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कचरे में छिपा खजाना

Author: 
अतुल कुमार अग्रवाल
Source: 
विज्ञान प्रगति, जनवरी 2017

आज मानव जीवन जो उद्योग में प्रकृति के सहायक के रूप में था वही प्रकृति को हानि प्रदान करने लगा। उद्योगों और कारखानों में उपयोगी वस्तुओं के साथ-साथ औद्योगिक कूड़ा और अपशिष्ट भी दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। जिसका निस्तारण करना एक बड़ी समस्या है। इसी क्रम श्रृंखला में सब से आगे आकर सीएसआईआर की रुड़की स्थित प्रयोगशाला केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान औद्योगिक कचरे से निर्माण सामग्री बनाकर प्रकृति और समाज की सेवा में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दे रही है।

आधुनिकता की इस दौड़ में दिन-प्रतिदिन नई-नई तकनीकों के आविष्कार के साथ मानव अपनी पुरानी इमारतों को तोड़कर गगनचुम्बी भवनों का निर्माण करता रहा है और इस प्रकार पुराने भवनों के विध्वंस हुए मलबे का निस्तारण एक बड़ी समस्या बनकर खड़ी हुई है। ऐसे में सीएसआईआर की प्रयोगशाला-सीबीआरआई, रुड़की ‘सबको आवास’ के सपने को साकार करने हेतु पुनर्नवीनीकरण (रिसाइक्लिंग) कर ब्लॉक्स बनाकर एक नई दिशा प्रदान कर रही है।

कोटा स्टोन अपशिष्ट से निर्मित टाइल्स और ब्लॉक्स


कोटा स्टोन निर्माण कार्यों में प्रयोग किए जाने वाला उच्च कोटि का पत्थर है। अपने समृद्ध हरे-नीले और भूरे रंग के कारण इस लोकप्रिय पत्थर का प्रयोग रास्ते, गलियारे, बालकनी, वाणिज्यिक भवन तथा एक्सटीरियरस आदि के निर्माण में किया जाता है। परन्तु इस कोटा स्टोन के उत्पादन के साथ ही भारी मात्रा में औद्योगिक कचरे और पत्थर के मलबे का भी उत्पादन होता है।

कोटा, रामगंजमंडी तथा झालावाड़ क्षेत्र में कोटा स्टोन की पाँच हजार से अधिक स्प्लिटिंग इकाइयाँ चल रही हैं। इन इकाइयों में पत्थर की चिराई से मलबा निकलता है। इस मलबे को खाली कराने के लिये डम्पिंग यार्ड बनाया जाता है। लेकिन डम्पिंग यार्ड भी एक-दो साल में भर जाता है। इस कारण उद्यमियों को जहाँ भी खाली जगह मिलती है, वहीं मलबा डाल देते हैं। इन सभी कारणों से इन इकाइयों के द्वारा पिछले 50 सालों में लगभग 650 मिलियन टन से भी ज्यादा कोटा स्टोन अपशिष्ट राजस्थान के हाड़ोती क्षेत्र से उत्पन्न हुआ है। इस अपशिष्ट से हाड़ोती क्षेत्र में अनेक पर्यावरणीय सम्बन्धित समस्याएँ जैसे- वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, भूमि प्रदूषण एवं अनेक स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।

Fig-1 Fig-2 इस समस्या के समाधान हेतु सीएसआईआर- केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, रुड़की ने इस अपशिष्ट (वेस्ट) के उपयोग से बहुमूल्य निर्माण सामग्री विकसित की है। जिनमें विभिन्न प्रकार के डिजाइनों की उन्नत गुणवत्ता वाली कारपेट टाइलें, पेवर ब्लॉक्स तथा हल्के वजन वाले निर्माण ब्लॉक्स को बनाने की तकनीक सम्मिलित है। इस अपशिष्ट (वेस्ट) से टाइलें एवं ब्लॉक्स बनाने के लिये प्रायोगिक संयंत्र भी संस्थान द्वारा बनाया गया है।

इस तकनीक के अन्तर्गत कोटा स्टोन के अपशिष्ट (वेस्ट) के घोल को अलग-अलग तरह से मिश्रित कर, उसकी मात्रा, अनुपात, फोम के वजन आदि को परिवर्तित करके मिश्रण तैयार किये जाते हैं। इस मिश्रण पर कई रासायनिक प्रक्रियाओं तथा उसके विभिन्न भौतिक-यान्त्रिक गुणों जैसे- जल अवशोषण तथा प्रतिरोधक क्षमता आदि की जाँच के बाद उसे अलग-अलग प्रकार की निर्माण सामग्रियों के रूप में ढाला जाता है। इस तकनीक से आवासीय, वाणिज्यिक और औद्योगिक इमारतों के फर्श के लिये उपयुक्त विभिन्न डिजाइनों की सर्वोच्च गुणवत्ता की सामान्य प्रयोजन टाइल्स का निर्माण सीएसआईआर-केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, रुड़की द्वारा किया गया है।

साथ ही इस तकनीक के अन्तर्गत कोटा स्टोन के अपशिष्ट से हल्के भार के सेल्यूलर फोम्ड कंक्रीट (सीएफसी) ब्लॉक्स का भी निर्माण किया गया है। कोटा स्टोन के कचरे, सीमेंट, रेत और पानी के मिश्रण पर की गई रासायनिक प्रतिक्रियाओं से निर्मित यह सीएफसी कंक्रीट एवं ब्लॉक्स बहुउपयोगी हैं। साथ ही इसकी ऊष्मीय चालकता साधारण ईंटों के मुकाबले बहुत कम है जिसके फलस्वरूप कम घनत्व के सीएफसी ब्लॉक्स का उपयोग ईंटों के स्थान पर एक इन्फिल सामग्री के रूप में प्रयोग किये जाने से मनुष्य की जेब पर भी कम दबाव रहेगा।

सीएसआईआर-केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, रुड़की ने निरन्तर शोध करके ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे इस विध्वंस कचरे का सही प्रकार से पुनर्चक्रण कर निर्माण सामग्री तथा उनके उत्पादन में आवश्यक कच्चे माल के रूप में इसका भरपूर प्रयोग किया जा सकता है।

इसी तकनीक के अन्तर्गत, सीएसआईआर- केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, रुड़की ने इस विध्वंस कचरे का पुनर्नवीनीकरण कर कम लागत के साफ पुनर्निर्मित मोटे समुच्चय ‘आरसीए’ का उत्पादन किया है। इस आरसीए की भौतिक एवं यान्त्रिक गुणों जैसे कुचल मूल्य, प्रभाव मान, जल अवशोषण, विशिष्ट गुरुत्व, बढ़ाव सूचकांक और परत सूचकांक आदि की जाँच की गई। तत्पश्चात इस आरसीए का उपयोग भवन निर्माण सामग्री जैसे- सीमेंट, कंक्रीट, पेवर ब्लॉक्स के उत्पादन में किया गया। इस निर्माण प्रक्रिया के अन्तर्गत अलग-अलग मात्रा में सीमेंट, रेत और आरसीए के मिश्रण से संघनन तकनीक का प्रयोग कर सीमेंट कंक्रीट पेवर ब्लॉक्स में आरसीए के उपयोग के कारण पेवर ब्लॉक्स की क्षमता में सराहनीय वृद्धि हुई है। साथ ही आरसीए के प्रयोग से पेवर ब्लॉक्स के नियन्त्रण मिश्रण में अधिक मजबूत बॉन्ड्स (जोड़) बनाकर उसे और मजबूत बनाता है।

उड़न राख (फ्लाई ऐश) से जिओपॉलीमर


उड़न राख (फ्लाई ऐश) एक औद्योगिक कचरा है जो चूर्णित कोयले के जलने से बनता है और औद्योगिक अपशिष्टों में सबसे अधिक उत्पादित होता है। इसका निपटान एवं उपयोग एक बहुत बड़ी चुनौती है। ताप विद्युत संयंत्र (थर्मल पावर प्लांट) से निकला कचरा (राख) तालाबों में छोड़ दिया जाता है। जहाँ भर जाने पर इसे मिट्टी से ढक दिया जाता है। अनुमानतः 40000 वर्ग गज भूमि इस परिव्यक्त राख तालाबों से भरी हुई है।

. इस समस्या के निवारण हेतु सीएसआईआर- केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, रुड़की ने इस कचरे से कई उपयोगी निर्माण सामग्रियाँ बनाने की तकनीक विकसित की है, जिससे यह प्रकृति को हानि पहुँचाने के स्थान पर मनुष्य के निर्माण कार्य में सहायक बन सके।

साथ ही उड़न राख का उपयोग तटबंधन संरचना तथा बैकफिल सामग्री के रूप में भी किया जा रहा है। इसी श्रृंखला में सीएसआईआर- केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, रुड़की की उड़न राख से उपयोगी निर्माण सामग्री बनाने की तकनीक में नवीनतम तकनीक है- जिओपॉलीमर।

जिओपॉलीमर लोकप्रिय निर्माण सामग्री के रूप में सामने आया है क्योंकि इससे धारणीय तथा पर्यावरण अनुकूल निर्माण सामग्री का उत्पादन होता है। उड़न राख और रासायनिक प्रतिघातकों की ऊँचे पीएच में प्रतिक्रिया से जिओपॉलीमर का उत्पादन होता है। यह जिओपॉलीमर साधारण पोर्टलैण्ड सीमेंट की तुलना में अधिक मजबूत, टिकाऊ और प्रकृति के अनुकूल होता है। उड़नराख से निर्मित जिओपॉलीमर से हम ईंट, कंक्रीट, तापरोधक कंक्रीट, फोम, ठोस एवं खोखले निर्माण ब्लॉक्स आदि का उत्पादन कर सकते हैं।

जिओपॉलीमर से निर्मित ब्लॉक्स भार और बिना-भार सम्भालने, दोनों (लोड बियरिंग एवं नॉन लोड बियरिंग) निर्माण कार्यों में उच्च कार्य करते हैं। जिओपॉलीमर से बनी ईंटें साधारण ईंटों के भार की तुलना में काफी हल्की होती हैं। साथ ही जिओपॉलीमर से निर्मित ईंटें साधारण ईंटों के मुकाबले कम पानी सोखती हैं तथा सरलता से साधारण गारे के उपयोग द्वारा जुड़ जाती हैं। इसके अलावा जिओपॉलीमर द्वारा निर्मित ईंटें साधारण ईंटों की तुलना में रासायनिक तथा समुद्री वातावरण में ज्यादा टिकाऊ हैं तथा ऐसी स्थिति में अपनी प्रतिरोधक क्षमता का उत्तम प्रदर्शनी करती हैं।

जिओपॉलीमर से तैयार तापरोधक कंक्रीट पूर्व निर्मित छत और दीवार पैनल, हल्के इन्फिल ब्लॉक्स और समग्र प्रणाली से फर्श आदि बनाने के काम आता है जो कम पानी सोखता है और ज्यादा मजबूत है। साथ ही जिओपॉलीमर तकनीक से तैयार निर्माण सामग्री साधारण निर्माण सामग्री की तुलना में कम ईंधन में ज्यादा जल्दी पक जाते हैं।

सैंडविच पैनल बनाने के उपयोग में आने वाला जीव सामग्री फोम भी जिओपॉलीमर की मदद से बनता है। श्रेणी ‘एफ’ के उड़नराख से निर्मित जिओपॉलीमर तकनीक से बना यह फोम हल्के, कठोर, विस्तार स्थिर, कम जल खपत, अग्निरोधक और तापरोधक होता है। इस प्रकार जिओपॉलीमर एक पर्यावरण के अनुकूल बहुउपयोगी निर्माण सामग्री के रूप में आगे आया है। सीएसआईआर-केन्द्रीय भवन अनुसंधान संस्थान, रुड़की द्वारा विकसित औद्योगिक कचरे से उपयोगी निर्माण सामग्री की तकनीक एक छोटा लेकिन प्रभावी और प्रेरणादायक कदम है। यह प्रकृति और उद्योग के बीच एक समन्वय स्थापित करने के उद्देश्य से औद्योगिक अपशिष्ट के विरुद्ध एक बड़े युद्ध की कृतार्थ शुरुआत है जिसमें सभी के भरपूर सहयोग की अत्यधिक आवश्यकता है। अब यह हम सभी की जिम्मेदारी है कि हम ऐसे कदमों से प्रेरणा प्राप्त कर एक ‘स्वच्छ, स्वस्थ और सबको आवास’ हेतु सामग्री देकर समाज के पुनर्निर्माण में अपना योगदान दें। यदि हमने अपने दायित्व से मुख मोड़ा तो सृष्टि के विनाश के अपराधी हम स्वयं होंगे, प्रकृति या जगत नियन्ता नहीं।

सम्पर्क सूत्र :


डॉ. अतुल कुमार अग्रवाल, वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक, सीएसआईआर-सीबीआरआई, रुड़की 247 667 (उत्तराखण्ड), [मो. : 09897194009; ई-मेल : atulcbri@rediffmail.com]

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