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ग्रामीण भारत में पेयजल की चुनौतियाँ

Author: 
भुवन भास्कर
Source: 
कुरुक्षेत्र, दिसम्बर 2016

गाँवों में पीने के पानी की समस्या को तीन हिस्सों में देखा जाना चाहिए। एक तो भूजल का गिरता स्तर, दूसरा पीने लायक साफ पानी की आपूर्ति का अभाव और तीसरा, उपलब्ध पानी की गुणवत्ता। ग्रामीण भारत में विद्यमान पेयजल संकट को दूर करने के लिये हमें इन्हीं तीन समस्याओं पर काम करना होगा, जिनकी पहचान हमने ऊपर के हिस्से में की है। भूजल के गिरते स्तर को रोककर उसे बढ़ाने का उपाय करना, उपलब्ध पानी को रिहायशी इलाकों के अंदर हैण्डपम्प या पाइप के जरिए पहुँचाना, जहाँ से लोगों को 24 घंटे आसानी से पानी मिल सके और ऐसी जगहों पर जहाँ भूजल में रासायनिक संक्रमण है, या पानी खारा है, वहाँ उसका उपचार (ट्रीट) कर पाइप के जरिए घरों में पहुँचाने की व्यवस्था करना। इन तीनों बिंदुओं पर एक साथ प्रभावी तरीके से काम करके ही ग्रामीण भारत की प्यास को बुझाया जा सकता है और कई बीमारियों और अकाल मौतों से बचा जा सकता है।

पेयजल की चुनौतियां देश के ग्रामीण क्षेत्रों में पीने का पानी उपलब्ध कराना आजादी के बाद से ही तमाम सरकारों के लिये चुनौती रहा है। और शायद इसी चुनौती को भांपते हुए संविधान निर्माताओं ने संविधान की धारा 47 के तहत साफ पीने योग्य पानी उपलब्ध कराने को बाकायदा राज्य के दायित्वों में शामिल किया। अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों के अनुकूल स्वतंत्र भारत की सरकारों ने इस दिशा में ध्यान भी दिया और 10वीं पंचवर्षीय योजना तक साफ पीने का पानी मुहैया कराने के मद में 1,105 अरब रुपये खर्च किये जा चुके थे। इसकी शुरुआत 1949 में हुई जब 40 वर्षों के भीतर 90 प्रतिशत जनसंख्या को साफ पीने का पानी उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया। इसके ठीक दो दशक बाद 1969 में यूनिसेफ की तकनीकी मदद से करीब 255 करोड़ रुपये खर्च कर 12 लाख बोरवेल खोदे गए और पाइप से पानी आपूर्ति की 17,000 योजनाएं शुरू की गईं। इसके अगले दो दशकों में सरकार ने एक्सीलरेटेड वाटर सप्लाई प्रोग्राम (एआरडब्ल्यूएसपी), अन्तरराष्ट्रीय पेयजल और स्वच्छता दशक के तहत सभी गाँवों को पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिये एक शीर्ष समिति का निर्माण, राष्ट्रीय पेयजल मिशन (एनडीडब्ल्यूएम) और 1987 की राष्ट्रीय जलनीति के रूप में कई नीतिगत हस्तक्षेप किए। इसके बाद के वर्षों में कई योजनाओं के तहत पहले की नीतियों और कार्यक्रमों को व्यापक स्वरूप दिया गया और इनमें जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने की कोशिश की गई।

लेकिन ग्रामीण भारत में पीने के साफ पानी की उपलब्धता की मौजूदा हालत देखते हुए किसी भी तरह से यह निष्कर्ष निकाल पाना कठिन है कि हजारों करोड़ रुपये और दसियों योजनाओं का कोई खास सकारात्मक परिणाम हासिल हो पाया है। एक अनुमान के मुताबिक आज भी करीब 3.77 करोड़ लोग हर साल दूषित पानी के इस्तेमाल से बीमार पड़ते हैं, करीब 15 लाख बच्चे दस्त से अकाल मौत मरते हैं और पानी से होने वाली बीमारियों के कारण करीब 7.3 करोड़ कार्य-दिवस बर्बाद हो जाते हैं। इन सबसे भारतीय अर्थव्यवस्था को हर साल करीब 60 करोड़ डॉलर का नुकसान होता है। भूजल स्तर का लगातार कम होते जाना तो एक समस्या है, लेकिन जो पानी उपलब्ध है उसकी गुणवत्ता भी चिंताजनक स्तर तक खराब है। लाखों हेक्टेयर इलाकों में भूजल ही कई घातक बीमारियों का कारण है। करीब 6.6 करोड़ लोग अत्यधिक फ्लोराइड वाले पानी के घातक नतीजों से जूझ रहे हैं, जबकि करीब 1 करोड़ लोग अत्यधिक आर्सेनिक वाले पानी के शिकार हैं। कई जगहों पर पानी में लोहे (आयरन) की ज्यादा मात्रा भी बड़ी परेशानी का सबब है। देश में मौजूद कुल 14.2 लाख रिहायशी बस्तियों में से 1,95,813 रिहायशी बस्तियाँ आज भी पीने के पानी की अशुद्धता के नतीजों को भोगने के लिये अभिशप्त हैं।

इस लिहाज से गाँवों में पीने के पानी की समस्या को तीन हिस्सों में देखा जाना चाहिए। एक तो भूजल का गिरता स्तर, दूसरा पीने लायक साफ पानी की आपूर्ति का अभाव और तीसरा, उपलब्ध पानी की गुणवत्ता। आमतौर पर पीने के पानी की समस्या का आकलन आस-पास के इलाके में मौजूद जल निकायों की संख्या और भूजल की गहराई से किया जाता है, लेकिन एक बड़ी समस्या आपूर्ति की भी है। देश के कई इलाकों में पीने का पानी लाने के लिये मटके लेकर पैदल कई किलोमीटर का सफर करती महिलाओं की तस्वीरें बहुत आम हैं और यह समस्या का एक बड़ा पहलू है। लेकिन इन तस्वीरों के पीछे छिपा एक तथ्य यह भी है कि देश के ज्यादातर इलाकों में पानी की कमी नहीं है। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक ग्रामीण जनसंख्या के 94 प्रतिशत और शहरी जनसंख्या के 91 प्रतिशत हिस्से को पीने का साफ पानी उपलब्ध है। पेयजल आपूर्ति विभाग के आँकड़े बताते हैं कि देश की 14.2 लाख रिहायशी इकाइयों में से 12.7 लाख पूरी तरह कवर्ड (एफसी) हैं, 1.3 लाख आंशिक तौर पर कवर्ड (पीसी) हैं जबकि 15,917 ऐसी हैं जो बिल्कुल भी कवर्ड नहीं (एनसी) हैं। लेकिन वस्तु-स्थिति इन आंकड़ों से मेल नहीं खाती है क्योंकि कवरेज के आंकड़े केवल इंस्टॉल्ड कैपेसिटी बताते हैं न कि पानी की गुणवत्ता या लोगों के बीच उसकी वास्तविक आपूर्ति। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। महाराष्ट्र के अमरावती जिले में एक बड़ा इलाका ऐसा है, जहाँ भूजलस्तर 150-200 फुट के बीच है लेकिन वहाँ के लोग इस पानी का इस्तेमाल पीने के लिये तो बात ही दूर खेती तक के लिये नहीं कर सकते क्योंकि यह बहुत खारा है।

देश के ग्रामीण इलाकों में लगभग 85 प्रतिशत जनसंख्या अपने दैनिक कामकाज के लिये पूरी तरह भूजल पर ही निर्भर है और यह भूजल लगातार कम हो रहा है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में जमीन की सतह के ऊपर और नीचे कुल 1,869 अरब घनमीटर ताजा पानी मौजूद है, जिसमें करीब 40 प्रतिशत इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इस्तेमाल योग्य भूजल का करीब 92 प्रतिशत खेती में, 5 प्रतिशत उद्योगों में और 3 प्रतिशत घरेलू उपयोग में आता है, जबकि सतह के ऊपर मौजूद पानी का 89 प्रतिशत खेती में, 2 प्रतिशत उद्योग में और 9 प्रतिशत घरों में प्रयोग होता है। लेकिन भारत में देश की जनसंख्या बढ़ने के साथ ही प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता घटती जा रही है। देश में पेयजल संकट के मूल में यहाँ की विशाल जनसंख्या है। एक ओर जहाँ विश्व की लगभग 17 प्रतिशत जनसंख्या यहाँ निवास करती है, वहीं विश्व में मौजूद कुल ताजा पानी का महज 4 प्रतिशत ही भारत में है। भारत में प्रति व्यक्ति पानी की सालाना उपलब्धता 1955 में 5300 घनमीटर थी, जो 2001 की जनगणना के आधार पर घटकर 1816 घनमीटर रह गई और 2011 की जनगणना के आधार पर 1545 घनमीटर पर आ गई है। प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता के लिहाज से भारत का स्थान दुनिया में 133वां है, जबकि पानी की गुणवत्ता के लिहाज से यह दुनिया में 122वें स्थान पर है। किसी देश में जब प्रति व्यक्ति पानी की सालाना उपलब्धता 1700 घनमीटर से कम हो जाती है, उसे पानी की कमी वाला (वाटर स्ट्रेस्ड) देश कहा जाता है। इस लिहाज से भारत अब पानी की कमी वाला देश है। यह एक खतरनाक स्थिति है।

 

रिहायशी इकाई (हैबिटेशन) किसे कहते हैं?

सरकारी परिभाषा के मुताबिक रिहायशी इकाई किसी भी ऐसी जगह को माना जाता है जहाँ कम-से-कम 200 लोग रहते हैं।

 

 

एफसी, पीसी और एनसी क्या है?

एफसी (फुली कवर्ड)

इलाके में रहने वाले सभी लोगों को 40 एलपीसीडी या उससे ज्यादा साफ पीने का पानी उपलब्ध हो।

पीसी (पार्शियली कवर्ड)

वह रिहायशी इकाई, जिसके 1.6 किलोमीटर (पहाड़ी इलाकों में 100 मीटर ऊँचाई) के अंदर ताजे पानी के एक या ज्यादा स्रोत मौजूद तो हो, लेकिन उससे होने वाली पानी की आपूर्ति 10 से 40 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन (एलपीसीडी) के बीच हो।

एनसी (नॉन कवर्ड)

वह रिहायशी इकाई, जिसके 1.6 किलोमीटर (पहाड़ी इलाकों में 100 मीटर ऊँचाई) के अंदर ताजे पानी का एक भी स्रोत मौजूद न हो, अगर स्रोत हो भी तो वह अत्यधिक खारा हो, फ्लोराइड, आयरन, आर्सेनिक इत्यादि रासायनिक तत्वों से संक्रमित हो, या फिर 10 एलपीसीडी से कम साफ पीने लायक पानी उपलब्ध कराता हो।

 

ग्रामीण भारत में विद्यमान पेयजल संकट को दूर करने के लिये हमें उन्हीं तीन समस्याओं पर काम करना होगा, जिनकी पहचान हमने ऊपर के हिस्से में की है। भूजल के गिरते स्तर को रोककर उसे बढ़ाने का उपाय करना, उपलब्ध पानी को रिहायशी इलाकों के अंदर हैण्डपम्प या पाइप के जरिए ऐसी जगहों पर पहुँचाना, जहाँ से लोगों को 24 घंटे आसानी से पानी मिल सके और ऐसी जगहों पर जहाँ भूजल में रासायनिक संक्रमण है, या पानी खारा है, वहाँ उसका उपचार (ट्रीट) कर पाइप के जरिए घरों में पहुँचाने की व्यवस्था करना। इन तीनों बिंदुओं पर एक साथ प्रभावी तरीके से काम कर रही ग्रामीण भारत की प्यास को खत्म किया जा सकता है और करीब 70 प्रतिशत जनता को कई बीमारियों और अकाल मौतों से बचाया जा सकता है।

 

ग्रामीण भारत में पेयजल समस्याः भयावह परिदृश्य

1.

भारत की करीब 84 करोड़ ग्रामीण जनता में से केवल 18 प्रतिशत को ही ट्रीट किया हुआ पानी उपलब्ध हो पाता है। इसकी तुलना अगर मोबाइल फोनधारकों से करें, तो इनकी संख्या 41 प्रतिशत है।

2.

देश में केवल एक-तिहाई ग्रामीण परिवारों को पाइप से पानी की आपूर्ति होती है। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में रहने वाले करीब 69 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है।

3.

ग्रामीण भारत में मौजूद पाइप से मिलने वाले पानी का आधे से ज्यादा ट्रीट किया हुआ नहीं होता।

4.

ट्रीट किए हुए पानी की उपलब्धता दरअसल राज्यों के आधार पर बदलती रहती है। आंध्र प्रदेश में जहाँ 36 प्रतिशत ग्रामीण जनता को ट्रीट किया हुआ पानी मिलता है, वहीं बिहार में यह संख्या केवल 2 प्रतिशत है।

5.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के मुताबिक, हर साल करीब 3.8 करोड़ लोगों को पानी के कारण कई तरह की बीमारियाँ होती हैं। इनमें 75 प्रतिशत बच्चे होते हैं। अशुद्ध पानी के कारण करीब 8 लाख मौतें होती हैं, जिनमें 4 लाख मौतें केवल दस्त के कारण होती हैं।

6.

पानी की गुणवत्ता के लिहाज से भारत का स्थान 122 देशों में 120वां है और पानी की उपलब्धता के लिहाज से 180 देशों में यह 133वें स्थान पर है।

स्रोतः सेफ वॉटर नेटवर्क

 

भूजलस्तर बढ़ाने के लिये एकमात्र तरीका वर्षा के जल का संरक्षण है। यह संरक्षण दो तरीके से हो सकता है। चूँकि भूजल का सबसे ज्यादा इस्तेमाल, लगभग 90 प्रतिशत, खेती में होता है इसलिये इसका स्तर बढ़ाने के लिये खेतों को ही इस्तेमाल किया जा सकता है। नेचुरल फार्मिंग के जाने-माने विशेषज्ञ और किसान सुभाष शर्मा यवतमाल अपने 17 एकड़ खेतों में वर्षा को संरक्षित रखने के लिये कई तरीके अपनाते हैं, जैसे ग्रिड लॉकिंग, माइक्रो लॉकिंग, प्राकृतिक खेती, 80 फुट गड्ढे की खुदाई इत्यादि। इसके दो तरह के फायदे होते हैं। एक तो उन्हें अपने खेतों के लिये साल भर का पानी वर्षा के संरक्षित जल से ही मिल जाता है और दूसरा, उनके खेतों के नीचे और आस-पास की जमीन में भूजल का रिचार्ज भी होता है। वर्षा के पानी का संरक्षण किस हद तक भूजल के हालात बदल सकता है, इसे केवल इस आंकड़े से समझा जा सकता है कि एक वर्ग मीटर भूमि पर एक मिलीमीटर वर्षा के पानी को एकत्र किया जाए तो वह एक लीटर के बराबर होता है। यानी एक हेक्टेयर भूमि (10,000 वर्ग मीटर) पर गिरने वाले 100 सेंटीमीटर (1000 एमएम) पानी की मात्रा एक करोड़ लीटर के बराबर होती है। 9 सितंबर, 2016 को पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक इस साल कुल 10.54 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर खरीफ फसलों की खेती की गई है। यदि इतनी जमीन पर देश की औसत 1160 एमएम बारिश को संरक्षित कर लिया जाए तो भूजल में कितनी बढ़ोत्तरी हो सकती है, इसकी कल्पना की जा सकती है।

भूजलस्तर ठीक करने का एक अन्य तरीका तालाबों की खुदाई भी है। ज्यादा समय नहीं बीता जब भारत के हर गाँव में कम-से-कम एक तालाब जरूर हुआ करता था। लेकिन धीरे-धीरे लोगों ने तालाबों को भर कर उस पर कब्जा करना शुरू कर दिया और अब लाखों गाँवों से तालाब लुप्त हो गए हैं। महाराष्ट्र में देवेंद्र फड़नवीस द्वारा शुरू की गई जलयुक्त शिविर योजना और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह सरकार की तालाब खुदाई की योजना के परिणाम कुछ हद तक दिखने लगे हैं। केंद्र सरकार ने भी मनरेगा के तहत 5 लाख तालाबों की खुदाई का जो महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है, उसका आधा हिस्सा भी अगर पूरा हो सका, तो आने वाले वर्षों में ग्रामीण क्षेत्रों के लिये पेयजल की समस्या का बहुत हद तक समाधान हो सकेगा।

ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की समस्या का जो दूसरा रूप आपूर्ति के रूप में है, उसका समाधान सामाजिक भागीदारी के साथ किया जाना चाहिए। जयपुर जिले के जमवा रामगढ़ ब्लॉक में भींवास गाँव के किसानों ने आपसी समिति बनाकर 70 हजार लीटर क्षमता की पानी टंकी का निर्माण करवाया है। चूँकि उस इलाके में भूजल का स्तर ठीक है, तो स्थानीय विधायक की मदद से बोरवेल के जरिए उस टंकी में पानी चढ़ाया जाता है और अगले महीने-दो महीने में गाँव के सभी 113 घरों में पाइप से पानी पहुँचाने की योजना बन रही है। जन-भागीदारी के अलावा वितरण की व्यवस्था को ज्यादा सक्षम बनाना और व्यवस्थित करना समस्या के समाधान का एक अन्य उपाय है। कर्नाटक के हुबली-धारवाड़, बेलगांव और गुलबर्गा में 2006 से चल रही एक स्कीम के तहत विश्व बैंक की मदद से 1,80,000 लोगों के लिये चौबीसों घंटे पानी की आपूर्ति सुनिश्चित की गई, जबकि पहले उन्हें हफ्ते में एक बार कुछ घंटों के लिये पानी मिलता था। इन दोनों ही उदाहरणों में पानी की प्राकृतिक उपलब्धता में बिना कोई बदलाव किए केवल वितरण की प्रणाली को सुव्यवस्थित कर बेहतर प्रबंधन से बदलाव लाया जा सका।

पेयजल की चुनौतियां तीसरी समस्या, यानी ग्रामीण इलाकों में गुणवत्तायुक्त पानी की आपूर्ति करना सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि इसमें बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत होती है। यहाँ सरकार को पीपीपी यानी निजी क्षेत्र की भागीदारी के साथ वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की जरूरत होगी। पानी को आर्सेनिक, फ्लोराइड, आयरन जैसे रसायनों से मुक्त कर साफ सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने का दूसरा कोई विकल्प नहीं है। हालाँकि जल परियोजनाओं के लिये जारी होने वाले सरकारी फंड की शर्तों में एक बुनियादी कमी यह है कि वह सबसे कम बोली लगाने वाले के पक्ष में जाता है, न कि सबसे बेहतर गुणवत्ता का पानी उपलब्ध कराने वाले के पक्ष में। इस तरह की विसंगतियों को ठीक कर ग्रामीण इलाकों में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जा सकता है।

 

रासायनिक तत्वों से प्रभावित पानी वाले राज्यों और जिलों की संख्या

रासायनिक तत्व

प्रभावित राज्यों की संख्या

प्रभावित जिलों की संख्या

आर्सेनिक

10

68

फ्लोराइड

20

276

नाइट्रेट

21

387

आयरन

24

2976

 

 

विश्व के कुल क्षेत्रफल का हिस्सा

2.4

विश्व की कुल जनसंख्या का हिस्सा

17.1

विश्व में उपलब्ध कुल ताजे पानी का हिस्सा

4

प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता

1545 घनमीटर (2011 की जनगणना के आधार पर)

प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में स्थान

133

पानी की गुणवत्ता के मामले में विश्व में स्थान

122

सालाना औसत वर्षा

1160 एमएम (विश्व का औसत 1110 एमएम)

 

कुल मिलाकर जो परिदृश्य उभरता है, वह चिंताजनक है, निराशाजनक है, लेकिन साथ ही उम्मीदों का दीपक भी बदस्तूर चल रहा है। चाहे महाराष्ट्र हो या राजस्थान या फिर कर्नाटक, इन सभी जगहों पर सफलतापूर्वक जो भी प्रयोग हुए हैं या हो रहे हैं, वे आगे की राह दिखाते हैं। लेकिन समस्या की विकरालता और समय की कमी को देखते हुए तय है कि सरकार और समाज को मिलकर बिना समय गंवाए हर संभव विकल्प पर तुरन्त काम शुरू करना चाहिए। तभी देश के गाँवों में रहने वाली 70 प्रतिशत से ज्यादा जनता को पीने का साफ पानी मिल सकेगा और देश का भविष्य दस्त और अतिसार जैसी बीमारियों के कारण असमय काल-कवलित नहीं होगा।

(लेखक आर्थिक और कारपोरेट मामलों के जानकार हैं; वर्तमान में कम्युनिकेशन प्रोफेशनल के तौर पर नेशनल कमोडिटी एक्सचेंज के साथ जुड़े हैं।)
ई-मेल bhaskarbhuwan@gmail.com


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