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एवरेस्ट को अब पर्वतारोहियों से बचाओ

Author: 
अशोक कुमार
Source: 
शुक्रवार डॉट नेट

हिमालय बाजार की ऊँचाइयों ने हिमालयी ऊँचाइयों को भी नहीं बख्शा। जी हाँ, यह शब्दश: सच है। दुनिया के सबसे ऊँचे पर्वत शिखर माउंट एवरेस्ट (समुद्रतल से 29,029 फुट) को फतह करने का जो पहला साहसिक उपक्रम 29 मई 1953 को सर एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे ने कर दिखाया था, उसने आज पैसे वालों की ‘एडवेंचर टूरिज्म’ की व्यावसायिक शक्ल अख्तियार कर ली है। नतीजा यह है कि बिलियर्ड की टेबल के आकार के चबूतरे जैसी इस चोटी पर खड़े होने की कथित गौरवपूर्ण उपलब्धि को अपने नाम करने के इच्छुक प्रत्याशियों की लंबी कतार लगने लगी है।

चोटी तक के सफर की आखिरी बाधा, ‘हिलेरी स्टेप’ के नाम से मशहूर 40 फुट ऊँची सीधी खड़ी पहाड़ी पर लगने वाली कतार की वजह से ‘पर्वतारोहियों’ को वहाँ अब घंटों इंतजार करना पड़ता है। इस इंतजार के चलते कोई ऑक्सीजन सिलिंडर खत्म हो जाने के कारण, तो कोई बर्फीले तूफान के थपेड़ों के कारण दम तोड़ देता है। पिछले साल 10 पर्वतारोहियों ने जान गँवाई थी, तो इस साल अब तक सात मारे जा चुके हैं। 60 वर्षों में इस तरह 300 से ज्यादा पर्वतारोही जान गँवा चुके हैं।

मौसम के लिहाज से मई के आखिरी पखवाड़े को एवरेस्ट की चढ़ाई के लिये सबसे अनुकूल माना जाता है और सुबह के 11 बजे तक ही चढ़ाई की जा सकती है। इस कारण मारामारी मचती है। खबर है कि इस साल अब तक 520 से ज्यादा पर्वतारोहियों ने एवरेस्ट फतह कर लिया है। इनमें भारत की विकलांग प्रशिक्षु पुलिस अधिकारी अरुणिमा सिन्हा और जापान के 80 वर्षीय युइचिरो मिउरा शामिल हैं। मिउरा ने इस उम्र में चढ़ाई करके सबसे उम्रदराज एवरेस्ट विजेता का खिताब हासिल किया, तो 2010 में 13 वर्षीय अमेरिकी लड़के जॉर्डन रोमेरो ने सबसे कम उम्र एवरेस्ट विजेता का। हर साल ३35,000 से ज्यादा लोग इस पर्वत क्षेत्र की सैर करते हैं और 60 वर्षों में 6,149 पर्वतारोही एवरेस्ट फतह कर चुके हैं। इसकी होड़ कुछ इस तरह बढ़ चुकी है कि लोग अलग-अलग तरह के रिकॉर्ड अपने नाम करवाने में जुट गए हैं। कोई बिना ऑक्सीजन के एवरेस्ट फतह करने का कारनामा कर रहा है; तो कोई सबसे कम समय में, कोई सबसे कम उम्र में तो कोई सबसे ज्यादा उम्र में और कोई सबसे ज्यादा बार चोटी तह करने का आंकड़ा अपने नाम कर रहा है। हाल के वर्षों में ऐसे रिकॉर्ड बनाने की सनक तो इस होड़ को बढ़ा ही रही है, पर्वतारोहण की तकनीक में सुधार और व्यावसायिक मुनाफाखोरी भी एवरेस्ट पर भीड़ बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रही है।

गुड़गाँव स्थित ‘इक्सीगो डॉटकॉम’ सरीखे अनेक वेब पोर्टल शौकिया पर्वतारोहियों के लिये एवरेस्ट चढ़ाई से संबंधित छोटी से छोटी जानकारियाँ उपलब्ध करा रहे हैं, तो दुनियाभर में ट्रैवल एजेसियाँ इस पूरे अभियान के ठेके लेने को तैयार हैं। हिमालय क्षेत्र के शेरपा चढ़ाई के दौरान विभिन्न ठिकानों पर तमाम अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस तंबू लगाने से लेकर चोटी-दर-चोटी रस्सियां तान कर चढ़ाई को आसान बनाने के लिये उपलब्ध हैं। ‘नेशनल जियोग्राफिक’ पत्रिका के मुताबिक, 1990 में अगर इस अभियान की सफलता दर मात्र 18 प्रतिशत थी, तो 2012 में वह बढ़कर 56 प्रतिशत तक पहुँच गई है। इस अभियान में पर्वतारोही को 10 हजार डॉलर से लेकर 1 लाख डॉलर तक खर्च आ सकता है, जिसमें नेपाल सरकार द्वारा जारी की जाने वाली परमिट का खर्च भी शामिल है। नेपाल सरकार 10 पर्वतारोहियों के दल को परमिट देने लिये 70,000 डॉलर की फीस लेती है। इस अभियान के लिये प्रायोजकों की कमी भी नहीं है। हिलेरी-नोर्गे के अभियान को करीब 100 ब्रिटिश कंपनियों ने प्रायोजित किया था।

लेकिन तब और अब में काफी फर्क आ चुका है। उन दिनों यह पूरे सीजन तक चलने वाला लंबा अभियान होता था। पर्वतारोही काठमांडो से शुरुआत करते थे और करीब महीने भर में हिमालय के नीचे आधार शिविर में पहुँचते-पहुँचते तक अपने शरीर का तालमेल पूरे परिवेश और मौसम के साथ बिठा लेते थे। आज पर्वतारोही विमान से सीधे वहाँ उतरते हैं और लगभग तीन महीने में ही एवरेस्ट फतह कर डालते हैं। हिलेरी और नोर्गे ने तो अपनी शालीनता का परिचय देते हुए यह स्पष्ट नहीं किया था कि चोटी पर उनमें से किसने पहले कदम रखा लेकिन आज के पर्वतारोही इतनी हड़बड़ी में होते हैं कि वे रास्ते में बीमार-घायल पर्वतारोहियों की मदद करने की जहमत तक नहीं उठाते।

बल्कि वे तो आपस में धक्कामुक्की और झगड़े तक करने से बाज नहीं आते। खबर है कि पिछले साल तीन पर्वतारोहियों ने जब 50 हजार डॉलर तक खर्च करने वाले अमीर पर्वतारोहियों के लिये रस्सियाँ तान रहे शेरपाओं से आगे निकलने की कोशिश की तो उनके बीच बकझक और मारपीट भी हुई। जाहिर है कि सहनशीलता और विनम्रता की परीक्षा लेने वाला यह अभियान पैसे के रौब और अधैर्य के कारण अपनी गरिमा खो रहा है। इससे भी खतरनाक बात यह है कि इन अभियानों के कारण एवरेस्ट कूड़े के ढेर में तब्दील हो रहा है।

ऑक्सीजन के खाली कनस्तर, फटे तंबुओं के टुकड़े, मानव शव, मानव मल समेत तमाम तरह के साजोसामान तलहटी से लेकर चोटी तक बिखरे नजर आते हैं। इस कचरे से चिंतित ‘इको एवरेस्ट एक्सपीडिशन’ सरीखे पर्यावरण प्रेमियों के दल एवरेस्ट की सफाई का सालाना अभियान चला रहे हैं। यह दल 2008 से अब तक वहाँ से करीब १३ टन कचरे की सफाई कर चुका है, तो भारत-नेपाल सेनाओं के एक संयुक्त दल ने हाल में दो टन कचरा साफ किया है। कलाकारों का दल भी करीब डेढ़ टन कचरा लेकर नीचे आया है और उन्हें कलाकृतियों में तब्दील करके उनकी बिक्री से इस अभियान को आगे बढ़ाने में मदद करना चाहता है। फिर भी, माना जाता है कि 10 टन कचरा अभी भी उन पहाड़ियों में बिखरा पड़ा है।

एक ओर ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के कारण पहले ही हिमालय की हिमनदों के पिघलने के कारण गंगा, मेकोंग, यांगत्जे जैसी बड़ी नदियों के (जो दो अरब आबादी के जीवनस्रोत हैं) जलस्रोतों के लुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है, तो एवरेस्ट पर बढ़ती भीड़ और कचरा इस खतरे को और बढ़ाने का काम ही कर रहा है। खतरे की एक और घंटी यह है कि इस भीड़ पर लगाम लगाने की कोशिशों की जगह उसे और सुविधाएँ प्रदान करने पर विचार किया जा रहा है। चोटी पर चढ़ने वालों की कतार को जल्दी निबटाने के लिये ‘हिलेरी स्टेप’ से चोटी तक एक सीढ़ी बना देने पर विचार किया जा रहा है। पिछले साल परमिटों की बिक्री से 1.2 अरब डॉलर कमाने वाला नेपाल क्या एवरेस्ट को बचाने के लिये परमिट की फीस बढ़ाने की पहल करेगा? क्या विश्व समुदाय इस दिशा में कोई कदम उठाएगा?

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