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भारत के संदर्भ में ग्लोबल वार्मिंग : एक परिचयात्मक अवलोकन (Global Warming in the Indian context)

Author: 
नागराज आडवे

उन्होंने हमें गुजरात में जो कहा


. कुछ वर्ष पहले हमारा एक समूह गुजरात के कुछ हिस्सों में यह जानने के लिये गया था कि जलवायु परिवर्तन से वहाँ छोटे किसानों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। पूर्वी गुजरात के गाँवों में उन्होंने हमें बताया कि सर्दियों की मक्का की फसल प्रभावित हो रही है। क्योंकि सर्दी जरा गर्म हुई है, पिछले पाँच वर्षाें में ओस गिरना अत्यधिक कम या पूरा बन्द हो गया है। अधिकतर गरीब निवासी जिनके पास अपने कुएँ नहीं हैं, उनकी फसलों के लिये नमी का एक मात्र स्रोत ओस ही है। ओस के कम गिरने या नहीं गिरने से उनकी फसल या तो सूख गई या मजबूरन उन्हें उनके खेत खाली छोड़ने पड़े। इस क्षेत्र में एवं इसके आस-पास मक्का, गरीब निवासियों के लिये पोषण का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्रोत है। उत्तरी गुजरात के अन्य गाँवों में हमें अन्य प्रभावों के बारे में बताया गया- आजकल बरसात उस समय नहीं होती है जिस समय होनी चाहिए या जब बरसात होती है उस समय नहीं होनी चाहिए, अधिकतर बरसात थोड़े समय में होती है, लोगों को नई बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है, पशु और ज्यादा बीमार रहने लगे हैं, कीटाणुओं का प्रकोप बढ़ गया है, आदि।

इन सबके बारे में लोगों से बहुत ही रोचक जवाब प्राप्त हुए। जब हम उनसे पूछते कि इससे होने वाले बदलाव के बारे में उनके क्या विचार हैं, तो वे कहते कि ये तो अपने आप हो रहे प्राकृतिक बदलाव हैं। यह बहुत चौंकाने वाली बात है कि उन लोगों ने इसे कल्पना योग्य बात भी नहीं समझी कि मनुष्य में इस व्यापक स्तर पर प्रकृति में बदलाव करने की शक्ति है।

दुर्भाग्य से यह सच है कि मनुष्य अपनी गतिविधियों से वातावरण में व्यापक बदलाव ला सकते हैं। जब भी हम कोयला और खनिज तेल को जलाते हैं, जोकि अभी और पिछले 250 वर्षों से आधुनिक समाज के चालक हैं, तब उसमें मौजूद कार्बन वातावरण में उपस्थित ऑक्सीजन से मिलकर कार्बन डाइऑक्साइड गैस का निर्माण करते हैं। ऑक्सीजन गैस की तरह यह भी अदृश्य होती है और इसकी गंध भी नहीं होती है।

ऑक्सीजन के विपरीत इसमें सूर्य के कुछ विकिरण को रोककर सोख लेने की क्षमता होती है जोकि पृथ्वी की सतह से टकराने के बाद लौटकर वापस जा रही होती है। कुछ अन्य गैस भी ऐसा ही करती हैं जैसे मीथेन (प्राकृतिक गैस के जलने से उत्पन्न) एवं नाइट्रस ऑक्साइड (रासायनिक खाद के उपयोग से उत्पन्न) लेकिन कार्बन डाइऑक्साइड सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह वातावरण में हजारों सालों तक बनी रहती है। इसी कारण से समझने की सहजता के लिये इस पुस्तिका का विषय मुख्य रूप से कार्बन डाइऑक्साइड पर केन्द्रित है। इन गैसों की सौर विकिरण को रोककर वातावरण को गर्म करने की इस क्षमता को अंग्रेजी में ग्रीनहाउस प्रभाव एवं इन गैसों को ग्रीनहाउस गैस कहा जाता है। यह इसलिये कि वातावरण का गर्म होने की प्रक्रिया लगभग उसी तरह है जो सर्द आबोहवा वाले देशों में पौधों को कृत्रिम रूप से गर्मी प्रदान करने के लिये निर्मित कुछ विशेष काँच के कमरे में होती है जिन्हें ग्रीनहाउस कहा जाता है।

धरती की रजाई (का आवरण) हमें और गर्म कर रही है


कार्बन डाइऑक्साइड अपने आप में खलनायक नहीं है; बल्कि धरती पर जीवन के लिये यह आवश्यक तत्व है। कार्बन डाइऑक्साइड के बिना पृथ्वी 30 डिग्री सेल्सियस अधिक ठंडी होती और इस स्थिति में रहने के लायक नहीं होती एवं निश्चित रूप से मनुष्यों के लिये तो नहीं। प्राकृतिक वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की उपस्थिति से ही उपयुक्त तापमान बना रहा है जिससे खेती की फसलों को उगाने एवं मानव सभ्यताओं के विकास में सहायता मिली है।

लेकिन अब हम वातावरण में प्राकृतिक रूप से उपस्थित कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में कुछ और भी जोड़ रहे हैं। हम धरती के नीचे से खोदकर कोयला, खनिज तेल एवं प्राकृतिक गैस को कारखाने चलाने के लिये, कार चलाने के लिये, बिजली के उत्पादन के लिये, हवाई जहाज उड़ाने के लिये, सीमेेंट बनाने के लिये, माल परिवहन के लिये एवं युद्ध लड़ने के लिये जलाते हैं।

इनमें से कुछ गतिविधियाँ आवश्यक हैं, कुछ सामाजिक अपव्यय हैं और कुछ तो बिल्कुल ही अनावश्यक, यहाँ तक कि नुकसानदेह हैं। ऐसी गतिविधियों के द्वारा पूरी दुनिया में धरती को खोदकर निकाले गए ईंधन को जलाकर 3400 करोड़ टन (1 टन = 1000 किलोग्राम) एवं सीमेंट के उत्पादन से सन 2013 में 200 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में छोड़ी गई है जो कि वर्तमान में उपलब्ध नवीनतम विश्वव्यापी आँकड़े हैं। साथ ही 400 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ोत्तरी हमारे जंगलों की कटाई से हुई है; जब भी लकड़ी जलती है अथवा सड़ती है, उससे कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है। अन्य ग्रीन हाउस गैसों के योगदान की गणना उनकी वातावरण को गर्म करने की क्षमता की तुलना कार्बन डाइऑक्साइड से की जाती है एवं यह योगदान को कार्बन डाइऑक्साइड के मात्रा में व्यक्त किया जाता है। इसमें मीथेन का योगदान 900 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड के समान एवं नाइट्रस ऑक्साइड एवं अन्य गैसों का योगदान 400 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड के समान है।

दूसरे शब्दों में, केवल भूगर्भ से निकाले गए ईंधन को जलाने से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 3400 करोड़ टन है जबकि सभी मानव गतिविधियों से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 4000 करोड़ टन एवं अन्य गैसों के योगदान 1300 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर है। इस प्रकार केवल एक वर्ष 2013 में कुल 5300 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित हुआ है।

कालान्तर में समय के साथ एक चौथाई से कुछ अधिक कार्बन डाइऑक्साइड समुद्र के द्वारा सोख ली जाती है जिससे उसका पानी और अधिक अम्लीय हो रहा है। जमीन पर लगभग उतनी ही मात्रा पेड़ों, घास एवं मिट्टी द्वारा ग्रहण कर ली जाती है। आधे से कुछ कम वातावरण में बनी रहती है।

पूरे वातावरण में सभी गैसों को मिलाकर जो कुल गैसीय मात्रा है, उसके लगभग हर 800 करोड़ टन का अनुपात उसका एक भाग प्रति दस लाख है जिसे अंग्रेजी में एक पार्ट पर मिलियन (पीपीएम) कहा जाता है। सन 2015 में वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 400 पीपीएम के पार हो गया एवं ऐसा मानव इतिहास में ही पहली बार नहीं बल्कि पिछले 40 लाख वर्षों में पहली बार हुआ है। औद्योगिक क्रान्ति की शुरुआत में यह लगभग 280 पीपीएम हुआ करता था।

कार्बन डाइऑक्साइड लगभग एक वर्ष में धरती के वातावरण में सब तरफ फैल जाती है और एक अदृश्य रजाई या कम्बल की तरह काम करती है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि एक कम्बल स्वयं अपने से गर्मी पैदा नहीं करता बल्कि हमारे शरीर की गर्मी को रोक लेता है। उसी प्रकार कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड, धरती से टकराकर वापस जाती हुई सूर्य की उन अदृश्य गर्म विकिरणों को रोक लेती है। यही ग्लोबल वार्मिंग या वैश्विक तपन है। प्रत्येक वर्ष धरती के वातावरण में 50 अरब (एक अरब = सौ करोड़) टन कार्बन डाइऑक्साइड एवं अन्य गैसों का इकट्ठा होना ऐसा ही है जैसे एक और रजाई या कम्बल हमने स्वयं धरती को ओढ़ा दिया है। एक अधिक मोटा कम्बल अधिक गर्मी रोकेगा।

ग्रीनहाउस गैसों के द्वारा रोकी गई अतिरिक्त गर्मी का 90 प्रतिशत से अधिक समुद्रों में चली जाती है क्योंकि पानी में गर्मी सोख लेने की उच्च क्षमता होती है। समुद्रों का और अधिक गर्म होना जलवायु चक्र और वर्षा चक्र में बाधा पहुँचा रहा है। चक्रवातों का अधिक तीव्र बना रहा है और समुद्र के जलस्तर को और ऊँचा कर रहा है। जो 7 प्रतिशत अधिक गर्मी वातावरण में बचती है वह ग्लेशियरों (पर्वतों पर जो बर्फ की नदियाँ होती हैं उसे ग्लेशियर कहा जाता है) बर्फ को पिघलाती है और मिट्टी को गर्म करती है।

समय-समय पर दुनिया भर में पृथ्वी की सतह पर हवा के तापमान का औसत के द्वारा ग्लोबल वार्मिंग को मापा जाता है। वातावरण कितना अधिक गर्म हो गया है? 1961-1990 के बीच भारत 24.87 डिग्री सेल्सियस औसत गर्म हुआ करता था। यह उन वर्षों में सभी मौसमों का औसत है; ध्यान देने की बात है कि इसमें लद्दाख की ऊँचाइयों की ठंड एवं दक्षिण भारत की गर्मी दोनों शामिल हैं। इस सदी में 2001-2010 के पहले दशक तक यह औसत 25.51 डिग्री तक बढ़ गया। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यद्यपि इन वर्षों में तापमान अपेक्षा के अनुसार कम एवं ज्यादा हुआ लेकिन किसी भी एक वर्ष में यह 1960-61 के औसत तापमान से अधिक ठंडा नहीं हुआ। सबसे ठंडा वर्ष 1960-61 के औसत से 0.4 डिग्री अधिक गर्म था और सबसे गर्म वर्ष 1960-61 के औसत से 0.93 डिग्री अधिक गर्म था।

पूरी दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग की क्या स्थिति है? इसकी तुलना 18वीं सदी के औद्योगिक क्रान्ति की शुरुआत के समय से की जाती है। दुनिया उस समय से 1 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म हो गई है। उस समय धरती का औसत 13.5 डिग्री सेल्सियस से जरा ज्यादा था जो अब 14.5 डिग्री सेल्सियस है। उल्लेखनीय है कि आर्कटिक, उत्तरी अफ्रीका, दक्षिण यूरोप और हिमालय जैसे क्षेत्र और इकोसिस्टम्स (इस शब्द को हिन्दी में पारिस्थितिकी तंत्र कहा जाता है यानी यह विशेष प्राकृतिक प्रणालियाँ हैं जिनमें निर्जीव तत्व व जीवित प्राणियों का मिश्रित अवस्थान होता है) इस औसत से बहुत अधिक गर्म हो रहे हैं।

एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु यह है कि कार्बन डाइऑक्साइड के वातावरण में जाने के तुरन्त बाद ही ये पूरी गर्मी की वृद्धि नहीं होती है। गर्मी का समुद्र में पहुँचना और पूरी सतह के गर्म होने में कुछ वर्षों का अन्तराल रहता है। इसलिये पिछले कुछ दशकों में हमने जो अरबों टन कार्बन डाइऑक्साइड की वृद्धि की है उससे उत्पन्न पूरी गर्मी अब भी महसूस करना बाकी है।

अनिवार्य रूप से आने वाले समय में वर्तमान में हुए 1 डिग्री वृद्धि से इस गर्मी में 0.6 डिग्री सेल्सियस या सम्भवतः उससे भी अधिक वृद्धि होगी ।

अखबारों द्वारा अक्सर ‘ग्लोबल वार्मिंग’ और ‘जलवायु परिवर्तन’ शब्दों का प्रयोग इस प्रकार किया जाता है कि यह पर्यायवाची है परन्तु ऐसा नहीं है। ग्लोबल वार्मिंग की चर्चा अभी ऊपर की गई है। जबकि जलवायु परिवर्तन का सम्बन्ध समय के साथ मौसम का चरित्र, वर्षा, तूफान आदि में आ रहे बदलाव से है। यह ग्लोबल वार्मिंग के सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम है। आर्कटिक महासागर में समुद्री बर्फ का पिघलना, समुद्र का पानी गर्म होना, मिट्टी का अधिक सूखना आदि ग्लोबल वार्मिंग के ही परिणाम हैं। इनमें से कुछ जलवायु परिवर्तन में योगदान करते हैं लेकिन यह जलवायु परिवर्तन नहीं है।

ग्लोबल वार्मिंग के लिये कौन जिम्मेदार है?


इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिये विभिन्न तरीके अपनाए जा सकते हैं।

एक तरीका यह है कि विभिन्न आर्थिक गतिविधियों का परीक्षण किया जाये। दुनिया भर में, 2010 में, कार्बन डाइऑक्साइड एवं अन्य गैसों का कुल 5000 करोड़ टन उत्सर्जन हुआ। इसके 32 प्रतिशत के लिये औद्योगिक एवं विनिर्माण कार्य जिम्मेदार थे। 24 प्रतिशत के लिये कृषि एवं वनों का काटा जाना, 19 प्रतिशत के लिये घर एवं इमारतें, 14 प्रतिशत के लिये परिवहन एवं 11 प्रतिशत के लिये अन्य ऊर्जा जिम्मेदार रहे (जलवायु परिवर्तन पर अध्ययन के लिये एक अन्तरराष्ट्रीय संगठन गठित किया गया है - (इंटरगवर्नमेंटल पैनेल ऑन क्लाइमेट चेंज जिसे संक्षिप्त में आईपीसीसी कहा जाता है एवं यह आँकड़े इस संगठन द्वारा किया गया शोध से प्राप्त हुआ है)। यद्यपि परिवहन से कम उत्सर्जन हो रहा है यह सबसे तेजी से बढ़ते हुए क्षेत्रों में से एक है।

कृषि पर जलवायु परिवर्तन का खतरा बढ़ोत्तरी को जानने का एक और तरीका यह है कि यह बढ़ोत्तरी कौन से भौगोलिक क्षेत्र से हो रही है, यह जानें। केवल 30 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र से एवं 70 प्रतिशत शहरी क्षेत्र से हो रही है। शहरी क्षेत्र में एयर कंडीशनिंग यानी वातानुकूलन एवं मॉल्स में अत्यधिक अनुपयोगी खपत होती है। मुम्बई में 35 प्रतिशत से अधिक बिजली का उपयोग व्यक्तिगत एवं व्यावसायिक एसी चलाने में होता है। शहरों में पुल, मेट्रो एवं फ्लाईओवर जैसे बहुत सारे विनिर्माण एवं अन्य संरचनाएँ हैं, जो लोगों द्वारा उपयोग में लाई जाती हैं एवं इन्हें बनाने में बहुत सारी ऊर्जा एवं संसाधनों की खपत हो जाती है।

तीसरा और बिल्कुल सामान्य तरीका है यह जाँचना कि कौन सा देश कितनी अधिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के लिये जिम्मेदार है।

वर्ष 2013 में कुल 3400 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में कंगारू की तरह छलांग लगाते हुए, चीन द्वारा लगभग 1000 करोड़ टन उत्सर्जन ने संयुक्त राज्य अमरीका द्वारा 530 करोड़ टन को पीछे छोड़ दिया। तीसरे नम्बर पर भारत द्वारा 200 करोड़ टन उत्सर्जन था। इसके बाद रूस द्वारा 180 करोड़ टन और जापान द्वारा 140 करोड़ टन था। मीथेन और अन्य गैसों सहित भारत द्वारा कुल उत्सर्जन 300 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर किया गया। यदि प्रति व्यक्ति औसत बढ़ोत्तरी का आकलन किया जाये तो संयुक्त राज्य अमेरिका व यूरोप द्वारा की गई उत्सर्जन की बढ़ोत्तरी, चीन द्वारा की गई उत्सर्जन की बढ़ोत्तरी से बहुत ज्यादा है। यदि ऐतिहासिक उत्सर्जन बढ़ोत्तरी का आकलन किया जाये कि औद्योगिक क्रान्ति की शुरुआत के समय से प्रत्येक देश ने अब तक कुल कितना उत्सर्जन किया तो अमरीका व यूरोप में यह और भी ज्यादा होंगे।

इन तरीकों में प्रत्येक की अपनी विशेषता है और यह हमारी न्यायपूर्ण माँगों को और मजबूत करेगी कि लोक परिवहन की सुविधा और बढ़ाया जाये या कि सम्पन्न व विकसित देश उनके द्वारा पारिस्थितिकी तंत्र को पहुँचाए गए उन नुकसान का भुगतान करे जो उनके कारण हुआ है। लेकिन यह तरीके ग्लोबल वार्मिंग के केन्द्रीय समस्याओं का समाधान करने के लिये पर्याप्त नहीं है। ग्लोबल वार्मिंग के मूल में आधुनिक अर्थव्यवस्था को चलाने वाली शक्तियाँ हैं जैसे कि लाभ कमाने एवं विकास में वृद्धि के लिये होड़। भारत और दुनिया में आय, उपभोग एवं धन एकत्रण में लोगों के बीच बढ़ता हुआ अन्तर भी ग्लोबल वार्मिंग के पीछे प्रामाणिक कारण हैं।

समस्या की जड़ें


कुछ लोगों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग हजारों साल पहले ही शुरू हो गई थी। मनुष्य जैसे-जैसे दुनिया भर में फैले, वैसे-वैसे वे वहाँ घर बसाने एवं खेती और जलाऊ लकड़ी के लिये जंगल काटना शुरू किया। एक काटा हुआ पेड़ सड़ते समय वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है। फिर चीन और भारत में चावल की खेती में सैकड़ों वर्षों से ठहरा हुआ पानी उपयोग में लाया जाता रहा और नदियों में आये बाढ़ का पानी का भी खेती में उपयोग किया गया जिससे मीथेन उत्सर्जित होती रही। इसलिये ऐसे कहने वाले लोग पूरी तरह से गलत भी नहीं हैं। फिर भी 18वीं सदी के आखिरी समय में भूगर्भ से प्राप्त ईंधन की शक्ति से विकसित हुआ औद्योगिक पूँजीवाद, ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार में कुछ महत्त्वपूर्ण बदलाव लाया है जिसे समझे बिना इस चर्चा को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है।

पहला बदलाव था ऊर्जा के संसाधन के उपयोग मेंः यद्यपि कुछ सदियों पहले से कोयला, लंदन एवं कुछ अन्य शहरों में उपयोग में था फिर भी 18वीं सदी के आखिरी समय में इंग्लैंड में इसका उपयोग कारखाना प्रणाली के विस्तार और रेलवे के विकास में बहुत बड़े पैमाने पर तथा अलग तरह से होने लगा। इसके बाद खनिज तेल को जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन सन 1870 में शुरू हुई और प्राकृतिक गैस के उपयोग से सन 1885 में; ये तीनों भूगर्भ से प्राप्त ईंधन बहुत ऊर्जा-वान और अधिक मात्रा में कार्बन वाले हैं।

दूसरा बदलाव था कि लाभ प्राप्ति, किसी भी तरह से क्यों न हो, विकास की प्राथमिक चालक शक्ति हो गई। कम्पनियाँ सबसे सस्ते श्रम और कच्चे माल का उपयोग करके लाभ कमाते हैं। मजदूरों से अधिक लम्बे समय तक और तेजी से काम करवा कर लाभ लेते हैं। कम्पनियाँ सामान्य जनता के सार्वजनिक संसाधनों, जैसे कि जंगल, समुद्र तट और नदियों पर अपना नियंत्रण प्राप्त करके, प्रकृति के शोषण से भी लाभ लेती हैं। यह संयोग की बात नहीं है कि चीन पिछले कुछ ही वर्षों में सबसे अधिक कार्बन डाइऑक्साइड की उत्सर्जन में बढ़ोत्तरी करने वाला देश हो गया है। क्योंकि दुनिया भर से बहुत सारे विनिर्माण कार्य चीन में ले जाये गए क्योंकि वहाँ बहुत सारा कोयला और सस्ता श्रम उपलब्ध है। इसके लिये चीन के लोगों को और संसार को बहुत बड़ी पारिस्थितिकीय कीमत चुकानी पड़ी है। यह इसलिये कि व्यापारिक निगम लोगों एवं पर्यावरण की स्थिति बिगड़ने की परवाह किये बिना समाज एवं पर्यावरण के हितों की अनदेखी कर अपने लाभ बढ़ाने के प्रयास में ही रहते हैं।

वे अपने व्यापार को बढ़ाने के लिये लाभ में से कुछ राशि कम्पनी में फिर से निवेश कर देते हैं। यह बचत का निवेश एक प्रबन्धक, व्यापारी की व्यक्तिगत जिद या चाहने पर निर्भर नहीं है बल्कि सभी के लिये एक अनिवार्यता है। जो कम्पनियाँ ऐसा नहीं करती हैं, कुछ समय के बाद उनमें स्थिरता आ जाती है और वे बन्द हो जाती हैं या फिर दूसरी कम्पनियों द्वारा निगल ली जाती हैं। और चूँकि यह एक अनिवार्यता है, इसलिये वे फिर से निवेश करने और विस्तार करने को रोकने का प्रयास भी नहीं कर सकते हैं। कमाए गए लाभ में से बचत कर निवेश और विकास करना पूँजीवादी विकास का एक अभिन्न हिस्सा है।

परिणामस्वरूप, विश्व की अर्थव्यवस्था, जो सन 1700 से हजारों साल पहले की दौर में मुश्किल से प्रति वर्ष केवल 0.1 प्रतिशत बढ़ी थी, उसके बाद के समय में बहुत तेजी से बढ़ी है। एक राज्य, एक देश, अथवा पूरी दुनिया के आर्थिक विकास की गणना करने हेतु किये गए उत्पादन एवं प्रदत्त की गई सेवाओं के कुल मूल्य में वृद्धि, गिरावट का दर या एक समयावधि (सामान्य रूप से एक साल) की कुल आय का आकलन किया जाता है। विश्व की अर्थव्यवस्था का विकास जो सदियों पहले बहुत धीमी थी, 1700 और 2012 के बीच बहुत तेजी से 1.6 प्रतिशत प्रतिवर्ष और पिछले साठ वर्षों में 3.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष से भी अधिक की दर से विकसित हुई है।

सन 1820 में वैश्विक उत्पादन 694 अरब डॉलर था, 1917 में यह 27 खरब (एक खरब = एक सौ अरब) डॉलर हो गया था, 1973 तक यह 160 खरब डॉलर और 2003 में 410 खरब डॉलर हो गया था। वर्तमान में विश्व का वार्षिक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) यानी सभी देशों द्वारा अपने देश के अन्दर किये गए कुल आर्थिक कार्य लगभग 730 खरब डॉलर है। यह लगातार और ऊँची दर पर बढ़ता रहता है। जाहिर है कि विकास दर अगर इस कदर बढ़ेगा तो उसके कारण हो रहा कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन भी बेतहाशा बढ़ेगा।

18वीं सदी के मध्य से उत्सर्जित कुल कार्बन डाइऑक्साइड का आधा उत्सर्जन केवल पिछले 30 वर्षों में हुआ है।

वर्तमान में विश्व की आर्थिक विकास दर 3 प्रतिशत है और यह उम्मीद है कि यह वार्षिक दर सन 2050 तक जारी रहेगी। जीडीपी के समान कार्बन उत्सर्जन की दर में बढ़ोत्तरी नहीं होती है। यह इसलिये कि मनुष्य द्वारा की जा रही विभिन्न गतिविधियों में ऊर्जा की खपत का प्रकार भिन्न-भिन्न होती है एवं इसलिये कार्बन उत्सर्जन की दर भी भिन्न होती है। पिछले 25 वर्षों में पूरी दुनिया में वैश्विक जीडीपी विकास दर में प्रत्येक 1 प्रतिशत वृद्धि की तुलना में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में 0.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है अर्थात जीडीपी विकास दर से आधा। अब चीन में कोयले की खपत कम हो जाने के कारण इसमें थोड़ा सुधार हो सकता है। फिर भी 3 प्रतिशत जीडीपी की वार्षिक वृद्धि दर का मतलब है कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में औसतन 1-1.5 प्रतिशत की वृद्धि।

एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु को फिर से दोहराते हुए यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि पूँजी एकत्रित करने और लाभ कमाने की प्रवृत्ति ही दुनिया की पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की संचालक शक्ति है और इसीलिये यह ग्लोबल वार्मिंग की जड़ है। जो लोग राष्ट्र-राज्य या दूसरे किसी सन्दर्भ में इसका विश्लेषण करते हैं, वे इस प्रमुख तर्क को नजरअन्दाज कर देते हैं।

अधिकांश बैठकों में, जिनमें मैं शामिल हुआ हूँ, लोग पूँजीवादी औद्योगिक विकास एवं ग्लोबल वार्मिंग के बीच इस घनिष्ट सम्बन्ध के बारे में मौन रहे हैं। यदि आपने पहले ही समस्या को सही तरीके से समझा या परिभाषित नहीं किया तो आप इसके निराकरण की उम्मीद नहीं कर सकते हैं।

घरेलू उपभोग और वर्ग


अपने घरों में नियमित रूप से हम कितने उपकरणों का उपयोग करते हैं? कितने बल्ब, पंखे, वाटर हीटर, टोस्टर, रेफ्रिजरेटर, एसी? क्या साइकिल, बस अथवा कार चलाते हैं? कार्बन का उत्सर्जन इन सब बातों पर निर्भर करता है। जब हम शहर से बाहर जाते हैं तो क्या बस, ट्रेन से या हवाई यात्रा करते हैं। उदाहरण के लिये यदि आप वारंगल से दिल्ली की 1,545 किमी की रेल यात्रा करते हैं तो कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का आपका हिस्सा लगभग 35 किग्रा होगा। एक हवाई जहाज में इसी दूरी के लिये एक यात्री 200 किग्रा से ज्यादा उत्सर्जित करेगा।

निश्चित रूप से ये सब बातें किसी की आय और उपभोग पर निर्भर करती हैं। भारत में सरकारी नीतियों के कारण पिछले 25 वर्षों में लोगों के बीच आय और सम्पत्ति में बहुत बड़ा अन्तर गहरा गया है। अति धनवानों की संख्या में एकाएक विस्फोटक रूप से बढ़ोत्तरी हुई है, जबकि उसी समयावधि में अगर महंगाई के असर को अलग करके कारखानों में काम करने वालों की मजदूरी का आकलन किया जाये, जिसे वास्तविक मजदूरी कहा जाता है, तो 1996 की तुलना में 2014 में 5 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह बढ़ती हुई असमानता का असर, ऊर्जा तक पहुँच और उसका उपयोग करने में दिखाई देता है। जैसे कि भारत की बिजली उत्पादन क्षमता में। यद्यपि पिछले दशक में 3,00,000 मेगावाट तक तीन गुना बढ़ोत्तरी हुई है, फिर भी शहरी क्षेत्रों में 2.5 करोड़ लोग सहित 30 करोड़ लोग अपने घरों में अभी तक बिजली नहीं ले पाये हैं और अन्य 30 करोड़ लोगों को कुछ ही घंटे प्रतिदिन बिजली मिलती है।

एक साथी ने दिल्ली के कॉलेजों में कार्यशालाओं का आयोजन यह मापने के लिये किया कि एक घर-परिवार से कितनी कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। उनकी मदद से संख्या पर काम करते हुए हमने पाया कि दिल्ली का मध्यम वर्ग का प्रत्येक व्यक्ति प्रतिवर्ष 4-5 टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करता है जबकि भारत में एक धनी वर्ग का व्यक्ति उनसे बहुत ज्यादा, यूरोप के स्तर का उत्सर्जन करता है। आखिरकार गरीब वर्ग के कारखाना मजदूर या सुरक्षाकर्मी जो रु. 6000-7000 प्रति माह कमाते हैं, घरेलू नौकर जो उनसे भी कम कमाते हैं, खेतिहर मजदूर जो उनसे भी और कम कमाते हैं, ज्यादा-से-ज्यादा कितनी कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कर सकते हैं?

वर्तमान उपभोग और आय से होने वाला उत्सर्जन की असमानता व्यक्तियों के मालिकाना के उत्पाद और सम्पत्ति के विनिर्माण के दौरान हुए कार्बन उत्सर्जन से और ज्यादा हो जाता है। उदाहरण के लिये एक कार, जो दिल्ली में सिर्फ 10 प्रतिशत लोगों के पास ही है, को बनाने में लगने वाले एल्यूमिनियम के उत्पादन में 3500 किलो कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है, क्योंकि बाक्साइट के शुद्धिकरण और उससे एल्यूमिनियम बनाने की प्रक्रिया सघन ऊर्जा लगने वाली प्रक्रिया है। एक घर के सन्दर्भ में- किसी का बड़ा और पक्का मकान उतना ही ज्यादा उत्सर्जक है, क्योंकि सीमेन्ट उत्पादन एल्यूमिनियम उत्पादन जैसे ही कार्बन उत्सर्जन का बड़ा स्रोत है और भारत के ऊपरी मध्य वर्ग या अमीर वर्ग में कम-से-कम दो घर रखना सामान्य हो गया है, एक रहने के लिये और अन्य एक पहाड़ी क्षेत्र में छुट्टी मनाने के लिये। कुछ लोगों के पास तीन भी होते हैं। जब कि शहरी गरीब व्यक्ति को झुग्गी झोपड़ियों में ही रहना पड़ता है एवं अक्सर उन्हें वहाँ से भी भगाकर पक्के निर्माण किया जाता है।

ग्लोबल वार्मिंग के विश्लेषण के लिये राष्ट्र-राज्य के ढाँचा को इसलिये चुना जाता है ताकि आय और सम्पत्ति के इस विशाल अन्तर को अनदेखा किया जाये। जैसे- भारत सरकार कहती है कि भारत में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन कम है। यह हमारी सरकार का देश की विशाल गरीबी के पीछे छुपने का प्रयास है। कुछ साल पहले योजना आयोग की एक रिपोर्ट से प्रकट हुआ कि 80 करोड़ भारतीय प्रतिदिन 20 रुपए से कम की उपभोग करते हैं। ग्लोबल वार्मिंग को कम करने को लेकर अन्तरराष्ट्रीय वार्ताओं में हमारी सरकार ने देशों के बीच इसके लिये जिम्मेदारी में न्यायपूर्ण बँटवारे के लिये सही तर्क दिया है। क्योंकि विकसित देश अधिक कार्बन उत्सर्जन किये हैं और कर रहे हैं इसलिये उन्हें इसको कम करने के लिये अधिक खर्च और कार्य करने होंगे एवं उन्हें विकासशील देशों को भी मदद करनी होगी। लेकिन न्यायपूर्ण बँटवारे का सिद्धान्त केवल देशों के बीच ही नहीं बल्कि देश के भीतर भी लागू होना चाहिए। यानी भारत में अमीर वर्ग को वर्तमान में उनके द्वारा किये जा रहे उपभोग में कमी करनी चाहिए, क्योंकि यही एक तरीका है जिससे गरीब लोगों को पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचाए बिना अपना जीवन सुधार करने के लिये अवसर मिलेगा। यह कैसे सुनिश्चित किया जाये कि ग्लोबल वार्मिंग को कम करके भी अच्छा काम और रोजगार के अवसरों में बढ़ोत्तरी हो ताकि करोड़ों लोगों को अच्छी आजीविका मिले, यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है।

ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव


भारत और अन्य जगहों पर ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव जानने से पहले कुछ बातों को ध्यान में रखना उपयोगी होगाः

1. 1970 के दशक के मध्य लगभग 40 साल पहले दुनिया के विभिन्न हिस्सों में इसके प्रभाव की शुरुआत का अनुभव किया जाने लगा।

2. प्रदूषण के अधिकांश अन्य रूपों से अलग कार्बन डाइऑक्साइड का प्रभाव इसके स्रोत से बहुत दूर तक महसूस किया जा सकता है। अमेरिका में उत्सर्जित होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड मालदीव को प्रभावित करता है।

3. कार्बन डाइऑक्साइड का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा वातावरण में हजारों साल तक रहता है। इसका उत्सर्जन बन्द होने के बाद भी जलवायु परिवर्तन एक हजार साल के लिये होता रहता है। इसलिये जलवायु परिवर्तन स्थायी रूप धारण कर लिया है एवं यही नई ‘सामान्य’ स्थिति बन गई है।

4. इसके प्रभाव और अधिक बुरे होंगे, जिनमें कुछ तो अनिवार्य हैं। ये और अधिक नहीं बिगड़े और परिस्थिति हमारे नियंत्रण से बाहर न हो, इसके लिये तत्काल हमारे हस्तक्षेप की जरूरत है।

भारत में ग्लोबल वार्मिंग के प्रमुख प्रभाव


छोटे और सीमान्त किसान, शहरी गरीब और दूसरे अन्य समुदाय के लोग द्वारा झेली जा रही अन्य समस्याओं को ग्लोबल वार्मिंग और विकराल कर देती है- बीज, खाद और खेती में लगने वाली अन्य सामग्रियों की और ऊँची कीमतें; जमीन के पानी का गिरता स्तर; छोटे स्तर पर खेती का कम व्यवहार्य होना, दलित समुदाय के लोगों में भूमिहीनता, सामुदायिक संसाधनों का औद्योगिक और गृह निर्माण कम्पनियों द्वारा अधिग्रहण किया जाना, आदिवासियों से गैर आदिवासियों को भूमि का हस्तान्तरण, महिलाओं के नाम पर जमीन का न होना, बढ़ती कीमतें, आदि। भारतीय समाज में बरकरार अनेक असमानताओं से जलवायु परिवर्तन पर प्रभाव भी पड़े हैं और इस परिवर्तन के कारण असमानताएँ और विकराल भी हुए हैं। लाखों छोटे और सीमान्त किसानों, जो देश के कुल किसानों के 87 प्रतिशत हैं, खेतिहर मजदूर, गरीब महिलाएँ और अन्य सामाजिक समूहों के लिये जलवायु परिवर्तन आखिरी लाठी होगी जो उनकी पीठ तोड़ देगी। यह न्याय के सबसे बुरे उल्लंघनों में से एक है कि जो ग्लोबल वार्मिंग के लिये सबसे कम जिम्मेदार है वह ही उसका बोझ सबसे ज्यादा उठाते हैं।

1. अनियमित बारिश और ओले- भारत में जलवायु परिवर्तन का सबसे व्यापक प्रभाव वर्षा पर हुआ है। किसानों का कहना है कि पहली बार 15-20 साल पहले उन्होंने इसमें बदलाव को देखा था लेकिन पिछले 5-6 सालों में इसमें तेजी आई है।

आजकल बारिश तब होती है जब नहीं होनी चाहिए और जब होनी चाहिए तब नहीं होती है। कुछ स्थानों पर दक्षिण पश्चिम मानसून जल्दी आने लगा है और अन्य जगहों पर देरी करता है। किसान बारिश की आस में फसल बोते हैं पर या तो वह नहीं आती है या देर से आती है। या फिर फसल कटने या खलिहान के समय बहुत तेज बारिश होती है जो खड़ी या कटी फसल और चारे को नुकसान पहुँचाती है। ओलावृष्टि में भी पहले से वृद्धि हुई है, उस क्षेत्र में भी जहाँ पहले कभी नहीं हुई। लगातार सन 2013, 2014, और 2015 के बसन्त के मौसम में इस बेमौसम की बारिश से लाखों किसान प्रभावित हुए एवं बहुतों को नुकसान हुआ। 2015 में इसने 15 राज्यों में 1.8 करोड़ हेक्टेयर जमीन की फसल, जो कि पूरे रबी फसल के रकबे की विशाल 30 प्रतिशत है, को तबाह किया एवं इस कारण से 20,000 करोड़ रुपए का घाटा हुआ। इससे किसानों की आत्महत्याओं की जैसे बाढ़ आ गई।

यह चिन्ता की बात है कि इतनी कठोरता के साथ लगातार खेती को नुकसान हो रहा है। पिछले 4-5 सालों में खरीफ और रबी फसलों पर हर साल बुरा असर हुआ है। यदि एक साल में सूखा पड़ा, तो दूसरे में ओला गिरा और तीसरे में तेज बारिश हुई। किसानों को लगातार इन संकटों से मुकाबला करना पड़ रहा है। भारत में आवश्यक फसलें आज भी वर्षा पर अत्यधिक निर्भर करती हैं; जैसे कि धान और गेहूँ के फसल का आधा हिस्सा सिर्फ वर्षा पर निर्भर है। जहाँ भूजल उपलब्ध नहीं है वहाँ सूखी जमीन वाले छोटे और सीमान्त किसान, जो अधिकांश गरीब हैं, जलवायु परिवर्तन का यह आघात सहने को मजबूर हैं। ये लोग अक्सर दलित या पिछड़ी जाति या आदिवासी समुदाय के लोग होते हैं। इसके अलावा जब खेती को बड़े पैमाने पर चोट पहुँचती है तो खेतिहर मजदूरों को भी आमदनी का नुकसान होता है। ऐसे समय में उन्हें सरकार द्वारा जल्द-से-जल्द मुआवजा देने के बजाय उनको नजरअन्दाज किया जाता है।

2. कम समय में बहुत तेज बारिश- पहले एक मानसून सत्र में एक समान तो नहीं पर उचित और भरोसेमन्द बारिश हुआ करती थी। किसान इसकी असमानता से परिचित होते हुए इसके प्रकार के अनुसार विभिन्न संस्कृतियों में इसका स्थानीय नामकरण करते हैं। परन्तु अधिकांश स्थानों में आजकल कई दिनों तक बारिश नहीं होती है और फिर कुछ ही घंटों में या 1-2 दिनों में बहुत सी बारिश हो जाती है। यह सब समुद्र की गर्म सतह के तापमान से जुड़ा हुआ है। यह इसलिये भी होता है, क्योंकि गर्म हवा में अधिक नमी को रोकने की क्षमता होती है। थोड़ी और गर्म होने पर यह और तेजी से फटती है। इस तेजी से फटने से होने वाली बारिश खड़ी फसलों को नुकसान पहुँचाती है, फसल के नए पौधों को प्रभावित करती है और खेत की ऊपरी सतह की मिट्टी को खराब करती है। यह बाढ़ होने का कारण बनती है और लोगों की पानी की उपलब्धता को प्रभावित करती है।

किसी एक तेज बारिश या सूखे की घटना के लिये जलवायु परिवर्तन को सम्भावित कारण नहीं बताया जा सकता है क्योंकि जलवायु परिवर्तन एक प्रक्रिया है, न कि एक घटना। फिर भी 2013 में उत्तराखण्ड में आई विशाल बाढ़ सम्भवतया देश के लोगों द्वारा सामना किया गया सबसे खराब जलवायु परिवर्तन आपदा है। एक विशाल क्षेत्र में बहुत तीव्र बारिश की मार पड़ी, वह भी 3 दिनों तक। राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण ने कहा कि 11,000 लोग मारे गए होंगे। मरने वालों की वास्तविक संख्या का आकलन कभी नहीं हो पाएगा क्योंकि पर्यटन के मौसम में कई जगहों से आये नेपाली और भारतीय प्रवासी कामगार वहाँ काम कर रहे थे। सबसे ज्यादा जन-जीवन की हानि केदारनाथ, रामबाड़ा और उसके आस-पास हुई। केदारनाथ के ठीक ऊपर तीव्र बारिश से एक पहाड़ी झील चोराबारी की दीवार फट गई। पानी की बड़ी लहरें नीचे की ओर दौड़ीं और शहर को बर्बाद करते हुए चीजों और व्यक्तियों को या तो बहा ले गई या मिट्टी और चट्टानों के बीच दबा दी।

उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली और पिथौरागढ़ जिलों और उस से भी आगे के सैकड़ों गाँव तबाह हो गए। विभिन्न नदी घाटियों में गाँव के बाद गाँव पानी में डूब गए, घर मकान बह गए, खड़ी फसलें नष्ट हो गई, खेतों में नदियों का पानी और मलबा भर गया। जिन पालतू पशुओं पर स्थानीय निवासी दूध और खाद-गोबर के लिये निर्भर करते हैं वह भी पानी में डूब गए। पर्यटन पर आघात हुआ जिस पर लाखों स्थानीय और प्रवासी कामगार श्रमिक नौकरी और आय के लिये निर्भर करते थे। बच्चों के स्कूल जाने की स्थिति नहीं रही। विशेष रूप से महिलाओं पर बहुत बुरा असर पड़ा क्योंकि उन्हें ही घर सम्भालना, खाना पकाना और मवेशियों के लिये चारे की व्यवस्था करनी होती है।

जैसा कि सामान्यतः होता है, अन्धाधुन्ध विकास कार्यों से ही उत्तराखण्ड में विनाश की इतनी बुरी स्थिति बनी है। जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण के लिये पहाड़ियों में विस्फोट करना, पत्थरों का भराव करना, सड़कों का असुरक्षित रूप से चौड़ा किया जाना, नदियों के किनारे पर्यटकों के लिये अस्थायी घटिया निर्माण किया जाना, इसके उदाहरण हैं। यह चिन्ता का विषय है कि भारत के हिमालय क्षेत्र में पश्चिम में हिमाचल प्रदेश से लेकर पूर्व में अरुणाचल प्रदेश तक विशाल जलविद्युत परियोजनाओं और इसी के तरह अन्य अनियंत्रित विकास कार्यों की अनेक परियोजनाएँ क्रियान्वित किया जा रहा है।

3. अनेक स्थानों पर सूखा- मध्य भारत के उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश राज्यों में विस्तृत बुन्देलखण्ड के कुछ हिस्सों में पिछले 15 सालों से सूखे की स्थिति बनी हुई है। ग्लोबल वार्मिंग देश के आन्तरिक क्षेत्रों में सूखा के प्रकोप को बढ़ाता है और पहले से ही सूखे मौसम वाले जगहों पर मिट्टी को और सूखा कर देता है। जब कुछ साल पहले हमारी टीम बुन्देलखण्ड गई तो देखा गया कि खेती कार्य पूरा नष्ट हो चुका था। बड़ी झीलें पहली बार सूख गईं, लाखों खेतिहर मजदूर, छोटे किसान और गरीब महिलाएँ अपने पूरे परिवार के साथ मजदूरी के लिये पलायन कर रहे थे। पानी और चारे के अभाव में पशुधन मौत को सौंप दिया जा रहा था। जो सर्वेक्षण टीमें 2015 में बुन्देलखण्ड गईं उसने पाया कि वही भयावह स्थिति बनी हुई है।

भारत के उन हिस्सों में भी अब सूखा होने लगा है जहाँ पहले मुश्किल से ही या कभी भी सूखा नहीं पड़ा- उत्तरपूर्व का हिस्सा, सन 2000 से झारखण्ड का हिस्सा, केरल में अभी-अभी। यह अब बार-बार होने लगा है कि एक स्थान पर सूखा है और समीप के स्थान पर बाढ़। सन 2015 में भारत अपने पिछले दशकों में सबसे बुरे सूखाकाल से ग्रस्त था; 13 राज्यों के 40 करोड़ लोग इससे बुरी तरह प्रभावित हुए थे।

महिलाओं को इससे बहुत ज्यादा धक्का लगता है। बुन्देलखण्ड में हमने देखा कि बुजुर्ग महिलाएँ कुछ बचे-खुचे चालू हैण्डपम्पों का उपयोग नहीं कर पाती हैं क्योंकि पानी का स्तर बहुत गहराई तक पहुँच गया है जहाँ से पानी खींचने की ताकत उनमें नहीं है। जब खाद्य सामग्री की आपूर्ति घटती है तब पुरुषवादी समाज व्यवस्था में महिलाओं को कम खाकर ही सन्तोष करना पड़ता है। क्योंकि गरीब महिलाएँ घर और बाहर के सारे काम करती हैं - पानी लाना, किसानी के कार्य, चारा और जलाऊ लकड़ी की व्यवस्था, मजदूरी के कार्य- इसलिये जलवायु परिवर्तन का प्रकोप सब से अधिक उन्हीं पर पड़ता है।

4. हिमालय/ गढ़वाल पहाड़ी/ हिमाचल क्षेत्र में- औसत रूप से हिमालय 1.5 डिग्री सेल्सियस गर्म हुआ है जोकि भारत के तापमान बढ़ने की औसत से दो गुना से ज्यादा है। यह बढ़ोत्तरी सर्दियों के मौसम में और भी ज्यादा है; पूरे भारत में ठंड का मौसम छोटा होता जा रहा है और उसका तापमान बढ़ता जा रहा है पर यह बदलाव ऊँचाई वाले क्षेत्रों में और अधिक है। कश्मीर और लद्दाख में कम सर्दी के कारण बर्फबारी में बदलाव आया है एवं मध्य और ऊँचाई के क्षेत्रों में बर्फबारी कम हो गई है। बर्फबारी के बजाय बारिश गिरने लगी है। या फिर गलत समय पर बर्फबारी होती है। छोटे ग्लेशियर गायब हो रहे हैं और बड़े ग्लेशियर ऊपर व नीचे से पिघलने लगे हैं। ये सब लोगों के पीने व सिंचाई के लिये पानी की उपलब्धता पर गम्भीर प्रभाव डालते हैं। कहीं झरने सूखने लगे हैं जिन पर स्थानीय लोग निर्भर हैं और कहीं पहाड़ी क्षेत्रों में जंगल में आग लगने की घटनाओं और कीटों में वृद्धि हुई है।

ग्लोबल वार्मिंग अन्य प्रजातियाँ भी इससे प्रभावित हुए हैं। ओक के पेड़, सेब के पेड़, सब्जियाँ, रेंगने वाले जीव, तितलियाँ, पक्षी और अन्य पशु-वर्ग ये सभी अपने रहने के अनुकूल तापमान की खोज में पहाड़ की ढलाई पर और ऊपर चढ़ने लगे हैं। चारागाह सिमट गए हैं और अल्पाइन प्रजाति विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रहे हैं। कई प्रजाति पहले से ही पहाड़ के शिखरों पर हैं, यदि इसी तरह गर्मी बढ़ती रही तो यह और कितनी दूर तक चढ़ सकेंगे?

5. स्वास्थ्य पर प्रभाव - कई बातें स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती हैं; जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को अलग करना न तो आसान है और न ही आवश्यक। जलवायु परिवर्तन के परिणामस्वरूप कम भोजन की उपलब्धता के कारण गरीब वर्ग में पोषण की कमी हो गई है। समय के साथ यह स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालता है। अन्य बातों के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले कुछ वर्षों में खाद्य सामग्री की कीमतों में वृद्धि हुई है। पिछले एक वर्ष में मध्य भारतीय क्षेत्र में खाद्य पदार्थों की कमी से गरीबों में मृत्यु दर और गम्भीर बीमारियों में बढ़ोत्तरी हुई है। दिल्ली व अन्य स्थानों पर यह शहरी गरीबों को भी चोट पहुँचा रहा है।

मैदानी इलाकों एवं पहाड़ी स्थानों में ठंड कम होने के साथ ही मच्छरजनित बीमारियाँ जैसे मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया का प्रकोप व्यापक हो जाता है; सामान्य रूप से कम ठंडे मौसम में वायरस और बैक्टीरिया अधिक पनपने लगते हैं। भारत के विभिन्न हिस्सों में गर्मी की लहरों की संख्या, क्षेत्र और अवधि में भी वृद्धि हुई है। इससे तीव्र गर्मी जनित तनाव, दीर्घकालिक किडनी रोग एवं मौतें होती हैं। विशेष रूप से गरीब और वृद्ध, बेघर और वे लोग जो लम्बे समय बाहर काम करते हैं, इससे अधिक पीड़ित होते हैं। उदाहरणतः हाल के वर्षों में ओड़िशा में गर्मी जनित दौरा के कारण मरने वालों की संख्या में वृद्धि हुई है। भविष्य में सबसे खतरनाक प्रभावों में से एक यह है कि भारत का विशाल क्षेत्र बल्कि पूरे दक्षिण एशिया का बड़ा हिस्सा, बसाहट के अयोग्य बन जाएगा।

अधिक गर्मी और नमी दोनों एक साथ मिलकर मनुष्य शरीर की अपनी गर्मी को वातावरण में छोड़ने की प्रक्रिया को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेगी।

6. तटीय क्षेत्र- भारत में पिछले 30 वर्षों में तटीय क्षेत्र के निवासियों ने अनुभव किया है कि समुद्र का पानी अपेक्षाकृत गर्म होने के कारण समुद्र तल का स्तर ऊँचा हुआ है- गुजरात, सुन्दरबन और अन्य कई जगहों पर। उनके लिये इसका प्रभाव यह हुआ है कि उनकी जमीन, गाँव और मकानों का धीमी गति से कटाव हुआ है एवं कुँओं और खेतों का लवणीकरण हुआ है जिस वजह से हजारों लोगों को आजीविका की खोज में पलायन करना पड़ा है।

बुन्देलखण्ड : पलायन की निरन्तरता करोड़ों लोग भारत के तटीय क्षेत्रों में फैली हुई उपजाऊ भूमि पर खेती, मछली पालन व अन्य आजीविका के कार्य करते हैं। वैसे भी वर्तमान में बड़े बन्दरगाह, वृहद विद्युत संयंत्र और अन्य परियोजनाएँ तटीय क्षेत्रों में लोगों को विस्थापित कर रहे हैं और खेती, पानी के स्रोत स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचा रहे हैं और तटरेखा का कटाव कर रहे हैं। अब इसमें जलवायु परिवर्तन का बुरा असर भी जुड़ गया है। कर्नाटक के मछुआरों ने बताया कि उनका समुद्र में जाना अब और अनिश्चित हो गया है क्योंकि बारिश और तूफान के आने का स्पष्ट संकेत अब नहीं मिलते हैं। समुद्र तल की लहरें और धाराएँ अप्रत्याशित रूप से बदल रही हैं। हवा के रुख के बारे में अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। मछली पकड़ने के बाद किये जाने वाले कार्य के लिये, जो अक्सर मछुआरिनें करती हैं, जगह सिमटती जा रही है, क्योंकि समुद्र पास आते जा रहे हैं।

समुद्र तल के तापमान में वृद्धि के कारण पूर्वी तटीय क्षेत्र में तूफानी लहरें व अधिक तीव्रता के तूफान आते हैं। सम्भवतया 2013 के आखिर में आया अधिक तीव्रता वाला फेलिन तूफान इसके कारण ओड़िशा और आन्ध्र प्रदेश में अधिक तबाही मचाई थी। तूफान के साथ आया हुआ खारा पानी बहकर भूजल में मिल गया और तटीय खेती और पीने के पानी के स्रोतों को नुकसान पहुँचाया।

7. शहरी क्षेत्रों पर प्रभाव- दुनिया भर में रहने वाले लोगों पर बढ़ती हुई गर्मी का प्रभाव पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन से खेती पर पड़ रहे प्रभाव के कारण खाद्य सामग्रियों की कीमतें बढ़ रही हैं। बाढ़ या फिर सूखे के कारण यह दुष्प्रभाव सबसे अधिक होते हैं। 2016 में महाराष्ट्र के लातूर में पड़े विशाल सूखे की स्थिति यह है कि लातूर शहर के निवासियों के लिये ट्रेन द्वारा पानी की आपूर्ति की जा रही है। मराठवाड़ा के कुछ शहर पानी के लिये तरस रहे हैं। दूसरी ओर हाइड्रोलॉजिकल चक्र (प्रकृति में पानी का चक्र जिसके कारण वर्षा होती है) में परिवर्तन के कारण कुछ शहर अति वर्षा की घटनाओं से बाढ़ की चपेट में आ गए हैं। हाल ही में दिसम्बर 2015 में चेन्नई में 1 दिन में 340 मिमि बारिश हुई और इससे पहले सितम्बर 2014 में श्रीनगर और जून 2005 में मुम्बई के अति वर्षा के उदाहरण तो है ही। इन सभी मामलों में, नालों के आस-पास के नीचे के इलाकों में झुग्गी बस्तियों के कम मजबूत मकानों में रहने वाले शहरी गरीबों, दिहाड़ी मजदूरी करने वाले लोग एवं गरीब महिलाओं को इनके आघातों का अधिक सामना करना पड़ा है। ऐसी घटनाओं में लाभ कमाने के लालच से किये गए नियोजन के विकास कार्यों के कारण जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव और बदतर हो जाते हैं- उत्तराखण्ड में नदी के बहाव पर स्थापित परियोजनाएँ, मुम्बई में बिल्डरों की लॉबी द्वारा नालों और जल निकासी पर बनाए गए मकान और चेन्नई में जलाशयों को मिट्टी से भरकर बनाए गए मकान। यह सवाल तर्कसंगत है कि यह विकास किसको लाभ पहुँचा रहा है?

लातूर जिले के गाँव की महिलाएँ पानी लाने के लिये दिन में कम से कम दो बार दो किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय करती है एक पुस्तिका में जिन अनेक तरहों से जलवायु परिवर्तन हमें प्रभावित कर रहा है उसके बारे में विस्तृत रूप से लिखना आसान नहीं है। जैसे कि आदिवासी और जंगलों पर निर्भर अन्य समुदाय पर ग्लोबल वार्मिंग के कारण उपयोगी वृक्षों और वनस्पतियों के मिश्रण में आया बदलाव का क्या प्रभाव पड़ता है। या ऐसे औषधीय पौधों, जिन पर वे निर्भर करते हैं, के विलोपन और उपयोगी वनस्पतियों का पहाड़ों के ऊपर की ओर ऊँची ढलान पर चले जाने का उन पर क्या असर पड़ता है?

हमें यह महसूस करने की आवश्यकता है कि जलवायु परिवर्तन के जो दुष्प्रभाव बताए गए हैं वे और अधिक तीव्रता से एक ही साथ होने वाले हैं। एक जगह समुद्र तल ऊँचा होगा तो दूसरी जगह सूखा, उसके आस-पास ही बाढ़, ओलावृष्टि और तेज बारिश होगी। यह हर जगह सबसे अधिक गरीबों की खाद्य सुरक्षा, पानी की उपलब्धता, आजीविका, भूमि, और स्वास्थ्य पर आघात करेगा।

संसार के अन्य जगहों पर प्रभाव


1. पिछले 20 सालों में समुद्र तल औसत रूप से 3.2 मिमि प्रतिवर्ष की दर से ऊँचा हो रहा है।

2. 1970 के दशक के मध्य से अफ्रीका के कुछ हिस्सों में लगातार सूखा पड़ा है।

3. अति हानिकारक प्राकृतिक घटनाओं में बढ़ोत्तरी 2010 में रूस में गर्मी की लहरों का चलना और पाकिस्तान में बाढ़ का आना; सन 2011 में संयुक्त राज्य अमरीका के टेक्सास में सूखा, 2013 में अर्जेंटीना में गर्मी की लहरों का चलना, 2014 में कैलिफोर्निया में आग लगना, जॉर्डन, लेबनान, इजराइल और फिलिस्तीन के कुछ हिस्से में सूखा और नेपाल में आई बर्फ की आँधी जिसने 43 लोगों और 21 पर्वतारोहियों की जान ले ली।

4. सितम्बर 2012 में आर्कटिक सागर में बर्फ बड़े पैमाने पर पिघल गई एवं इसका क्षेत्र एवं आयतन सबसे निम्न स्तर तक पहुँच गया।

5. समुद्र तल से 2000 मीटर की गहराई से अधिक नीचे तक महासागर का पानी गर्म हो गया है।

6. हिमालय के 800 ग्लेशियर्स, जिनकी निगरानी चीन, भारत और अन्य देशों में की जा रही है, में से 95 प्रतिशत 20,000 फीट की ऊपर की ऊँचाई पर पिघल रहे हैं।

7. दुनिया के सबसे गरीब देशों एवं चीन में खाद्य उत्पादन पर चोट पड़ने की शुरुआत हो रही है।

अन्य प्रजातियों पर प्रभाव


भारत में जैसे-जैसे सागर का पानी अधिक गर्म हो रहा है, वैसे-वैसे मैकरल (आइला, सार्डिन और अन्य मछलियाँ पूर्वी और पश्चिमी, दोनों तटों पर उत्तर की ओर चली गई हैं। पहले मैकरल मछली केरल के मालाबार में मिलती थी, अब वह 650 किमी उत्तर में गुजरात तट के पानी में पाई जाती है। यह मछली बंगाल की खाड़ी में पहले आन्ध्र तक मिलती थी परन्तु अब ओड़िशा के पास पाई जाती है। इसी प्रकार का उत्तर की ओर स्थान परिवर्तन गंगा नदी में पाई जाने वाली मछलियों के साथ हो रहा है।

1. उत्तर में भारत के पहाड़ पर अनेक प्रजातियों का और ऊँचाई की ओर विस्थापन- जैसे कि ओक वृक्ष, सेब के पेड़, पशु प्रजातियाँ और सब्जियों के साथ हो रहा है।

2. विनाशकारी कीटों का अधिक फैलाव और वन क्षेत्रों में खरपतवारों की बढ़ोत्तरी।

3. कई पौधों और पेड़ों में जल्दी और अनियमित फूल खिलना जैसे ओड़िशा और कर्नाटक में आम, पूरे हिमालय पर रोडोडेन्ड्रॉन्स फूल और कश्मीर में केसर।

4. समुद्र तल का पानी गर्म होने के कारण मछलियों के अंडा देने का समय में परिवर्तन।

5. सूखे के समय गायों एवं अन्य पशुधनों की विशाल पैमाने पर धीमी मौत।

दुनिया भर में असर


सैकड़ों प्रजातियों के बारे में प्रकाशित 800 से ज्यादा शोधपत्रों का सर्वेक्षण बताता है-

1. प्रजातियाँ उत्तर दिशा की ओर यानी भूमध्य रेखा से दूर उत्तरी ध्रुव की तरफ सही तापमान की खोज में प्रस्थान कर रही हैं।

2. पक्षियों का वार्षिक प्रवास समय से पहले होने लगा है।

3. वातावरण जैसे-जैसे गर्म हो रहा है, पहाड़ की प्रजातियाँ ऊपर जा रही हैं, लेकिन पहाड़ के और ऊपर जाने की जगह न होने के कारण अनुकूल तापमान के अभाव में कुछ पहाड़ी मेंढक की प्रजातियाँ विलुप्त हो गई हैं।

4. पक्षीगण अपने अंडे समय पूर्व दे रहे हैं।

5. शिकारी प्रजातियों व उनके शिकार के जीवन वृत्त के बीच सामंजस्य में फर्क उत्पन्न हो गया है और परागण कीट व फूल वाले पौधों के बीच समय में व्यवधान आ गया है।

6. गर्म हवाएँ, सूखा, सागर का अधिक अम्लीय होना, पहाड़ों की ढलान पर और ऊपर चढ़ने की जगह नहीं होना एवं ग्लोबल वार्मिंग के अन्य प्रभावों से वर्तमान में पहचाने गए कुल प्रजातियों का एक बड़ा हिस्सा, वैज्ञानिकों के अनुसार 40-70 प्रतिशत, विलुप्ति के कगार पर हैं।

संशयी दृष्टिकोण


अभी कई लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि धरती गर्म हो रही है पर यह कोई खास बात नहीं है; इसके गर्म होने में मनुष्य जिम्मेदार नहीं है; पहले भी हुआ है तो कौन सी बड़ी बात है? ऊपर दिये गए आधिकारिक आँकड़ों से यह मालूम पड़ता है कि 1961-1990 के आधार वर्ष के बाद से भारत कितना गर्म हुआ है। आँकड़ों की बात छोड़ें, भारत या किसी अन्य देश के प्राकृतिक वातावरण में जो बदलाव हो रहा है, उसे केवल आँख खोलकर देखने से ही आसानी से मालूम हो सकता है कि ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव क्या है।- पेड़ पौधों में जल्दी फूल आना, हिमनदों या ग्लेशियर्स का पिघलना, बसन्त का जल्दी आगमन, सर्दियों का मौसम अपेक्षाकृत गर्म होना, छोटे द्वीपों का डूबना, आर्कटिक सागर की बर्फ का पिघलना आदि।

यह प्राकृतिक रूप से पहले भी हुआ है ऐसा कहना ठीक है परन्तु यहाँ बात उस गति की है जिस तेजी से वर्तमान में परिवर्तन हो रहे हैं। मानव सभ्यता को विकसित हुए 10,000 साल हो गए हैं और हम उन परिवर्तनों को बढ़ावा दे रहे हैं जो मानवीय अनुभव से पहले लाखों सालों में भी नहीं हुए हैं। पारिस्थितिकी तंत्र परिवर्तनों को तब स्वीकार करने में सक्षम होता है जब कि ये परिवर्तन धीरे-धीरे हों। अब ये परिवर्तन इतनी तेजी से हो रहे हैं कि पारिस्थितिकी तंत्र और विभिन्न प्रजातियाँ इसका मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं।

कुछ लोग जलवायु परिवर्तन का वैज्ञानिक आधार पर सवाल खड़ा कर रहे हैं क्योंकि 1998 के बाद से कुछ वर्षों में धरती की सतह की गर्मी में बढ़ोत्तरी की दर कुछ समय के लिये कम हुई थी। ऐसा इसलिये हुआ था क्योंकि जो अधिक गर्मी को कैद की जा रही थी, वह समुद्र में 300 मीटर की गहराई के नीचे जा रही थी। सतही तापमान में बढ़ोत्तरी की दर में यह कमी अब शायद खत्म हो चुका है क्योंकि 1880 में जब से तापमान नापने के उपकरणों से तापमान रिकॉर्ड करना शुरू किया गया है, तब से अब तक 2014 और 2015 सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए अभी तक के सबसे गर्म वर्ष रहे हैं। 2016 में इस बात की पुष्टि हो रही है क्योंकि हर महीना गर्मी के पिछला रिकॉर्ड तोड़ते हुए बड़े अन्तर के साथ सबसे गर्म महीना बन रहा है। यदि हम वातावरण में और अधिक कार्बन डाइऑक्साइड व ग्रीनहाउस गैसे भेजेंगे, वे उतना ही अधिक गर्मी विकिरण को कैद करेंगी। ग्लोबल वार्मिंग का यह मूलभूत भौतिकशास्त्रीय आधार 120 वर्षों पहले से ही सुस्थापित है।

ग्लोबल वार्मिंग का मुकाबला करने की तात्कालिक आवश्यकता


हमें तत्काल कार्यवाही करने की आवश्यकता है ताकि इसका प्रभाव जितना हो चुका है उससे और ज्यादा खराब न हो। धरती जितनी भी और गर्म होगी, उतनी ही अधिक उत्तराखण्ड और चेन्नई में बाढ़ जैसी अति हानिकारक चरम प्राकृतिक घटनाएँ बार-बार होंगी। जो प्राकृतिक आपदाएँ 50 सालों में एक बार आती थीं वह अब हर 10 सालों में या फिर 5 सालों में हो सकती है। लोग मुश्किल से ही अचानक हुई एक आपदा की तकलीफ से उबर सकेंगे कि दूसरी आपदा अचानक उन्हें आघात पहुँचाने आ जाएगी।

यह तात्कालिक आवश्यकता किसी और कारणों से भी बनती हैं। कुछ पारिस्थितिकी तंत्रों में ग्लोबल वार्मिंग के कारण ऐसी प्रतिक्रिया उत्पन्न हो सकती है जिससे ग्लोबल वार्मिंग में और इजाफा हो। जैसे कि आर्कटिक सागर की बर्फ इतनी पिघल गई है कि उसका क्षेत्रफल मनुष्य द्वारा अभिलेखित इतिहास में सबसे कम हो गया है। आर्कटिक सागर को ‘संसार का एयर कंडीशनर’ कहा जाता है। आर्कटिक सागर के बर्फ सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करते हुए एक बड़े आईने की तरह काम करती है। कम बर्फ होने का अर्थ है कि धरती के जलवायु तंत्र के द्वारा अधिक गर्मी शोषित की जा रही है। दूसरी बात, आर्कटिक में ऊपर की जमी हुई सतह के नीचे अरबों टन मीथेन है। पिघलता हुआ बर्फ इस मीथेन को छोड़ेगा जिससे और अधिक गर्मी होगी। यह पिछले दस सालों से ही हो रहा है। कुछ और ऐसे जलवायु परिवर्तन के प्रभाव रिकॉर्ड किये जा चुके हैं; पानी का अधिक वाष्पीकरण जो अधिक गर्मी रोकेगा, मिट्टी का अधिक गर्म होना जो कार्बन डाइऑक्साइड को सोखने की बजाय उसका उत्सर्जन करेगा आदि। अभी यह बहस चल रही है कि समुद्रों के द्वारा जितनी कार्बन डाइऑक्साइड प्रतिवर्ष सोखी जाती रही है क्या उसमें कमी आई है। यदि ऐसा है तो अधिक कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में बनी रहेगी व और गर्मी करेगी। यह अत्यन्त खतरनाक होगा।

इन सब परिवर्तनों में से कुछ पहले से ही नियंत्रण से बाहर हो गए हैं। जैसे कि जल्दी ही हमें गर्मी के मौसम में बर्फहीन आर्कटिक देखने को मिलेगा- यह रोका नहीं जा सकता है। ग्लोबल वार्मिंग से मुकाबला करने के लिये तत्काल कार्यवाही की आवश्यकता इस कारण से है कि ग्लोबल वार्मिंग के सारे प्रभाव जब एक साथ बहुत बड़े पैमाने पर होंगे तब मानव के लिये इन गम्भीर और खतरनाक समस्याओं से बचना असम्भव होगा।

सरकार क्या कर रही है?

भारत सरकार


इन समस्याओं की गम्भीरता एवं जटिलता की तुलना में भारत सरकार न तो पर्याप्त तत्परता दिखा रही है और न ही उपयुक्त कदम उठा रही है। भारत सरकार द्वारा राष्ट्र संघ को सन 2015 में दिया गया ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिये उठाए जाने वाले कदमों एवं लक्ष्यों का एक दस्तावेज पेश किया गया है जिसे अंग्रेजी में इंटेंडेड नेशनली डिटर्मिंड कंट्रिब्युशन (आईएनडीसी) कहा जाता है। इस दस्तावेज में ग्लोबल वार्मिंग के शमन हेतु, जिसे अंग्रेजी में मिटिगेशन कहा जाता है, उत्सर्जन कम करने के लिये सरकार सन 2030 तक सन 2005 के स्तर से उत्सर्जन को 33-35 प्रतिशत कम करने का लक्ष्य तय किया है। परन्तु इसमें पेंच यह है कि यह कार्बन के वास्तविक मात्रा में कमी न होकर सकल घरेलू उत्पाद के प्रति इकाई से हो रही उत्सर्जन के आनुपातिक मात्रा में कमी है। क्योंकि भारत का सकल घरेलू उत्पाद 2030 तक वर्तमान से कई अधिक होने वाला है इसलिये आनुपातिक रूप से उससे उत्सर्जन अगर 33 प्रतिशत कम भी हो जाये फिर भी कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन की कुल वास्तविक मात्रा सम्भवतः दोगुना होकर 500-600 करोड़ टन हो जाएगा जो कि निश्चित रूप से पृथ्वी की कार्बन डाइऑक्साइड सोखने की क्षमता का एक बड़ा हिस्सा है। क्या यह विश्व स्तर पर व्याप्त इस पारिस्थितिक संकट, जो वर्तमान में ही भारत के लोगों और अन्य प्रजातियों को इतनी बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है, का मुकाबला करने के लिये उचित एवं पर्याप्त सरकारी नीति है?

महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कार्यक्रम (मनरेगा) के तहत देश भर में हजारों कुएँ, तालाब एवं अन्य जल एवं मृदा संरक्षण की संरचनाएँ बनाई गई हैं ताकि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम किया जा सके और लोगों को उसके मुकाबले के लिये तैयार किया जा सके, जिसे अंग्रेजी में एडाप्टेशन कहा जाता है। परन्तु दुःख की बात यह है कि इस कार्यक्रम में वर्तमान में जबकि पूरा देश भीषण सूखा से जूझ रहा है, अपर्याप्त निवेश किया जा रहा है एवं इसके संचालन में भी कुछ गम्भीर त्रुटियाँ हैं। अधिक गर्मी को सहने वाले संकरित एवं लवणरोधी फसलों पर भी शोध कुछ कृषि अनुसन्धान केन्द्रों में हो रहा है परन्तु यह और जल्दी से व्यापक तौर पर छोटे किसानों तक पहुँचाने की जरुरत है। परन्तु इसके विपरीत सरकारी कृषि विस्तार सेवाओं को कम किया जा रहा है क्योंकि नव-उदारवादी आर्थिक सिद्धान्तों के चलते, जिसके तहत गरीबों के लिये सरकारी कार्यक्रमों को कम कर इन सेवाओं को निजी व्यापारियों को सौंप देने की सिफारिश की जाती है, सरकार के कल्याणकारी कार्यक्रमों पर खर्च को कम किया जा रहा है।

सरकार आईएनडीसी दस्तावेज में दावा किया है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 2.8 प्रतिशत हिस्सा एडाप्टेशन के लिये निवेश किया जाएगा। परन्तु इसमें से कुछ कार्यक्रम वर्तमान में चल रहे कार्यक्रमों का एडाप्टेशन के मद में पुनर्वर्गीकरण मात्र है एवं कोई नया निवेश नहीं है। न्यायपूर्ण आर्थिक एवं सामाजिक सरकारी नीतियाँ महत्त्वपूर्ण हैं देश के अधिकतर गरीब लोगों को जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने हेतु सक्षम बनाने के लिये। परन्तु पिछले कुछ दशकों से एवं वर्तमान में, अधिकतर सरकारी नीतियाँ समाज को विपरीत दिशा में धकेल रही हैं एवं गरीबों को सेवा प्रदाय की जिम्मेदारी निजी कम्पनियों को सौंपी जा रही है।

राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना, जिसे अंग्रेजी में नेशनल ऐक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज (एनएपीसीसी) कहा जाता है, में आठ मिशन हैं- सौर, ऊर्जा कुशलता, जल, कृषि, ज्ञान आदि। परन्तु सरकार का प्रयास रहा है कि इनमें निजी उद्योगों को अधिक मुनाफा कमाने का अवसर मिले ना कि वास्तव में जलवायु परिवर्तन का मुकाबला किया जा सके। विशेषकर गरीब किसानों के हितों को दरकिनार कर दिया गया है। 22 राज्यों में राज्य स्तरीय कार्य योजनाएँ तैयार की गई हैं परन्तु इसके लिये स्थानीय लोग, व्यावसायिक संघ या अन्य संस्थानों से कोई चर्चाएँ नहीं की गई हैं (मध्य प्रदेश की जलवायु कार्य योजना इसमें एक सुखद व्यतिक्रम है)। सन 2013 में घटित उत्तराखण्ड की आपदा दिखाता है कि केन्द्र और राज्य की सरकारें ऐसी आपदाओं के मुकाबला के लिये कितनी कम मुस्तैद हैं। यद्यपि उत्तराखण्ड में एक जलवायु कार्य योजना पहले से बनी हुई थी।

जलवायु परिवर्तन का जल के विभिन्न स्रोतों पर प्रभाव आईएनडीसी में कुछ स्वागत योग्य कदम है- घरों के छतों पर फोटोवोल्टेइक सौर ऊर्जा का उत्पादन एवं उसे विद्युत ग्रिड से युक्त करने का विस्तार एवं मास ट्रांजिट (जैसे कि मेट्रो) सार्वजनिक परिवहन का विस्तार। देश के सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता सन 2022 तक 100 गिगावाट हो जाने की उम्मीद है। परन्तु एक मेगावाट सौर ऊर्जा के उत्पादन के लिये लगभग चार एकड़ भूमि की जरुरत पड़ती है। इसलिये अगर यह घरों के छतों पर ही अधिक उत्पादन नहीं होता है तो भूमि उपलब्धता की समस्या खड़ी हो जाएगी।

आईएनडीसी दस्तावेज में 25 सौर उद्यान की बात की गई है जो कृषि भूमि का अधिग्रहण कर बनाया जाएगा। आईएनडीसी एवं ऊर्जा नीति की यह एक प्रमुख समस्या है कि यह सभी स्रोतों से अन्धाधुन्ध ऊर्जा उत्पादन की पैरवी करते हैं। नाभीकीय ऊर्जा (न्यूक्लियर), जिसे बेशर्मी से पर्यावरणीय रूप से अच्छी बताई गई है, का व्यापक विस्तार कर वर्तमान के 4 गिगावाट से 63 गिगावाट तक ले जाना है एवं बड़े जलविद्युत परियोजनाओं से उत्पादन को 100 गिगावाट तक। इसके अलावा कोयला से विद्युत उत्पादन तो है ही। विद्युत उत्पादन में इस बेतहाशा वृद्धि अमीर वर्ग की बढ़ती माँगों को पूरा करने के लिये की जा रही है।

पिछले पच्चीस वर्षों के आर्थिक नीतियाँ- सस्ती हवाई यात्राएँ, मोटरवाहनों के क्रय के लिये सुगम ऋण, शहरों में मॉलों का भरमार, आसानी से एयरकंडिशनर, फ्रिज, टेलिविजन एवं अन्य विद्युतिकृत उपभोक्ता सामानों का प्राप्त होना, उत्खनन के क्षेत्र को विदेशी पूँजी के लिये खोल देना, अमीर वर्गों की कमाई पर कर में कमी लाना- यह सभी कार्बन उत्सर्जन को बढ़ावा देने के साथ ही अमीर एवं गरीब वर्गों के बीच आर्थिक असमानता को भी बढ़ाया है। इस दौरान सभी सरकारें लगातार विशाल गरीब वर्ग के कम खपत के पीछे छिपकर यह कहते रही है कि भारत की उत्सर्जन मात्रा कम है। जबकि इस अवधि में देश में सभी स्रोतों से ऊर्जा की खपत में बेतहाशा वृद्धि को प्रोत्साहन दिया गया है अमीर वर्गों के उपभोग के लिये, जिससे कि कार्बन उत्सर्जन में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है।

अन्य सरकारें


पिछले बीस वर्षों से दुनिया की तमाम सरकारें सालाना एक बैठक में मिलते हैं जिसे कान्फ्रेंस ऑफ द पार्टिज (सीओपी या कोप) कहा जाता है। इसमें उत्सर्जन में कमी लाने, एडाप्टेशन के तरीके एवं विकासशील देशों को मिटिगेशन व एडाप्टेशन के लिये वित्तीय व तकनीकी मदद पहुँचाने पर विचार किया जाता है। दिसम्बर 2015 में फ्रांस के राजधानी पेरिस में 21वाँ सीओपी आयोजित किया गया था। सन 1997 में जापान के क्योटो शहर में आयोजित सीओपी में अधिकतर विकसित देश उनके सन 1990 में उत्सर्जन के स्तर को सन 2012 तक एक मामूली मात्रा से कम करने पर सहमत हुए थे।

अलग-अलग देशों के लिये अलग-अलग उत्सर्जन स्तर निर्धारित किये गए थे एवं औसतन विश्व भर में सन 1990 से सन 2012 तक उत्सर्जन में 5.2 प्रतिशत कटौती करने का वादा किया गया था। यह वैज्ञानिकों द्वारा ग्लोबल वार्मिंग को काबू में लाने के लिये बताए गए स्तर से कम था। क्योंकि विकासशील देशों (चीन और भारत समेत) को इस समझौते को स्वीकृत करना नहीं था एवं संयुक्त राज्य अमरीका ने इसे स्वीकार नहीं किया इसलिये दुनिया के तीन सबसे बड़े उत्सर्जक इस समझौते से बाहर रह गए। केवल यह ही नहीं कि क्योटो समझौते में उत्सर्जन में कटौती का स्तर बहुत कम था बल्कि यह व्यापारिक निगमों द्वारा मुनाफा कमाने का रास्ता भी प्रशस्त कर दिया। इस समझौते में दो व्यवस्थाओं की शुरुआत की गई- क्लीन डेवलपमेंट मेकेनिज्म (सीडीएम) यानि स्वच्छ विकास योजना और रिड्युसिंग एमिशन्स फ्रॉम डीफॉरेस्टेशन एंड फॉरेस्ट डिग्रेडेशन (रेड्ड) यानि निर्वनिकरण व वनों के क्षरण जनित उत्सर्जन को कम करना। कोई व्यापारिक इकाई, सामुदायिक संस्था, स्थानीय, प्रान्तीय या राष्ट्रीय सरकार अगर उत्सर्जन को कम करने का कोई काम करता है तो उसे किसी नियामक संस्था द्वारा जाँच के बाद कार्बन क्रेडिट यानि कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने का प्रमाणपत्र दिया जाता है।

जिन व्यापारिक निगमों या विकसित देश नियमानुसार अपने उत्सर्जन में कमी नहीं कर पा रहे हैं वे इन कार्बन क्रेडिटों को खरीदकर इस मायने में अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कर सकते हैं। इस प्रकार उत्सर्जन को जाँचकर कार्बन क्रेडिट प्रदान करने एवं उसे खरीदी बिक्री करने की एक विशाल विश्व स्तरीय व्यापारिक व्यवस्था खड़ी की गई है जिसमें बड़े-बड़े निगम मुनाफा कमाने का रास्ता खोजते हैं एवं वास्तव में इससे कोई उत्सर्जन में कमी नहीं होती है। अभी रेड्ड प्लस योजना में इस व्यवस्था को और विस्तृत कर प्रकृति द्वारा प्रदान किया जा रहा विभिन्न पारिस्थितिक सेवाओं पर भी कीमत लगाकर उनको बेचने का प्रावधान किया गया है। इसके पीछे सिद्धान्त यह है कि खुले बाजार में खरीदी बिक्री से चीजों का उपभोग कुशल ढंग से होता है परन्तु हकीकत यह है कि बाजार में हर वक्त कुछ व्यापारिक निगम हावी हो जाते हैं एवं वे अपने मुनाफा कमाने हेतु बाजार का संचालन गलत ढंग से करने लगते हैं। अतः आश्चर्य की बात नहीं कि पहले बताए गए पूँजीवाद के नियम के अनुसार मिटिगेशन एवं एडाप्टेशन में भी व्यापारिक कम्पनियों ने मुनाफा कमाने का रास्ता ढूँढ लिया है।

वर्तमान में दुनिया COP द्वारा निर्धारित मात्रा में उत्सर्जन कम करने के समझौते के द्वितीय चरण में लटकी हुई है एवं तृतीय चरण की शुरुआत सन 2020 में होगी। इस तृतीय चरण के लिये प्रत्येक देश को अपना आइएनडीसी पेरिस में आयोजित COP से पहले पेश कर देना था एवं अधिकतर देश यह कर चुके हैं। चीन अपनी उत्सर्जन की सघनता यानी प्रति इकाई सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में उत्सर्जन की मात्रा को 60-65 प्रतिशत कम करने का वादा किया है। संयुक्त राज्य अमरीका सन 2025 तक अपना कुल उत्सर्जन में, ना कि उत्सर्जन की सघनता में, 26-28 प्रतिशत कमी लाने का वादा किया है। परन्तु इस प्रकार एक विश्वव्यापी एकीकृत प्रयास के बजाय टुकड़ों में उत्सर्जन कम करना वैज्ञानिक शोध से प्राप्त जानकारी को नजरअन्दाज करता है।

पेरिस में दिसम्बर 2015 को जो समझौता हुई है उस में ग्लोबल वार्मिंग को ‘औद्योगीकरण के पूर्व के स्तर से 2 डिग्री सेंटिग्रेड बढ़ोत्तरी से कम रखने एवं उसे 1.5 डिग्री बढ़ोत्तरी तक ही सीमित रखने के प्रयास करने’ की बात की गई है। हालांकि यह उन लोगों के लिये एक जीत है जिन्होंने वर्षों से ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री से कम रखने के लिये बोलते आये हैं, बहरहाल, सभी देशों द्वारा कुल मिलाकर जो वर्तमान में उत्सर्जन कम करने के वादे किये गए हैं, अगर वह वादे पूरे-पूरे निभाए भी जाएँ, फिर भी विश्व में औसतन तापमान में 3 डिग्री सेंटिग्रेड इजाफा होगा जो कि सुरक्षित स्तर से बहुत अधिक है। यह एक व्यापक हादसा होगा क्योंकि मानवीय सभ्यता इतनी अधिक तापमान वृद्धि से होने वाले दुष्परिणामों से पूरी तरह अनभिज्ञ है।

कुछ सरकारें इसके अपवाद हैं। कुछ समुद्र के बीच टापुओं पर बने छोटे देश, जिन्हें समुद्र तल का ऊँचा हो जाने का सबसे ज्यादा खतरा है, बड़े देशों पर दबाव डाल रहे हैं ग्लोबल वार्मिंग को नियंत्रित करने हेतु अधिक कारगर कदम उठाने के लिये। दक्षिण अमेरिकी देश बोलिविया की सरकार, जिसकी जनसंख्या का अधिकांश आदिवासी मूल के हैं, जनता के दबाव के कारण सन 2010 में एक धरती माता के अधिकार कानून पारित किया है। इस कानून में यह स्वीकृत किया गया है कि सभी जीवों को अधिकार है जैसे कि- जीवन के मूलभूत इकाई या वंशणु (अंग्रेजी में जीन) के अन्तरण के बिना जैवविविधता को बरकरार रखने का अधिकार, जीवन की निरन्तरता को बनाए रखने के लिये पानी का अधिकार व मानवों द्वारा नाश किये गए पारिस्थितिकी तंत्रों को सुधारने का अधिकार। दक्षिण अमेरिका के ही एक और देश इक्वाडोर ने अपने संविधान में प्रकृति को भी मानवों की तरह अधिकार प्रदान किया है।

परन्तु अधिकतर सरकारें अपने राष्ट्रीय अमीर वर्ग के ही प्रतिनिधित्व करते हैं। यह सरकारें, वर्ग शोषण पर आधारित पूँजीवादी व्यवस्था के जिन ढाँचागत कारणों से उत्सर्जन में वृद्धि हो रही है, उन पर सवाल खड़े करने में अक्षम है। यह उम्मीद करना कि अमीर वर्ग द्वारा नियंत्रित यह सरकारें, नीचे से जन संघर्ष से उत्पन्न कोई दबाव के बिना ही ग्लोबल वार्मिंग के शमन के लिये कारगर एवं जन-पक्षीय कदम उठाएँगे, सरासर गलत लोगों पर भरोसा करने जैसा होगा।

हमें क्या करना चाहिए?


तत्परता के साथ हमें एक साथ मिलकर उपर्युक्त अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग स्तरों पर कार्य करना होगा। ग्लोबल वार्मिंग हमारी जिन्दगी के इतने पहलुओं को छूता है कि जो भी हम अर्थपूर्ण सोचते हैं वह करने के लिये हमारे पास बहुत मौका है।

एक सोच यह भी है, जिसका सार में विचारधारागत रुढ़ी है कि प्रौद्योगिकी (टेक्नोलॉजी) से इस समस्या का समाधान होगा। परन्तु यह न सिर्फ अव्यावहारिक है बल्कि बेवकूफी भी है क्योंकि यह विचार के कारण अधिकतर लोगों को ऐसा लगता है कि ग्लोबल वार्मिंग के शमन के लिये सामाजिक व राजनीतिक कदम उठाने की कोई जरूरत नहीं है। प्रौद्योगिकी की भी भूमिका है जैसे कि हमें छतों पर सौर ऊर्जा का उत्पादन बढ़ाना है। परन्तु हमें समाधान के लिये जन-पक्षीय सामाजिक एवं राजनीतिक बदलाव की आवश्यकता अधिक है जिसके फलस्वरूप समुचित प्रौद्योगिकी का उपयोग हो सकेगा ना कि केवल प्रौद्योगिकी के ही भरोसे हम रह जाएँ।

इस पुस्तिका में इसके पश्चात कुछ कदम सुझाए गए हैं, जो जाहिर है कि सीमित है और समय के साथ यह और विस्तृत होंगे। ग्लोबल वार्मिंग का गहराते हुए संकट को देखते हुए हमारे पास समय नहीं है एवं हमें इसके शमन के लिये तत्काल कार्यवाही करनी होगी।

व्यक्तिगत प्रयास


बहुत सारे युवाओं के दिमाग पर बाजार हावी है। यह बाजारी नियंत्रण न केवल गैर जरूरी उपभोग में दिखता है - हमारी पहचान आजकल तरह-तरह के यंत्रों के उपयोग से बनने लगी है- बल्कि अन्य लोगों एवं प्रकृति के साथ हमारे रिश्ते भी इसके द्वारा प्रभावित हुए हैं। इसलिये खोती जा रही मन की स्वतंत्रता को वापस पाने का संघर्ष एक आवश्यक प्रथम कदम है एवं यह एक निरन्तर युद्ध की तरह है।

जहाँ तक व्यावहारिक व्यक्तिगत कार्यों का सवाल है तो हमें हमारा सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाली गतिविधि को चिह्नित कर उसे कम करना चाहिए। जैसे कि अमीर वर्ग के लिये हवाई यात्रा करना है। इसके अलावा अमीर वर्ग के व्यक्ति को अधिक ऊर्जा का खपत करने वाले यंत्रों जैसे कि एसी का उपयोग कम करना चाहिए। साथ ही ऐसे व्यक्ति को बसों या अन्य सार्वजनिक यातायात प्रणाली से यात्रा करने, साईकिल चलाने या पैदल चलने जैसे कदम और अधिक उठाने चाहिए। यह व्यक्तिगत जीवनयापन में बदलाव लाने के निर्णय इसके लिये अनुकूल सार्वजनिक नीतियों एवं व्यवस्थाओं से जुड़े हुए हैं जैसे कि साईकिल के लिये अलग रास्ता होना एवं महिला सुरक्षा युक्त बस सेवा होना आदि।

जिनके पास पर्याप्त साधन है वे पारिवारिक स्तर पर छतों पर सौर ऊर्जा के पैनल एवं वर्षाजल को सहेजने की प्रणाली लगा सकते हैं। दिल्ली में छतों पर लगाए गए सौर प्रणालियों को विद्युत ग्रिड के साथ जोड़ने की व्यवस्था हाल में शुरू की गई है। शहरों के घरों के बरामदों या छतों पर सब्जी उगाना न केवल सेहत के लिये अच्छा है बल्कि इससे खेतों से घरों तक सब्जी पहुँचाने में होने वाले कार्बन उत्सर्जन में भी बचत होती है। शहरी खेती दिल्ली, बंगलुरु एवं कुछ अन्य शहरों में की जा रही है परन्तु यह अमीर परिवारों तक ही सीमित है। अटलांटिक महासागर में स्थित टापू देश क्यूबा के शहरों में यह पच्चीस वर्षों से हो रहा है।

एक सोच यह भी है कि ग्लोबल वार्मिंग एक विशाल तंत्रगत समस्या है इसलिये इसके समाधान के लिये व्यक्तिगत प्रयास करना व्यर्थ है। परन्तु यह सही नहीं है। व्यक्तिगत प्रयासों से हम इस समस्या से जूझने की हिम्मत बनाएँ रखते हैं। इससे हमें इस विषय पर दोस्तों और रिश्तेदारों से वार्तालाप करने और कभी-कभी बहस करने में मदद मिलती है। इसके अलावा यह वांछनीय है कि हमारे विचार एवं हमारी जीवनशैली में सामंजस्य हो।

सामूहिक प्रयास


यद्यपि व्यक्तिगत प्रयास आवश्यक है, पर इनकी उपयोगिता को अभिजात वर्ग एवं प्रचार माध्यमों द्वारा अत्यधिक तुल दिया जाता है। वे हमें पृथ्वी दिवस (अर्थ डे) पर एक घंटे के लिये बत्ती बुझाने के लिये कहते हैं या हमारे रोशनी के बल्बों को बदलकर कम ऊर्जा खपत वाले एलईडी बल्ब लगाने के लिये बोलते हैं और यह सब करके हमें लगता है कि ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिये हमने काफी कुछ कर लिया है। इसके बाद हम ग्लोबल वार्मिंग एवं अन्य पारिस्थितिक समस्याओं के लिये उत्तरदायी ढाँचागत कारकों के बारे में प्रश्न करने से कन्नी काटने लगते हैं। दूरगामी सामाजिक एवं राजनीतिक परिवर्तन आमतौर पर तब ही होता है जब अनेक लोग सामूहिक रूप से यह महसूस करते हैं कि तंत्र में ही कुछ बुनियादी खामी है जिसे सुधारने की जरूरत है और इसके लिये एक साथ आकर कुछ सामूहिक प्रयास करते हैं। ऐसे सामूहिक प्रयासों के लिये निम्न कदम उठाए जा सकते हैं-

. 1. जलवायु परिवर्तन पर एक जन-पक्षीय सोच-समझ को और ठोस बनाने के लिये शहरी एवं ग्रामीण इलाकों में अधिक-से-अधिक लोगों के साथ संवाद स्थापित कर यह जानने की जरूरत है कि किस प्रकार से जलवायु परिवर्तन के कारण उनकी जिन्दगी प्रभावित हो रहा है, इसके बारे में वह क्या सोचते हैं और इसके लिये वह क्या कर रहे हैं या नहीं कर रहे हैं। स्थानीय किसान एवं अन्य समुदाय विभिन्न तरीकों से इस परिवर्तन का मुकाबला कर रहे हैं : फसलों के मिश्रण को बदल रहे हैं, फसल चक्र को बदल रहे हैं, पारम्परिक देशी बीजों के उपयोग की ओर लौट रहे हैं, खेतों में छोटे तालाब खोद रहे हैं एवं पुराने तालाबों एवं अन्य जलाशयों को पुनर्जीवित कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने में कौन से कार्य सफल होते हैं यह जानना महत्त्वपूर्ण है क्योंकि एक जगह पर सफल हुए तरीके उसी परिस्थितियों के अन्य जगहों में भी सफलता से दोहराए जा सकते हैं।

यह काम छात्रों और युवाओं के समूह और जन संगठनों द्वारा किया जा सकता है। शहरी गरीबों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव में उनके निवास स्थल में पानी भर जाना, पानी की कमी होना, अत्यधिक गर्मी होना और कृषि पर प्रभाव के कारण खाद्य की कीमतों में वृद्धि होना शामिल है। इन सब घटनाओं की जन पक्षीय जाँच करने से हमें जलवायु परिवर्तन का मुद्दा को वर्ग शोषण के परिप्रेक्ष्य से समझने और हमारेे तरफ लगातार फेंका जा रहा अन्य असन्तोषजनक परिप्रेक्ष्यों का पर्दाफाश करने में मदद मिलती है। जलवायु परिवर्तन पर एक लैंगिक यानी महिला पक्षीय परिप्रेक्ष्य बहुत महत्त्वपूर्ण है जिसका निर्माण के लिये भारत में अभी तक खास प्रयास हुआ नहीं है। इसके लिये भी छात्रों को महिलाओं के साथ काम करने या उन्हें संगठित करने वाले समूहों के साथ सम्पर्क साधना चाहिए। ऐसा करने से जलवायु परिवर्तन के मुद्दा को अमूर्त विज्ञान के दायरे से बाहर निकालकर लोगों के जीवन एवं आजीविकाओं के बीच स्थानान्तरित कर दिया जाएगा जहाँ उसे होनी चाहिए।

2. आपके महाविद्यालय में अगर कोई छात्र समूह या संघ नहीं है तो ऐसा समूह या संघ का गठन कर लेना चाहिए। यह एक पर्यावरण संरक्षण समूह, प्रकृति संरक्षण समूह या छात्र समूह हो सकता है। इसकी शुरुआत दोस्तों या दिलचस्पी रखने वाले छात्रों से चर्चा के माध्यम से की जा सकती है। छात्र समूह बनाने के मुद्दे पर विचार विमर्श के लिये एक बैठक बुलाई जा सकती है एवं इसका प्रचार व्हाट्सएप समूह बनाकर एवं पोस्टर लेखन के माध्यम से किया जा सकता है। फिल्मों का प्रदर्शन एवं उस पर चर्चा से यह कार्य प्रारम्भ किया जा सकता है एवं इसमें सहानुभूति रखने वाले अध्यापकों की सहायता ली जा सकती है।

छोटे परन्तु सटीक कार्यों से इस प्रक्रिया को शुरू किया जा सकता है। उदाहरण के लिये छात्र अपने महाविद्यालय के छत पर उपलब्ध खाली जगहों को चिह्नित कर यह आकलन कर सकते हैं कि वहाँ कितने सौर ऊर्जा पैनल लगाए जा सकते हैं। इसके बाद सम्बन्धित विभागीय कार्यालय से सम्पर्क साधकर या नवीन व नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के वेबसाइट पर जाकर सौर ऊर्जा प्रणाली स्थापित करने के बारे में कार्यवाही कर सकते हैं (नवीकरणीय ऊर्जा वह ऊर्जा है जिसका उपयोग बार-बार किया जा सकता है उसके भण्डार में कमी किये बिना जैसे कि सौर, वायु, गोबर आदि। इसी प्रकार महाविद्यालय में वर्षाजल का संग्रहण के भी कार्य किये जा सकते हैं। इन परियोजनाओं पर कार्य करने हेतु छात्रों को महाविद्यालय प्रशासन पर दबाव लाना होगा एवं इसलिये छात्रों का साथ आना आवश्यक है। एक बार आपका समूह सक्रिय हो जाता है तो आप अन्य महाविद्यालयों के छात्रों से सम्पर्क कर वहाँ भी ऐसे समूह बनाने के लिये प्रयास कर सकते हैं।

3. आपके शहर या समुदाय में, कोई भी शहर में, जहाँ हम रहते हैं या अध्ययन के लिये निवास करते हैं, ग्लोबल वार्मिंग से मुकाबला करने के लिये कुछ-न-कुछ हो रहा है या किया जा सकता है। उदाहरण के लिये दिल्ली में छतों पर सौर ऊर्जा प्रणालियाँ स्थापित करने के लिये एक अभियान चलाया गया था। अन्य संगठन यह माँग कर रहे हैं कि दिल्ली की जन परिवहन नीति को आम आदमी पार्टी का ऑड-इवन परियोजना से और विस्तृत किया जाये जैसे कि बस रैपिड ट्रांस्पोर्ट प्रणाली को जिसमें कि अधिकतर लोगों के जल्द-से-जल्द सफर के लिये सड़कों का एक तिहाई हिस्सा सार्वजनिक बसों एवं एम्बुलेंसों के लिये सुरक्षित कर दिया जाता है, दिल्ली के अधिक हिस्सों में लागू किया जाये। वे यह भी माँग कर रहे हैं कि यातायात प्रणाली अधिक उत्सर्जन करने वाले चार पहिया निजी वाहन केन्द्रित न होकर बस यात्री, साइकिल चालक एवं पैदल चलने वालों के हितों पर ज्यादा ध्यान दें। कई शहर, जिनमें देहरादून जैसे प्रादेशिक राजधानी भी है, केवल निजी चालकों द्वारा चलाए जा रहे छोटे चार पहिया एवं तीन पहिया वाहनों पर यातायात के लिये निर्भर है। कुछ शहरों में मेट्रो रेल विकसित किया जा रहा है पर इनका किराया इतना अधिक है कि कामकाजी गरीब लोग इसका उपयोग नहीं कर सकते हैं। इसलिये इनके लिये भी मुम्बई या कोलकाता जैसे शहरों में स्थानीय पैसेंजर रेल सेवा के यात्रियों के लिये जैसे ही सस्ती यातायात पास का प्रावधान होना चाहिए।

जलवायु परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में सभी शहरों में जल प्रबन्धन एक प्रमुख विषय है। चार स्तरों पर इसके लिये कार्य किया जा सकता है। पहला, भूजल स्तर को वर्धित करने के लिये सार्वजनिक स्थलों और सड़कों पर वर्षाजल की पुनर्भरण संरचनाओं के निर्माण हेतु स्थानीय प्रशासन पर दबाव डाला जा सकता है। दूसरा, बावड़ियों, झीलों, तालाबों एवं नदी नालों जैसे पुराने जलाशयों को साफ कर उनका संरक्षण किया जा सकता है। इसके लिये पहले हमें यह पता करना होगा कि वह कहाँ स्थित है। ऐसे जलाशयों को खोजने का काम छात्रों एवं दिलचस्पी रखने वाले अध्यापकों द्वारा किया जा सकता है। तीसरा, यह माँग करनी चाहिए कि शहर के सभी नागरिकों को एक स्वस्थ जीवन के लिये आवश्यक पानी उपलब्ध कराना चाहिए एवं इसके लिये जल वितरण प्रणाली को अधिक न्यायोचित बनाना होगा। चौथा, जलभूमि, नदी-नालों के किनारों एवं जलाशयों को भरकर उस पर अतिक्रमण कर निर्माण कार्य पर रोक लगाना होगा ताकि दिसम्बर 2015 में चेन्नई में आये बाढ़ जैसे विनाशकारी आपदाएँ न आएँ। इस प्रकार पारम्परिक जलाशयों को पुनर्जीवित कर, वर्तमान जलाशयों को साफ कर, नए जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण कर एवं जल वितरण प्रणालियों को नए सिरे से न्यायोचित ढंग से बिछाकर अनेक लाभ प्राप्त किया जा सकता है- भूजल की उपलब्धता में सुधार, जल का अपचय में कमी, ऊर्जा की खपत में कमी एवं सभी के लिये जल की उपलब्धता।

4. नवीकरणीय एवं कम हानीकारक विकेन्द्रित ऊर्जा का चयनः परमाणु ऊर्जा, जिसे भारत सरकार एवं विदेश के कुछ विशेषज्ञ जलवायु परिवर्तन समस्या के समाधान के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, वास्तव में बहुत खतरनाक है। कोयला सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाला एवं जानलेवा जहरीले पदार्थों को उत्सर्जित करने वाला ईंधन है। बड़े जल विद्युत परियोजनाएँ भी उनके जलाशयों से अधिक कार्बन उत्सर्जन करते हैं एवं इनके खिलाफ भी लोग आन्दोलन कर रहे हैं। अगर हम मौजूदा सभी प्रमुख ऊर्जा स्रोतों का विरोध करते हैं तो हम किस ऊर्जा स्रोत के पक्ष में हैं?

हम एकाएक कोयला या अन्य खनिज ईंधनों का उपयोग बन्द नहीं कर सकते हैं। परन्तु हमें और तेज गति से साफ-सूथरी ऊर्जा स्रोतों के उपयोग को बढ़ाना होगा। भारत एवं अन्य जगहों पर कुछ संगठन एवं समूह गम्भीरता के साथ खनिज ईंधन के विकल्पों के उपयोग पर चर्चा करने लगे हैं। सौर एवं वायु ऊर्जा ऐसे प्रमुख वैकल्पिक स्रोत हैं। सौर ऊर्जा खाना बनाने, पानी गर्म करने एवं अन्य गर्मी पैदा करके किये जाने वाले कार्य में उपयोग के लिये आदर्श है। इसके अलावा विकेन्द्रित विद्युत उत्पादन के लिये भी यह उत्तम साधन है एवं इसका इस्तेमाल ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में भी होनी चाहिए क्योंकि यहीं से सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन होता है।

परन्तु यह तब ही हो पाएगा जब सरकारें जन-दबाव के कारण कोयला एवं अन्य जमीन के नीचे से निकाले गए ईंधनों का उपयोग को अनुदान देकर प्रोत्साहित करने के बजाय सौर और वायु ऊर्जा को पुरजोर समर्थन देने लगेगी। इस मायने में जर्मनी का उदाहरण उल्लेखनीय है - पिछले एक दशक में वहाँ सौर ऊर्जा का उत्पादन सैंकड़ो मेगावाट से बढ़कर 30000 मेगावाट हो गया है। यह इसलिये हो पाया है क्योंकि वहाँ के सरकार सौर ऊर्जा के प्रसार हेतु प्रोत्साहन नीति बनाई है। वहाँ के एक विशाल पर्यावरणीय हरित आन्दोलन द्वारा, जिसमें मजदूर, छात्र व नागरिक शामिल हैं, परमाणु ऊर्जा का तीव्र विरोध एवं इसके बजाय नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग के पक्ष में माँग के कारण जर्मनी में ऐसा हो पाया है। जर्मनी के नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन के आधा हिस्सा नागरिक समूहों, किसानों एवं नई ऊर्जा सहकारी समितियों द्वारा विकेन्द्रित तरीकों से किया जाता है।

नवीकरणीय ऊर्जा के भी सामाजिक कीमतें होती है। विशाल केन्द्रिकृत सौर ऊर्जा उद्यान बड़े पैमाने पर कृषि भूमि का अधिग्रहण कर स्थापित किये जाते हैं। इसलिये कोयला के एवज में तुलनात्मक रूप से सामाजिक तौर पर कम हानीकारक नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के उपयोग की ओर जाने के लिये हमें इस ऊर्जा से सर्वप्रथम व्यापक जनता की मूलभूत ऊर्जा माँगों को पूरी करनी होगी और अमीर वर्गों द्वारा किया जा रहा अनावश्यक ऊर्जा उपयोग पर लगाम लगाना होगा। अन्यथा हम सभी स्रोतों से और अधिक ऊर्जा हथियाने के होड़ में फँस जाएँगे, जो लगता है कि हमारी वर्तमान नीति है एवं यह अधिकतर जनता एवं अन्य प्रजातियों के लिये हानिकारक है।

5. विस्थापन के विरुद्ध संघर्ष: भारत भर में वन, भूमि, नदियाँ एवं समुद्र जैसे सामूहिक सम्पदाओं पर स्थानीय समुदायों के नियंत्रण स्थापित करने एवं विस्थापन के विरोध में संघर्ष तेज हो गए हैं। यह संघर्ष उत्खनन परियोजनाएँ, कोयला आधारित विद्युत संयंत्र, अल्युमिनियम संयंत्र, परमाणु ऊर्जा संयंत्र एवं हाल ही में स्थापित हुए मुम्बई दिल्ली औद्योगिक गलियारा जैसे 18 वृहद औद्योगिक क्षेत्रों के विरुद्ध जारी है।

विरोध करने वाले स्थानीय निवासी अपनी आजीविकाएँ, संसाधनों एवं कृषिभूमि पर नियंत्रण खोने एवं कभी-कभी इन परियोजनाओं के कारण होने वाले स्वास्थ्य समस्याओं से खफा हैं। यद्यपि उनके इस विरोध के पीछे तात्कालिक रूप से उनके मन में जलवायु परिवर्तन नहीं है परन्तु यह जलवायु परिवर्तन से जुड़ा हुआ है। यह संघर्ष ऊर्जा स्रोतों के चयन के बारे में है- कोयला उत्खनन एवं कोयला आधारित वृहद विद्युत संयंत्रों के विरुद्ध संघर्ष कई जगहों पर फूट पड़ा है जैसे कि महान, चंद्रपुर, सोमपेटा एवं काकरापल्ली जहाँ वृहद विद्युत परियोजनाओं का निर्माण हो रहा है। कुडनकुलम एवं जैतापुर में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों और नर्मदा घाटी एवं पोलावरम में वृहद जलविद्युत परियोजना के विरुद्ध संघर्ष चल रहे हैं। उत्तर-पश्चिम में हिमाचल प्रदेश से लेकर उत्तर-पूर्व में अरुणाचल प्रदेश तक हिमालय में बड़े बाँधों के खिलाफ आन्दोलन चल रहे हैं।

जलभूमि और वनों को संरक्षित कर, जैसे कि स्थानीय लोगों के संघर्ष से ओड़िशा राज्य के जगतसिंहपुर एवं नियमगिरी में क्रमशः पॉस्को इस्पात परियोजना एवं वेदान्त बॉक्साइट परियोजना को बरखास्त कराकर किया गया है, न केवल महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रों को बचाया गया है बल्कि कार्बन को शोषित कर उत्सर्जन के दुष्प्रभाव को कम करने वाले प्राकृतिक प्रणालियों को भी बचाया गया है। न्यायपूर्ण एवं समुचित विकास प्रणालियाँ क्या होनी चाहिए, यह सवाल इन जन संघर्षों के केन्द्र में है एवं यही सवाल ग्लोबल वार्मिंग के विरुद्ध जारी संघर्षों में भी अहम है।

समय के साथ छात्र एवं युवा इन संघर्षों के साथ विभिन्न तरीकों से जुड़े हैं - इनसे जुड़कर सक्रिय भागीदारी निभाएँ हैं, कुछ अन्य लोग प्रगतिशील संगठनों एवं दलों से जुड़कर इनका समर्थन किये हैं, कुछ लोगों ने इन संघर्षों के समर्थन के लिये समूह बनाएँ हैं एवं अन्य लोगों ने संघर्ष स्थलों का दौरा कर लोगों का हौसला अफजाई किये हैं एवं रिपोर्ट प्रकाशित किये हैं या अन्य तरीकों से इनके समर्थन में अभियान चलाएँ हैं।

दुनिया के अन्य जगहों पर भी इस प्रकार के आन्दोलन जारी है जैसे कि जीवाश्मिक ईंधनों का उत्खनन या उनका दहन के खिलाफ संघर्ष, विशेषकर कोयला एवं खनिज तेल के उत्खनन, बीते दो वर्षों में तेज हुए हैं। इनमें उत्तरी अमेरिका में कीस्टोन पाइपलाइन एवं ब्रिटेन में कोयला खदानों के विरुद्ध सफल प्रतिरोध शामिल है। वर्तमान में ब्रेक फ्री फ्रॉम फॉसिल फ्यूल कैम्पेन यानी जीवाश्मिक ईंधन से मुक्ति अभियान के अन्तर्गत एक साथ कई देशों में कोयला खदानों और खनिज तेल उत्पादन क्षेत्रों और यह करने वाले बड़े कम्पनियों के कार्यालयों के सामने प्रदर्शन किये जा रहे हैं। इसका विवरण www.350.org वेबसाइट में मिलेगा।

विगत कुछ वर्षों में युवाओं द्वारा अभियान चलाए गए हैं वित्तीय संस्थाओं को जीवाश्मिक ईंधन के विकास से समर्थन वापस लेने के लिये। इसके फलस्वरूप 500 से भी ज्यादा संस्थाएँ जैसे पेंशन फंड, सरकारी संस्थाएँ, विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालय व धनवान न्यासें, जिनकी वित्तीय सम्पदा 2300 खरब रुपए हैं, जीवाश्मिक ईंधन से अपना निवेश वापस लेने की प्रतिबद्धता जाहिर किये हैं। इस सूची में करीब 30 शैक्षणिक संस्थाएँ शामिल हैं जैसे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रिकन स्टडिज एवं ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय।

6. पूँजीवाद को चुनौती: जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने के लिये जारी जन पक्षीय आन्दोलनों ने जीवाश्मिक ईंधन उत्पादन करने वाले व्यापारिक निगमों को निशाना बनाकर शत्रु का पहचान अवश्य किया है। परन्तु जिसकी जरूरत है वह पूँजीवाद का मुनाफा कमाने एवं धन एकत्रित करने की आधारभूत प्रवृत्ति को चुनौती पहुँचाना है। यह धन एकत्रित करने की प्रक्रिया भयानक है- चाहे वह उपनिवेशवाद का इतिहास, संसाधनों का हिंसक दोहन, संसाधनों पर कब्जा करने के लिये युद्ध, मजदूरों का शोषण या दमनात्मक कानून हो, इन सभी में पूँजीवाद का हिंसक रूप बखूबी झलकता है। अतः ग्लोबल वार्मिंग का मुकाबला करने के लिये पूँजीवादी व्यवस्था को ही चुनौती पहुँचानी होगी। समस्या यह है कि हालांकि पूँजीवाद के राजनीतिक विकल्प मौजूद हैं, वैश्विक पैमाने पर इसके आर्थिक विकल्प का निर्माण करना आसान नहीं है।

ग्लोबल वार्मिंग एवं अन्य पारिस्थितिक संकटों के कारण कई ऐसे प्रश्नों का महत्त्व बढ़ गया है जो कुछ समय से उठाए जा रहे थे- क्या ऊँचे आर्थिक वृद्धि दर की जरूरत है? यह आर्थिक वृद्धि कैसे हासिल होता है? क्या इससे अधिकतर लोगों को अच्छे काम, बड़े पैमाने पर रोजगार एवं अच्छे ढंग से जीने के लिये वेतन मिलता है? इस ‘विकास’ का लाभ वास्तव में कितने लोगों को मिलता है? हकीकत तो यह है कि पूँजीवादी विकास एवं आर्थिक वृद्धि दर लोगों को और ज्यादा काम करवाकर एवं प्रकृति का बेतहाशा दोहन कर हासिल होता है। इससे भारत में पिछले बीस वर्षों में अधिकतर अस्थायी, असुरक्षित, तनावपूर्ण एवं कम वेतन वाले रोजगार का ही सृजन हुआ है एवं यह घटिया स्तर के रोजगार के अवसर भी वर्तमान में कम होते जा रहे हैं।

आँख मीचकर यह पूँजीवादी आर्थिक वृद्धि के मंत्र को स्वीकार करने के बजाय मैं एक अधिक न्यायपूर्ण विकास प्रणाली की पैरवी करुँगा जिसमें अधिकतर लोगों की आवश्यकतानुसार उन्हें आधारभूत वस्तुएँ एवं सेवाएँ प्रदान किये जाएँगे जिससे कि वे अपने रोजमर्रा के जीवन के वर्तमान निम्न स्तर को सुधार सके। जैसे-जैसे लोगों की जिन्दगी के स्तर में सुधार आएगा वैसे-वैसे अपने आप कम वृद्धि दर वाला न्यायपूर्ण विकास स्थापित होगा।

पारिस्थितिक चिन्ताएँ हमारी राजनीति के अभिन्न अंग होनी चाहिए। बीसवीं सदी की वामपंथी राजनीति की बहुत सारी आलोचना की गई है - उसमें लोकतंत्र का अभाव, उसके द्वारा प्रौद्योगिकी को दी गई प्राथमिकता, उसके व्यापक औद्योगिक पैमाना और उसके कारण हुए पारिस्थितिक विनाश जिसमें वामपंथी पूँजीवाद और प्रकृति के बीच के सम्बन्ध का अनुकरण किये हैं। प्रगतिशील राजनीति भविष्य में वामपंथी राजनीति की इन खामियों को नजरअन्दाज नहीं कर सकती है एवं इसलिये एक लोकतांत्रिक एवं पारिस्थितिक रूप से स्थायी राजनीति स्थापित करने का प्रयास करना होगा।

7. न्यायोचित बर्तावः ग्लोबल वार्मिंग के मुकाबला के लिये अपनाए जाने वाले उपायों के केन्द्र में न्यायोचित बर्ताव है। इसके कम-से-कम चार पहलू है और सम्भवतः और भी हो सकते हैं-

क. लोगों के बीच संसाधनों का न्यायोचित बँटवाराः यह विकास की प्रणाली से जुड़ा हुआ है। अधिकांश लोगों को सही जिन्दगी जीने के लिये पर्याप्त संसाधन मिले इसके लिये छोटे पैमाने पर कृषि को पुनर्जीवित करना होगा, भूमि का न्यायोचित बँटवारा करना होगा एवं उस पर महिलाओं को नियंत्रण देना होगा। भारत जैसे जटिल व विविध समाज व्यवस्था में समुदायों, जातियों एवं लिंगों के बीच अधिक समानता अनिवार्य है। अधिकांश लोगों की आधारभूत जरूरतों को प्राथमिकता देनी होगी, अमीर वर्ग के लोगों को कम उपभोग करने के लिये उपयुक्त कानून एवं नीतियाँ पारित कर मजबूर करना होगा, अधिक आय एवं धन एकत्रण पर रोक लगानी होगी एवं सामूहिक सामाजिक प्राथमिकताओं को गरीबों के पक्ष में बदलनी होगी।

ख) जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से मुकाबला के लिये न्यायोचित प्रस्तुति मुकाबला केवल आपातकालीन घटना के प्रतिक्रिया स्वरूप ही नहीं होनी चाहिए बल्कि इसके लिये पहले से ही तैयारी करनी होगी क्योंकि गरीब वर्ग के ऊपर ही ऐसी आपात घटनाओं के दुष्प्रभाव सबसे अधिक होते हैं इसलिये उनके लिये पर्याप्त प्रावधान करनी होगी ताकि वह ग्लोबल वार्मिंग से कम प्रभावित हो एवं आपात घटनाओं के पश्चात जल्द-से-जल्द अपनी आजीविकाओं को पुनर्स्थापित कर सकें।

ग) पीढ़ियों के बीच न्यायोचित बर्तावः हम कितने आगे तक सोचने को तैयार हैं? क्या हम इस बात को मानने के लिये तैयार हैं कि केवल हमारी पीढ़ी को ही उपभोग का अधिकार नहीं है बल्कि भविष्य में आने वाली पीढ़ियों को भी सामूहिक संसाधनों पर हमारे बराबर के हक हैं? यह भी स्थायी विकास का एक अंग है।

घ) अन्य प्रजातियों के प्रति न्यायोचित बर्तावः हमें ऐसे दृष्टिकोण से हटना होगा जो केवल मानवों और उनके बीच के अन्तर्विरोधों पर केन्द्रित है। हमें मानना होगा कि अन्य प्रजातियों को भी सामूहिक संसाधनों, ऊर्जा, नदियों एवं वनों पर उतना ही हक है जैसे कि हमें है। हमें समझना होगा कि हम पृथ्वी पर अब तक के खोजे गए एवं जीवित 17 लाख प्रजातियों में से सिर्फ एक है। पारिस्थितिक तंत्र एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं एवं जीवन एक जाल की तरह है जिसे हमें और अच्छे ढंग से संरक्षित करना होगा।

मई 2016


सूचना- इस पुस्तिका में प्रस्तुत किये गए विषय के बारे में टिप्पणी करने या ग्लोबल वार्मिंग के बारे में चर्चा करने के लिये पाठक मुझसे सम्पर्क कर सकते हैं। कोई भी संगठन या संस्था इस पुस्तिका को किसी भी भाषा में अपने नाम से प्रकाशित कर सकता है। लेखन की स्वीकृति अगर मुझे दिया जाता है तो अच्छा होगा परन्तु यह आवश्यक नहीं है। कृपया इसके लेखन में परिवर्तन न करें। यह पुस्तिका अंग्रेजी के मूल लेखन का अनुवाद है एवं इसके एक पहले के संस्करण का कन्नड़ भाषा में अनुवाद हो चुका है। यह संस्करणों के प्रतियाँ भी इमेल से उपलब्ध कराए जा सकते हैं।

ईमेल
nagraj.adve@gmail.com

मोबाइल नं.
09910476553

मूल अंग्रेजी लेख से अनुवाद: विवेक मलिक

सन्दर्भ सूची


हिन्दी भाषा में जलवायु परिवर्तन के विषय में विस्तृत लेख या सन्दर्भ मिलना मुश्किल है इसलिये यहाँ अंग्रेजी में उपलब्ध कुछ प्रमुख सन्दर्भों का उल्लेख किया गया है।

- India Climate Justice, Mausam nos. 1-6, http://www.thecornerhouse.org.uk/resources/results

- Soumya Dutta, et al, Climate Change and India, RLS/ Daanish Books, Delhi, 2013.

- IPCC, Climate Change 2013: The Physical Science Basis, Summary for Policy Makers,

https://www.ipcc.ch/report/ar5/.

- Delhi Platform, ‘Impacts of Global Warming on Agriculture in India’, 2009 (लेखक के पास उपलब्ध)

- P.K. Aggarwal, ‘Global Climate Change and Indian Agriculture: Impacts, Adaptation and Mitigation’, Indian Journal of Agricultural Sciences, vol. 78, no. 10, November 2008, pp. 911-919.

- Nagraj Adve, ‘Moving Home: Global Warming and the Shifts in Species’ Ranges in India’, Economic and Political Weekly, vol. 49, no. 39, 27 September 2014.

- People’s Science Institute, Documenting Climate Change in Uttarakhand, Dehradun, 2010 (लेखक के पास उपलब्ध)

- MoEF/ Government of India, India’s Intended Nationally Determined Contribution, October 2015, http://www4.unfccc.int/submissions/INDC/Published%20Documents/India/1/INDIA%20INDC%20TO%20UNFCCC.pdf (जलवायु परिवर्तन के बारे में भारत सरकार के आधिकारिक दृष्टिकोण इसमें व्यक्त है)

- Centre for Science and Environment, Down to Earth, http://www.downtoearth.org.in/(भारत में जलवायु परिवर्तन की वर्तमान स्थिति सम्बन्धी खबर एवं विश्लेषण इसमें मिलेंगे)

- Indian Network on Ethics and Climate Change/ INECC, http://inecc.net/ (भारत में जलवायु परिवर्तन से सम्बन्धित राजनीतिक विश्लेषण इसमें मिलेंगे)

- John Bellamy Foster, The Ecological Revolution, Cornerstone Publications, Kharagpur, 2009.

- Naomi Klein, This Changes Everything: Capitalism vs the Climate, Penguin Books, 2014.

- अन्य देशों में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी समस्याओं एवं संघर्षों के बारे में जानकारी के लिये देखें - · https://350.org/

- विकास एवं जलवायु परिवर्तन से जुड़ी नियमित खबरों एवं राजनीतिक विश्लेषण के लिये देखें - Guardian newspaper, at https://www.theguardian.com/environment/climate-change

अंग्रेजी में पढ़ने के लिये इस लिंक को यहाँ देखें



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