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वायु प्रदूषण की नई राजधानियाँ

Author: 
अजीत सिंह, अनुपम चक्रवर्ती
Source: 
डाउन टू अर्थ, दिसम्बर, 2016

राजधानी दिल्ली में जहाँ वायु प्रदूषण की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है, वहीं उत्तर व मध्य भारत के कई शहर इस मामले में दिल्ली को भी पीछे छोड़ रहे हैं। तमाम कोशिशों के बावजूद दिल्ली जिस प्रदूषण से उबर नहीं पाई, अब वैसी ही दूषित हवा कई दूसरे शहरों का दम घोंट रही है। अजीत सिंह के साथ अनुपम चक्रवर्ती की रिपोर्ट

scan0012 दीपावली के बाद नवम्बर का दूसरा सप्ताह। लखनऊ की किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के साँस रोग विभाग में मरीजों की भीड़ अचानक बढ़ गई है। विभागाध्यक्ष डॉक्टर सूर्यकांत बताते हैं कि आँख और नाक की एलर्जी के मरीजों की तादाद दीपावली के बाद करीब 25 फीसदी ज्यादा है। पहले गम्भीर निमोनिया के महीने में एक-दो मामले आते थे, अब हफ्ते में ऐसे चार-पाँच मरीज आ रहे हैं। ब्रोंकाइटिस और अस्थमा के मरीज भी बढ़ गए हैं।

जी हाँ, आप वायु प्रदूषण की नई राजधानी लखनऊ में हैं। फसल कटाई के मौसम में दीपावली के बाद जहरीले धुएँ में लिपटी तो धूल और धुँध यानी स्मॉग दिल्ली को अपनी गिरफ्त में ले लेता है, अब वह उत्तर भारत के लखनऊ जैसे शहरों का दम भी घोंटने लगा है। केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) के अनुसार, गत 29 और 30 अक्टूबर को कानपुर देश के 32 प्रमुख शहरों में सबसे प्रदूषित शहर था। अगले आठ दिनों में फरीदाबाद पाँच बार इस फेहरिस्त में टॉप पर रहा, जबकि 8 व 9 नवम्बर को लखनऊ देश का सबसे प्रदूषित शहर था। ताजनगरी आगरा भी इस साल स्मॉग से बुरी तरह घिरी रही। यही हाल नौ नवम्बर को बनारस का था।

अब दिल्ली दूर नहीं


एक तरफ दिल्ली इस साल पिछले 17 वर्षों का सबसे भयंकर स्मॉग झेल रही थी, वहीं लखनऊ, कानपुर जैसे शहर वायु प्रदूषण के पैमानों पर दिल्ली हुए जा रहे हैं। लुधियाना, आगरा, इलाहाबाद, बनारस, पटना जैसे शहरों की हवा भी दिल्ली की तरह ही दूषित हो चुकी है। उत्तर व मध्य भारत के भूगोल में वायु प्रदूषण की कई राजधानियाँ पनप चुकी हैं, जबकि स्मॉग की खबरों और चिंताओं का केन्द्र अब भी दिल्ली ही है। इस साल विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने मध्य प्रदेश के ग्वालियर को अत्यंत महीन प्रदूषित कणों (पीएम 2.5) के लिहाज से इराक के जबोल के बाद दुनिया का दूसरा सर्वाधिक प्रदूषित शहर माना है। इस मामले में विश्व के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में 10 शहर तो भारत के ही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इलाहाबाद, पटना और रायपुर ने वायु प्रदूषण के कई मानकों पर दिल्ली को पीछे छोड़ दिया है जबकि लुधियाना, कानपुर, लखनऊ और फिरोजाबाद भी दिल्ली की राह पर हैं। दीपावली के बाद छाया स्मॉग भले ही कुछ दिनों में छट गया, लेकिन यह इन शहरों में साल भर रहने वाले वायु प्रदूषण की स्थिति है। आखिर चीन के बाद भारत दुनिया का सबसे प्रदूषित देश यूँ ही नहीं बना।

यह कोई अचानक आई आपदा नहीं है और न ही सिर्फ कुछ दिनों का संकट। केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के आँकड़ों से पता चलता है कि 2002 से 2014 के बीच ग्वालियर, कानपुर, लुधियाना, ग्वालियर और सूरत में वायु प्रदूषण में बढ़ोत्तरी की दर दिल्ली से अधिक रही है। जबकि इन शहरों में प्रदूषण से बचने के उपाय दिल्ली जितने भी नहीं हैं। दिल्ली पिछले 20 वर्षों से साफ हवा के लिये संघर्ष कर रही है। पब्लिक ट्रान्सपोर्ट में सीएनजी का इस्तेमाल, ट्रकों के प्रवेश पर अंकुश, भारी डीजल कारों से ग्रीन टैक्स की वसूली, ऑड-इवन जैसे प्रयोग और पटाखों की बिक्री पर लगे प्रतिबंध जैसे उपाय इसी लम्बे संघर्ष की देन हैं।

वायु प्रदूषण से रोजाना 1701 मौतें


दिल्ली से सटे यूपी के गाजियाबाद में रहने वाले दीपक गोस्वामी और उनकी पत्नी अंजु के लिये दीपावली के बाद पूरा हफ्ता बेहद तकलीफदेह गुजरा। गत 30 अक्टूबर से ही उनकी छह साल की बेटी श्रेया को साँस लेने में परेशानी होने लगी। दिल में छेद होने की वजह से आठ महीनें की श्रेया का ऑपरेशन करवाना पड़ा था। दीपावली के बाद जब दिल्ली में आनंद विहार के आस-पास छोटे प्रदूषित कणों (पीएम 2.5) की मात्रा बढ़कर 883 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर तक पहुँच गई तो श्रेया का साँस लेना मुश्किल हो गया और उसे ऑक्सीजन पर रखना पड़ा। घने स्मॉग के चलते कई दिनों तक उसकी साँसें अटकी रहीं। इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल के बालरोग विशेषज्ञ अनुपम सिब्बल बताते हैं कि बच्चों में श्वसन तंत्र पूरी तरह विकसित नहीं होता है। वे ज्यादा साँस लेते हैं और उनमें साँस सम्बन्धी संक्रमण और बीमारियों का खतरा अधिक रहता है।

दुनिया भर में वायु प्रदूषण को स्वास्थ्य के एक बड़े खतरे के तौर पर देखा जा रहा है। डब्ल्यूएचओ की बर्डन ऑफ डिजीज रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में होने वाले हर नौ में से एक मौत के लिये वायु प्रदूषण जिम्मेदार है। वर्ष 2012 में बाहरी वायु प्रदूषण की वजह से भारत में 6.21 लाख लोग मौत का शिकार हुए। यानी रोजाना करीब 1701 मौतें! सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरन्मेंट (सीएसई) के प्रोग्राम मैनेजर विवेक भट्टाचार्य बताते हैं कि हाल के वर्षों में उत्तर भारत के कई शहरों में वायु प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ा है, जिसका सीधा असर लोगों खासकर बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। अलग-अलग शहरों में हुए अध्ययन और सर्वे बताते हैं कि अमृतसर, लखनऊ, जयपुर, बीकानेर और कानपुर आदि शहरों में बढ़ता वायु प्रदूषण लोगों के स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। मिसाल के तौर पर, कानपुर में सीपीसीबी और जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज का एक अध्ययन बताता है कि शहर के विकास नगर और जूहीलाल कॉलोनी में रहने वाले लोगों के फेफड़े साफ वातावरण में रहने वाले लोगों के मुकाबले कम सक्रिय हैं। इसी तरह लखनऊ में मुख्य मार्गों के नजदीक रहने वाले बच्चों में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस अधिक पाया गया है।

गाजियाबाद के वैशाली में मेडिकल स्टोर चलाने वाले विशाल शर्मा बताते हैं कि इस साल सात नवम्बर को उन्होंने पहली बार एक ही दिन में 400 मास्क बेचे। इतने मास्क तो पहले साल भर में नहीं बिकते थे। इस साल भयंकर स्मॉग आया तो मास्क खरीदने वालों की लाइन लग गई। उल्लेखनीय है कि इस साल दिल्ली के पंजाबी बाग और आनंद विहार इलाकों में दो से छह नवम्बर के दौरान अत्यंत छोटे प्रदूषित कणों यानी पीएम 2.5 का स्तर 999 माइक्रोग्राम तक पहुँच गया। स्वास्थ्य मानकों से यह 10-12 गुना अधिक है और ज्यादातर उपकरण इससे अधिक प्रदूषण मापने में सक्षम नहीं हैं।

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कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं


लखनऊ स्थित भारतीय विषविज्ञान शोध संस्थान (आईआईटीआर) ने इस साल दीपावली की रात और इससे एक दिन पहली रात शहर में सात जगह प्रदूषण का स्तर मापा। सर्वे में सामने आया है कि वायु प्रदूषण के लिये जिम्मेदार अत्यंत महीन प्रदूषित कण (पीएम 2.5) की मात्रा 248 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से बढ़कर 672 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर तक पहुँच गई। थोड़े बड़े प्रदूषित कणों यानी पीएम 10 की मात्रा 360 माइक्रोग्राम से बढ़कर 864 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर तक पहुँच गई थी। मानकों के हिसाब से पीएम 2.5 को 60 और पीएम 10 को 100 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से अधिक नहीं होना चाहिए। इन आँकड़ों से जाहिर है कि दीपावली के दिन लखनऊ की हवा 8-10 गुना अधिक प्रदूषित थी। आईआईटीआर की सर्वे रिपोर्ट में वायु प्रदूषण में हुई इस भारी बढ़ोत्तरी के लिये पटाखों को जिम्मेदार ठहराया गया है, क्योंकि दीपावली के दिन छुट्टी की वजह से वाहनों और औद्योगिक गतिविधियों से होने वाला प्रदूषण अपेक्षाकृत कम रहता है। आईआईटीआर के निदेशक आलोक धवन लखनऊ में वायु प्रदूषण की स्थिति को बहुत चिंताजनक करार देते हैं। उनका कहना है कि इससे न सिर्फ लोग बल्कि पूरा पर्यावरण प्रभावित हो रहा है। संस्थान ने पीएम 2.5 से भी छोटे प्रदूषित कणों का स्तर पर लखनऊ की हवा में मापा है जो काफी अधिक पाया गया है। इतने महीन कणों के लिये भारत में कोई मानक तय नहीं किये गये हैं, लेकिन ये बेहद महीन कण साँस के साथ मानव मस्तिष्क तक पहुँच सकते हैं और कई विकार पैदा कर सकते हैं।

 

अमृतसर

21 यातायात पुलिसकर्मियों के स्वास्थ्य पर किए गए अध्ययन में पता चला कि ऑटोमाबाइल से निकलने वाले प्रदूषित हवा जीनोटॉक्सिक प्रभाव से युक्त होते हैं और लम्बे समय तक इससे सम्पर्क में रहना जोखिम भरा हो सकता है।

लखनऊ

सड़कों के करीब रहने वाले बच्चों के बीच उच्च ऑक्सीडेटिव तनाव पाया गया।

 

देश के अधिकतर शहरों में दीपावली के बाद वायु प्रदूषण बढ़ता है। खेतों में जलने वाली पराली और सर्दियों की धुँध के साथ मिलकर यह स्मॉग के हालात पैदा करने में अहम भूमिका निभाता है। लेकिन गैस चैम्बर में तब्दील होते भारतीय शहरों के लिये सिर्फ दीपावली के पटाखों को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है। हालाँकि, इस साल पटाखे मुक्त दीपावली का अभियान बेहद फीका रहा, जिसका नतीजा लुधियाना से बनारस तक छाए स्मॉग के रूप में साफ दिखा। लेकिन हैरानी की बात यह है कि दीपावली के 20 दिन बाद भी उत्तर भारत के कई शहरों में वायु प्रदूषण की स्थिति बेहद खतरनाक बनी हुई है। 20 नवम्बर को लखनऊ और पटना में वायु गुणवत्ता सूचकांक दिल्ली में 380 के मुकाबले क्रमशः 456 और 404 था। मुजफ्फरनगर, गया और आगरा में वायु प्रदूषण सूचकांक 300 के ऊपर रहा जो सुरक्षित सीमा से तीन-चार गुना अधिक है। यानी जब स्मॉग नहीं होता, तब भी इन शहरों की हवा खतरनाक ढंग से प्रदूषित होती है। इसके लिये कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं है। वाहनों के प्रदूषण से लेकर फैक्ट्रियों से निकला धुआँ, सड़कों व निर्माण कार्यों की उड़ने वाली धूल और कूड़े के जलने जैसे कई कारक मिलकर इतना अधिक प्रदूषण फैलाते हैं।

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खलनायक की तलाश


दिल्ली के अलावा दूसरे शहरों में भी बढ़ते वायु प्रदूषण को समझने के लिये हमें देश में वाहनों की संख्या में हो रही बढ़ोत्तरी पर गौर करना चाहिए। वर्ष 2010 से 2013 के बीच कई शहरों में वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ी है। मिसाल के तौर पर, इन चार वर्षों में गाजियाबाद में वाहनों की संख्या 54 फीसदी, पटना में 43 फीसदी, इंदौर में 36 फीसदी, आगरा में 30 फीसदी, कानपुर में 22 फीसदी बढ़ी है। जबकि इस दौरान दिल्ली में वाहनों की संख्या 15 फीसदी बढ़ी। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने देश के जिन शहरों में वायु प्रदूषण के लिये वाहनों और उद्योगों से निकले धुएँ को मुख्य वजह माना है, उनमें दिल्ली के साथ-साथ फरीदाबाद, हिसार, यमुनानगर, ग्वालियर, इंदौर, जालंधर, जयपुर, आगरा, इलाहाबाद, गाजियाबाद, कानपुर, लखनऊ, मेरठ, बनारस और देहरादून भी शामिल हैं।

सीपीसीबी की वर्ष 2014 की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश के जिन शहरों में प्रदूषित कणों (पीएम 10) का स्तर मानकों से करीब 200 फीसदी अधिक पाया गया है, उनमें इलाहाबाद टॉप पर है जबकि दिल्ली पाँचवें नम्बर पर है। मानकों से 200 फीसदी या इससे अधिक प्रदूषण वाले देश के सात शहरों में से पाँच शहर अकेले उत्तर प्रदेश के हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रमुख शहरों में वाहन 70 फीसदी कार्बन मोनो ऑक्साइड और 30 फीसदी प्रदूषित कणों के उत्सर्जन लिये जिम्मेदार हैं।

 

जलगाँव

वर्ष 2005 की इंडिया इन इंडस्ट्रियल हेल्थ रिपोर्ट के अनुसार, जलगाँव शहर के ट्रैफिक पुलिसकर्मियों में साँस सम्बन्धी परेशानियाँ बहुत अधिक पाई गई हैं।

अहमदाबाद

शहर के सबसे प्रदूषित इलाकों में दुकानदारों के फेफड़ों में काफी खराबी पाई गई। यह अन्तर सर्वाधिक प्रदूषित और अपेक्षाकृत कम प्रदूषित क्षेत्रों में साफ नजर आया।

 

मौसम विज्ञानी और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर डीएन पांडे बताते हैं कि कार्बन या धूल के कणों पर हवा में मौजूद पानी की बूँदें संघनित होने से स्मॉग बनता है। बनारस, कानपुर और लखनऊ जैसे शहर क्षेत्रफल में भले ही दिल्ली से छोटे हैं लेकिन आबादी और वाहनों के घनत्व के मामले में दिल्ली से पीछे नहीं हैं। इसके अलावा उत्तर भारत के शहरों की भौगोलिक स्थिति भी इन्हें दिल्ली की तरह स्मॉग की चपेट में ले आती है। दीपावली के बाद हवा में प्रदूषित कणों की मात्रा बढ़ती है और सर्दियों की वजह से ठंडी हवा घनी होकर जमीन के आस-पास रहती है। पंजाब-हरियाणा और पश्चिमी यूपी में पराली जलने के बाद ये स्थितियाँ और भी प्रभावी हो जाती हैं। पांडे मानते हैं कि हरियाणा-पंजाब में पराली जलाने की वजह से जो स्मॉग दिल्ली में फैला, इस साल उसका असर लखनऊ, बनारस और पटना तक भी हो रहा है। इन शहरों में सड़कों से उठने वाली धूल और बड़ी तादाद में निर्माण गतिविधियों के चलते भी वातावरण में धूल की मात्रा अधिक है जो ठंडी हवा और धुएँ के साथ मिलकर स्मॉग में बदल जाती है।

हाल के वर्षों में हरियाणा-पंजाब में धान कटाई के बाद पराली का खेतों में जलाया जाना, स्मॉग के सबसे बड़े कारण के तौर पर सामने आया है। नासा के उपग्रहों से प्राप्त चित्रों से भी इस बात की पुष्टि होती है कि जब हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी यूपी में पराली जलाए जाने की घटनाएँ बढ़ती हैं, उसके बाद ही दिल्ली की हवा में प्रदूषित कणों की मात्रा बढ़ती है और स्मॉग छा जाता है। खेतों में जलने वाली पराली ने दिल्ली में ऑड-इवन जैसी व्यापक पहल को निष्प्रभावी करने में भी बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन वायु प्रदूषण का सारा दोष किसानों के ऊपर डालकर हम वायु प्रदूषण से नहीं बच सकते।

आईआईटी-कानपुर का वर्ष 2015 का एक अध्ययन बताता है कि दिल्ली में 38 फीसदी वायु प्रदूषण के लिये सड़कों की धूल और 20 फीसदी वायु प्रदूषण के लिये वाहनों से निकला धुआँ जिम्मेदार है। उद्योगों का धुआँ और निर्माण कार्यों से निकली धूल भी दिल्ली की हवा को प्रदूषित कर रही है।

प्रदूषण के ये कारण जगजाहिर हैं, इसके बावजूद साफ ईंधन के इस्तेमाल से लेकर, डीजल वाहनों पर रोक और ग्रीन सेस वसूली जैसे छोटे-बड़े हर उपायों को निहित स्वार्थों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा है। यह रवैया वायु प्रदूषण से भी अधिक खतरनाक है। लोगों, उद्योगों और सरकारों की ऐसी बेपरवाही छोटे शहरों में प्रदूषण को और भी गम्भीर बना देती है। जबकि यह न सिर्फ खेतों को जलाने की समस्या है, न सिर्फ वाहनों के धुएँ की, न सिर्फ शहरों, न अकेले गाँव, न अकेले वाहनों की। बल्कि पर्यावरण के प्रति बेपरवाही का सामूहिक नतीजा है, जिससे निपटने के लिये सामूहिक उपाय ही कारगर साबित हो सकते हैं।

 

बीकानेर

2010 में शहर के 100 डीजल टैक्सी ड्राइवरों और इतने ही स्वस्थ लोगों पर हुए एक अध्ययन में ड्राइवरों में साँस और फेफड़े सम्बन्धी समस्याएँ अधिक पाई गईं।

कानपुर

धुएँ शहर के विकास नगर जैसे प्रदूषित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के फेफड़ों की सक्रियता अपेक्षाकृत साफ वातावरण में रहने वाले लोगों के मुकाबले कम पाई गई।

 

छोटे शहरों पर बड़ी मार


वायु प्रदूषण के मामले में दिल्ली को टक्कर देते इन शहरों की स्थिति इसलिये भी चिन्ताजनक है क्योंकि यहाँ प्रदूषण से निपटने के दिल्ली जैसे उपायों को अपनाने में भी अभी लम्बा समय लग सकता है। राष्ट्रीय राजधानी में सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल लगातार राष्ट्रीय राजधानी में प्रदूषण पर नजर रखे हुए हैं। अदालत के दबाव में सरकार को कई कदम उठाने पड़े हैं, इसके बावजूद दिल्ली की स्थितियाँ बद से बदतर होती जा रही हैं। ऐसे में उन छोटे शहरों का क्या भविष्य होगा, जहाँ अभी तक प्रदूषण मापने के इंतजाम भी नहीं हैं। मिसाल के तौर पर, भोपाल के प्रदूषण के स्तर को लेकर केन्द्र और राज्य के प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के आँकड़े एक-दूसरे के उलट हैं। केन्द्र की एजेंसी ने दीपावली के दिन भोपाल को प्रदूषित माना जबकि मध्य प्रदेश प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) के अधिकारियों का दावा है कि दीपावली के दौरान शहर में प्रदूषण पिछले पाँच साल में सबसे कम रहा।

इस साल उत्तर भारत के कई शहरों में स्मॉग छाये रहने के बावजूद राज्य सरकारें प्रदूषण रोकने के लिये ठोस कदम उठाने में नाकाम रही हैं। यूपी सरकार ने आठ नवम्बर को आनन-फानन में कुछ दिनों के लिये स्टोन क्रेशर और बहुमंजिला इमारतों के लिये खुदाई पर रोक जरूर लगाई। लेकिन स्मॉग छटते ही मामला चीजें पुराने ढर्रे पर लौटने लगी हैं। वायु प्रदूषण पर होने वाली सालाना चर्चा और चिन्ता दिल्ली से प्रसारित समाचार चैनलों पर दोबारा स्मॉग दिखाई पड़ने तक फिलहाल टल गई है।

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