वन संबंधित अधिकारों को मान्यता देने का कार्य करता है।

 

 

जैवविविधता अधिनियम (2002) राष्ट्रीय महत्व के संरक्षित पौधों एवं जीव-जंतुओं के संरक्षण के लिये एक वृहद एवं प्रभावशाली कानून के रूप में सामने आया है। जैवविविधता अधिनियम के तहत केन्द्र सरकार को जैवविविधता से परिपूर्ण क्षेत्रों की पहचान करना एवं मॉनीटर करने का कार्य निर्धारित किया गया है ताकि जैवविविधता का संरक्षण एवं संवर्धन किया जा सके एवं जरूरत पड़ने पर इसका सतत उपयोग भी किया जा सके।

जैवविविधता पर प्रतिकूल प्रभाव की संभावना वाली परियोजनाओं के प्रभाव निराकरण के लिये उपाय करने एवं नीति निर्धारण में जनता की भागीदारी को सुनिश्चित कराना साथ ही जैवविविधता से परिपूर्ण क्षेत्र में उनके दोहन एवं दुरुपयोग होने कि स्थिति में राज्य सरकारों को तत्काल सुधारक उपाय करने हेतु सहायता या निर्देश देने का कार्य केंद्र सरकार करती है। जैवविविधता के महत्व वाले क्षेत्र को विरासतीय क्षेत्र (Heritage site) करने का कार्य राज्य सरकार का है जिसे वह स्थानीय निकाय एवं आवश्यकता पड़ने पर केंद्र सरकार से विमर्श कर निर्धारित करता है। राज्य सरकार विलुप्त एवं विलुप्तिकरण के संभावित खतरे से प्रभावित जातियों एवं प्रजातियों के संरक्षण और पुनर्स्थापना हेतु केंद्र सरकार से विमर्श कर आवश्यक उपाय करती है। जैवविविधता से संबंधित गतिविधियों एवं जैविक संसाधनों के प्रयोग में सभी घटकों की संयुक्त सहभागिता एवं संपोषण के बारे में भारत सरकार को सलाह देना राष्ट्रीय जैवविविधता प्राधिकरण का प्रमुख कार्य है।

 

सारणी 5- पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की प्रतिबंधित/नियंत्रित/मान्य गतिविधियाँ

क्र.सं.

कार्य

प्रतिबंधित

नियंत्रित

मान्य

विशेष

1.

औद्योगिक खनन

हाँ

-

-

घरों की मरम्मत एवं निर्माण तथा घर के लिये ईंट बनाने में मिट्टी की खुदाई की अनुमति प्रदान की गई है

2.

प्रदूषण करने वाले उद्योगों की स्थापना

हाँ

-

-

-

3.

होटल एवं रिसार्ट्स की स्थापना

-

हाँ

-

-

4.

वृहद पनबिजलीघर की स्थापना

हाँ

-

-

-

5.

विदेशी प्रजातियों का आगमन

-

हाँ

-

-

6.

जलाऊ लकड़ी का व्यापारिक उपयोग

हाँ

-

-

होटल एवं अन्य औद्योगिक स्थापना में इनके उपयोग होने की स्थितियों में

7.

सड़क का चौड़ीकरण

-

हाँ

 

कार्य के पहले पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (ई.आई.ए.) और बचाव के उपाय को लागू करना आवश्यक है।

8.

पेड़ों का काटना

-

हाँ

 

संबंधित विभागों से अनुमति प्राप्त करनी होगी  

9.

कृषि तंत्र में बड़ा परिवर्तन

-

हाँ

-

-

10.

प्राकृतिक जल संसाधन एवं भूगर्भ जल का व्यापारिक उपयोग

-

हाँ

-

वन्य जीवों की गतिविधियों को नियंत्रण मुक्त एवं वहाँ के निवासियों का ध्यान रखते हुये प्राकृतिक जल एवं भूगर्भ जल संसाधन के उपयोग की अनुमति है।

11.

स्थानीय समुदाय द्वारा की जा रही कृषि एवं बागवनी

-

-

हाँ

परन्तु कार्य का विस्तार अधिक होने इन परियोजनाओं को मास्टर प्लान के तहत नियंत्रित किया जाता है।

12.

वर्षा जल संचयन

-

-

हाँ

अनुमोदित/सर्वमान्य

13.

बिजली के तार बिछाना

-

हाँ

-

अंतरस्थलीय बिजली के तार बिछाने की प्रक्रिया अनुमोदित

14.

रात्रि में वाहनों की गतिविधियाँ

-

हाँ

-

वाणिज्यिक उपयोग हेतु

15.

हानिकारक पदार्थों का उपयोग एवं उत्पादन

हाँ

-

-

-

16.

पहाड़ी ढलानों एवं नदी तटों का संरक्षण

-

हाँ

-

मास्टर प्लान के तहत नियंत्रित किया जाता है

17.

वायु एवं वाहनों द्वारा प्रदूषण

-

हाँ

-

-

18.

विदेशी/बाहरी प्रजातियों का आगमन

-

हाँ

-

-

 

इको-सेंसिटिव जोन (Eco-sensitive Zone)


वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (National Wildlife Board) वन्यजीव एवं जंगल के संरक्षण के लिये सभी आवश्यक उपाय करता है। 21 जनवरी 2002 को राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड ने अपनी 21वीं बैठक में राष्ट्रीय पार्क एवं सेचुरी की सीमा के 10 किमी. की परिधि क्षेत्र को इको-सेंसिटिव क्षेत्र घोषित करने का निर्णय लिया था। राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड के अनुसार इको-सेंसिटिव जोन विभिन्न पारिस्थितिकी क्षेत्रों के मध्य पारिस्थितिकी गलियारे (corridor) का कार्य करते हैं और जैवविविधता से परिपूर्ण क्षेत्रों के विखंडन/अलगाव को रोकते हैं। राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड के प्रतिनिधि के तौर पर प्रमुख वन्यजीव संरक्षक (Chief Wildlife Warden) इको-सेंसिटिव जोन एवं पर्यावरणीय स्थिति को देखते हुए इन क्षेत्रों में निर्माण कार्य/गतिविधियों को प्रतिबंधित, सुरक्षात्मक उपाय के साथ नियंत्रित या अनुमति प्रदान करते हैं (सारणी 5)। इको-सेंसिटिव जोन संरक्षित क्षेत्र के लिये संक्रमण क्षेत्र (Transition zone) या शॉक आब्जर्वर का कार्य करते है जहाँ पर विभिन्न प्रकार की विकास योजनाओं पर नियंत्रण रखा जाता है जिससे कि उनके द्वारा होने वाले दुष्प्रभावों से संरक्षित क्षेत्रों को बचाया जा सके। विभिन्न परियोजनाओं को प्रतिबंधित, नियंत्रित या कोई भी प्रतिबंध नहीं की सूचियों में बाँटा गया है। जिन गतिविधियों को नियंत्रित वर्ग में रखा गया है उन्हें अनुमति प्राप्त करने के लिये पहले पर्यावरणीय मंजूरी या राष्ट्रीय वन्य-जीव बोर्ड की स्टैंडिंग कमेटी से या आवश्यकता होने पर दोनों से मंजूरी प्राप्त करना अनिवार्य होता है। गतिविधियाँ जिन्हें प्रतिबंधित या नियंत्रित श्रेणी में नहीं रखा गया है उन्हें किसी भी प्रकार की मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती है।

बफर जोन (Buffer zone)


विभिन्न राज्य सरकारों, संगठनों एवं अन्य संस्थानों द्वारा राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड

 

सारणी 6- प्रस्तावित बफर जोन के लिये सुझाए गए मापदण्ड

 

श्रेणियाँ

क्षेत्रफल (किमी)2

प्रतिबंधित क्षेत्रों की संख्या

कुल क्षेत्रफल (किमी)2

कुल संरक्षित क्षेत्र का प्रतिशत भाग

प्रस्तावित बफर जोन की दूरी (किमी)

D

500 एवं अधिक

73

101389

63.4%

2

B

200-500

115

38942

24.37%

1

C

100-200

85

12066

7.55%

0.5

A

100 या कम

344

7422

4.65%

0.1

(केन्द्रीय उच्चाधिकार प्राप्त समिति CEC) 2012

 

 

सारणी 7- बफर जोन के अंतर्गत विभिन्न प्रतिबंधित/नियंत्रित गतिविधियाँ [(CEC), 2012]

क्र.सं.

कार्य/गतिविधियाँ

प्रतिबंधित

नियंत्रित

1.

खनन पट्टा नवीकरण/अनुदान

हाँ

-

2.

पत्थर कंकड़ एवं नदी से बालू का उत्खनन

-

हाँ

3.

हानिकारक उद्योग

हाँ

-

4.

ईंट भट्टा

हाँ

-

5.

लकड़ी आधारित उद्योग (एम.डी.फ./पार्टिकल बोर्ड को छोड़कर)

हाँ

 

6.

होटल एवं रेस्टोरेंट (रिसोर्ट)

-

हाँ

7.

सड़क निर्माण (5 मीटर से ज्यादा चौड़ाई)

-

हाँ

8.

औद्योगिक हेलीकॉप्टर सेवा

-

हाँ

9.

पनबिजलीघर परियोजना

-

हाँ

10.

सिंचाई परियोजना, नहर परियोजना

-

हाँ

11.

ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन लाइन (>33kv)

-

हाँ

 

पार्क एवं सेंचुरी की सीमा के 10 किमी. के परिधि क्षेत्र को राष्ट्रीय वन जीव बोर्ड द्वारा इको-सेंसिटिव क्षेत्र घोषित करने के निर्णय पर आपतियों/सुझाव के कारण सर्वोच्च न्यायालय के तत्वाधान में केन्द्रीय उच्चाधिकार संपन्न समिति (Central Empowered commitee) ने इको-सेंसिटिव क्षेत्रों के लिये बफर जोन बनाने का सुझाव दिया है। केन्द्रीय उच्चाधिकार संपन्न समिति (CEC) ने भारत के 102 नेशनल पार्क एवं 515 वाइल्डलाइफ सेंचुरी के लिये, क्षेत्रफल के अनुसार वर्गीकृत कर बफर जोन के निर्धारण के लिये मापंदड बनाया है (सारणी 6)। प्रस्तावित बफर जोन में कुछ गतिविधियों प्रतिबंधित हैं एवं कुछ को नियंत्रण के साथ अनुमति प्रदान करने का प्रावधान किया गया है (सारणी 7)।

सड़क निर्माण परियोजनाओं का पर्यावरण पर प्रभाव


किसी भी सड़क निर्माण परियोजना का कार्य मुख्यतः दो प्रकार से होता है, नई सड़क का निर्माण तथा पुरानी सड़क का जीर्णोद्धार। नई सड़क निर्माण से पर्यावरण एवं जिव-जंतुओं पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव पहले से मौजूद सड़क के सुधारीकरण/चौड़ीकरण के कारण होने वाले दुष्प्रभाव से बहुत अधिक होते हैं क्योंकि इनमें सड़क के आस-पास/दोनों तरफ अतिरिक्त भूमि की जरूरत होती है जिसके कारण परियोजना के क्रियान्वयन से पर्यावरण पर विभिन्न प्रकार के दुष्प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है। सड़क परियोजना के क्रिया-कलापों के कारण पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का आकलन, प्रस्तावित सड़क के विस्तार एवं उसके निर्माण संबंधी कार्यों में लगे समय एवं कार्य चक्र के आधार पर किया जाता है। सभी प्रस्तावित सड़क परियोजनाओं के चौड़ीकरण एवं विस्तार/निर्माण के संदर्भ में कई प्रकार की जानकारियाँ/आँकड़े जिसमें की राइट ऑफ द वे (RoW), भूमि समतलीकरण, पेड़ों की कटाई, पुलों एवं सुरंगो की संख्या और भू-गर्भीय एवं स्थलीय जल के प्रवाह में बदलाव एवं परियोजनाओं से विस्थापित अथवा प्रभावित होने वाले व्यक्तियों/परिवारों एवं जमीन जायदाद के अधिग्रहण से संबंधित जानकारियाँ सम्मिलित रहती हैं। उपलब्ध जानकारियों के आधार पर निर्माण के दौरान होने वाले क्रिया-कलापों का स्थानीय पर्यावरण पर प्रभाव का आकलन किया जाता है। भूमि उपयोग से संबंधित जानकारियाँ सड़क निर्माण के दौरान होने वाली पर्यावरणीय क्षति को कम करने में बहुत सहायक होती है। उदाहरण के तौर पर वन क्षेत्र या हरियाली युक्त क्षेत्र की तुलना में बंजर या अनुपयोगी क्षेत्र में सड़क निर्माण करने से पर्यावरण एवं अन्य दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। सारणी 8 में सड़क परियोजनाओं के विभिन्न चरणों (Phase) में विभिन्न क्रिया-कलापों का पर्यावरण एवं जीवों पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है।

सड़क निर्माण/चौड़ीकरण की प्रक्रिया के विभिन्न कार्यों में जितना अधिक समय लगता है उसके कारण पड़ने वाले दुष्प्रभाव भी उतने ही अधिक होते जाते हैं। जीवों एवं पौधों पर सड़क परियोजना के प्रभाव आकलन में भूमि की भौतिक संरचना का अध्ययन भी जरूरी है। ढालों एवं उभारों की दिशा उस क्षेत्र की जल बहाव की दिशा को नियंत्रित करती हैं। ढालों में असंतुलन की वजह से भू-क्षय (Soil erosion) की मात्रा में अप्रत्याशित वृद्धि होती है। सड़क निर्माण के दौरान मिट्टी की खुदाई एवं भराई के कारण उपजाऊ मृदा का क्षय एवं जल बहाव की दिशा में परिवर्तन होता है। साथ ही मिट्टी के संघनन में असंतुलन आने के कारण मिट्टी वर्षा जल के द्वारा सतही जल भंडार में गाद (Sediments) के रूप में एकत्रित होती जाती है। सड़क निर्माण के दौरान वातावरण में धूल के कणों की मात्रा में अप्रत्याशित वृद्धि होती है। भारी मशीनों के कारण ध्वनि प्रदूषण में वृद्धि होती है। इस प्रकार सड़क निर्माण की संबंधित क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है साथ ही साथ पर्यावरण पर कुछ दुष्प्रभाव भी पड़ते हैं। सड़क के मार्गों का समुचित निर्धारण करके इन दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

सड़क एवं राजमार्गों के निर्माण का जैवविविधता पर प्रभाव


सड़क निर्माण का मुख्य प्रभाव वनस्पति एवं वन्यजीवों के क्षेत्र का विखडन तथा उनकी जनसंख्या में अलगाव के रूप में होता है। सड़क के निर्माण कार्य के विभिन्न पर्यावरणीय प्रभाव अल्प अवधि के होते है परंतु सड़क बनने के बाद जैवविविधता पर दुष्प्रभाव में समय के साथ वृद्धि होती जाती है। सड़क निर्माण के बाद पर्यावरण पर संभावित दुष्प्रभाव के साथ ही संबंधित क्षेत्र की सामाजिक अर्थव्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन आता है। सड़क बनने के बाद उसके आस-पास व्यापारिक प्रतिष्ठान एवं आबादी का बसना शुरू हो जाता है। फलस्वरूप प्राकृतिक क्षेत्रों का विलोपन होने लगता है। चूँकि आगमन सुविधाजनक होने की वजह से शिकारियों की पहुँच घने प्राकृतिक क्षेत्रों में वन्यजीवों तक हो जाती है परिणामस्वरूप शिकार की घटना में भी वृद्धि होती है।

वाहनों की संख्या में वृद्धि होने एवं हानिकारक अवशिष्टों के उत्सर्जन में वृद्धि होने की वजह से वायु एवं आस-पास के जलस्रोतों की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। वाहनों से NOx, SOx, PM, CO और HC इत्यादि प्रदूषकों के उत्सर्जन के कारण वायु प्रदूषण के स्तर में वृद्धि हो जाती है। वायु प्रदूषण का प्रभाव वन्यजीवों पर सर्वाधिक पड़ता है क्योंकि पर्यावरण की गुणवत्ता में अचानक हुए परिवर्तन के प्रति ये वन्य जीव-जंतु एवं पौधे काफी संवेदनशील होते हैं। वाहनों से होने वाले शोर से जीव-जंतुओं एवं पछियों के मध्य आपसी संचार में गतिरोध उत्पन्न होता है जिसके कारण उनमें दिशाभ्रम एवं मतिभ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार जीव-जंतुओं एवं पछियों के व्यवहार एवं प्रजनन पर दुष्प्रभाव पड़ता है।

 

सारणी 8 - सड़क परियोजनाओं की विभिन्न गतिविधियों का पर्यावरण एवं वन्यजीवों पर प्रभाव

क्र.सं.

गतिविधियाँ एवं क्रियाकलाप

पर्यावरण एवं वन्यजीवों पर प्रभाव रूप रेख

 

रूप-रेखा

1.

सड़क मार्गों का चुनाव, पुलिया तथा सुरंग हेतु भूमि अधिग्रहण

जीवों के प्राकृतिक आवास का विलोपन एवं इनके कारोबार  में वृद्धि

 

2.

स्थानीय निवासियों की खेती-बाड़ी एव उपजाउ भूमि का अधिग्रहण, परियोजना से विस्थापित होने वाले व्यक्तियों/ परिवारों में का पुनः स्थापना एवं पुनर्वास

पुनः स्थापना एवं पुनर्वास के लिये नई जमीन की आवश्यकता जिससे जीवों के प्राकृतिक आवास का विलोपन एवं विखंडन, जैविक विविधता में ह्रास और प्रजातियों की संरचना भिन्नता

निर्माण कार्य

3.

पेड़-पौधों एवं वनस्पतियों को काटना

वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास का विलोपन, वनाच्छादित क्षेत्र में कमी एवं प्राकृतिक सुंदरता में कमी

4.

श्रमिक निर्माण शिविर एवं सहायक ढाँचे की स्थापना

परियोजना के मजदूरों द्वारा संसाधनों का उपयोग जिससे स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव एवं प्राकृतिक आवास में बदलाव, अवसादन के प्रति संवेदनशील प्रजातियों का विलोपन एवं पोषक तत्वों के चक्रण का बाधित होना और बाहरी प्रजातियों की घुसपैठ

5.

नदी-नालों का पथान्तरण एवं विभक्तिकरण

स्थलीय एवं भूमिगत जल प्रवाह का रूपांतरण एवं संबंधित दुष्प्रभाव, जीवों का दैनिक एवं प्रवास मार्गों में परिवर्तन

6.

तालाब एवं आर्द्र भूमि का भराव

तालाबों की जल संग्रहण की क्षमता में कमी, वर्षा जल में प्रदूषण एवं अवसादन से ग्रहण जल की गुणवत्ता में ह्रास,  भूमिगत जल की गुणवत्ता एवं मात्रा में कमी। आर्द्र भूमिय जैवविविधता में कमी

7.

निर्माण कार्य हेतु जल का उपयोग

सतही एवं भूमिगत जल की गुणवत्ता एवं मात्रा में कमी और जल संतुलन में बदलाव

8.

कच्चे माल, मिटटी आदि की ढुलाई

मिटटी का संघनन, उपजाऊ मृदा का क्षय, मिट्टी संरक्षण क्षमता एवं जल की पारगम्यता में कमी। घने वन में मानव पहुँच एवं वन्यजीवों का शिकार और जंगली आग का भय

9.

खुदाई एवं भराव

भूमि की उर्वरता में कमी और ढाल एवं मृदा क्षरण का असंतुलन। सतही वनस्पति का विलोपन और वन्य जीवों पर दबाव

10.

विस्फोट, पत्थरों की कटाई एवं तुडाई या सुरंग निर्माण  

पर्वतीय ढालों से मिट्टी का व्यापक बहाव। पहाड़ों के ढलान की स्थिरता पर दुष्प्रभाव जल के प्राकृतिक प्रवाह में परिवर्तन एवं जल भराव की आशंका। वन्य जीवों के संसाधनों का दोहन

11.

सड़क का सतहीकरण और पुलिया एवं सुरंग का निर्माण   

मिट्टी कटाव एवं भराव मात्रा में अंतर के कारण अनुपयोगी पदार्थ का संचय। पुलिया एवं सुरंग के निर्माण के कारण नदी किनारों एवं तलछट की नम भूमि के चरित्र में बदलाव

12.

अनुपयोगी शेष पदार्थ का परिवहन

मिट्टी का संघनन, उपजाऊ मृदा का क्षय। अनुपयोगी शेष पदार्थ एवं मिट्टी वर्षाजल के द्वारा सतही जल भंडार में गाद के रूप में एकत्रित होता जाता है।

प्रयोग काल

13.

वाहनों की गतिविधियाँ

वाहनों से होने वाले प्रदूषण के कारण वन्यजीवों के स्वास्थ्य में ह्रास। वाहनों से सीधी टक्कर में वन्यजीवों की मौत एवं आवास का विखंडन जिसके कारण जनंसख्या में गिरावट एवं आनुवांशिकी विविधता में कमी। सीमित संसाधनों के उपभोग हेतु वन्यजीवों के मध्य टकराव।

14.

वायु प्रदुषण

धूल कण NOx, Sox, PM10, CO, HC इत्यादि के उत्सर्जन के कारण वायु प्रदूषण में वृद्धि होना जिसका पौधों एवं जीवजंतुओं पर दुष्प्रभाव पड़ता है।

15.

जल प्रदूषण

सड़क पर उपस्थित हानिकारक प्रदूषक वर्षाजल के प्रवाह के साथ सतही जल भंडार को प्रदूषित करते हैं साथ ही साथ भूजल पर भी दुष्प्रभाव डालते हैं।

16.

ध्वनि प्रदूषण

वन्यजीवों का सड़क से दूर जाना एवं केन्द्रीकरण होना, गुटों का अलगाव जिसके फलस्वरूप उनके व्यवहार में परिवर्तन होता है। सड़क पार करते समय अक्सर हॉर्न की आवाज सुनकर जानवर डर जाते हैं एवं दुर्घटना के शिकार हो जाते हैं वाहनों के ध्वनि प्रदूषण से जीव-जंतुओं एवं पछियों के मध्य संचार में गतिरोध होता है। जिसका उनके व्यवहार एवं प्रजनन पर दुष्प्रभाव पड़ता है।

17.

सड़क का रख-रखाव

ईंधन से उत्पन्न कण एवं अनुपयोगी शेष पदार्थों के कारण प्रदूषण एवं उससे संबंधित दुष्प्रभाव।

18.

सड़क सुरक्षा

वाहनों एवं जीवों के मध्य टक्कर में जीवों की मौत और वाहनों की दुर्घटनाओं में वृद्धि

 

रोड ट्रेप (Road Trap)


कई प्रकार के वन्यजीव दैनिक आवागमन एवं वार्षिक प्रवास पर जाने के लिये एक नियत मार्ग का उपयोग करते हैं। यह प्रवास प्रजनन एवं भोजन के लिये होता है। इन प्रवास मार्गों के मध्य सड़क आ जाने से वाहनों के साथ टक्कर की हमेशा सम्भावना रहती है। इन दुर्घटनाओं की वजह से इन जीव-जन्तुओं के प्रवास मार्ग एवं समय में परिवर्तन आ सकता है जिसके फलस्वरूप जनसंख्या में गिरावट एवं आनुवंशिक विविधता में कमी हो सकती है। सड़क दुर्घटना में वन्य-जीवों की अकसर मृत्यु भी होती रहती है। मृत वन्य-जीवों का शरीर मृतभोजी एवं मांसाहारियों के लिये भोजन होता है अतः वे इसकी ओर आकर्षित होते हैं और दुर्घटना के शिकार होते हैं। इस प्रकार एक चक्रीय घटना की शुरुआत होती है एवं दुर्घटना की एक श्रृंखला बन जाती है। (चित्र 2) । इस पूरे घटना क्रम को सड़क जाल या ट्रैप कहते हैं। मंद गति से चलने वाले सरीसृप एवं उभयचर सर्वप्रथम सड़क दुर्घटना के शिकार होते हैं एवं इनका मृत शरीर एक सड़क जाल या रोड-ट्रैप का निर्माण करता है। मृतभोजी (Scavengers) एवं मांसाहारी (Carnivores) मृत शरीर की तरफ आकर्षित होते हैं एवं दुर्घटना का शिकार बनते हैं। खाद्य श्रृंखला पर पड़ने वाले प्रभाव से सभी संबंधित जीव-जन्तु प्रभावित होते हैं।

चारागाह से होकर गुजरने वाली सड़क के कारण हरित क्षेत्र का संकुचन एवं आवास का विखंडन होता है। शाकाहारी जन्तु टक्कर से बचने एवं भोजन और आवास की खोज में सुदूर क्षेत्र में चले जाते हैं। शिकार (भोजन) की कमी के कारण मांसाहारी एवं मृतभोजी जानवरों को स्थानांतरण (माइग्रेशन) करना पड़ता है जिसके वे अभयस्त नहीं होते फलस्वरूप उनकी मृत्यु हो जाती है।

निर्माण कार्य में लगा समय कार्यों के दुष्प्रभाव के आकलन में महत्त्वपूर्ण होता है। कम अवधि के निर्माण कार्य का ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता। वहीं बड़ी परियोजनाएं जिनकी कार्य अवधि एक वर्ष से ज्यादा होती है उनका जीवों एवं पौधों पर ज्यादा दुष्प्रभाव पड़ता है क्योंकि इनका जीवन-चक्र प्रभावित होता है। साथ ही मौसमी स्थानांतरण एवं वार्षिक प्रजनन-चक्र भी प्रभावित हो सकता है। इसलिये निर्माण कार्य हेतु उचित ऋतु एवं समय का उपयोग किया जाता है जिसके लिये स्थानीय पौधों एवं जन्तुओं के प्रवास काल का अध्ययन बहुत जरूरी है। निर्माण काल की समाप्ति पर पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव की प्रकृति में भी अंतर आ जाता है वाहनों के आगमन के कारण स्थानीय पौधों की प्रजातियों में बाह्य विदेशी प्रजातियों एवं आनुवंशिक संशोधित प्रजातियों का प्रवेश होने लगता है जिसके कारण पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन उत्पन्न हो जाता है। आवासीय विखंडन के कारण वन्य जीवों के समूहों के मध्य विखंडन एवं अलगाव उत्पन्न हो जाता है वाहनों के शोर एवं टक्कर के भय से वन्य जीवों के व्यवहार में परिवर्तन आता है स्थानीय खंडित वन क्षेत्र और इनके जीव एवं पैाधों की प्रजातियाँ, पर्यावरण के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती हैं। इनके परिवेश में जरा सा भी परिवर्तन इनके विलुप्तिकरण का कारण भी बन सकता है। इन पर दुष्प्रभाव और भी ज्यादा तब होता है जब सड़कें वन्य अथवा जीव-जन्तु संरक्षित क्षेत्र के नजदीक से गुजरती है। सारणी 9 में विभिन्न सड़क परियोजनाओं से प्रभावित क्षेत्र इनके प्रभाव एवं प्रभावित प्रजातियों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है।

Fig-2

 

सारणी 9- सड़क परियोजनाओं से प्रभावित क्षेत्र, प्रभाव एवं प्रभावित प्रजातियाँ

 

क्र.सं.

रोड/प्रोजेक्ट

प्रभावित क्षेत्र

प्रभाव

प्रभावित प्रजातियाँ

1

दुधवा गोरिफानता और धुधवा चन्दनचवकी मार्ग

दुधवा टाइगर रिजर्व क्षेत्र, (उत्तर प्रदेश)

आवास का विखंडन एवं विलोपन, घास-भूमि का विलोपन

बाघ, बारहसिंघा (swamp deer) आदि

2.

इंदिरा गांधी वन्यजीव अभयारण्य की सड़क (IGWS)

इंदिरा गांधी वन्यजीव अभयारण्य

रोड-कील एवं आवास का विखंडन  एवं अनामालैस जंगल क्षेत्र (तमिलनाडु)

पैर विहीन उभयचर, शल्क पूछी सर्प, कांटेदार चूहा, स्मॉल किवेट कैट, साम्भर

3.

मुंबई-पुणे एक्सप्रेस

पश्चिमी घाट बंदरगाह का उष्ण कटिबंधीय वन (वेस्टर्न घाट, समुद्र, तट, डेक्केन, पठार)   

संवेदनशील प्राकृतिक आवास का विखंडन एवं ह्रास

माउस डियर, बड़ी गिलहरी एवं स्थानिक प्रजातीय

4.

पूर्वी-पश्चिमी व उत्तरी-दक्षिणी उच्च मार्ग, ग्रेट निकोबार द्वीप समूह

ग्रेट निकोबार द्वीप समूह का सागर तट

कछुओं के प्रजनन क्षेत्र का विलुप्तिकरण एवं उनका शिकार

सागरीय जीव जंतु एवं समुद्री कछुआ

5.

राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-7) (पेंच टाइगर रिजर्व)           

मध्य भारत की सुदूर आर्द्र एवं शुष्क पर्णपाती वन और पेंच टाइगर रिजर्व वन क्षेत्र (म.प्र. और महाराष्ट्र)

संवेदनशील प्राकृतिक वन क्षेत्र और रोड-कील

बाघ एवं अन्य वन्य जीवों की सड़क दुर्घटना में मृत्यु

6.

टाला – सड़क मार्ग परियोजना

बक्सा टाइगर रिजर्व वन क्षेत्र (BTR), अलीपुर द्वार, (पश्चिम बंगाल)

संवेदनशील प्राकृतिक वन आवास का विखंडन एवं विलोपन

बड़ी गिलहरी, बाघ, तेंदुआ एवं हाथी

7.

देहरादून-दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-58)

राजाजी राष्ट्रीय पार्क एवं देहरादून के जंगल

प्राकृतिक आवास का विखंडन एवं हाथियों के कोरिडोर में रुकावट

हाथी एवं अन्य वन्य जीव

 

भारत में सड़क/राजमार्ग परियोजनाओं का पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (Environmental Impact Assessment of Road/High-way Projects in India)


सड़क के कारण परिवहन सुविधाजनक होता है जिसके कारण लोगों के मध्य सांस्कृतिक विचारों का आदान-प्रदान संभव हो पाता है। सड़क तंत्र एवं सुगम परिवहन राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिये महत्त्वपूर्ण होते हैं। इस समय भारत में सड़कों की कुल लंबाई 42.36 लाख किलोमीटर है। यह विश्व का दूसरा सबसे बड़ा सड़क-तंत्र है। सड़क द्वारा कुल माल भाड़े का लगभग 60 प्रतिशत एवं 87.4 प्रतिशत यात्री का परिवहन होता है। राष्ट्रीय राजमार्ग (National Highway) सड़क के कुल विस्तार का लगभग 1.7 प्रतिशत ही है पर सम्पूर्ण सड़क यातायात का लगभग 40 प्रतिशत परिवहन राष्ट्रीय राजमार्ग द्वारा होता है। भारत सरकार द्वारा सितम्बर (2006) की अधिसूचना के अनुसार कुछ सड़क एवं राजमार्ग से जुड़ी परियोजनाओं के लिये पूर्व पर्यावरणीय अनापत्ति (Prior Environmental Clearance) प्राप्त करना अनिवार्य किया है। इन सड़क एवं राजमार्ग परियोजनाओं/क्रिया-कलापों को अनुसूची के मद 7 (च) में रखा गया और साथ ही साथ अवसीमा निर्धारण (थ्रेसहोल्ड क्राइटेरिया) प्रक्रिया में प्रवर्ग ‘क’ तथा ‘ख’ दोनों में ही रखा गया है। ई.आई.ए. अधिसूचना के अनुसार सामान्य शर्तों के लागू होने पर प्रवर्ग ‘ख’ में आने वाली सभी राजमार्ग परियोजनाओं को प्रवर्ग ‘क’ की माना जाता है तथा उसके पर्यावरणीय अनापत्ति आवेदन पर निर्णय केन्द्र स्तर पर विशेषज्ञ आकलन समिति के द्वारा अनुशंसा पर किया जाता है। सामान्य शर्त जब लागू होती है जबकि अगर वो क्षेत्र जिनमें कि परियोजना या क्रिया-कलाप प्रस्तावित है, वन्य जीव संरक्षण अधिनियम (1972) के अधीन आती हो या केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा गम्भीर रूप से प्रदूषित क्षेत्र (Critically polluted area) के रूप में पहचान की गई हो या पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र [ecologically polluted areas under EPA (1986)] अधिसूचित हो या उपर्युक्त सीमाओं और अन्तरराष्ट्रीय सीमाओं से 10 किमी. भीतर या आंशिक रूप से अवस्थित हो।

प्रवर्ग ‘क’ एवं ‘ख’ में आने वाली परियोजनाओं को संबंधित केन्द्रीय अथवा राज्य स्तरीय विशेषज्ञ आकलन समिति के तहत निर्दिष्ट प्रक्रिया की तरह पर्यावरणीय अनापत्ति प्रक्रिया (एनवायर्नमेंटल क्लीयरेंस) से गुजरना होता है। ई.आई.ए. के अधिनियम (2006) में वर्णित प्रक्रिया के अनुसार लोक सुनवाई एवं जन सुनवाई रिपोर्ट को ई.आई.ए. रिर्पार्ट के साथ संलग्न करना जरूरी होता है। राजमार्ग परियोजना अगर वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम (1972) के अधीन अधिसूचित संरक्षित क्षेत्र या वन (संरक्षण) अधिनियम, 1981 के अधीन आने वाले संरक्षित वन क्षेत्र (प्रोटेक्ट फॉरेस्ट) या अधिसूचित वन (रिजर्व फॉरेस्ट) के 10 किमी. की परिधि में आती है अथवा कोस्टल जोन रेगुलेशन [CRZ (2011)] के तहत निर्धारित तटीय जोन के अंतर्गत आती है तो उस स्थिति में वर्तमान में प्रचलित नियमों एवं प्रावधानों के अनुसार उपर्युक्त अनापत्ति पत्र संबंधित विभाग से निर्धारित प्रक्रिया के तहत लेना जरूरी होता है।

ई.आई.ए. के विभिन्न चरणों में जैवविविधता का अध्ययन महत्त्वपूर्ण होता हैं। इसके लिये सड़क निर्माण परियोजना क्षेत्र के आस-पास उपलब्ध जीव-जन्तुओं और पौधों की सूची बनाई जाती है। सड़क परियोजना में कृषि क्षेत्र के अधिग्रहण होने की स्थिति में उपलब्ध फसलों को भी सूचीबद्ध किया जाता है ताकि सड़क निर्माण का इन फसलों की प्रजातियों पर प्रभाव का अध्ययन किया जा सके। ई.आई.ए. के विभिन्न चरण एवं विभिन्न चरणों में जैवविविधता के अध्ययन के महत्व का संक्षिप्त विवरण निम्नांकित है।

स्क्रीनिंग: पूर्व पर्यावरणीय अनापत्ति की अपेक्षा वाले सड़क एवं राजमार्ग की परियोजनाओं की स्क्रीनिंग में फार्म- 1 से प्राप्त जानकारियाँ (जैसे-राइट ऑफ द वे (RoW ) , भूमि समतलीकरण, पेड़ों की कटाई, पुलों एवं सुरंगों की संख्या और भू-गर्भीय एवं स्थलीय जल के प्रवाह में बदलाव इत्यादि) एवं परियोजना क्षेत्र की पर्यावरणीय संवेदनशीलता और प्रभाव के आधार पर विशेषज्ञ आकलन समिति (एक्सपर्ट अप्रेजल कमेटी) या राज्य स्तरीय विशेषज्ञ आकलन समिति (जो भी लागू हो) द्वारा निर्धारित मानदंडों के अंतर्गत सड़क परियोजनाओं को विधिसम्मत रूप से प्रवर्ग ‘क’, ‘ख’ एवं ‘ख’2 में वर्गीकृत करती है। श्रेणी ‘ख’ में वर्णित सड़क परियोजनाओं के लिये पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट अनिवार्य होता है एवं श्रेणी ‘ख2’ के लिये पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट अनिवार्य नहीं होती है। सड़क परियोजनाओं के वर्गीकरण के समय परियोजनाओं के उन क्रिया-कलापों का भी ध्यान रखा जाता है। जिनका जैवविविधता पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दुष्प्रभाव पड़ता है। परियोजना के किसी कार्य का स्थानीय एवं प्रमुख पौधों या जीवों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दुष्प्रभाव पड़ने की स्थिति में उस परियोजना का विस्तृत पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन जरूरी हो जाता है।

विस्तारण (स्कोपिंग): सड़क के आधुनिकीकरण या विस्तार एवं निर्माण के लिये विशेषज्ञ आकलन समिति अथवा राज्यस्तरीय विशेषज्ञ आकलन समिति (जो भी लागू हो) सभी प्रासंगिक पर्यावरणीय चिन्ताओं को ध्यान में रखते हुए ई.आई.ए. रिपोर्ट के लिये एक विस्तृत एवं व्यापक कार्य अवधारित (टर्म ऑफ रेफरेंस) का निर्धारण करती है। परियोजना के विभिन्न क्रिया-कलापों एवं उनके कारण पर्यावरण में होने वाले संभावित परिवर्तन के दुष्प्रभाव के प्रकार एवं परिमाण को ध्यान में रखते हुए व्यापक कार्य अवधारित (ToR) का निर्धारण किया जाता है परियोजनाओं के लिये ToR के आधार पर परियोजना का पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन किया जाता है। पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन के अंतर्गत जैविक विविधता का अध्ययन करते समय प्रभावित क्षेत्र में उपलब्ध जीवों की प्रजातियों के प्रकार, कौन सी प्रजाति बहुतायत में है एवं प्रमुख प्रजाति के विषय में जानकारी एकत्रित कि जाती है। साथ ही जीवों के मध्य आपसी संबंध भी ज्ञात किये जाते हैं। प्रभावित पारिस्थितिकी तंत्र के मूल्यांकन हेतु सर्वप्रथम यह अध्ययन किया जाता है कि उपलब्ध जीवों का जीवन-चक्र नयी सड़क की वजह से किस प्रकार प्रभावित हो रहा है।

लोक परमार्श (पब्लिक कंसल्टेशन): लोक परामर्श पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन की महत्त्वपूर्ण एवं प्रभावी प्रक्रिया वर्ग ‘क’ एवं ‘ख1’ की सड़क आधुनिकीकरण या विस्तार एवं निर्माण से संबंधित सभी परियोजनाओं के लिये अनिवार्य है। इस चरण में प्रभावित एवं स्थानीय व्यक्तियों की आपत्तियों एवं सुझाव को सम्मिलित किया जाता है एवं उनके मत एवं संबंधित पर्यावरणीय मुद्दे को जाना जाता है। स्थानीय निवासी आस-पास की जैवविविधता से संबंधित मौलिक ज्ञान उपलब्ध कराते हैं जिनसे प्रजातियों की सूची एवं पारिस्थितिकी तंत्र की बनावट एवं कार्य की जानकारी प्राप्त होती है।

आकलन (अप्रेजल): पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट में प्रभावित स्थानीय व्यक्तियों की आपत्तियों एवं सुझावों को सम्मिलित कर विस्तृत ई.आई.ए. रिपोर्ट को एक्सपर्ट अप्रेजल कमेटी आकलन करती है तथा ‘पूर्व पर्यावरण अनापत्ति’ प्रमाण-पत्र (एनवायर्नमेंटल क्लियरेंस) प्रदान करने की अनुशंसा करती है। परियोजना को सहमति प्रदान करने का अंतिम निर्णय राजनैतिक होता है। परियोजना को सहमति न मिलने की स्थिति में परियोजना के प्रारूप को परिवर्तित कर अनापत्ति प्रमाण-पत्र (एनवायर्नमेंटल क्लियरेंस) के लिये दोबारा प्रस्तुत किया जाता है परियोजना के ई.आई.ए. प्रक्रिया के दौरान आर्थिक, सामाजिक एवं पर्यावरणीय मुद्दों पर निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता होती है तथा निर्णय प्रक्रिया के दौरान राष्ट्रीय अन्तरराष्ट्रीय, एवं स्थानीय कानूनों और नियमों का अनुपालन किया जाता है। निर्णय लेने की पूरी प्रक्रिया के दौरान जैवविविधता संरक्षण एक महत्त्वपूर्ण मुददा होता है। इसलिये परियोजना का निर्णय लेते समय जैवविविधता के मुद्दे पर सही एवं विस्तृत परिप्रेक्ष्य से विमर्श किया जाता है।

निष्कर्ष


पिछले कुछ दशकों में भारत से कई दुर्लभ जानवर लुप्त हुये हैं जिनमें इंडियन चीता, छोटे कद का गैंडा, गुलाबी सिर वाली बत्तख, जंगली उल्लू और हिमालयन बटेर शामिल हैं। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) के अनुसार भारत में वर्ष 2004 में 648 दुर्लभ प्रजातियाँ खतरे में थी जोकि वर्ष 2012 में बढ़कर 929 हो गई। इस प्रकार जैवविविधता के रूप में इस विश्व धरोहर को गँवाने वाले देशों की सूची में भारत चीन के ठीक बाद सातवें स्थान पर आ गया। 5 अक्टूबर 2012 को हैदराबाद, भारत में सम्पन्न हुये जैवविविधता सम्मेलन के पक्षकारों की 11वीं बैठक में सभी देश द्वारा सतत विकास हेतु जैवविविधता के संरक्षण के लिये अपनी प्रतिबद्धता (commitment) को दर्शाना एवं इसके संरक्षण हेतु आर्थिक मुद्दों पर भी विमर्श करना जैवविविधता संरक्षण की महत्ता को दर्शाता है। भारत सरकार ने अन्तरराष्ट्रीय समुदायों से किये गये वायदों एवं विभिन्न अन्तरराष्ट्रीय संधियों के तहत जैवविविधता संरक्षण हेतु जैवविविधता अधिनियम (2002) और नियम 2004 को लागू किया है। भारत सरकार द्वारा लागू किये गये जैवविविधता संरक्षण के इन्हीं उपायों के तहत जीवों एवं पौधों की सुरक्षा के लिये भारत सरकार ने अपने कुल भौगोलिक हिस्से के लगभग 4.8 प्रतिशत भाग सुरक्षित क्षेत्र (प्रोटेक्टेड एरिया) घोषित कर इन क्षेत्रों में विभिन्न निर्माण गतिविधियों/कार्यों को निषिद्ध कर रखा है। बाघों एवं अन्य जानवरों की संख्या में संतोषजनक वृद्धि एवं कुल वन क्षेत्रों में विस्तार के रूप में इन्हीं उपायों के तहत कुछ सकारात्मक परिणाम भी मिले हैं।

वर्ष 2012 में सर्वोच्च न्यायालय के तत्वाधान में केन्द्रीय उच्चाधिकार संपन्न समिति (Central empowered committee) ने सुरक्षित क्षेत्रों के बाहरी पर्यावरणीय संवेदनशील (इको-सेंसिटिव) क्षेत्रों के लिये बफर जोन बनाने का सुझाव दिया है। परन्तु केन्द्रीय उच्चाधिकार संपन्न समिति द्वारा प्रस्तावित बफर जोन के निर्धारण के मापदंड को बहुत से पर्यावरणविद सही नहीं मानते हैं। उनके अनुसार बफर जोन का निर्धारण संरक्षित क्षेत्र के क्षेत्रफल के आधार पर नहीं बल्कि संरक्षित क्षेत्र में उपस्थित जैवविविधता एवं स्थानिक प्रजातियों (Endemic species) की उपलब्धतानुसार करना चाहिए। पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील संरक्षित क्षेत्रों की वर्तमान स्थिति को भी वरीयता देना चाहिए। अगर संरक्षित क्षेत्र का क्षेत्रफल ज्यादा है तो केन्द्रीय उच्चाधिकार संपन्न समिति द्वारा अनुशंसा के अनुसार बफर जोन भी ज्यादा होगा। इसके ठीक विपरीत यदि संरक्षित क्षेत्र का क्षेत्रफल कम है तो इसका बफर जोन भी कम होगा, भले ही उस क्षेत्र में जैवविविधता एवं स्थानिक प्रजातियों की अधिकता क्यों न हो, जोकि विधिसम्मत नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने विभिन्न राज्यों को पहले 15 फरवरी 2013 तक का समय दिया था जिसमें कि इन राज्यों को विभिन्न संरक्षित क्षेत्रों के बफर जोन से संबंधित अनुशंसा को भेजना था। इस समय सीमा को फिलहाल 3 महीने (5 मई 2013) और बढ़ा दिया गया है। इसके बावजूद भी अधिकतर संरक्षित क्षेत्रों को बफर जोन सूचित करने की विभिन्न राज्यों द्वारा अभी तक संतोषपूर्ण कार्यवाही नहीं की गई है। वर्तमान परिदृश्य में जैवविविधता को प्रमुख खतरा विभिन्न निर्माण परियोजनाओं/कार्यों के कारण पारस्थितिकी तंत्र में असंतुलन और जीवों एवं पौधों के आवासों के विखंडन के रूप में है। इस प्रकार की निर्माण परियोजनाओं/कार्यों में सड़क निर्माण का प्रभावकारी योगदान होता है। इसलिये सड़क परियोजनाओं/कार्यों। को पर्यावरण मंजूरी के लिये पर्यावरणीय प्रभाव के आकलन के दौरान जैवविविधता के अध्ययन को शामिल किया गया है।

पर्यावरणीय प्रभाव के आकलन के दौरान जैवविविधता अध्ययन को प्रभावी बनाने के लिये इस प्रक्रिया के अंतर्गत सड़क निर्माण का कृषि योग्य फसलों की प्रजातियों को होने वाले नुकसान को भी शामिल किया जाना आवश्यक है। इस प्रकार के नुकसानों के निवारण हेतु जनता, निजी एवं सरकार की सहभागिता से एक प्रभावशाली केंद्रित स्थानीय फसलों एवं पौधों की प्रजातियों के जीन बैंक की स्थापना करने की आवश्यकता है। जीव-जन्तुओं एवं वाहन चालकों की सुरक्षा हेतु सड़क परियोजना या निर्माण कार्य के दौरान जीवों के झुंडो में अलगाव एवं वाहनों की टक्कर से बचाव के लिये पुलिया या अंतःमार्ग (अंडर पास) का निर्माण अधिक संख्या में किये जाने की जरूरत है। इन अंतः मार्गों (अंडर पास) बाहर का निर्माण वन्य जीवों के व्यवहार के अध्ययन के आधार पर होना चाहिए क्योंकि अकसर जीव नए मार्ग या अंतः मार्ग के उपयोग से कतराते हैं। जीव-जन्तु बाहुल्य क्षेत्र में वाहन चालकों को सावधान करने वाले निर्देशों/निशानों का प्रयोग किया जाना चाहिए। सड़क निर्माण परियोजना/कार्य का जैवविविधता पर दुष्प्रभाव पड़ने की स्थिति में जैवविविधता संरक्षण में जनता, निजी संगठनों एवं सरकार की सहभागिता एवं आपसी सहमति से इसके संरक्षण एवं वृद्धि के लिये सभी उपयुक्त उपायों को अपनाने की आवश्यकता है।

आभार


लेखक, निदेशक, सीएसआईआर, केन्द्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के प्रति आभार व्यक्त करते हैं जिन्होंने इस शोध पत्र को प्रकाशित करने की अनुमति प्रदान की है। शोध पत्र की भाषा में संशोधन एवं इसके टंकण में सहयोग हेतु राजभाषा अनुभाग के श्री संजय चौधरी, वरिष्ठ हिंदी अनुवादक एवं श्रीमती संतोष के प्रति भी आभार प्रकट किया जाता है।

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सम्पर्क


संजीव कुमार सिंहा, नीरज शर्मा, रजनी ध्यानी एवं अनिल सिंह, Sanjiv Kumar Sinha, Niraj Sharma, Rajni Dhyani & Anil Singh
पर्यावरण विज्ञान विभाग, सीएसआईआर-केन्द्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली 110025, Environmental Science Division, CSIR- Central Road Research Institute, New Delhi 110025


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