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विश्व की ऊर्जा समस्या कुछ नवाचारी उपाय

Author: 
प्रदीप कुमार मुखर्जी
Source: 
विज्ञान प्रगति, जनवरी, 2017

वैज्ञानिकों को नवाचारी विधि द्वारा पानी और कार्बन डाइऑक्साइड से जिस जेट ईंधन को बनाने में सफलता मिली है वह पूरी तरह से हरित ईंधन है। आशा है, इस नवाचारी विधि को औद्योगिक स्तर पर अंजाम देने में निकट भविष्य में सफलता मिलेगी। ईंधन की समस्या से जूझते विश्व को इस प्रकार की नवाचारी विधियों से निश्चित रूप से लाभ मिलेगा।

सम्पूर्ण विश्व में बढ़ती हुई ऊर्जा समस्या ने वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर दुनिया भर के वैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित किया है। इसके साथ ही ऊर्जा संकट से निपटने के कुछ नवाचारी उपाय ईजाद करने की दिशा में भी वैज्ञानिक काम कर रहे हैं। हाल ही में इसमें महत्त्वपूर्ण सफलता वैज्ञानिकों के हाथ लगी है।

जहाँ कुछ यूरोपियन वैज्ञानिकों को उपलब्ध सौर ऊर्जा, पानी एवं कार्बन डाइऑक्साइड से हरित जेट ईंधन को बनाने में कामयाबी मिली है वहीं मैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) तथा स्टेनफोर्ड के वैज्ञानिकों को औद्योगिक प्रक्रियाओं तथा ताप बिजली घरों आदि से निकलने वाली अपशिष्ट ऊष्मा (वेस्ट हीट) से बिजली बनाने में सफलता मिली है।

वैज्ञानिकों ने बनाया जेट ईंधन


वास्तव में ईटीएच, ज्यूरिख के वैज्ञानिकों को पुरानी अवधारणा पर नई सोच से काम करके ही जेट ईंधन को बनाने में सफलता मिली। सैद्धान्तिक रूप से पानी और कार्बन डाइऑक्साइड के विघटन से कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन गैसों के मिश्रण को प्राप्त किया जा सकता है। गैसों के इस मिश्रण को ‘जल-अंगार गैस’ या ‘वाटर गैस’ कहते हैं। इसे संश्लेषण गैस यानी सिंथेसिस गैस (संक्षेप में सिन गैस) भी कहते हैं। पारम्परिक रूप से भाप को अंगार यानी रक्त-तप्त चारकोल से होकर गुजारने पर ही यह गैस हमें प्राप्त होती है, तभी इसे ‘जल-अंगार गैस’ कहते हैं। इस गैस द्वारा अनेक कार्बनिक यौगिकों जैसे मिथेनॉल, मीथेन आदि का संश्लेषण किया जा सकता है। यही कारण है कि इसे संश्लेषण गैस कहते हैं।

जल-अंगार गैस के अलावा वायु-अंगार गैस या प्रोड्यूसर गैस भी होती है। वायु को अंगार यानी रक्त-तप्त चारकोल से होकर गुजारने पर ही यह गैस हमें प्राप्त होती है, तभी इसे वायु-अंगार गैस कहते हैं। इस गैस का दूसरा नाम ‘एयर गैस’ भी है। दरअसल, कार्बनमोनोक्साइड और नाइट्रोजन गैसों के मिश्रण को ही प्रोड्यूसर गैस या एचर गैस कहते हैं। जब वायु को रक्त-तप्त चारकोल से होकर गुजारा जाता है तो इसमें मौजूद ऑक्सीजन चारकोल में मौजूद कार्बन को कार्बन मोनोक्साइड में ऑक्सीकृत यानी उपचयित कर देती है। यह वायु में मौजूद नाइट्रोजन में से बिना कोई रासायनिक अभिक्रिया किए ज्यों की त्यों गुजर जाती है और इस प्रकार हमें प्रोड्यूसर गैस यानी कार्बन मोनोक्साइड और नाइट्रोजन गैसों का मिश्रण प्राप्त होता है। कुछ औद्यौगिक अनुप्रयोगों में प्रोड्यूसर या एयर गैस का इस्तेमाल सस्ते ईंधन के रूप में किया जाता है। जब वायु और भाप के मिश्रण को रक्त-तप्त चारकोल से होकर गुजारा जाता है तो जो प्रोड्यूसर गैस हमें प्राप्त होती है उसमें कार्बनमोनोक्साइड और नाइट्रोजन के अलावा हाइड्रोजन गैस भी होती है। असल में जल के उपचयन से ही हाइड्रोजन गैस बनती है। हाइड्रोजन युक्त प्रोड्यूसर गैस का इस्तेमाल ईंधन के अलावा संश्लेषित अमोनिया के विनिर्माण में किया जा सकता है।

विश्व की ऊर्जा समस्या कुछ नवाचारी उपाय जल और कार्बनडाइऑक्साइड के मिश्रण से भी वाटर गैस या सिंथेसिस गैस बनाई जा सकती है। इस प्रकार से प्राप्त गैस को फिशर-ट्रॉप्स अभिक्रिया (Fischer-Tropsch process) से जेट ईंधन में बदला जा सकता है। ईटीएच, ज्यूरिख के वैज्ञानिकों ने इसी काम को अंजाम दिया। लेकिन इस काम में दो चुनौतियाँ थीं- पहली चुनौती तो यह थी कि पानी और कार्बन डाइऑक्साइड का विघटन अति उच्च ताप पर होता है और दूसरी सबसे बड़ी चुनौती है कि सिंथेसिस गैस या सिन गैस विस्फोटक होती है। फिशर-ट्रॉप्स अभिक्रिया से जेट से विस्फोटक होती है। सिन गैस की अभिक्रिया फिशर-ट्रॉप्स प्रक्रम से तब तक नहीं कराई जा सकती जब तक कि ऑक्सीजन पूरी तरह से हटा न दी गई हो, नहीं तो परिणामस्वरूप भयंकर विस्फोट होगा।

इन चुनौतियों से दो-चार होने के लिये ईटीएच, ज्यूरिख के वैज्ञानिक दल ने एल्डो स्टाइनफील्ड के नेतृत्व में एक उच्च ताप वाले सौर रिएक्टर का निर्माण किया। इस रिएक्टर में सीरियम ऑक्साइड से बने एक सरंध्र सिरेमिक (जिसे सीरिया भी कहते हैं) को लिया गया। एक संकीर्ण पुंज के रूप में समाहित सौर ऊर्जा को जब वैज्ञानिकों ने इस सिरेमिक पर सकेंद्रित किया तो सौर ऊर्जा को अवशोषित करने के कारण इसका ताप बढ़ने लगा और अन्ततः यह ताप बढ़कर 1500 डिग्री सेल्सियस हो गया। इस प्रक्रम में जिससे ऑक्सीजन गैस विमुक्त होती है। इस गैस को पाइप द्वारा निकाल दिया जाता है। इस रासायनिक प्रक्रम के दूसरे चरण, जो 700 डिग्री सेल्सियस ताप पर सम्पन्न होती है, में अपचयित धातु-ऑक्साइड सिरेमिक पानी और कार्बन डाइऑक्साइड से अभिक्रिया कर उन्हें क्रमशः हाइड्रोजन और कार्बन मोनोक्साइड में ऑक्सीकृत कर देती है। इस प्रकार सिंथेसिस गैस या सिन गैस प्राप्त होती है और उपचयित धातु ऑक्साइड सिरेमिक ऑक्सीजन को ग्रहण कर पुनः अपनी प्रारम्भिक अवस्था में बन जाता है। दो चरणों वाली इस रासायनिक अभिक्रिया में पहले धातु-ऑक्साइड सिरेमिक का उपचयन होता है फिर पानी और कार्बनडाइऑक्साइड के मिश्रण का ऑक्सीकरण या उपचयन। इसे ‘रिडॉक्स अभिक्रिया’ कहते हैं।

धातु-ऑक्साइड सिरेमिक रिडॉक्स अभिक्रिया के अगले चक्र के लिये तैयार होता है और यह सिलसिला चलता रहता है। ईटीएच, ज्यूरिख के वैज्ञानिकों को 240 ऐसे क्रमागत चक्रों को अंजाम देने में सफलता मिली जिससे कुल 750 लीटर सिंथेसिस गैस उन्हें प्राप्त हुई। ज्यूरिख से इस गैस को एम्सटर्डम भेजा गया जहाँ शैल अनुसंधान केन्द्र में इस गैस को फिशर-ट्रॉप्स विधि द्वारा जेट ईंधन में बदल दिया गया।

फिशर-ट्रॉप्स विधि से सिन गैस को जेट ईंधन में बदलने में सीरिया नामक धातु-ऑक्साइड सिरेमिक की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। दरअसल, सिन गैस में ऑक्सीजन की मौजूदगी ही फिशर ट्रॉप्स अभिक्रिया के लिये विस्फोट का कारण बनती है। लेकिन ईटीएच, ज्यूरिख के वैज्ञानिकों ने दो भिन्न चरणों में ऑक्सीजन और सिन गैस को पृथक रूप से प्राप्त किया। इस प्रकार विस्फोट की समस्या पर उन्होंने विजय पाई।

वैज्ञानिकों को नवाचारी विधि द्वारा पानी और कार्बनडाइऑक्साइड से जिस जेट ईंधन को बनाने में सफलता मिली है वह पूरी तरह से हरित ईंधन है। आशा है, इस नवाचारी विधि को औद्यौगिक स्तर पर अंजाम देने में निकट भविष्य में सफलता मिलेगी। ईंधन की समस्या से जूझते विश्व को इस प्रकार की नवाचारी विधियों से निश्चित रूप से लाभ मिलेगा।

अपशिष्ट ऊष्मा से विद्युत ऊर्जा


विश्व की ऊर्जा समस्या कुछ नवाचारी उपाय एक ओर नवाचारी उपाय एमआईटी और स्टेनफोर्ड के वैज्ञानिकों ने निकाला है। औद्योगिक प्रक्रियाओं तथा ताप बिजली घरों से निकलने वाली अपशिष्ट ऊष्मा (वेस्ट हीट), जो अन्ततः बेकार चली जाती है, से बिजली बनाने में इन वैज्ञानिकों को सफलता मिली है। ऐसा नहीं कि इस दिशा में विगत में प्रयास न किया जाता रहा हो। विश्व भर के अनुसन्धानकर्ता दशकों से अपशिष्ट ऊष्मा से ऊर्जा बनाने के अपने उपक्रमों में लगे थे। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये उन्होंने ताप-विद्युत (थर्मोइलेक्ट्रिक) पदार्थ, जो ताप प्रवणता (टैम्परेचर ग्रेडिएंट) की मदद से विद्युत उत्पन्न कर सकते हैं, का प्रयोग किया लेकिन इसमें दो समस्याएँ थीं। पहली समस्या यह कि विशिष्ट होने के कारण ताप-विद्युत पदार्थों की लागत अधिक होती है। अतः इस प्रौद्योगिकी को औद्योगिक स्तर तक समुन्नत कर पाना जरा कठिन है। दूसरी समस्या यह कि अपशिष्ट ऊष्मा का ताप अपने परिवेश के ताप से दसियों डिग्री अधिक होता है जबकि ताप-विद्युत पदार्थ उच्च ताप पर ही अच्छी तरह से काम कर पाते हैं। परिणामस्वरूप, इन पदार्थों से बनी युक्तियों की दक्षता 0.5 प्रतिशत मात्र ही होती है।

एमआईटी एवं स्टेनफोर्ड के वैज्ञानिकों ने अपेक्षाकृत कम ताप वाली अपशिष्ट ऊष्मा, परिवेश से जिसके ताप का आधिक्य 100 डिग्री सेल्सियस से भी कम होता है, को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करने के लिये एक नवाचारी सोच से काम लिया। इसके लिये उन्होंने ऊष्मागैल्वेनी (थर्मोगैल्वेनिक) प्रभाव के सिद्धान्त का प्रयोग किया। इस सिद्धान्त के अनुसार एक पुनः आवेशनीय (रीचार्जेबल) बैटरी की वोल्टता उसके ताप की व्युत्क्रमानुपाती होती है। यानी ताप कम तो बैटरी को आवेशित करने में अधिक वोल्टता और ताप अधिक तो इसे आवेशित करने में कम वोल्टता की आवश्यकता होती है। बैटरी के अनावेशित होने की स्थिति में भी यही नियम लागू होता है।

एमआईटी एवं स्टेनफोर्ड के वैज्ञानिकों ने पहले अपशिष्ट ऊष्मा का उपयोग बैटरी का ताप बढ़ाने के लिये किया। ऊष्मा गैल्वेनी प्रभाव के कारण बैटरी को इसके बढ़े ताप के कारण आवेशित होने में सामान्य स्थिति में लाने वाली वोल्टता से कम वोल्टता की आवश्यकता हुई। वैज्ञानिकों ने बैटरी को पूर्ण रूप से आवेशित करने के बाद इसे ठंडा होने के लिये छोड़ दिया। अपने कम ताप के कारण बैटरी बाह्य परिपथ से अधिक वोल्टता वाली विद्युत प्रदान करती हुई अनावेशित होती पाई गई। इस प्रकार बैटरी को अनावेशित करने में जितनी ऊर्जा की खपत हुई थी, अनावेशित होते समय उससे अधिक ऊर्जा उसने प्रदान की। इस अधिक ऊर्जा का स्रोत अपशिष्ट ऊष्मा ही है। इस प्रकार वैज्ञानिक अपशिष्ट ऊष्मा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करने में सफल हुए।

ऐसा नहीं कि इस प्रकार के प्रयोग पहले न किए गए हों। 1950 के दशक में बैटरी का ताप बढ़ाने, उसे आवेशित करने एवं तत्पश्चात उसे ठंडा करने के प्रयोग अंजाम दिए गए लेकिन इसके लिये ताप को 500 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक होने की आवश्यकता थी। अतः इससे ऊर्जा प्राप्त करने का व्यावहारिक उपाय नहीं निकल पाया।

एमआईटी और स्टेनफोर्ड के वैज्ञानिकों को 100 डिग्री सेल्सियस से कम के तापांतर पर भी अपशिष्ट मध्य से ऊर्जा प्राप्त करने में सफलता मिली। बैटरी के ताप को 50 डिग्री सेल्सियस बढ़ाकर, उसे आवेशित कर तथा फिर उसे ठंडा करने के बाद जब इसे बाह्य परिपथ से जोड़ा गया तो अनावेशित कहीं अधिक ऊर्जा इसने उत्पन्न की। अपशिष्ट ऊष्मा के विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित होने की दक्षता 5.7 प्रतिशत पाई गई। वैज्ञानिक अब इस प्रौद्योगिकी पर और परीक्षण करना चाहते हैं ताकि औद्योगिक अनुप्रयोगों के लिये इसका व्यापक रूप से इस्तेमाल हो सके।

सम्पर्क सूत्र :


डॉ. प्रदीप कुमार मुखर्जी, 43, देशबंधु सोसाइटी, 15, पटपड़गंज, दिल्ली 110092, [ई-मेल : pkn_dn@rediffmail.com]

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