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ग्लोबल वार्मिंग : पिघलते ग्लेशियर बढ़ा रहे हैं भूकम्पीय गतिविधियाँ

Author: 
सुशील कुमार
Source: 
अश्मिका, जून 2010

यह बहुत आश्चर्य की बात नहीं है कि ग्लोबल वार्मिंग पर बहुत असहमति एवं संशय है। हालाँकि प्रथम अनुभूति में ही यह एक बहुत बड़ी समस्या है जिससे हमें जूझना पड़ रहा है। यह पूरे ग्रह (प्लानेट) को एक साथ प्रभावित कर रही है। कुछ घटनाओं को हम देख नहीं सकते जैसे कि नये अध्ययन बताते हैं कि गहरे समुद्र में लहरें सामान्यत: बर्फ जैसी ठंडी होती हैं, वे भी गरम होना शुरू हो गई हैं। एक अन्य अध्ययन में वैज्ञानिकों ने बताया है कि भविष्य में यदि ग्लेशियर इसी प्रकार पिघलते रहे तो आने वाले दिनों में भूकम्पों की संख्या में भी निश्चित रूप से वृद्धि होगी। ग्रीनलैंड एवं अंटार्कटिका में बड़ी हिम परत होने के कारण वहाँ भूकम्पीयता का स्तर कम है। नासा (नेशनल एरोनाटिक्स एण्ड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) की वैज्ञानिक जोनीसार के अध्ययन के अनुसार अलास्का में हाल में ही भूकम्पों की संख्या में वृद्धि का कारण अधिक बर्फ का पिघलना है (चित्र 1)।

जोनी सार के अनुसार 2001 से 2006 के बीच तापमान अधिक रहा और बहुत तेजी से अधिक बर्फ पिघली। अध्ययन बताते हैं कि गर्मियों में जब ज्यादा बर्फ पिघलती है और बर्फ की मोटाई लगभग 10% घटती है तो यह छोटे आकार के भूकम्पों (M<3.0) की उत्पत्ति के लिये पर्याप्त होती है। दुनिया भर के भूकम्प वैज्ञानिकों का मत है कि ग्लेशियरों के पिघलने का दूसरा सबसे गंभीर परिणाम ग्लेशियर भूकम्प हैं।

पिघलते ग्लेशियर एवं भूकम्प के संबंध को सरल रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है जैसे कि जब एक क्यूबिक मीटर ग्लेशियर बर्फ पिघलती है तो वह टेक्टोनिक प्लेट (पृथ्वी की ऊपरी सतह, क्रस्ट) पर अनुमानिक एक टन दबाव कम देती है। अधिकर हिमालयी ग्लेशियर सैकड़ों मीटर मोटे हैं। हिमालय में भूकम्पों के आने का मुख्य कारण इंडियन प्लेट एवं यूरेशियन प्लेट का आपस में टकराना है। इस टकराव से दोनों प्लेटों पर तनाव उत्पन्न हो गया है यह तनाव ही अंत में भूकम्पों के रूप में मुक्त होता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि पिघली हुई एक क्यूबिक मीटर ग्लेशियर बर्फ, प्लेट को और गतिमान होने की आजादी प्रदान करती है और इस प्रकरण में पर्याप्त घर्षण जोकि इकट्ठे हुये तनाव को मुक्त करने के लिये आवश्यक होता है मिल जाता है एवं वह भूकम्पों के रूप में बाहर आता है।

इस प्रकार हम परिभाषित कर सकते हैं कि जब ग्लेशियर पिघलते हैं और टेक्टोनिक प्लेट पर दबाव कम होता है तो प्लेट के भीतर, दीर्घ विकृति को सामान्य होने के लिये, भूकम्प होने की प्रबल संभावना रहती है। इस प्रकार छोटे होते ग्लेशियर भूकम्प होने की राह को आसान बनाते हैं एवं छोटे भूकम्पों का कारक भी बनते हैं। जबकि बड़े भूकम्पों (7.0
पाकिस्तान में बर्फ से ढके पर्वत ग्लेशियर बहुत तेजी से ऊँचे क्षेत्रों में स्थानांतरित हो रहे हैं जैसे कि पाकिस्तान अधिकृत जम्मू कश्मीर एवं कागहन क्षेत्र। कुछ ग्लेशियर मानवीय गलतियों एवं जंगलों की अंधाधुंध कटाई से खत्म हो रहे हैं। हाल ही कश्मीर में आए 2005 के भूकम्प (Mw=7.6) के कारण भी इस प्रकार ग्लेशियरों के स्थानांतरण एवं खत्म होते छोटे ग्लेशियरों से प्रभावित होना माना जा रहा है। सियाचिन ग्लेशियर सहित सभी मुख्य हिमालयी ग्लेशियर यूरेशियन कान्टिनेंट (टेक्टोनिक प्लेट) पर स्थित हैं एवं इंडियन प्लेट लगभग 5 सेंटीमीटर की दर से उत्तर की तरफ गतिमान हैं, जोकि लगातार इस क्षेत्र में तनाव को बढ़ा रही हैं तथा भूकम्प उत्पत्ति का मुख्य प्रथम कारण है। पिघलते ग्लेशियर इन इलाकों में रहने वाले लोगों के लिये दूसरा सबसे बड़ा खतरा है।

भविष्य में इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि पिघलते हिमालय ग्लेशियर दक्षिण एशिया में बड़े भूकम्पों के आने का कारण बन सकते हैं। सियाचिन ग्लेशियर के आस-पास सन 1983 से 2000 तक के भूकम्पों के एकत्रित आंकड़े जिनका आकार 4.0 से 5.2 तक का था, वैज्ञानिक इन भूकम्पों का संभावित कारण भी ग्लेशियर का पिघलना ही मानते हैं। हाल ही में चीन के सीहयून प्रांत में 12 मई 2008 को 7.9 आकार के भूकम्प का कारण भी ग्लेशियर का पिघलना ही माना जा रहा है। इसी कारण इस भूकम्प का नाम ही ग्लेशियर भूकम्प दिया गया है।

इस प्रकार पिघलते पीछे खिसकते हुये ग्लेशियर भविष्य में आने वाले भूकम्पों के लिये रास्ता खोल रहे हैं। नासा के वैज्ञानिकों के एक अन्य अध्ययन के अनुसार दक्षिणी अलास्का में संभवत: भूकम्पों की बढ़ती गतिविधियों के कारण को भी इसी प्रकार से समझा जा सकता है कि जैसे-जैसे ग्लेशियर पिघलते हैं वे उस जगह पृथ्वी की ऊपरी परत के दबाव को हल्का कर देते हैं। टेक्टोनिक प्लेटें, जोकि पृथ्वी की ऊपरी सतह के गतिमान टुकड़े हैं और आजादी से गति कर सकते हैं उन पर दबाव कम हो जाने से, गतिपरिवर्तन भूकम्पों के आने का कारण होती हैं। ऐतिहासिक रूप से यह दर्ज है कि जब बड़े हिमखण्ड पिघलना शुरू करते थे तो भूकम्पों की संख्या बढ़ जाती थी।

अत: हम कह सकते हैं कि लगभग 10,000 साल पहले महाहिमकाल के अंत में स्कैन्डिनेविया (उत्तरी यूरोप का क्षेत्र जिसमें डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन, फिनलैंड तथा आईसलैंड सम्मिलित हैं) में बड़े भूकम्प आये। कनाडा में भी हिम की परत के पिघलने से और ज्यादा मोडरेट आकार (5.0
Fig-1 Fig-2 सन 1979 में दक्षिण अलास्का में एक बड़ा भूकम्प आया था जोकि सेंट एलिआस भूकम्प के नाम से जाना जाता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि वह भी ग्लेशियरों के पिघलने से आया था। क्योंकि इस क्षेत्र में पहले 1899 में एक बड़ा भूकम्प आया था उसके बाद 1899 से पैसिफिक प्लेट पर, जोकि महाद्वीपीय प्लेट के नीचे फिसल रही थी, दबाव बना और 1979 में भूकम्प आया। इस दौरान 1899 एवं 1979 के बीच में बहुत से ग्लेशियर जो भ्रंश मण्डल (फाल्ट जोन) के आस-पास थे सैकड़ों मीटर छोटे हो गये थे और कुछ तो बिल्कुल लुप्त हो गये थे, इस तनाव को मुक्त करने में सहायक हुए। आइसलैंड जोकि उत्तरी अटलाटिंक समुद्र में एक दृश्य भूमि (लेंड स्केप) है, एक अध्ययन से पता चला है कि वहाँ भूकम्पीय गतिविधियों का कारण ग्लेशियर हैं। यह क्षेत्र ज्वालामुखीय रूप से सक्रिय है, इन ज्वालामुखीय बाहुल्य वाले क्षेत्रों में लांग पीरियड भूकम्प प्राय: आते रहते हैं। कभी-कभी इन्हें तुरंत ज्वालामुखी विस्फोट का संकेत माना जाता है।

प्रोफेसर जोन्सडोटीर और उनके सहयोगियों ने जो उपसला विश्वविद्यालय, उपसला के भूविज्ञान विभाग में कार्यरत हैं बताया है कि इनमें से कुछ भूकम्प ग्लेशियरों के गतिमान होने के कारण आये हैं ना कि ज्वालामुखी गतिविधियों के कारण। आइसलैंड में ज्वालामुखीय खतरों का सही-सही मूल्यांकन करने के लिये यह पता लगाने की आवश्यकता थी कि वास्तव में भूकम्पीय गतिविधियों का सही कारण क्या है? उन्होंने आइसलैंड के काटला ज्वालामुखी में एकत्रित किये गये मौसम संबंधित भूकम्प के आंकड़ों का गहराई से अध्ययन किया। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने सन 2000 के बाद दर्ज किये हुये 13,000 लम्बी अवधि भूकम्पों का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि भूकम्पीय गतिविधियाँ मौसमी (सीजनल) थीं जो साफ तौर पर मौसम परिवर्तन से संबंधित थीं एवं मौसम परिवर्तन ग्लेशियरों की गति के बढ़ने से संबंधित था। उन्होंने पाया कि भूकम्पीय गतिविधियाँ वर्षों से लगातार हो रही थीं जबकि इस दौरान ज्वालामुखी विस्फोट का कहीं कोई नामोनिशान भी नहीं था।

वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि रिकॉर्ड किये गये लम्बी अवधि के भूकम्प, ग्लेशियरों के गतिमान होने के कारण थे ना कि ज्वालामुखी गतिविधियों के कारण, जैसा कि पहले सोचा गया था। यह अध्ययन हालाँकि काटला ज्वालामुखी क्षेत्र तक सीमित था परंतु शोधकर्ताओं ने सुझाव दिया कि ग्लोबल वार्मिंग, ग्लेशियरों से ढके क्षेत्रों में ग्लेशियर प्रभावित भूकम्पीय गतिविधियों को बढ़ाने में बड़ा कारक हो सकती है इसलिये हमें इस प्रकार की भूकम्पीय गतिविधियों पर नजर रखनी चाहिए।

सम्पर्क


सुशील कुमार
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून

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