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बाल-सखा कुँवर प्रसून और मैं

Author: 
प्रताप शिखर
Source: 
‘एक थी टिहरी’ पुस्तक से साभार, युगवाणी प्रेस, देहरादून 2010

सन 1961 में प्राथमिक विद्यालय भैंस्यारौ से कुँवर प्रसून ने पाँचवी कक्षा उत्तीर्ण की और मैं पाँचवी कक्षा में दाखिल हुआ। अब तक वह अपने गाँव में नाटक करवा चुका था। नाटक के बहाने गाँव में जुलूस भी निकाल चुका था। नाटक करने के लिये बल्ली, तिरपाल और दरी लोगों के घरों से माँग कर प्राप्त किये गये थे। एक ताऊ जी ने उन्हें बल्ली देने के बजाय डाँट कर भगा दिया था। बस ताऊ जी के खिलाफ जुलूस निकल गया। ढेवर्या बड्डा मुर्दाबाद! ढेवर्या कौंकी! हाय! हाय! नारों से गाँव गुंजायमान हो गया। तब अधिकांश बच्चों को मुर्दाबाद और हाय-हाय का अर्थ भी समझ में नहीं आता था। जुलूस के बाद जनमत बच्चों की तरफ हो गया था। गाँव वालों ने ढेवर्या ताऊ की खूब भर्त्सना की। झोपड़ीनुमा बालों वाला छोटे कद का ठिगना सा लड़का कुँवर सिंह (कुँवर प्रसून) बच्चों का नेता था। ढेबर्या ताऊ ने कहा- ‘गाँधी की जड़ मरिगे’ (गाँधी का लड़का मर गया)। उसके पिता को लोग गाँधी कहते थे। लड़के गाँधी कहकर उसे भी चिढ़ाया करते थे। कुँवर बड़े स्कूल (राजकीय हाईस्कूल चम्बा) में कक्षा 6 का विद्यार्थी था और हमें मिलने आया करता था। हम उसे बड़ा विद्यार्थी मानते हुए उसका सम्मान करते थे। गाँव की महिलाएँ प्रदेश गये अपने पतियों के लिये उससे पत्र लिखवाया करती थी।

एक थी टिहरी एक बार उसे मसखरी सूझी और उसने स्यूण्या के पत्र में उसकी पत्नी की ओर से लिख दिया, ‘हमारे घर में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है। बच्चा हँसते हुए इस दुनिया में आया है।’ पुत्र की कामना करने वाला स्यूण्या पत्र पाते ही दिल्ली से भाँति-भाँति की पोशाकें खरीद कर घर आया। सन 1966 में हम लोग जनता हाई स्कूल जाजल में मिले। मैं नौवीं और वह दसवीं कक्षा में दाखिल हुआ था। उसने लाल बहादुर शास्त्री पर ब्रज भाषा में एक कविता लिखी थी। शनिवार को होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम में वह उस कविता को सुनाता था, भारत-चीन युद्ध पर स्वरचित हिन्दी कविता और ‘मदुली हिराहिर’ गढ़वाली गीत भी सुनाया करता था। अखबारों में पुस्तकों के विज्ञापन देख-देख कर वह उन्हें पढ़ने के लिये तरसता था। पर जेब खाली होने के कारण उन्हें मंगा नहीं सकता था। जाजल में कारोबार करने वाले निरक्षर भागसिंह भण्डारी के नाम उसने वी.पी.पी. से पुस्तकें मँगवाई और उनके पुत्र से मित्रता कर बारी-बारी से सभी पुस्तकें पढ़ डाली। हाईस्कूल उत्तीर्ण कर वह अपने गाँव के कौंर सिंह के साथ दिल्ली भाग गया। दिल्ली के अनुभव वह चटखारे ले-ले कर सुनाता था। किसी भी होटल में वह दोपहर के भोजन तक टिकते थे और कुछ ही घण्टे नौकरी करते थे। एक बार वे दिल्ली में नौकरी कर रहे अपने गाँव के बड़े भाई के पास रात गुजारने गए, अगले दिन भरपेट भोजन कराने के बाद बड़े भाई ने उनसे कहा कि अब मेरे पास मत आना। कहीं जम कर नौकरी करना। रेलवे प्लेटफार्म पर बिना टिकट पकड़े जाने पर अपनी वाक्चातुर्य से वह बाहर आया।

राजकीय सुमन हाई स्कूल चम्बा में इण्टर की कक्षाएँ खुलने पर वह वापस लौट आया और अपने मामा की ‘छानी’ मखलख में रहकर इण्टर की पढ़ाई करने लगा। मखलख चम्बा के निकट घने बांजों के बीच स्थित खूबसूरत स्थान है। जंगल के बीच निवास करने पर उसने अपना छद्मनाम विपिन बिहारी रखा। अब वह विपिन बिहारी के नाम से कविताएँ लिखता था। तब मैं भोगपुर, देहरादून में ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ता था, वह मेरे लिये पत्र में कविताएँ लिखता था। उसने ‘मेरी शव-यात्रा’ शीर्षक से भ्रष्टाचार पर अतुकान्त कविता लिखी थी। विज्ञान के विषयों की वह तैयारी नहीं कर पाया था, इसलिये परीक्षा नहीं दी। तब मैं डिग्री कॉलेज में पढ़ने टिहरी गया और वह कला वर्ग के विषय लेकर चम्बा में ही इण्टर में पढ़ने लगा। उत्तीर्ण होने पर वह भी टिहरी आ गया। अब हम पुराना मोटर अड्डा में कमरा लेकर रहने लगे।

महाविद्यालय में स्वतंत्रता दिवस के दिन अनुपस्थित रहने पर प्रधानाचार्य डॉ. कपिलदेव उपाध्याय ने दण्डस्वरूप हमारी शुल्क मुक्ति निरस्त कर दी थी। अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिये हमने डाक से दो कविताएँ प्रधानाचार्य को प्रेषित कर दी। यद्यपि हमने छद्म नाम से कविताएँ लिखी थी पर प्रधानाचार्य ने हस्तलिपि से मिलान कर मुझे पकड़ लिया। दोनों कविताएँ मेरी हस्तलिपि में थी। मुझे प्रधानाचार्य के समक्ष पेश किया गया। मैंने उन्हें स्पष्ट बता दिया कि कविताएँ मैंने लिखी हैं, क्योंकि शुल्क मुक्त करने के बाद हमारी शुल्क मुक्ति निरस्त कर दी गई है। यह हमारे साथ अन्याय हुआ है। हमारा पक्ष सुने बिना ही हमें दण्ड दे दिया गया है।

. मुझे कविताओं के अर्थ बताने को कहा गया। पहली कविता का शीर्षक था, ‘ककड़ी के चोर को फाँसी’। जिस प्रकार अंग्रेज न्यायाधीश ने ककड़ी चोरने के मामूली अपराध में एक व्यक्ति को फाँसी की सजा सुना दी थी उसी प्रकार पहाड़ के ग्रामीण जीवन की समस्या समझे बिना ही आपने हमें दण्ड दे दिया। आपकी क्या समस्या है? प्रधानाचार्य ने मुझसे पूछा। गुरुजी! हमें एक दिन तो घर जाने में लगता है। हमारे लिये ‘खर्चे’ का इन्तजाम करने में भी घरवालों को समय लगता है। फिर 15 अगस्त से मैंने बीड़ी-सिगरेट पीना छोड़ दिया है। उस दिन गाँव के युवकों के साथ रास्तों की सफाई भी की है।

प्रधानाचार्य ने हिसाब लगाकर बताया कि तुम्हारी शुल्क मुक्ति की राशि से अधिक धनराशि की बचत तुम्हारे सिगरेट छोड़ने से हुई है। यह बात मैं एकदम सत्य कह गया था। मैं सालों तक सपने में भी सिगरेट पीता रहा। धूम्रपान की इच्छापूर्ति के लिये मैं जान-बूझकर धूम्रपान करने वालों की बगल में बैठ जाता था। यदि प्रधानाचार्य को न बताया होता तो सम्भवतः मैं पुनः धूम्रपान शुरू कर देता। दूसरी बात मैं एकदम असत्य कह गया था। अपनी भूल सुधार के लिये मैंने सर्वोदय सेवक श्री सन्त धर्मानन्द नौटियाल को आमन्त्रित कर उनके मार्गदर्शन में गणतन्त्र दिवस पर युवकों के साथ गाँव के रास्ते साफ किए।

प्रधानाचार्य ने दूसरी कविता ‘काश! मैं लड़की होता’ का अर्थ पूछा। मैंने कह दिया कि यह कविता कुँवर प्रसून ने बनाई है। उसे भी कक्षा से बुलाया गया। उसके आते ही प्रधानाचार्य ने पूछा ‘क्या तू लड़की होना चाहता है’। सकपकाहट में उसने कहा हाँ। प्रधानचार्य ने कहा कि चिकित्सा विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है कि अब लिंग परिवर्तन भी होने लगे हैं। महाविद्यालय में साधन सम्पन्न और नौकरीशुदा लोगों की लड़कियाँ पढ़ती थी। उन सब लड़कियों की पूर्ण शुल्क मुक्ति कर दी गई थी। इस पृष्ठ भूमि में वह कविता लिखी गई थी। प्रधानाचार्य ने धनराशि उपलब्ध होने पर पुनः शुल्क मुक्ति का वायदा किया और उसे पूर्ण भी किया। महाविद्यालय के एक कार्यक्रम में प्रधानाचार्य ने हमारी कविताओं का जवाब कविता में ही सुनाया,‘गजब होता यदि तू लड़की होता’। इस कविता में पर्वतीय महिला की दिनचर्या और कष्टों, पहाड़ी जन-जीवन और पुरुषों के निठल्लेपन तथा शराब के नशे में पत्नी का उत्पीड़न करने का वर्णन था। शिक्षक, छात्र-छात्राएँ और आगन्तुक हमारी तरफ देख-देख कर हँसी के फव्वारे छोड़ते रहे। पहाड़ी महिलाओं के मध्य समाज सेवा करने वाली विदूषी महिला डॉ. इन्दु टिकेकर ने कहा ‘इस पहाड़ में एक बार महिला का जन्म लेकर देखो’।

एक थी टिहरी माह में एक-आध बार हम चम्बा से रानीचौरी होते हुए पैदल घर आते थे। चम्बा में परिचितों, मित्रों से मिलते, होटलों में चाय की चुस्कियों के साथ देश-दुनिया की गप्प हाँकते। चाय के साथ बालूशाही खाना उसका शौक था। कभी-कभी शराब के तस्करों को पकड़ने की कार्यवाही करते थे। एक बार शराब के एक खतरनाक तस्कर पंछा को शहीद गबर सिंह नेगी के स्मारक के सामने वाले टीले पर हम लोगों ने धर दबोचा और उसकी बोतलें जब्त कर चौराहे पर ले आए। चौराहे पर एक आम सभा का आयोजन कर भाषण दिये और बोतलें फोड़ डाली। युवक संघ जाजल के माध्यम से भी हम लोग शराब के तस्करों को रंगे हाथों पकड़ते थे। शराब पीने और बेचने वाले से ‘लोण-लोट्या’ पद्धति से शपथ करवाते थे। कच्ची शराब के अड्डों पर छापा मारकर उपकरणों सहित शराब नष्ट करते थे। युवक संघ की कार्यकारिणी में उसका प्रस्ताव गिर जाने से क्षुब्ध होकर उसने प्रचार सचिव पद से इस्तीफा दे दिया था। इस्तीफे की एक पंक्ति थी, ‘डॉक्टर को बिदकाना, ग्राम सेवक को धमकाना, पंचायत मन्त्री को हड़काना युवक संघ का काम है तो मैं इससे इस्तीफा देता हूँ।’ युवक संघ का अध्यक्ष होने के नाते मैंने उससे इस्तीफा ले लिया और कभी बोर्ड की मीटिंग में नहीं रखा। उसने भी कभी इसकी चर्चा नहीं की और सभी लोग पूर्ववत युवक संघ के कार्य में जुटे रहे।

रानीचौरी से छातका तक बाँज, बुरांश, काफल, चीड़ का घना जंगल है। कभी चम्बा से ही विलम्ब से चलते तो रात में अंधेरे घने जंगल से गुजरते समय भय को भगाने के लिये चिल्ला-चिल्ला कर कहते, अबे चल…! अबे हट...! अबे! भाग...! हमारी आवाज गुरियाली की पहाड़ी पर टकरा कर वापस आती थी। मौण खाला के भयंकर गधेरे की गहरी घाटी को जल्दी-जल्दी पार कर जब चोटी पर पहुँचते तब जान में जान आती थी। जंगली जानवरों के साथ-साथ मौण खाला के कुख्यात दैंत का भी भय बना रहता था। गहरी घाटी में चिल्लाने की आवाज पानी के भयानक अट्टहास में दबकर रह जाती थी। जुलाई-अगस्त के वर्षाकालीन मौसम में जंगल में कोहरे से घिरी हुई रातें अत्यन्त डरावनी हो जाती है। एक बार हम गुरियाली से आगे बढ़ने की हिम्मत न कर सके और वापस लौटे। रानीचौरी में श्री बनवारीलाल बहुगुणा के मेहमान बने। कभी चम्बा में बुक सेलर विजय सिंह नेगी (विजय जड़धारी) के साथ रुक जाते थे। एक बार सांझ के समय एक भूली-भटकी बस पर चम्बा से जाजल के लिये सवार हुए। जाजल से मेरा गाँव नजदीक पड़ता था। तब बस में अपर और लोअर दो श्रेणियाँ होती थी। अपर श्रेणी का किराया लोअर से अधिक पड़ता था। उस खाली बस में चालक-परिचालक के अलावा केवल हम दो ही सवारी थे। जाजल तक अपर का किराया पूरा न होने पर कंडक्टर ने हमसे लोअर में बैठने को कहा, हमने उससे कहा कि पहले वह लोअर में अपनी सीट पर बैठ कर पीछे से दरवाजा खोले और सीटों की सफाई करें तब हम अन्दर प्रविष्ट होंगे। तब कंडक्टर की सीट सबसे पीछे होती थी और दरवाजा भी पीछे की ओर होता था, कंडक्टर भी अनाड़ी था, एक बार बुर्जुआ बन जाने पर सर्वहारा बनने में उसे अपनी तौहीन लग रही थी। झड़प होने के कारण हम अकड़ के साथ पाँच किलोमीटर पहले ही नागणी में उतर गये और यहाँ से पैदल चलते हुए रात को घर पहुँचे।

उन्नीस सौ इकहत्तर में बरेली कॉलेज बरेली में उत्तर प्रदेश तरुण शान्ति सेना का एक प्रशिक्षण शिविर उत्तर प्रदेश सर्वोदय मण्डल ने आयोजित किया था। टिहरी से मैं और कुँवर उस शिविर में भाग लेने गये थे। ठक्कर बापा छात्रावास के अधीक्षक भवानी भाई ने हमें एक तरफ का किराया देते हुए कहा था कि दूसरी तरफ का किराया आयोजकों की ओर से दिया जायेगा किन्तु वहाँ दूसरी तरफ का किराया नहीं मिला। फलतः नरेन्द्रनगर तक आते-आते हमारी जेबें खाली हो गयीं। हमारा गन्तव्य स्थान जाजल यहाँ से 25 किमी की दूरी पर था। हेंवल घाटी निवासी खाद्य निरीक्षक बख्तावार सिंह राणा नरेन्द्रनगर से हमें अपने साथ जाजल तक लाये। उन्होंने स्नेहवश हमारा किराया चुकाया था या हमारी परेशानी को समझते हुए, कुछ कह नहीं सकते। हमने उन्हें अपनी समस्या नहीं बताई थी। ठक्कर बापा छात्रावास में जाने की भी एक कहानी है। विश्वविद्यालय आन्दोलन के सम्बन्ध में हम सुन्दर लाल बहुगुणा से मिलने गये थे। बातचीत के बाद उन्होंने हमें छात्रावास का भ्रमण कराया और कहा कि यहाँ सारी सुविधाएँ मौजूद हैं, यहाँ आ जाओ। हम बहुगुणा से अत्यन्त प्रभावित हो चुके थे और अगले ही दिन ठक्कर बापा छात्रावास में आ गये।

एक थी टिहरी कुँवर के गाँव कुड़ी में एक बैशाखू बाकी हुआ करते थे। उसका व्यवसाय अन्ध विश्वास की नींव पर खड़ा था। गढ़वाल क्षेत्र के अलावा हरिद्वार, देहरादून, सहारनपुर, बिजनौर और न जाने कहाँ-कहाँ से लोग आकर बाकी देवता से अपने कष्टों को दूर करने की गुहार लगाते थे। देवता सबके कष्टों का कारण और उनका निवारण करने के उपाय बतलाया करते थे। बाकी उनसे खाडू, बोगट्या के साथ नकद धनराशि भी ठगता था। हम बाकी के कार्यों का विरोध करते थे। अपने व्यवसाय में मन्दी आते देख बाकी ने रात को गाँव में पत्थरों की वर्षा करवाई। पत्थरों की वर्षा होने का सिलसिला बढ़ता ही गया तो गाँव में देवता के प्रकोप की चर्चा होने लगी। किन्तु कुँवर की तत्परता से बाकी को रंगे हाथों पकड़ा गया। अपनी साख बनाये रखने के लिये बाकी ने कुँवर और उसके साथियों पर न्यायालय में मुकदमा दायर कर दिया। बाकी का पड़ोसी चिमसूदास बाकी का गवाह बना और उसने प्रसून के विरोध में बयान दिए। इस घटना के बाद हमने बाकी और चिमसूदास दोनों को प्रणाम करना छोड़ दिया था। एक बार ऋषिकेश के पास टौंगिया निवासी धर्म सिंह भण्डारी के घर पर हमारी चिमसूदास से मुलाकात हुई। मैंने चिमसूदास को प्रणाम भी नहीं किया और उसकी ओर मुखातिब भी नहीं हुआ। चिमसू ने मुझसे इसका कारण पूछा तो मैंने स्पष्ट कर दिया कि आपने अन्धविश्वासी बाकी के समर्थन और कुँवर के विरोध में गवाही दी है। मेरी नादानी पर हँसते हुए उसने कहा कि कुँवर तो मुझे प्रणाम करने लगा है। मैंने तुरन्त कुँवर से जानकारी माँगी तो उसने हाँ कर दी। तब मैंने खेद व्यक्त करते हुए चिमसूदास से कहा कि जब कुँवर ने ही प्रणाम कर दिया है तो मैं भी करूँगा। मेरी आपसे कोई रंजिश नहीं है। चिमसूदास इलाके भर में ढोल सागर का विशेषज्ञ था और हम लोग उसका सम्मान करते थे।

तरुण शान्ति सेना जय प्रकाश नारायण द्वारा स्थापित तरुणों का संगठन था। जय प्रकाश नारायण की भाँति ही हमने भी अपने नाम से जाति सूचक शब्द हटा दिये थे। मैं प्रताप सिंह पंवार से प्रताप सिंह शिखर बना और वह कुँवर सिंह भण्डारी से कुँवर सिंह प्रसून बना, परन्तु इसमें भी लोग हमारा वर्ण जान जाते थे। अपना उद्देश्य पूरा होते न देख हम दोनों ने नाम से ‘सिंह’ शब्द भी हटा दिए थे। अब मैं प्रताप शिखर और वह कुँवर प्रसून बन गया। कुछ जातिवादी लोग हमसे हमारी जाति और वर्ण पूछते तो हम उन्हें लम्बा भाषण पिला देते। हमारी जाति मानव है और धर्म मानवता है। मनुष्य द्वारा निर्मित जाति, वर्ण और धर्मों ने मनुष्य-मनुष्य के बीच खाई पैदा की है। मनुष्य को मनुष्य का दुश्मन बनाया है। हमारा वक्तव्य सुन कर लोगों के मुँह तो चुप हो जाते थे पर फिर भी कहते थे कि किसी-न-किसी जाति में जन्म तो अवश्य हुआ होगा। हमें ऐसे नाम की आवश्यकता थी जिससे किसी धर्म और सम्प्रदाय का बोध न हो सके, पर ऐसा नाम हमें नहीं मिला। उसने अपने घर का नाम ‘हरित रश्मि पुंज’ और मैंने ‘उतुंग-श्रृंग’ रखा था।

सन 1970-71 के मद्य-निषेध आन्दोलन में हम ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया था। हम लोग पहले जत्थे में गिरफ्तार कर देहरादून जेल भेज दिये गये थे। जेल में दो पाकिस्तानी जासूस बेड़ियों में बन्द कर तन्हाई में रखे गये थे। एक रात जेल में हड़कम्प मच गया। पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया था। इस युद्ध के बाद ही पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश के नाम से स्वतन्त्र राष्ट्र बना था। पाकिस्तानी जासूसों का मानना था कि भारत ने पाकिस्तान पर पहले हमला किया था। जेल में हमारी भेंट कैदियों के मुखिया गुमानू भाई से हुई। वह सुबह-सुबह कैदियों को पंक्ति में खड़ा कर दिन भर के लिये काम करने का आदेश देता था। जेल से छूटने पर उसका रुतबा समाप्त हो जाता था। इसलिये वह जान-बूझकर दुकान का ताला तोड़ने का अभिनय कर गिरफ्तार होता था। जेल से छूटने के दो तीन दिन बाद वह पुनः जेल में प्रविष्ट हो जाता था। पैरों की लम्बाई के तीन चौथाई हिस्से पर पाजामा पहने, हाथ में चाबियों के गुच्छों को लहराते हुए वह हमारे पास आया और जेल के कायदे कानूनों रहन-सहन और परम्पराओं से हमें अवगत कराया। उस विचित्र व्यक्तित्व पर प्रसून ने ‘तरुण-मन’ में लेख लिखा था। तोड़ू ताला; गुमानू भाई। सोलह दिन बाद हम जेल से रिहा कर दिये गये थे। कुछ समय बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने पर्वतीय क्षेत्र को ‘ड्राई एरिया’ घोषित कर हमारी माँग मान ली थी।

विरोध करने के लिये अहिंसक तरीके खोजने और जनमत को अपने पक्ष में करने की उसे सिद्धि प्राप्त थी। डिग्री कॉलेज टिहरी में अध्ययन करते समय किसी अध्यापक ने उसे अपनी कक्षा से निकाल दिया। जब भी उस शिक्षक की घण्टी आती वह उठकर कक्षा कक्ष से बाहर दरवाजे के बगल में बैठ कर लेक्चर सुनता और नोट्स भी लेता। बात महाविद्यालय के सभी छात्रों, शिक्षकों, कर्मचारियों और प्रधानाचार्य तक पहुँची। साथियों ने उसे समझाया कि माफी माँग ले और अन्दर आजा पर उसने कहा कि मैं बाहर ही ठीक हूँ। मैंने भी तो अमुक शिक्षक का बहिष्कार कर रखा है। कुछ दिनों की नाटकबाजी के बाद शिक्षक ने उसे अन्दर कक्षा में बुला लिया। इसी प्रकार का एक किस्सा रेलगाड़ी की यात्रा करने का भी है। वह अपनी बड़ी दीदी और भाणजियों को छोड़ने लखनऊ जा रहा था। उन्हें सीट पर बिठा कर वह प्लेटफार्म पर पानी लेने चला गया। वापस आया तो उसकी सीट पर पुलिस का एक बाहुबली सिपाही बैठा हुआ था। उठने के लिये कहने पर वह पुलिसिया रौब दिखा रहा था। अब वह चलती ट्रेन में एक टाँग पर खड़ा हो गया। सह यात्री उसे बैठने के लिये कहते तो कहता कि कहाँ बैठूँ? मेरी सीट पर तो वह पुलिस वाला बैठा है। धीरे-धीरे जनमत प्रसून के पक्ष में बन गया, बाद में पुलिस वाले ने उसे सीट दे दी।

वह भात खाने का अत्यन्त शौकीन था। सन 1978 के फरवरी माह में हम लोग वनों की नीलामी का विरोध कर टिहरी जेल में बन्द थे। हमारे साथ रामपुर गाँव के एक बुजुर्ग व्यक्ति सोबन सिंह रौतेला भी जेल में बन्द थे। वह आजाद हिन्द फौज के सिपाही रहे थे। नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के वह कट्टर अनुयायी थे। उनके जन्मदिन पर वह अपने मकान पर ध्वजारोहण करते और बच्चों में मिठाई बाँटकर नेताजी और स्वतन्त्रता संग्राम पर भाषण देते थे। दाँत न होने के कारण वे रोटियाँ नहीं खा सकते थे और जेल में दोनों समय भात ही खाते थे। जेल में कैदी चक्की चलाकर गेहूँ पीसते थे, ताजे आटे की रोटियाँ स्वादिष्ट होती थीं। कुँवर प्रसून रौतेला जी को भात खाते देख तरसता रहता था। एक दिन उसने उनसे रोटी के बदले भात का विनिमय कर लिया। उस निर्जीव स्वादहीन भात को खाकर वह दिन भर पछताता रहा और जेल प्रशासन को कोसता रहा। जून 1978 में हम लोग दोहरी शिक्षा पद्धति के विरुद्ध लखनऊ से देहरादून के लिये पैदल मार्च कर रहे थे। बरेली जनपद के किसी गाँव में हम 15-20 पदयात्रियों को सामूहिक भोज में आमन्त्रित किया गया था। कुँवर प्रसून लेट लतीफ था और दूसरे के समय का ध्यान नहीं रखता था। सब साथी भोजन करने गये तो वह नहाने गया। मैं उसके लिये पूरियाँ और सब्जी लेता आया। उसने नाराज होते हुए कहा, अपने आप तो तुम लोगों ने दाल-भात खाया और मेरे लिये सूखी पूरियाँ। साथियों के मनाने पर उसने बेमन से पूरियाँ खाई। यहाँ तो भोजन और आवास की व्यवस्था करने के लिये एक हिरावल दस्ता आगे-आगे चलता था।

अस्कोट-आराकोट पदयात्रा 1974 में ऐसा नहीं था। वहाँ सारी व्यवस्था हमें स्वयं ही करनी होती थी। मीलों पैदल चलकर थके मांदे व्यक्ति को बात करने की भी इच्छा नहीं होती थी किन्तु कुँवर प्रसून पड़ाव पर पहुँचते ही जनसम्पर्क में जुट जाता था। मदकोट से मुनस्यारी की चढ़ाई चढ़ते समय आदमी हाँफते हुए चलता है। प्रसून ने चलते-चलते एक सहयात्री से घनिष्ठता बढ़ा दी थी तब वहाँ पैदल चलने वालों का ताँता लगा रहता था। कौवाधार में रुक कर लोग विश्राम करते और चाय पीते थे। सुन्दरलाल बहुगुणा ने हमें चाय पीते देख लिया था। मुनस्यारी पहुँच कर उन्होंने हम से साहित्य बिक्री का हिसाब माँगा। तब 25 पैसे कीमत की पुस्तिकाओं को हम सभा समाप्ति के बाद बेचा करते थे। हिसाब में 25 पैसे कम निकलने पर उन्होंने हमें डाँटते हुए कहा कि तुम लोग चाय पी गये हो। यदि मैं तुम्हारा परीक्षक होता तो साक्षात्कार में तुम्हें फेल कर देता। तुम जानते हो सार्वजनिक जीवन में तीन बातों का विशेष ध्यान रखना होता है, धन का सदुपयोग, समय की पाबन्दी और चरित्र की मजबूती। हमने स्पष्ट किया कि एक अपरिचित सहयात्री ने हमें चाय पिलाई थी। बाद में उसके पिट्ठू पर तुड़ी-मुड़ी हालत में 25 पैसे की एक पुस्तिका मिली तो वह यूरेका! यूरेका!! चिल्लाने लगा। मैंने कहा अब कैसा यूरेका! तूने डाँट पिलवानी थी सो हम दोनों डाँट खा चुके हैं। दूसरे दिन मैंने मुनस्यारी में रहकर सरकारी दफ्तरों से सम्पर्क किया और वह गाँव में जाकर गाँव वालों द्वारा चीन के साथ व्यापार करने के किस्से सुन कर आया। वह जुड़ी-बूटी की चाय ‘ज्या’ घी के साथ पीकर आया था और एक टुकड़ा हमें दिखाने को भी लाया था। अगले दिन काला मुनि पहाड़ की चढ़ाई चढ़ते समय असंख्य जोंकें हमारा खून चूसने लगी तो मैंने फब्ती कसी, ‘ज्या’ के साथ पिया तेरा सब घी जोंकों ने बाहर निकाल दिया है।

जय प्रकाश नारायण जी के नेतृत्व में सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन बिहार-गुजरात से शुरू होकर अन्य राज्यों में भी फैल चुका था। तरुण शान्ति सेना के साथ अन्य विचार धारा के युवकों को जोड़ कर अब लोग नायक ने छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी का गठन कर दिया था। सन्तोष भारतीय उत्तर प्रदेश छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के संयोजक बने थे। आन्दोलन में भारतीय की सक्रियता को देख उन्हें अखिल भारतीय छात्र युवा संघर्ष वाहिनी में ले लिया गया था। उत्तर प्रदेश की संघर्ष वाहिनी से उनके हटने पर प्रसून को उत्तर प्रदेश छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का कार्यवाहक संयोजक बना दिया गया था। दून मार्च में उनकी जिद और हठधर्मिता के कारण अधिकांश सदस्य उनसे असन्तुष्ट हो गये थे। प्रसून इस स्थिति से अवगत थे और उन्होंने छः माह में वाहिनी की एक भी बैठक नहीं बुलाई। लोक नायक द्वारा पटना में वाहिनी के अखिल भारतीय सम्मेलन के आयोजन के अवसर पर उत्तर प्रदेश के सदस्य समय निकाल कर एक कमरे में बैठे। उसमें श्री अमरनाथ भाई को भी आमन्त्रित किया गया था। प्रसून पर वाहिनी को छः माह पीछे धकेलने का आरोप लगाया गया, कहा गया कि यदि बैठक नहीं बुला सकते थे और पहाड़ों से नीचे नहीं उतर सकते थे तो इस्तीफा भेज ही सकते थे। वह अन्तरात्मा की आवाज का बहाना बना कर टस से मस नहीं हुआ। इस बैठक में मैंने प्रसून का साथ नहीं दिया। मैं वाहिनी की कार्यसमिति का सदस्य था और दून मार्च में प्रसून के व्यवहार से आहत था। रात खुल गई पर प्रसून ने खेद तक नहीं जताया और त्याग पत्र भी संयोजक पद से नहीं दिया। वह टूट सकता था पर झुक नहीं सकता था।

एक समय में वह खादी वस्त्रों और गाँधीवाद का दीवाना था। जेब में पैसे की कमी होने पर भी उसने रजाई-गद्दा के कवर महँगी खादी से बनवाये। वह बुर्जुआ, सर्वहारा और सर्वहारा का आधिनायकवाद शब्दों से ही नफरत करता था। बातचीत और चर्चा में मैं जब भी इन शब्दों का प्रयोग करता तो वह मुझे डाँट देता था। उसका कहना होता था कि अधिनायकवाद साधन सम्पन्न और साधनहीन दोनों का ही खतरनाक होता है। देश पर लगी आपात स्थिति के बाद चुनाव में लोकतन्त्र की जीत पर वह बेहद खुश था और कहता था कि सत्ता बन्दूक की नली से नहीं, जनता के मत से निकलती है। इस चुनाव में हमने बढ़ चढ़ कर लोकतन्त्र का प्रचार किया था। उसने इन्दिरा गाँधी को ‘नागिन’ मानते हुए गढ़वाली गीत बनाया था, ‘दुलना भिटि सांपिणी कु मुख ऐगे भैर। मुश्किल सि रात खुलि, लुकीगे सुबेर।’ हम लोगों ने टिहरी, उत्तरकाशी जनपदों के विभिन्न शहरों और कस्बों में सभाएँ कर लोकतन्त्र के पक्ष में समां बाँधा था। सभाओं में वह इमरजेंसी में रचित जनकवि घनश्याम रतूड़ी ‘सैलानी’ का गीत ‘बल्द हटै दिन्या, दिवा बुझे दिनि, पाली थै गौड़ी कि मौ बणली’ को बड़े चाव से गाता था। सभा के अन्त में हम एक-एक रुपया अभियान के लिये माँगते थे, उस धन से हमारा आगे का काम चलता था। ऋषिकेश में भी मुखर्जी चौक पर हमने सभा की थी।

चुनाव के समय ऋषिकेश में कोई बड़ा नेता शायद चन्द्रशेखर आने वाले थे। सभा में भीड़ जुट गई थी हमने संयोजक से तब तक मंच संभालने को कहा जब तक मुख्य अतिथि नहीं आ जाते। संयोजक नेता कम और व्यापारी अधिक था। वह माथे पर चन्दन का लेप और गले में रुद्राक्ष की माला धारण किये रहता था। उससे किसी ने कहा कि वह लड़के चन्द्रशेखर और जयप्रकाश नारायण से क्या कम हैं। फिर हमारी खोज हुई पर तब तक हम अपने मिशन पर आगे निकल गये थे। आपातकाल में सर्वोदय जगत पर बाबा नागार्जुन की एक कविता छपी थी- ‘गुर्राती है टीले पर बैठी है खूनी बाघिन, इस बाघिन को रखेंगे हम चिड़िया घर में, ऐसी जन्तु मिलेगी भी क्या त्रिभुवन भर में’। इस कविता के प्रकाशन पर सम्पादक भवानी प्रसाद मिश्र ने खेद जताया था। हम इस कविता को भी जन गीतों में सुनाया करते थे। एल.आई.यू. के एक कर्मचारी ने हमें आगाह किया कि तुम्हारे नाम की फाइल खुली हुई है और तुम लोग कभी भी गिरफ्तार किये जा सकते हो, सतर्क रहो। हम गिरफ्तारी देने के लिये तैयार रहते थे पर आपातकाल में टिहरी गढ़वाल में एक भी गिरफ्तारी नहीं हुई, क्योंकि उस समय यहाँ सुलझे हुए जिलाधिकारी थे।

सुन्दरलाल बहुगुणा अपनी उत्तराखण्ड पदयात्रा के दौरान अल्मोड़ा पहुँचे थे। उन्होंने श्रीनगर से मुझे और टिहरी से कुँवर प्रसून को अल्मोड़ा बुलाया था। हम लोग श्रीनगर से चले। ग्वालदम में हिमपात के कारण सड़क बन्द थी। रात्रि विश्राम के लिये गाँधीनिधि में चले गए। वहाँ पर्याप्त बिस्तर न होने के कारण बर्फीली सर्दी में ठिठुरते रहे और कविता बनाते रहे।

‘माँ अल्मोड़ा में आये थे जब राजर्षि विवेकानन्द’ की तर्ज पर हम भी कुछ क्षणों के लिये स्वामी जी जैसी ऊँचाई पर पहुँच गये। ‘माँ अल्मोड़ा में आये थे जब प्रसून-शिखर, तब मग में क्यों हिम बिछवाया शीतलता अति प्रखर।’ उस सर्दी भरी रात में हम लम्बी कविता बनाकर खुद अपनी तारीफ करते गये और ठहाके लगाते रहे। स्याली धार में नगरपालिका का आदमी टोल टैक्स माँगने आया। टिहरी, श्रीनगर में टोल कंडक्टर ही वसूल करते हैं पर अल्मोड़ा में नगर पालिका यात्रियों से स्वयं टैक्स वसूलती है। हम कोसी में अपनी शेष बची पूँजी खर्च कर चुके थे, केवल एक ही आदमी का टोल टैक्स हमारी जेब में था। हम दोनों बस से उतर गये और सात किलोमीटर पैदल चल कर अल्मोड़ा पहुँचे। वहाँ शेखर पाठक, शमशेर बिष्ट आदि छात्र नेताओं से वार्ता के बाद ‘अस्कोट आराकोट’ यात्रा का कार्यक्रम बना। हम चाहते थे कि हम बहुगुणा जी की पद यात्रा में सम्मिलित हों पर उन्होंने हमें पढ़ाई करने को वापस भेज दिया। अल्मोड़ा से कौसानी तक राधा भट्ट हमें ले आई थी। कौसानी में सुन्दरलाल बहुगुणा के सहयोगी सदन मिश्र हमें साहित्य बिक्री से प्राप्त धनराशि खर्च हेतु देने लगे, किन्तु हमने साहित्य के पैसे खर्च करने से इन्कार कर दिया। कौसानी से हम लोग पैदल के रास्ते से गरुड पहुँचे। गरुड में दीवान सिंह भाकुनी ने हमारी मदद की और हम बस से कर्ण प्रयाग पहुँच गये। वहाँ से रामस्वरूप रतूड़ी ने हमें श्रीनगर तक भेज दिया। इस यात्रा का वर्णन कुँवर प्रसून ने ‘एक नंगे आदमी से मिलने गये थे’ लेख में किया था। वह लेख ‘तरुण मन’ में छपा भी था।

दिल्ली का एक स्वैच्छिक संगठन पहाड़ी महिला की दिनचर्या पर एक फिल्म का निर्माण कर रहा था। स्थानीय व्यक्ति होने के नाते हम उनका सहयोग कर रहे थे। सरकार की ओर से एल.आई.यू. का एक आदमी बराबर साथ रहता था। सिटी मजिस्ट्रेट नरेन्द्रनगर अरुण कुमार ढोडियाल और उनकी पत्नी भूमि अध्याप्ति अधिकारी श्रीमती हेमलता ढौडियाल जाजल में आये। अरुण कुमार सेंसर सर्टिफिकेट और अनुमति पत्र व न जाने क्या-क्या दिखाने को कहने लगे। अधिकारी के समक्ष बात किस तरह से की जाती है, यह समझाने के लिये सिटी मजिस्ट्रेट अपने से आधा शरीरधारी कुँवर प्रसून पर टूट पड़े। हम लोगों का निश्चय था कि हम बड़े अधिकारी एवं छोटे से छोटे कर्मचारी के साथ एक समान व्यवहार करेंगे। यह बात हमने व्यवहार में भी उतार ली थी। मैंने सी.एम. के हाथ पकड़ लिये तो वह पैरों से प्रहार करने लगा। फिर मैं ढोडियाल को धकियाते हुए उसकी जीप तक ले गया और जीप में यंत्रवत बैठी हुई उसकी पत्नी हेमलता से कहा ‘ये क्या कर रहे हैं, इन्हें संभालो’। कुँवर प्रसून तत्काल सड़क के किनारे खड़ी जीप के नीचे लेट गये, तब तक विजय जड़धारी भी आकर प्रसून के साथ ही लेट गये। मैं बाजीगरी करते हुए लोगों को एकत्र करता रहा और उन्हें स्थिति की जानकारी देता रहा। भीड़ एकत्र हो गई थी। झगड़े की बात सुनकर डेढ़ किलोमीटर दूर खाड़ी से धूम सिंह नेगी और साहब सिंह भी आ गये थे। भीड़ के सामने सी.एम. को माफी माँगनी पड़ी। इस घटना के बाद कुँवर प्रसून मुझसे नाराज हो गया। उसका कहना था कि मैंने उसे छुड़ा कर अच्छा नहीं किया। सी.एम. मुझे पीट रहा था तो पिटने देता। अस्पताल जाने की नौबत आती तो मजा आ जाता। उसका चिन्तन आम आदमी के चिन्तन से विपरीत होता था।

दोहरी शिक्षा पद्धति के विरुद्ध लखनऊ के कान्वेंट ताल्लुकेदार पब्लिक स्कूल से देहरादून के दून स्कूल तक उत्तर प्रदेश छात्र युवा संघर्ष वाहिनी ने 5 जून 1978 से 30 जून 1978 तक पदयात्रा निकाली थी। इस यात्रा में हम देहरादून के शर्मा परिवार के निकट सम्पर्क में आये थे। कुँवर प्रसून का विवाह हम लोगों ने शर्मा परिवार की लड़की से तय कर दिया था। अन्तर्जातीय विवाह होने के कारण यह समाचार गुप्त रखा गया था। हम आने वाले भूचाल के झटकों का सामना करने हेतु अपना क्षमतावर्द्धन कर रहे थे किन्तु योजना गुप्त न रही और प्रसून के पिता पता लगाकर शर्मा परिवार में धमक गये। उन्होंने हमारा सारा खेल बिगाड़ दिया था। हमने भी तो उनका खेल इसी प्रकार बिगाड़ा था। एक रेंजर साहब की लड़की को दिखाने के लिये वे हमें उनकी कोठी देहरादून ले गये थे। तब हम चिपको आन्दोलन में सक्रिय थे और रेंजरों पर आय से अधिक सम्पत्ति जोड़ कर देहरादून में कोठियाँ बनाने की जाँच चल रही थी। ऐसे घर में हम रिश्ता नहीं जोड़ना चाहते थे। प्रसून के पिता का मन रखने के लिये हम लड़की को देखने गये पर निपट गँवार बनकर। लड़की ने प्रसून को नापसन्द कर दिया। बाद में प्रसून की दीदी ने हमें डाँटा कि भेड़-पालकों जैसा वेश बनाकर कहीं लड़की देखने जाया जाता है।

पदयात्राओं और आन्दोलनों में हमारी भागीदारी को देख अनेक लोग हमारे समर्थक बन गये थे। ऐसी ही एक समर्थक अध्यापिका से कुँवर प्रसून की घनिष्ठता बढ़ गई थी। बीस वर्ष की उम्र में उस अध्यापिका का विवाह पचास-पिचपन वर्षीय वृद्ध के साथ हुआ था। प्रसून उस पर उसके परिवार और समाज द्वारा किये गये अन्याय से आहत था। वह उस अन्याय का बदला अध्यापिका से शादी करके लेना चाहता था। नौ अगस्त के क्रान्तिकारी दिन को शादी के लिये तय किया गया था। इस बार योजना अत्यन्त गुप्त रखी गई किन्तु कानूनी बाधा सामने आ गई। अध्यापिका चिपको आन्दोलन में हमारे साथ जेल भी गई। एक दिन उसने कुँवर प्रसून का पेन, एक लेख और मेरा भी एक लेख मुझे लौटाते हुए कहा कि मैं कुँवर प्रसून से नाराज हूँ और उसका सामान लौटा रही हूँ। अब मैं उससे बात भी नहीं करना चाहती। नौ अगस्त के बाद प्रसून ने उससे मिलना-जुलना छोड़ दिया था।

मसूरी से प्रकाशित सीमान्त प्रहरी ने ‘मेरे सपनों का उत्तराखण्ड’ स्तम्भ प्रारम्भ किया था। उस स्तम्भ में प्रसून ने ‘झोपड़ियों का स्वाभिमान’ शीर्षक से लेख लिखा था। मैंने भी ‘निर्गम माँ के आक्रामक पुत्र’ लेख लिखा था। मैंने कल्पना की थी कि आने वाली पीढ़ी सहसा आक्रामक हो उठी है। गंगा-यमुना आदि पहाड़ों से निकलने वाली दर्जनों नदियाँ यहाँ की उपजाऊ मिट्टी और जीवनदाई स्वच्छ जल को यहाँ से बहा ले जाती है। उस आक्रामक पीढ़ी ने इन नदियों को पहाड़ से नीचे उतरने से रोक दिया है और उन्हें माला की भाँति पहाड़ों पर पहना दिया है। मैंने कल्पना की थी कि उत्तराखण्ड में प्रेमदत्त, प्रेम सिंह और प्रेमदास एक ही थाली पर खाना खायेंगे। प्रसून ने कल्पना की थी कि आने वाले उत्तराखण्ड का आम आदमी स्वाभिमानी होगा। उसका यह लेख बाद में ‘रविवार’ पर भी छापा था। उस अध्यापिका ने हमारे लेख लौटा कर हम से नाता तोड़ लिया था।

काणाताल के जंगल में चिपको आन्दोलन के दौरान हमारा आवास खुरेत गाँव में था। वहाँ रेंजर पूरण सिंह नेगी के परिवार से हमें सर्वाधिक सहयोग मिल रहा था। वन विभाग के रेंजर पूरण सिंह नेगी भी हमारे आन्दोलन का समर्थन कर रहे थे। वैसे भी उनकी देहरादून में कोठी नहीं थी और वे आम ग्रामीण की तरह जीवन-यापन करते थे। आन्दोलन की सफलता के बाद जब हम वापस आने लगे तो रेंजर साहब ने अपनी पुत्री का विवाह प्रसून से करने की इच्छा प्रकट की। सुनकर प्रसून विदक गया, वह तो छोटी लड़की है, वह तो अपरिपक्व है, वह तो पढ़ाई भी पूरी नहीं कर सकी है। उस समय तक मेरा एक बालक भी हो गया था और प्रसून इक्कड़ हाथी की भाँति घूमता रहता था। उसके घर वालों ने तंग आकर उसकी शादी की चर्चा ही छोड़ दी थी। हमें उसकी शादी की चिन्ता सता रही थी। मैंने उसे समझाया कि गाँव में इण्टर तक पढ़ी लड़की मिलती है तो बड़ी बात है। उन दिनों टिहरी गढ़वाल में महिला साक्षरता का प्रतिशत 8-9 प्रतिशत से अधिक नहीं था। इतनी साक्षरता भी शहरों के कारण थी। गाँवों में तो शून्य के बराबर ही शिक्षा थी, लड़कियाँ जल्दी परिपक्व हो जाती हैं। वह उसे बाद में स्नातक तक पढ़ा सकता है। ढोल बाजे के बिना सादे समारोह में प्रसून की शादी सम्पन्न हुई।

काणाताल के निकट खुरेत और पुजाल्डी गाँवों में हम से पहले वन ठेकेदार के लोगों ने जाकर ग्रामीणों को हम से सतर्क रहने की हिदायत दे दी थी। जिस कारण ग्रामीणों ने हमारी बात नहीं सुनी और हम जनवरी की ठंड में देर रात तक गाँव के एक खलिहान में ही रह गये। बाद में एक वृद्ध दम्पति ने हमें आश्रय दिया और भोजन के साथ घी-दही देकर हमारा स्वागत किया। अगले दिन हम सुरकण्डा देवी के मन्दिर से पक्का इरादा कर पुनः गाँव में लौटे और एक छोर से दूसरे छोर तक घनश्याम रतूड़ी सैलानी के चिपको गीतों की कैसेट सुनाते हुए प्रत्येक घर से एक-एक रोटी माँगने लगे। हमारे साथ बच्चों की भीड़ जमा हुई तो हमने नारे लगाने शुरू कर दिए। गाँव के बच्चों और युवकों ने हमारे साथ मिलकर भाँति-भाँति की रोटी-सब्जी का आनन्द लिया। कुछ युवकों ने अपने घर से दही और मक्खन मँगवा लिया था।

युवकों ने हम से कहा कि हमारी पेड़ से अधिक समस्या पेयजल की है। बस, तुरन्त वन और जल सुरक्षा समिति का गठन कर दिया गया। आन्दोलन के दबाव से गाँव में पेयजल पहुँचा और जंगल कटना भी बन्द हुआ। मन्दिर में हुई गोष्ठी में कुँवर प्रसून ने हम से कहा था कि हमारे सामने बड़ी चुनौती आ गई है। देवी की खिचड़ी खाने का मतलब है, चुनौती स्वीकार करना। चुनौतियों को स्वीकार करना उसका स्वभाव था। ‘अस्कोट-आराकोट पदयात्रा-1974’ के दौरान हमने बाबा केदारनाथ के अतिथि बन कर हलुवा जैसे पकवानों का आनन्द उठाया था। भक्तगणों के साथ हम भी केदार शिला पर चिपके थे। प्रसून ने पंडितों से कहा था कि हम तो अछूत हैं। क्या अछूतों को मन्दिर में प्रवेश करने की अनुमति है। पण्डित ने कूटनीतिक उत्तर देते हुए कहा था कि बाबा छूत-अछूत सबको पहिचानता है। जिसको बाबा की अनुमति नहीं होती, वह यहाँ आ ही नहीं सकता। तब शमशेर बिष्ट, शेखर पाठक और हम दो कुल चार पदयात्री केदारनाथ गये थे। हम सब पुजारी के जवाब से प्रसन्न हुए और उसे जिलाधिकारी चमोली से अधिक समझदार समझा। केदारनाथ की पदयात्रा करते हुए चमोली के तत्कालीन डी.एम. श्री भूरेलाल से हमारी मुठभेड़ रास्ते में हुई थी। वे हमारे मिशन को बड़े हल्के में ले रहे थे। और हम उन्हें बाबा केदार का भक्त मान रहे थे। डी.एम. को हमने बहस में खूब उलझाया था किन्तु मन्दिर के पुजारी बहस से साफ बच गये थे।

हेंवलिका के द्वितीय अंक हेतु मैंने एक कहानी लिखी थी। कहानी को रोचक बनाने के लिये वन अधिकारी की पुत्री और चिपको आन्दोलनकारी युवक का रोमान्स दिखाया गया था। हेंवलिका छप कर आई तो कहानी का शीर्षक और कथावस्तु बदल कर नायक-नायिका को ही गायब कर दिया गया था। मैंने प्रसून से कहा, ‘तुमने मेरी कहानी की हत्या कर कहानी की लाश को हेंवलिका के पृष्ठों पर दफन कर दिया क्यों? नायक-नायिका तुम नहीं थे वे तो मेरी कल्पना की उपज थे।’ उसने कहा तुम अपने आप तो चमियाला में अपने परिवार के साथ रहते हो। एक दिन भी हेंवलिका के सम्पादन हेतु समय नहीं निकाल पाये हो। तब मैंने कहानी की लाश को गायब तो नहीं किया। दरअसल मैं चमियाला में भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में फँसा हुआ था। सहकारी समितियों और त्रुटिपूर्ण नहर निर्माण पर सिंचाई विभाग के भ्रष्टाचार को लेकर आन्दोलनरत था। वहाँ की जनता ने टिहरी आ कर सिंचाई विभाग के कार्यालय पर ताला लगा दिया था। इस अवसर पर भ्रष्टाचार का भयानक पुतला टिहरी पुल से भागीरथी में प्रवाहित कर दिया गया था।

हेंवलिका के पहले अंक के प्रकाशन के अवसर पर वह भी मुझे अकेला छोड़कर एक सप्ताह के लिये कहीं गायब हो गया था। उस समय हेंवलिका और ‘तरुण हिन्द’ साप्ताहिक के सम्पादन और प्रूफरीडिंग का कार्य भार मुझे ही उठाना पड़ा था। मैंने भी उसके कुछ लेखों में फेर बदल कर उसकी नाराजगी मोल ले ली थी। ‘तरुण हिन्द’ के सम्पादक योगेश्वर प्रसाद धूलिया मस्त और फक्कड़ प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। वे साम्यवादी विचार धारा के समर्थक थे। उनके पास विपिन उनियाल अक्सर आते जाते रहते थे। विपिन भी साम्यवादी थे, परन्तु दोनों में हल्की सी दूरी थी, क्योंकि दोनों व्यक्ति साम्यवाद के दो अलग-अलग गुटों का प्रतिनिधित्व करते थे। एक व्यक्ति के रूप में वे मुझे पसन्द करते थे और मैं उन्हें पसन्द करता। एक दिन उन्होंने खिचड़ी खाने के लिये मुझे भी आमन्त्रित किया। लहसुन और गरम मसालों के आधिक्य से मुझे बार-बार हिचकियाँ आने लगी। धूलिया जी ने मजाक में कहा, गाँधीजी और सुन्दरलाल बहुगुणा ने नव युवकों को इतना नाजुक बना दिया है कि उन्हें खिचड़ी तक नहीं पचती। मैंने जवाब दिया, गुरुजी मुझे वास्तव में साम्यवादी खिचड़ी नहीं पच रही है।

एक बार धूलिया जी मेरे कमरे पर आकर बोले, आज तुम्हारी खिचड़ी खाई जाय। मैं भी ज्यादातर खिचड़ी ही पकाया करता था। खिचड़ी खाने के बाद वे कहने लगे, बहुत स्वादिष्ट खिचड़ी बनाई है। कम मिर्च मसाले में इतना अच्छा स्वाद। मैंने जवाब दिया, गुरुजी गांधीवादी खिचड़ी तो सबको स्वादिष्ट लगती है। वे हमेशा हैण्ड टू माउथ रहा करते थे। अखबार के लिये धनराशि की जरूरत होने पर वे विज्ञापन लेने एवं ग्राहक बनाने बम्बई जाया करते थे और कभी अपनी पेंशन की धनराशि से कार्य चलाते थे। उनके बम्बई जाने पर मैं ही तरुण हिन्द का सम्पादन किया करता था। वे डाक में आये पुराने लिफाफों को फाड़ कर उनका रफ कार्य हेतु प्रयोग करते थे। मैं उनसे सीख कर आज भी पुराने लिफाफों का प्रयोग रफ कार्य हेतु करता हूँ।

इण्टर कॉलेज रानीचौरी और इण्टर कॉलेज जाजल में अध्यापन की नौकरी कर अपने परिवार पर लदे सरकारी कर्जे का बोझ प्रसून पहले ही उतार चुका था। उसका नौकरी करने का मकसद ही यही था। अब वह स्वयं को बन्धनमुक्त और दुनिया का सर्वाधिक आजाद व्यक्ति समझता था। विवाह करने पर भी वह गृहस्थी के बन्धन में नहीं बंध रहा था। उसकी माँ ने जब भी उसके कन्धों पर गृहस्थी का जुआ रखना चाहा तो वह बिदक कर दूर भागता रहा। घर वालों से झगड़ कर वह पत्नी के साथ युवक संघ जाजल के दफ्तर में रहने लगा था। उसके पिता आये औ मेरी मदद लेकर उसे घर ले गये। मैंने उसका सामान पिट्ठू में ठूँस कर उसे पिता के साथ जाने को मजबूर कर दिया था। दूसरी बार वह पत्नी को लेकर खाड़ी में कमरा किराये पर लेकर रहने लगा। एक दिन उसकी माँ ने आकर उन्हें भाषण पिलाया ‘अबे नृतकों! शरम करो, क्या तुम भूमिहीन हो, क्या तुम्हारा घर-बार नहीं है, यहाँ से एक मील की दूरी पर तो तुम्हारा घर है। पढ़ाई-लिखाई तो घर में भी हो सकती है।’ इस बार वह स्वयं ही सामान समेट कर घर चला गया। यह फसल बटोरने का मौसम था। उसकी माँ की अस्वस्थता की सूचना पाकर मैं डॉक्टर के साथ जब उसके घर गया तो कमरे में गेहूँ के बोरे रखे हुए थे। बैठने के लिये हमें स्थान बनाना पड़ा। डॉक्टर ने जाँच कर बताया कि इनके तो प्राण निकल गये हैं। तत्काल प्रसून को खबर भेजकर बुलाया गया। वह बार-बार अपनी माँ के पैरों में सिर रगड़-रगड़ कर माफी माँगने लगा और अपनी छोटी बहिन से कहने लगा, ‘तू भी तो हमें लेने नहीं आई थी। हम तो सामने की धार में बैठे-बैठे तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे थे।’

‘V’
आकार की घाटी के एक सिरे पर उसका घर है और दूसरे सिरे पर राहगीरों का विश्राम स्थल है। घर से गुस्से में निकल जाने पर उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और वह ‘V’ के दूसरे सिरे पर बैठकर माँ के बुलाने की प्रतीक्षा करता रहा। उसकी माँ ने सोचा स्वयं ही चला आयेगा, किन्तु वह झुकना जानता ही नहीं था। इस बात का उसे बड़ा पश्चाताप था। यदि वह वहाँ से वापस हो जाता तो सम्भवतः उसकी माँ बच जाती। लेकिन उसको जिद्दी बनाने में उसकी माँ का ही हाथ था। दूध की माँग करने पर बालक कुँवर को चावल का दूध पिलाना, उसकी जिद पर करछी गरम कर दाल के बरतन में डुबा कर कहना कि अब दाल में छौक पड़ गया है। स्रोत पर नहाने के बाद वह खाली बाल्टी लेकर घर आता था और घर में ठंडा पानी पीने को माँगता था। एक बार उसे जड़ी-बूटियों से बनी हुई चाय पीने का शौक चढ़ा तो उसने साधारण चाय पीना छोड़ दिया। जड़ी-बूटी की चाय कम होने पर उसकी बहिन ने उसके साथ साधारण चाय पत्ती मिलाकर चाय बनाई तो उसने केतली उठाकर ही बाहर ही फेंक दी।

एक थी टिहरी अपनी माँ की मृत्यु के बाद उसे गृहस्थ होने का अहसास हुआ, फिर भी वह कन्धे में झोला लटका कर कहीं भी चल देता था। वह मजाक में कहा करता था ‘रंजना अन्नदाता है और मैं अन्नखाता हूँ।’ सिल्यारा आश्रम में सुन्दरलाल बहुगुणा ने पद्मश्री ग्रहण करने के प्रश्न पर चिपको आन्दोलनकारियों की एक बैठक बुलाई थी। नौजवानों का विचार पद्मश्री को ठुकराने का बन रहा था और पुरानी पीढ़ी के लोग ग्रहण करने के पक्ष में थे। सुन्दरलाल बहुगुणा अपने पत्ते खोले बिना मुझे और प्रसून को अपने साथ दिल्ली ले जाना चाहते थे। हम चाहते थे कि वे मित्रों के बीच पद्मश्री ठुकराने की घोषणा करें, तब हम उनके साथ जायें। घनश्याम रतूड़ी ने हमारी मिन्नत की। हमने कपड़े गन्दे होने का बहाना बनाया तो सैलानी जी ने हमारे लिये खादी भण्डार से खादी के कपड़े खरीदने का वायदा भी किया पर हम दिल्ली जाने के लिये तैयार नहीं हुए। बाद में सुन्दरलाल बहुगुणा ने दो महिलाओं के साथ दिल्ली जाकर पद्मश्री पुरस्कार ग्रहण न करने की घोषणा की और उत्तरकाशी आकर उपवास में बैठ गए। उपवास की सूचना पाकर हम उत्तरकाशी पहुँचे पर कुँवर प्रसून नहीं गया। उपवास की समाप्ति पर बहुगुणा जी ने कश्मीर से कोहिमा तक पद यात्रा की घोषणा की और स्वयं उठ कर चल दिये। उनके साथ धूम सिंह नेगी और साहब सिंह पदयात्रा में गये। घनश्याम रतूड़ी ने टिप्पणी की कि अब हम उनके पीछे नहीं घिसट सकते। वस्तुतः बहुगुणा जी की उम्र और बौद्धिक स्तर अधिक होने और उनकी सधी हुई तेज गति के कारण अन्य लोग उनके पीछे घिसटते रहते थे।

उत्तर प्रदेश सरकार ने एक हजार मीटर से ऊँचे और तीस डिग्री से अधिक ढालदार क्षेत्र वाले हरे वृक्षों के कटान पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। जिससे जंगलों में प्रत्यक्ष लड़ा जाने वाला आन्दोलन अब नहीं हो सकता था। कश्मीर कोहिमा पदयात्रा में हम नहीं जाना चाहते थे। हम लोगों ने सोचा अब किसी एक क्षेत्र विशेष को चुन कर वहाँ सघन रूप से रचनात्मक कार्य करना चाहिए। इसके लिये एक संगठन की आवश्यकता थी। कुँवर प्रसून एक ढीला ढाला संगठन बनाने के पक्ष में थे। बन्धनों में बँध कर रहना उसका स्वभाव नहीं था। हमने संगठन को बाकायदा पंजीकृत कराया तो वह संगठन में सम्मिलित नहीं हुआ। उसने पत्रकारिता का रास्ता अपनाया और कन्धे में कैमरा लटकाये, हाथ पर छोटा सा ब्रीफकेस उठाये, जीन्स की पैन्ट और बुशर्ट पहने सूचना हेतु संकलन हेतु विभिन्न इलाकों का भ्रमण करने लगा। उसे पुरस्कार भी मिले और उसका विरोध भी हुआ। चम्बा में चौधरी-डोभाल विवाद, अंजनीसैंण में भडू हत्याकाण्ड, पौड़ी में उमेश डोभाल हत्याकाण्ड में उसकी भूमिका पर सवाल उठे और उसके दैनिक नव भारत टाइम्स की प्रतियाँ जगह-जगह जलाई गई। किन्तु जहाँ लोग विरोध के कारण टूट जाते हैं वहाँ कुँवर प्रसून विरोध से ऊर्जा प्राप्त करता था। टिहरी बाजार में घूमते हुए मार्क्सवादी नेता बच्चीराम कौंसवाल ने कहा था कि कुँवर प्रसून प्रतिक्रियावादी है, प्रतिक्रियावाद ही उसका जीवन है। जिस दिन वह प्रतिक्रिया नहीं करेगा उस दिन उसकी मौत समझो। प्रतिक्रिया करना उसकी नियति बन चुका है।

यही बात अपने तरीके से उत्तरांचल के सम्पादक सोमवारी लाल उनियाल ने कही थी कि कुँवर प्रसून एकदम नेगेटिव लिखता है। सफलता पाने के लिये नेगेटिव पोजिटिव दोनों प्रकार का लेखन होना चाहिए। उक्त दोनों व्यक्तियों को पता नहीं था कि कुँवर प्रसून को प्रतिक्रिया करने और नेगेटिव होने से ही ऊर्जा मिलती है। मैंने कुँवर प्रसून से बहस करना छोड़ दिया था। बहस करने से वह तर्क-कुतर्क कर अपना पक्ष सही सिद्ध करता था और उसके अनुसार न चलने पर वह प्रबल विरोध करता था। उससे विवाद किये बिना ही अपने अनुसार काम करते रहने की युक्ति मुझे मिल गई थी। बाबा आमटे ने रचनात्मक और संघर्षात्मक कार्यों को एक-दूसरे का पूरक बताया था। एक के बिना दूसरा अधूरा होता है। मैं इस बात को गाँठ बाँध कर संगठन के माध्यम से दोनों प्रकार के कार्य करने लगा। कुँवर प्रसून संघर्ष के कार्यों में हमारा साथ देता था। पेयजल आपूर्ति आन्दोलन और भैंसा बलि विरोधी आन्दोलन में वह हमारे साथ मुस्तैदी से खड़ा रहा। उसने मुझ पर भी अपनी कलम से प्रहार किए। रास्ते अलग हो गये थे पर पारिवारिक सम्बन्ध अन्त तक बने रहे। खेलों और फिल्मों में हमारी रुचि कभी नहीं रही। हम अखबार का खेल जगत और फिल्मी जगत का पन्ना कभी नहीं पढ़ते थे। कुछ समानताएँ थी जो रास्ते अलग होने पर भी हमें अलग नहीं कर सकी थी।

जगदम्बा प्रसाद रतूड़ी ने मुझे बाँध विरोधी बैठक में आने का निमन्त्रण दिया तो मैंने निमन्त्रण ठुकराते हुए कहा कि सुन्दरलाल बहुगुणा के लिये मुण्डन करवाने तो आ सकता हूँ पर उनकी मिटिंग में नहीं आ सकता। मैं उनसे बेहद खफा था। गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय हरिद्वार में एक सेमिनार में डॉ. कर्ण सिंह, प्रो. शेर सिंह जैसी जानी-मानी हस्तियाँ आई थी। सुन्दरलाल बहुगुणा ने मुझे वहाँ देखकर साहित्य बिक्री का काम दे दिया। अपने बेहद भावुकतापूर्ण भाषण में उन्होंने कहा कि ऐसी भी स्वैच्छिक संस्थाएँ हैं जो पैंतीस हजार रुपयों में पैंतीस पेड़ भी नहीं उगा सकी हैं। यह बात कुँवर प्रसून एवं अन्य मित्र मेरे बारे में कहते रहते थे। सुन्दरलाल बहुगुणा के मुँह से यह बात सुनकर मैं हतप्रभ रह गया। आक्रोश में आकर मैं तुरन्त प्रबल विरोध करना चाहता था। किन्तु वहाँ सभी वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी उनकी बातों से सहमत नहीं हो रहे थे। यह सोच कर मैं चुप रह गया, किन्तु मेरा मूड एकदम उखड़ गया और मैं अपनी सुध-बुध खो बैठा। यद्यपि मैं डॉ. प्रेम लाल गौतम डायरेक्टर, रानीचौरी हिल कैम्पस के साथ उनकी गाड़ी पर घर तक पहुँच गया था पर अपना सारा सामान गेस्ट हाउस में ही छोड़ गया। मैंने सुन्दरलाल बहुगुणा को सिंराई के पते पर तुरन्त विरोध पत्र लिखकर कहा कि बिना देखे ही आपने मुझ पर आरोप क्यों लगाया? अपने जवाब में उन्होंने लिखा कि मैंने तुम्हारा नाम नहीं लिया था। यदि तुमने अपने लिये समझा है तो मैं तुम्हारे कहे अनुसार अवश्य देखने आऊँगा। बाद में वे रामपुर गाँव में आये भी। परती भूमि विकास परिषद के पदाधिकारी भी रामपुर आये। उन्होंने स्थल का निरीक्षण किया। ग्रामीणों और जन प्रतिनिधियों से भी वे मिले। मुस्सू और मग्घू ने उन्हें बताया कि उस क्षेत्र की कैक्टम की झाड़ियों को निपटाते हुए उसके चोप (गोंद) से बचने के लिये हमने मुखौटों का प्रयोग किया। उस पथरीले ढालदार क्षेत्र पर पेड़ लगाने के साथ-साथ बीज बोने की बात भी लोगों ने उन्हें बताई। परिषद के अधिकारियों ने बताया कि ऐसी भूमि पर आठ प्रतिशत सफलता मिलने पर भी हम इसे पूर्ण सफलता मानते हैं। दिल्ली जा कर उन्होंने दूसरी किस्त रु. 6400.00 की धनराशि तुरन्त भेज दी। कुँवर प्रसून के कारण हम हमेशा सतर्क रहा करते थे। उसने हमें धन का दुरुपयोग करने और गलत कार्य करने से बचाया।

सुन्दरलाल बहुगुणा प्रति वर्ष मित्र मिलन का आयोजन किया करते थे। एक वर्ष का मित्र मिलन टिहरी में पुल के पास बनी गंगा हिमालय कुटी में था। देश के विभिन्न प्रान्तों से मित्र लोग मित्र मिलन समारोह में भाग लेने आये थे। कुँवर प्रसून के नेतृत्व में गैर सरकारी संगठनों/स्वैच्छिक संगठनों के विरोध में वातावरण बनाया जा रहा था। अपनी चर्चा में उसने कहा कि गाँधी जी के विशुद्ध मुट्ठी भर बीज बर्बादी की कगार पर है। बहुगुणा जी को चाहिए कि उन बीजों को नष्ट होने से बचायें। उसके बाद खड़े होकर बहुगुणा जी की ओर मुखातिब होकर मैंने गुस्से में कहा कि अब समय आ गया है कि आप गाँधीवाद के विशुद्ध बीजों को नष्ट होने से बचाएँ, उन्हें सींचे, उन्हें खाद दें अथवा स्वैच्छिक संगठनों का सहयोग लें। मैंने स्पष्ट किया कि टिहरी बाँध विरोधी आन्दोलन में सिल्यारा से पर्वतीय नव जीवन मण्डल, चम्बा से महिला नव जागरण समिति और खाड़ी से उत्तराखण्ड जन जागृति संस्थान सबसे पहले जुलूस लेकर टिहरी पहुँचे थे। अब भी सुरेन्द्र दत्त भट्ट, मान सिंह रावत, राधा बहन, विमला बहुगुणा, शोभा बहन, भवानी भाई अपने-अपने स्वैच्छिक संगठनों का प्रतिनिधित्व कर बाँध विरोधी आन्दोलन में शरीक हैं। संस्थानों को घटाकर मुट्ठी भर शुद्ध बीजों का अलग से काम मुझे बता दीजिए। दूसरी बार बहुगुणा जी पर क्रोधित होकर मैं मित्र मिलन समारोह से उठकर चल दिया। मन में कटुता को समाप्त करने का प्रयास करते हुए मैं और कुँवर प्रसून आपस में मिलते रहे और एक-दूसरे के दुख दर्द बाँटते रहे। उसने आखिर तक अपने तरीके से शुद्ध बीज बने रहने का प्रयास किया।

जुलाई 2004 में मैं पी.जी.आई. चण्डीगढ़ से एंजियोप्लास्टी कर लौटा तो वह मेरे लिये इण्डिया टुडे के अंक लेकर आया और बाबा रामदेव के योग शिविर में जाने का सुझाव दिया। पन्द्रह जुलाई 2006 को पी.जी.आई. से उनके लौटने का समाचार सुनकर अगले दिन उससे मिलने जाने की तैयारी थी किन्तु उसने मुझे यह मौका नहीं दिया। वह रात में ही अनन्त की अन्तहीन यात्रा पर निकल गया। वह अपने जीवन में लड़ाई के हर मोर्चे पर सबसे आगे रहा और अन्तिम यात्रा में भी बाजी मार गया।

 

एक थी टिहरी  

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

1

डूबे हुए शहर में तैरते हुए लोग

2

बाल-सखा कुँवर प्रसून और मैं

3

टिहरी-शूल से व्यथित थे भवानी भाई

4

टिहरी की कविताओं के विविध रंग

5

मेरी प्यारी टिहरी

6

जब टिहरी में पहला रेडियो आया

7

टिहरी बाँध के विस्थापित

8

एक हठी सर्वोदयी की मौन विदाई

9

जीरो प्वाइन्ट पर टिहरी

10

अपनी धरती की सुगन्ध

11

आचार्य चिरंजी लाल असवाल

12

गद्य लेखन में टिहरी

13

पितरों की स्मृति में

14

श्रीदेव सुमन के लिये

15

सपने में टिहरी

16

मेरी टीरी

 

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