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गाँवों को पैसे नहीं, सहानुभूति चाहिए

Author: 
अमरेंद्र किशोर
Source: 
शुक्रवार डॉट नेट

अमरेंद्र किशोर द्वारा शरद दत्त से बातचीत पर आधारित साक्षात्कार

आपकी पुस्तक ‘बादलों के रंग हवाओं के संग’ के बारे में सुंदरलाल बहुगुणा ने लिखा है कि इस पुस्तक का प्रकाशन अपने आप में एक घटना है।

इस किताब के प्रकाशन को इतने बड़े पर्यावरणवादी ने यदि एक घटना कहा है तो अपने आप में यह एक बड़ी खबर है। यह किताब भारत के लोकज्ञान को लेकर है। सात राज्यों में घूमकर तथ्यों को यदि मैं इकट्ठा करता हूँ, उन्हें शब्दबद्ध करता हूँ तो यह घटना है अपने आप में।

बादल शब्द का इस्तेमाल आप बहुत करते हैं। बादलों से अपने रिश्ते के बारे में कुछ बताएँ? कैमूर की पहाड़ियों में मेरा बचपन बीता। वहाँ मैं बचपन में बादलों को छूने दौड़ता था। हर इलाके के बादलों की अपनी अलग तासीर है, अलग चरित्र है। इस किताब में भी मैंने दिखाया है कि बादलों को देखकर आप मौसम का हाल जान सकते हैं। तितरपंखी बादल का मतलब है कि जबरदस्त तरीके से बारिश होगी। बताशे के रंग का बादल देखने में केवल फबने वाला बादल होता है और किशमिशी रंग के बादल का मतलब है कि आज घुटनों भर पानी खेत में जरूर होगा। बादलों के अलग-अलग रंगों को लेकर मैंने जो लिखा है, उसमें मेरा अपना कुछ नहीं है। मैंने ग्रामीणों, आदिवासियों से जानकर यह सब लिखा है।

लोकसंस्कृति में आपकी रुचि कैसे शुरू हुई?

मेरे पिताजी आदिवासी विद्यालयों में पढ़ाते थे। जब मैंने होश संभाला तो अपने आपको कैमूर की वादियों में पाया। आदिवासियों के साथ रहना, उनके साथ नाचना-गाना, उनके साथ खेलना-कूदना। मेरा लालन-पालन आदिवासी बच्चों के बीच हुआ। उस संस्कृति से मेरा जुड़ाव बहुत ज्यादा हो गया। इसे लोकसंस्कृति कह सकते हैं यानी लोगों से जुड़ी संस्कृति, न कि बाहर से लाई हुई संस्कृति। आपकी किताबों में बहुत से प्रसंग महाभारत और पुराने महाकाव्यों से हैं। एक तरफ तो विशुद्ध लोक संस्कृति है और दूसरी तरफ भारतीय परंपरा और संस्कृति …

यह काम मेरे पिताजी का सपना था लेकिन उनकी लाचारी थी कि वे सरकारी नौकरी में थे। कहीं न कहीं एक बंदिश थी कि वे यह नहीं कर सकते थे। मुझे उनसे इस संस्कृति को समझने में 5-7 साल लग गए। इसमें भारतीय संस्कृति की बात थी और जब आप संस्कृति की बात करेंगे तो अपने इतिहास की, पौराणिक इतिहास की बात करेंगे। वही पुराण, महाभारत, रामचरित मानस! अगर पीपल की चर्चा करते हैं तो पीपल अपने आप में वासुदेव है, अमर है। उसके पत्तों में कीड़े नहीं लगते। तुलसी का बहुत बड़ा आयुर्वेदिक महत्त्व है। हिंदू धर्म सिर्फ आचार-विचार की विधा नहीं है, जीवन जीने की एक कला है।

आपकी एक और पुस्तक ‘आजादी और आदिवासी’ में आदिवासियों की पीड़ा है कि आजादी के इतने साल बाद भी उन्हें पूरी तरह से आजादी नहीं मिली। आपकी नजर में इस समस्या का समाधान क्या है?

हम नापते बहुत ज्यादा हैं और काटते बहुत कम। जैसे वन अधिकार कानून है, जिसकी 2006 से सिर्फ संकल्पना हो रही है लेकिन असल में हो कुछ नहीं रहा है। इस देश का अगर कोई सबसे बड़ा जमींदार है तो वह है वन विभाग। वन विभाग के अत्याचार की कहानी पुरानी है। सरकार, समाजसेवी, मानव विज्ञानी, लाल सेना या लाल आतंक से जुड़े लोग, ये सब आदिवासियों के शुभचिंतक तो हैं लेकिन करता कोई कुछ नहीं है। आदिवासियों के हालात जो 60 साल पहले थे, अब उससे भी बदतर हो गए हैं। मुझे नहीं लगता कि सरकार या सरकारी मशीनरी के पास इसका कोई इलाज है। जहाँ सरकार विफल होने लगती है तो समाज के हर नागरिक का फर्ज बनता है कि वह अपनी तरफ से जो कुछ बन पड़ता है वह करे।

आपने लिखा है कि आज भी 15-15 किलोमीटर दूर तक उन्हें पानी के लिये चलना पड़ता है। आज बाजारवाद के युग में जब कोकाकोला/पेप्सी कोला हर कोने पर मौजूद है लेकिन लोगों को पानी के लिये दूर जाना पड़ता है। यह तो एक विडंबना है ..

इसे विडंबना मत कहिए, बल्कि बाजार के व्यापारियों से यह सीखने की चीज है। आज भी कालाहांडी के बहुत से इलाकों में पानी नहीं है पर वहाँ के बाजारों में कोक है। आपको ‘पेरासिटामोल’ की गोली मिले या न मिले लेकिन वहाँ सौंदर्य प्रसाधन की तमाम सामग्रियाँ जरूर मिलेंगी, किताबें नहीं मिलेंगी लेकिन अश्लील फिल्मों की सीडी जरूर मिलेगी। तो बाजारवाद से यह सीखने की चीज है कि कैसे उनकी तमाम चीजें वहाँ पहुँच गई हैं। सरकार को वहाँ पैसे भेजने की जरूरत ही नहीं है। वहाँ के स्थानीय संसाधनों को ठीक से इस्तेमाल करने की जरूरत है। अगर ऐसा हो तो देश का हर गाँव अपना भरण-पोषण खुद कर सकता है। मैं कालाहांडी के पाँच गाँवों में ऐसा ही एक प्रयोग कर रहा हूँ। वहाँ रासायनिक उर्वरकों से नहीं, बल्कि गोबर की खाद के जरिए विकास का जो सपना हम देख रहे हैं, वह जरूर सफल होगा। उस दिन लोग समझ जाएँगे कि गाँवों को पैसे की नहीं, सहयोग और सहानुभूति की जरूरत है।

अपनी किताब ‘माता अनब्याही’ के बारे में कुछ बताएँ?

उड़ीसा में अनब्याही माताओं की संख्या 40,000 से ज्यादा है। इसके पीछे कई कारण हैं। कभी प्रेमी माँ बनाकर छोड़ देता है, कभी ठेकेदार लाचारी का फायदा उठाकर उन्हें माँ बना देते हैं। मैंने उड़ीसा के 216 जिलों में ऐसी ही माताओं से बात की और एक ‘केस स्टडी’ तैयार की। यह किताब काफी चर्चित रही है।

‘माँ नाराज क्यों है?’ (उपन्यास) और ‘जंगल-जंगल लूट मची है’ अपनी इन पुस्तकों के बारे में बताएँ।

मन दुखी था। जो काम मैं कर रहा हूँ, उससे माँ कितनी नाराज या कितनी खुश है, यह मुझे पता नहीं था। तो इसी पर मैंने किताब लिखी ‘माँ नाराज क्यों है?’ इससे मन बहुत हल्का हुआ। जंगलों में जो कुछ हो रहा है, जल, जानवर, जमीन और जंगल का जिस तरह से सरकार ने सत्यानाश किया है ‘जंगल-जंगल लूट मची है’ उसी के बारे में है।

भविष्य की क्या योजना है?

जिन पाँच गाँवों की मैंने अभी चर्चा की, उन्हीं को आत्मनिर्भर बनाने की योजना है। जल्द ही मेरी एक किताब आ रही ‘आदिवासी और मानवाधिकार’। झारखंड पर भी मेरी एक किताब आ रही है वहाँ की गड़रिया शैली पर, कि किस तरह गड़रिए बैठकर कहानी कहते हैं।

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