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त्वरित ट्रामा केयर: भूमिका व महत्त्व

Author: 
अमित गुप्ता, महेश सी मिश्रा
Source: 
योजना, जनवरी 2017

ट्रामा सेंटर सुविधाओं की दिशा में तेजी से प्रगति हो रही है। जिसका मकसद न सिर्फ मरीजों की त्वरित और बेहतरीन देखभाल है, बल्कि इसका मकसद शोध और प्रशिक्षण का बेहतरीन संस्थान भी बनाना है। आपदा की स्थिति में इलाज की सुविधाओं को बढ़ाने के लिये स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मन्त्रालय मोबाइल अस्पतालों की संख्या में वृद्धि कर रहा है ताकि प्रभावित व्यक्तियों को तत्काल चिकित्सा सुविधाएँ मुहैया करायी जा सके

कहा जाता है कि जख्मी मरीज को जो सबसे पहले छूता है, उसी से उस शख्स के बारे में नतीजा तय होता है। इसमें सीधे तौर पर इस बात पर जोर है कि गोल्डेन आवर यानि अहम अवधि के भीतर अस्पताल पहुँचने से पहले सही ट्रामा केयर सेंटर में ट्रांसफर के साथ बचाव और देखभाल अहम है। गोल्डेन आवर जख्मी होने के बाद के एक घंटे की अवधि को कहा जाता है। हालाँकि, भारत में कई जख्मी मरीज कई घंटों यानी 4-6 घंटे या इससे भी ज्यादा देरी से आपातकालीन चिकित्सा कक्ष में पहुँचते हैं। मैं इन घंटों को सिल्वर आवर (रजत अवधि) या ब्रोंज आवर (कांस्य अवधि) भी कहता हूँ। हमें अपने इमरजेंसी विभागों में पहले घंटे को गोल्डेन आवर (स्वर्ण अवधि) में बदलने की जरूरत है, चाहे मरीज रजत अवधि या कांस्य अवधि में क्यों न पहुँचे। गम्भीर रूप से जख्मी ऐसे कई मरीजों को समाज में वापस लौटाकर उन्हें देश के लिये उपयोगी बनाया जा सकता है।

आपदा की परिभाषा कुछ इस तरह है: “समाज के कामकाज में गम्भीर व्यवधान पैदा होना, जिससे बड़े पैमाने पर मानवीय संसाधनों या पर्यावरण को नुकसान होता है। यह नुकसान प्रभावित समाज के अपने संसाधनों के जरिए इससे निपटने की क्षमता से ज्यादा होता है।”

आपदा तब होती है, जब असुरक्षित समाज पर विपत्ति (प्राकृतिक या मानवीय) का आक्रमण होता है। आपदा के लिहाज से असुरक्षा या कमजोरी की परिभाषा इस तरह है: खतरे की आशंका वाले इलाके से नजदीकी या निर्माण, प्रकृति आदि के कारण किस हद तक समुदाय, ढाँचा, सेवाओं या भौगोलिक इलाकों को नुकसान पहुँचने की आशंका है।

भारत कई आपदाओं के लिहाज से अलग-अलग स्तर तक असुरक्षित है। तकरीबन 58.6 प्रतिशत से भी ज्यादा जमीन का टुकड़ा हल्के से बड़े भूकम्प की आशंका वाले इलाकों में आता है। देश की 4 करोड़ हेक्टेयर (12 प्रतिशत) से भी ज्यादा जमीन बाढ़ और कटाव के लिहाज से संवेदनशील है, जबकि कुल 7,516 किलोमीटर के तटीय इलाकों में 5,700 किलोमीटर के इलाके चक्रवात और सुनामी के लिहाज से संवेदनशील हैं। देश की 68 फीसदी जमीन में सूखे की आशंका रहती है और इसके पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन और हिमस्खलन का खतरा है। इसके अलावा, भारत में रासायनिक, जैविक, रेडियोधर्मी और आण्विक (सीबीआईन) संकटों और अन्य मानवीय आपदाओं का भी खतरा है। परम्परागत आपदा प्रबन्धन की तैयारी में 6 चीजें होती हैं। आपदा से पहले का दौर, जिसमें रोकथाम, तैयारी आदि शामिल हैं, जबकि आपदा के बाद के दौर में प्रतिक्रिया, पुनर्वास, पुननिर्माण और फिर से सामान्य बहाली शामिल हैं।

केन्द्रीय गृह मन्त्रालय और आपदा प्रबन्धन से जुड़ी नोडल एजेन्सी राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण बाकि मन्त्रालयों मसलन रक्षा, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण, रेलवे, परमाणु ऊर्जा, वित्त, कृषि, वन और पर्यावरण, ऊर्जा, ग्रामीण विकास अन्तरिक्ष और संचार, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, जल संसाधन और भूतल परिवहन मन्त्रालय के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर आपदा प्रबन्धन के काम में जुटे हैं।

आरेख 1 - आपदा प्रबंधन चक्र (संदर्भ: क्या आप तैयार हैं?) हंसिन-अवाजी भूकम्प आपदा की सीख-आपदा न्यूनीकरण और स्वयंसेवी गतिविधियों के लिये विवरण पुस्तिका
त्वरित ट्रामा केयर: भूमिका व महत्त्व आपदा प्रबन्धन कानून 2005 की अधिसूचना जारी होने के बाद राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण (एनडीएमए) का वजूद सामने आया। प्रधानमन्त्री इस प्राधिकरण के अध्यक्ष होते हैं। इसके अलावा, इस प्राधिकरण में वाइस चेयरमैन/सचिव और 9 सदस्य होते हैं। एनडीएमए की जिम्मेदारियों में पॉलिसी बनाना, प्लानिंग, दिशा-निर्देश जारी करना, विभिन्न मन्त्रालयों और राज्यों के लिये योजनाओं को मंजूरी देना, नीतियों के अमल को लेकर काम करना शामिल हैं। इसके अलावा, आपदाओं की रोकथाम, तैयारी और क्षमता निर्माण के लिये अन्य उपाय करना और देश के भीतर आपदा के जवाब में किए जाने वाले कामों को नियन्त्रित करना और इस सिलसिले में कहे जाने पर बाकी देशों की मदद करना भी इसके कामों में शामिल हैं।

आपदा प्रबन्धन कानून 2005 में राज्य और जिलास्तर पर आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण बनाने की भी बात कही गई है। इसके तहत हर जिले के डीएम के स्तर पर इसका नोडल सेन्टर बनाने का भी प्रावधान है।

एनडीएमए के मुताबिक, भारत में आपदा प्रबन्धन ढाँचे में इमरजेंसी सपोर्ट फंक्शन (ईएसएफ) योजना पर अमल के लिये डीजीएचएस का इमरजेंसी मेडिकल रेस्पॉन्स डिवीजन मुख्य केन्द्र है। इस योजना में समन्वय, संकट प्रबन्धन समिति मुख्यालयों और घटना स्थल पर त्वरित प्रतिक्रिया, संसाधन के स्टॉक आदि के लिये नोडल अधिकारियों की पहचान करना शामिल है। फैसले लेने वाला संस्थान संकट प्रबन्धन ग्रुप होता है, जिसके प्रमुख स्वास्थ्य और परिवार कल्याण के सचिव होते हैं। इस ग्रुप को डीजीएचएस के तहत आने वाली तकनीकी सलाहकार समिति सलाह देती है।

आपदा प्रबन्धन कार्यक्रम को जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर तैयार करने की जरूरत है और इस लक्ष्य को हासिल करने के लिये स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मन्त्रालय देश में सामूहिक दुर्घटना से जुड़े प्रबन्धन प्रशिक्षण कार्यक्रम को संस्थागत रूप देने पर काम कर रहा है। आपात स्थितियों के दौरान अस्पताल की तैयारी के लिये प्रशिक्षकों को प्रशिक्षण दिया गया है। अब तक 100 प्रशिक्षकों को प्रशिक्षण दिया गया है। आपदा के लिये अस्पताल की योजना और प्रशिक्षण देने वाली मुख्य एजेंसियाँ राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन संस्थान (एआईडीएम) और राष्ट्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण संस्थान (एनआईएचएफडब्ल्यू) हैं। इन प्रशिक्षकों को राज्य सरकार के अस्पतालों/मेडिकल कॉलेजों से लिया गया है।

अगले चरण में मुख्य तौर पर महामारी, अन्य बड़े संकट और जैविक इमरजेंसी पर जिलास्तर के अस्पताल मैनेजरों को ट्रेनिंग दी जाएगी। महामारी या ऐसे बड़े संकट की जाँच और प्रबन्धन से जुड़ा प्रशिक्षण एनआईसीडी की तरफ से आईडीएसपी कार्यक्रम के तहत दी जा रही है। जाँच वाली महामारी के लिये एनआईसीडी नोडल एजेंसी है। एनआईसीडी/आईसीएमआर संस्थाएँ पढ़ाई, ट्रेनिंग, शोध और प्रयोगशाला से जुड़ा सहयोग मुहैया कराती हैं। ज्यादातर राज्यों के पास स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग का क्षेत्रीय कार्यालय होता है और आपदाओं के स्वास्थ्य से जुड़े दुष्प्रभावों के असरदार प्रबन्धन के लिये क्षेत्रीय निदेशक राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करते हैं।

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मन्त्रालय ने सड़क सुरक्षा और आपदा के मामले में चुनिन्दा सरकारी अस्पतालों में सुविधाएँ दुरुस्त करने के लिये कदम उठाए हैं। इसके अलावा, हर 100 किलोमीटर पर ट्रामा सेंटर स्थापित करना और स्वर्णिम चतुर्भुज योजना नेटवर्क में राजमार्गों पर 50 किलोमीटर पर एम्बुलेंस देने की पहल भी सड़क परिवहन मन्त्रालय के साथ मिलकर शुरू की गई है। भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मन्त्रालय के सहयोग से लेवल-1 के 26 और लेवल-2 के 250 ट्रामा केयर सेंटर खोलने की योजना तैयार की गई है।

त्वरित ट्रामा केयर: भूमिका व महत्त्व अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान केन्द्र (एम्स) में 2006-07 में एपेक्स जेपीएन ट्रामा सेन्टर स्थापित किया गया। इस पहल को ट्रामा सेंटर सुविधाओं की दिशा में अहम कदम माना जा सकता है। इस ट्रामा सेंटर का मकसद न सिर्फ मरीजों की बेहतरीन देखभाल है, बल्कि इसका मकसद शोध और प्रशिक्षण का बेहतरीन संस्थान भी बनाना है, ताकि देश के प्रशासकों को देश भर में ट्रामा सेंटरों के संगठन को लेकर पॉलिसी बनाने में मदद मिल सके। एम्स के ट्रामा सेंटर में खास फैकल्टी से लेकर 24 घंटे काम करने वाली डॉक्टरों की टीम समेत तमाम बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध हैं। फिलहाल यहाँ सालाना 60,000 मरीज आते हैं और 6,000 से भी ज्यादा सर्जिकल गतिविधियों को अन्जाम दिया जाता है। इस सेन्टर में 190 बेड, 37 आईसीयू बेड, 6 ऑपरेशन थिएटर आदि हैं। साथ ही, बेड की संख्या बढ़ाकर 260 की जा रही है, 16 और आईसीयू बेड भी जोड़े जा रहे हैं। ऑपरेशन थिएटर की संख्या में भी बढ़ोत्तरी की जा रही है। इसके अलावा, प्राइवेट वार्डों और मरीज के परिजनों के लिये हॉस्टल और हेलिपैड को लेकर भी तेजी से काम हो रहा है। अगले 5-6 साल में इस सबसे बड़े ट्रामा सेंटर की क्षमता बढ़ाकर 750 बेड करने की योजना है। इस योजना को लेकर प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है।

आपदा स्थिति में इलाज की सुविधाओं को बढ़ाने के लिये स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मन्त्रालय मोबाइल अस्पताल को हासिल करने पर भी काम कर रहा है। यह काम आखिरी चरण में है। 100 बेड वाले कंटेनर आधारित इस अस्पताल को रेल, सड़क या हवाई मार्ग से घटना स्थल पर पहुँचाया जा सकता है। इसमें ऑपरेशन थिएटर (ओटी), ऑपरेशन के बाद केयर, जल शोधन इकाई, रसोई, शौचालय और पावर बैकअप जैसी सुविधाएँ हैं। किसी भी आपदा की हालत में सेना सबसे पहले तत्काल मदद मुहैया कराती है। सैन्य बलों से जुड़ी मेडिकल टीम के पास ट्रेनिंग और उपकरणों से लैस कर्मी होते हैं, जो जल्द किसी भी मुश्किल हालात से निपटने को तैयार रहते हैं। देश भर में फैले सभी सर्विस अस्पतालों में आपदा प्रबन्धन से निपटने का व्यापक प्लान होता है, जिससे सभी तरह की आपदाओं से निपटा जा सकता है। ये अस्पताल संकट की हालत में बेड की संख्या बढ़ाकर 3,000 तक करने के लिये अधिकृत होते हैं। सामूहिक दुर्घटना की आपातकालीन स्थितियों में मौजूद संसाधनों के भीतर इन अस्पतालों की सुविधाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है। इन बेडों को हमेशा पूरी तरह से तैयार रखा जाता है।

आपदा प्रबन्धन के लिये उपकरण और मेडिकल दुकानों की पहचान कर उन्हें तैयार रखा जाता है, ताकि कम-से-कम समय में इन चीजों को सभी मेडिकल इकाइयों और अस्पतालों में पहुँचाया जा सके। घटनास्थल पर इलाज और ऐसी जगहों पर दुर्घटना के प्रबन्धन के लिये पर्याप्त पोर्टेबल इमरजेंसी मेडिकल उपकरण भी रखे जाते हैं।

उनके पास मोबाइल अस्पताल और मोबाइल सर्जिकल टीम भी होती है, जिन्हें जरूरत पड़ने पर काफी कम समय में प्रभावित इलाकों तक पहुँचाया जा सकता है। ये मोबाइल अस्पताल दवाएँ, उपकरण, बेड आदि के मामले में आत्मनिर्भर होते हैं। पहचान किए गए कर्मियों को सभी मेडिकल इकाइयों में अलग कर रखा जाता है, ताकि आपदाओं की हालत में उन्हें तत्काल भेजा जा सके। यहाँ तक कि इमरजेंसी के लिये एम्बुलेंस और ट्रांसपोर्ट को भी तैयार रखा जाता है। जरूरी पड़ने पर सेना की बाकी इकाइयों से ट्रांसपोर्ट की पूलिंग भी की जा सकती है।

त्वरित ट्रामा केयर: भूमिका व महत्त्व

आपदा और ट्रामा से जुड़े देखभाल में कमियाँ


स्वास्थ्य राज्यों का विषय है। मेडिकल तैयारी और सामूहिक दुर्घटनाओं के प्रबन्धन की प्रशासनिक जिम्मेदारी मुख्य तौर पर राज्यों के स्वास्थ्य विभागों की होती है। राज्यों की स्वास्थ्य प्रणाली का ढाँचा तीन स्तरीय सिस्टम के तहत काम करता है।

इसमें शामिल होते हैं:
1. ब्लॉक स्तर पर पीएचसी और सीएचसी।
2. जिलास्तर पर जिला अस्पताल।
3. बड़े शहरों, राज्य मुख्यालयों में क्षेत्रीय देखभाल संस्थान।

हालाँकि, राज्यों में वैसी एजेंसियों/विभागों के स्थानीय संस्थाओं में काफी विभिन्नता है, जो स्थानीय संस्थाओं के तहत मेडिकल शिक्षा/सार्वजनिक स्वास्थ्य/मेडिकल सेवाओं जैसी इन इकाइयों का प्रशासन संभालते हैं।

ब्लॉक स्तर पर मौजूद इंफ्रास्ट्रक्चर सामूहिक दुर्घटना से निपटने के लिये पर्याप्त नहीं है। जिले से निचली जगहों के और जिलास्तर के अस्पतालों में 100 से 250 तक बेड होते हैं और यहाँ बड़ी इलाज की सुविधाएँ नहीं होती हैं। हालाँकि, जिलास्तर के अस्पतालों में सुविधाओं और सेवाओं की गुणवत्ता के मामले में राज्यों में स्थितियाँ काफी अलग-अलग हैं। राज्यों की राजधानियों और बाकी बड़े शहरों में मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पताल होते हैं, जिनका संचालन राज्य का स्वास्थ्य विभाग या नगर निकाय संस्थाओं द्वारा किया जाता है। इन सभी संस्थाओं के पास रूटीन काम का लोड काफी ज्यादा होता है और काम बढ़ने के मामले में उनकी क्षमता बेहद सीमित है। भारत जैसे विकासशील देशों में ऊँची मृत्यु दर की अहम वजह एक निश्चित भौगोलिक इलाके में ट्रामा सिस्टम का उपलब्ध नहीं होना है, जिसके तहत घटनास्थल से पुनर्वास तक का काम होता है। संक्षेप में कहें, तो ट्रामा केयर सिस्टम मरीज को सही देखभाल के लिये सही वक्त पर सही इलाज सेंटर तक पहुँचाने की दिशा में काम करता है।

अस्पताल से पहले की देखभाल


कई राज्यों में तो यह सुविधा नदारद है और कुछ राज्यों में यह बेहद पुरातन दौर में है, जहाँ उच्च स्तरीय एम्बुलेंस, प्रशिक्षित मानव संसाधन और निश्चित भौगोलिक इलाके में संस्थान की कमी है। कुछ राज्यों ने एम्बुलेंस/पुलिस और आग के लिये कॉमन एमरजेंसी नम्बर 108 को अपनाया है। मौजूदा सिस्टम जीपीएस/जीपीआरएस सिस्टम पर काम करता है, लेकिन इससे जुड़ा न तो उचित कानून है और न ही मानव संसाधन प्रशिक्षण और संस्था से जुड़े पहलुओं को लेकर नियामक सम्बन्धी नियन्त्रण है।

अस्पताल के अन्दर की देखभाल


निचले स्तर के इंफ्रास्ट्रक्चर (सीएचसी/जिला अस्पताल) और मेडिकल कॉलेजों से जुड़े स्वास्थ्य सम्बन्धी मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर गम्भीर रूप से जख्मी मरीजों की जरूरतों को पूरा नहीं करते। देशभर में बेहतरीन उपकरणों से लैस इमरजेंसी विभागों की कमी है। बेहतरीन उपकरणों से लैस निजी अस्पताल आर्थिक वजहों से सभी मरीजों को हर तरीके का इलाज मुहैया नहीं करा पाते।

प्रशिक्षित संसाधन


ऐसे प्रशिक्षित लोगों की कमी है, जो सभी स्तर के स्वास्थ्य केन्द्रों पर गम्भीर रूप से जख्मी मरीजों की सही ढंग से देखभाल कर सकें। ट्रामा टीम का संकल्पना का अभाव है और मरीजों की देखभाल कर रहे कर्मी अक्सर जीवन रक्षक प्रक्रियाओं के मामले में पर्याप्त तौर पर प्रशिक्षित नहीं होते।

इमरजेंसी डिपार्टमेंट ने प्रशिक्षित डॉक्टरों और नर्सों की कमी ट्रामा सर्जन और प्रशिक्षित सर्जिकल विशेषज्ञों की कमी विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञों की भारी कमी, जो जख्मी मरीज का सही तरीके से इलाज कर सकें (न्यूरोसर्जन, ट्रामा केयर विशेषज्ञ आदि)।

अस्पताल में पुनर्वास पेशेवरों की अपर्याप्त संख्या


इलाज की सुविधाओं से जुड़ी क्षमता में बढ़ोतरी के लिये मेडिकल सिस्टम में मानव संसाधन और इंफ्रास्ट्रक्चर का समग्र विकास जरूरी है। रक्षा मन्त्रालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मन्त्रालय, रेलवे मन्त्रालय और एनजीओ के पास उपलब्ध संसाधनों को एकजुटकर इसका विकास किया जा सकेगा। इसके तहत डॉक्टरों, नर्सों, पारा मेडिकल स्टाफ समेत सभी सम्बन्धित पक्षों को ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। साथ ही, आपदा प्रबन्धन के लिये बाकी जरूरी संसाधनों को भी जोड़ना होगा।

जेपीएन एपेक्स ट्रामा सेंटर की राष्ट्रीय क्षमता तैयार करने की कोशिशें


एटीएलएस, एयूटीएलएस, एसीसीसी के तौर पर सेना और राज्य सरकारों के डॉक्टरों को लम्बे समय से छोटी अवधि का कोर्स कराया जा रहा है। हाल में ट्रामा सर्जरी के तौर पर एमसीएच सुपर स्पेश्यिलिटी कोर्स भी शुरू किया गया और भारत में एम्स ऐसा पहला संस्थान बना, जिसने ट्रामा सर्जरी में सर्जिकल स्पेशलिस्ट के लिये डिग्री कोर्स शुरू किया।

एपेक्स ट्रामा सेंटर पहले ही भारत में एडवांस ट्रामा लाइफ सपोर्ट के लिये क्षमता निर्माण से जुड़े एनडीएमए के पायलट प्रोजेक्ट को पूरा कर चुका है। इसके तहत 3 राज्यों के डॉक्टरों, नर्सों और पारा मेडिकल स्टाफ को ट्रेनिंग दी गई है। एडवांस ट्रामा लाइफ सपोर्ट सम्बन्धित क्षमता निर्माण की परियोजना को और बढ़ाने पर पहले से काम चल रहा है, जिसका इरादा अगले 4 साल में एडवांस ट्रामा केयर के सिलसिले में तकरीबन 1800 डॉक्टरों और नर्सों को ट्रेनिंग देना है।

कुल मिलाकर कहें तो हमें अक्सर आपदा का सामना करने वाले जापान जैसे देशों से सीखने की जरूरत है, जहाँ उन्होंने आपदा प्रबन्धन के अलावा मरीजों को अस्पताल ले जाने से पहले ट्रामा केयर का सिस्टम तैयार किया है। नियन्त्रण सेन्टर और इमरजेंसी सूचना सिस्टम भी तैयार करने की जरूरत है, जिसके जरिए सभी अस्पताल को प्रभावित लोगों की संख्या और सहायता की जरूरतों के बारे में बताना चाहिए।

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