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जलमग्न जकार्ता

Author: 
राजेश विक्रांत
Source: 
दोपहर का सामना, 30 नवम्बर, 2016

अगर आपसे कहा जाए कि आने वाले दिनों में एक भरा पूरा शहर डूब जाएगा तो शायद आपको यकीन नहीं होगा। पर यह बात शत प्रतिशत सच है। दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाले द्वीप जावा का एक शहर है जकार्ता। इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता। एक करोड़ से ज्यादा आबादी वाला यह शहर समुद्र से घिरा हुआ है लिहाजा इसके अस्तित्व पर दोहरा संकट खड़ा हो चुका है।

जलमग्न जकार्ता ग्लोबल वॉर्मिंग से जहाँ समुद्र के जलस्तर में इजाफा हो रहा है वहीं इस शहर की जमीन नीचे भी बैठती जा रही है। अत्यधिक भूजल दोहन से यहाँ की जमीन धँस रही है दुष्परिणाम जकार्ता तेजी से डूब रहा है। ध्यान रहे कि ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से डूबने की कगार पर खड़ा जकार्ता कोई पहला या इकलौता शहर नहीं है।

वैज्ञानिक कई सालों से लगातार ऐसी चेतावनी जारी कर रहे हैं कि यदि धरती का तापमान इसी तरह से बढ़ता रहा तो आने वाले समय में कुछ बुरा हो सकता है। साइंटिफिक मैगजीन जनरल साइंस ने अपनी रिव्यू रिपोर्ट में कहा है कि धरती का तापमान अगर 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा तो समुद्र लेवल कम से कम 20 फीट यानी 6 मीटर तक बढ़ जाएगा। ऐसा होने के बाद जकार्ता ही नहीं बल्कि हिन्दुस्तान के मुम्बई-कोलकाता सहित दुनिया के 20 बड़े शहरों पर डूबने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा।

माना जा रहा है कि ऐसे हालात में धरती का 444000 स्क्वायर मील भू-भाग समुद्र में डूब जाएगा जिसकी वजह से 375 मिलियन से भी अधिक लोग प्रभावित होंगे। पर्यावरण परिवर्तन पर अब तक जितने सम्मेलन, बैठक या समिट हुए हैं सभी का मकसद दुनिया के औसत तापमान में 2 डिग्री सेल्सियस की संभावित बढ़ोतरी को रोकना ही है। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र की क्लाइमेट चेंज से निपटने के लिये ग्लोबल डील पर सभी देशों की रजामंदी का अभियान भी है।

दुनिया के जो 20 शहर 6 मीटर समुद्र लेवल राइज के दायरे में हैं उनमें मुम्बई, कोलकाता, शंघाई (चीन), हांगकांग (चीन), ताइझोउ (चीन), तानजिन (चीन), नांतोंग (चीन), जियागमेन (चीन), हुआइन (चीन), शांतोऊ (चीन), लियानयुंगैंग (चीन) जकार्ता (इंडोनेशिया), हो ची मिन सिटी (वियतनाम), हनोई (वियतनाम), नाम दिन्ह (वियतनाम), ओसाका (जापान), टोक्यो (जापान), चटगांव (बांग्लादेश), खुलना (बांग्लादेश) और बारिसाल (बांग्लादेश) के साथ इटली के वेनिस, अमेरिका के मैक्सिको सिटी और न्यू ऑरलियन्स, थाईलैंड के बैंकाक का नाम भी शामिल है।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार समु्द्र के स्तर में इजाफा गैस इमिशन की मौजूदा रफ्तार से बढ़ने से हो सकता है। समुद्र लेवल बढ़ने से समुद्र तटों का कटाव शुरू होगा, जिससे दुनिया का एक बड़ा हिस्सा पानी में डूब जाएगा और लोग बेघर हो जाएंगे। चीन दुनिया में सबसे ज्यादा ग्रीन हाउस गैस पैदा करने वाला देश है लिहाजा तापमान बढ़ने का सबसे ज्यादा असर चीन पर ही होगा। ऐसा होने पर प्रभावित होने वाली कुल आबादी की एक-चौथाई चीन की होगी।

अमेरिका ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के मामले में दूसरे नंबर पर है तथा इससे उसे काफी नुकसान होगा। रिपोर्ट में फिलहाल मुम्बई, कोलकाता, शंघाई और हांगकांग समेत दुनिया के कई बड़े शहरों को 6 मीटर तक डूबने के दायरे में बताया गया है। इसमें चौंकाने वाली बात ये है कि 6 मीटर समुद्र के स्तर के दायरे से प्रभावित होने वाले टॉप 20 शहरों में सभी एशिया के हैं। अगर बात ग्लोबल वॉर्मिंग से ज्यादा प्रभावित होने वालों की करें तो ईस्ट कोस्ट, गल्फ ऑफ मैक्सिको प्रमुख हैं। अमेरिका के पूर्वी तट और मैक्सिको की खाड़ी में समुद्र स्तर बहुत तेजी से बढ़ रहा है।

पिछले 50 सालों में समुद्र लेवल यहाँ पर 8 इंच से ज्यादा बढ़ा है। जबकि पूर्वी तट और खाड़ी इलाकों में जमीन घट रही है जिससे समुद्र का पानी देशों के अन्दर घुस सकता है। दुनिया के बाकी देशों में भी समुद्र की स्थिति में बदलाव हो रहा है। एक वैज्ञानिक आकलन के अनुसार सन 1880 से समुद्र का जलस्तर औसतन 8 इंच बढ़ा है। इसकी वजह ग्लेशियर्स का पिघलना और बर्फीली चोटियों का सिकुड़ना है। इसमें 1990 से इजाफा हुआ है।

2003 से 2007 के बीच ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र लेवल में लगभग आधा इंच बढ़ोतरी हुई है। अगर गैस उत्सर्जन ऐसे ही बढ़ता रहा तो 2050 तक समुद्र का जलस्तर काफी बढ़ जाएगा। 21वीं सदी के आखिर तक यह और भी ज्यादा होगा। ग्लोबल वार्मिंग में अगर 2016 तक बढ़ोतरी जीरो हो जाती है, तो भी समुद्र का जलस्तर अगले कई दशकों तक बढ़ता रहेगा।

जकार्ता शहर को बचाने के लिये सरकार दुबई के पास आइलैंड्स की तरह की व्यवस्था करना चाहती है पर इंडोनेशिया के तमाम वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता इस योजना की खिलाफत कर रहे हैं। बता दें कि पीने के पानी के लिये जकार्ता पूरी तरह से भूजल पर निर्भर है। शहर की बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिये अत्यधिक दोहन से यहाँ की जमीन खोखली हो गई है लिहाजा यह धँस रही है।

1990 से यह स्थिति पैदा होना शुरू हुई। जकार्ता की जमीन धँसने की सालाना दर 25 सेंटीमीटर है। इसके अलावा शहर को विकसित करने के लिये ताकि बढ़ती आबादी के लिये आवास, शिक्षा, सेहत, कारोबार की व्यवस्था हो सके, गगनचुम्बी इमारतों, कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स, मार्केट, मॉल, मल्टीप्लेक्स, सुपर बाजार आदि का निर्माण कार्य भी जोरों पर चल रहा है लिहाजा पहले से खोखली हो चुकी जमीन पर वजन भी बढ़ रहा है।

अत्यधिक निर्माण से बरसात का पानी जमीन के भीतर नहीं जा पा रहा है। इससे भूजल स्तर कम हो रहा है। साथ ही बरसात का यही पानी निचले इलाकों में मुसीबत का कारण भी बन रहा है। जकार्ता में 13 नदियाँ हैं। यहाँ की जमीन समुद्र स्तर से 4 मीटर नीचे चली गई है लिहाजा मानसून के दौरान नदियों का पानी खाड़ी में गिरने की बजाय निचले इलाकों में फैल जाता है। इसी ने पूरे शहर को डरा दिया है। वैसे शहर को बचाने के लिये नेशनल कैपिटल इंटीग्रेटेड कोस्टल डवलपमेंट प्रोग्राम के तहत ग्रेट गरुड़ परियोजना तैयार हुई है। इस पूरी परियोजना की लागत 40 अरब डॉलर है।

इस परियोजना पर डच और इंडोनेशिया सरकार संयुक्त रूप से काम कर रही है इसके तहत विशालकाय समुद्री दीवार और ग्रेट गरुड़ द्वीप का निर्माण किया जाना है। बहरहाल, अगर हमें जकार्ता के साथ दुनिया के अन्य शहरों को डूबने से बचाना है तो ग्लोबल वार्मिंग का सफाया करना होगा यानी धरती का तापमान कम करना होगा, अन्यथा आने वाले सालों में चीन की लायन सिटी, हिन्दुस्तान का द्वारका, खम्भात और टिहरी, ग्रीस का शहर पावलोपेट्री, जमैका का पोर्ट रायल, सिकन्दर का शहर अलेक्जेंड्रिया, इजिप्ट का हेरासलोइन आदि गुम शहरों की सूची में जकार्ता का भी नाम शामिल हो जाएगा।

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