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प्रदूषण रहित ऊर्जा के नैसर्गिक स्रोत बैल एवं गोबर

Author: 
परमानन्द मित्तल
Source: 
भारतीय धरोहर, सितम्बर-अक्टूबर, 2011

1993 में लगाये गये एक अनुमान के अनुसार भारत में एक हजार मेगावाट बिजली के उत्पादन की लागत लगभग एक हजार करोड़ रुपये आ रही हैं। 5 मार्च, 1994 को आयोजित पशु ऊर्जा सम्मेलन में भारत के कृषि मंत्री बलराम जाखड़ का कहना था कि देश में 7 करोड़ 40 लाख बैलों और 80 लाख भैंसे प्रतिवर्ष 10 हजार करोड़ रुपये की चार हजार करोड़ हॉर्सपावर ऊर्जा प्राप्त होती है।

भारत में बछड़े के जन्म पर उत्सव मनाया जाता है। बछड़ा शब्द संस्कृत के ‘वत्स’ शब्द से बना है। वत्स शब्द से वात्सल्य शब्द बना है। बछड़ा पैदा होते ही ‘माँ’ शब्द का उच्चारण करता है। गोमाता उसकी रक्षा अपने प्राण देकर भी करती है। तीन वर्ष की आयु होने पर बंध्यकरण करके बैल बन जाता है। कृषि कार्य, जुताई - बुआई सिंचाई गन्ना पिराई, सरसों पिराई आदि सभी काम करता है। गाड़ी में लगभग बोझा ढोता है भाई की तरह प्रेम करता है। जो कार्य हम अपने लिये स्वयं नहीं कर सकते वह हमारे लिये करता है। केन्द्रीय कृषि यांत्रिक अनुसंधान संस्थान, नवीबाग, भोपाल ने बैल - चलित एक मिनी ट्रैक्टर बनाया है, जो परम्परागत हल से 2-3 गुनी जुताई करता है। तथा किसान उस पर बैठकर कार्य कर सकता है। सरकारी आँकड़े से जानकारी मिलती थी देश में डेढ़ करोड़ बैलगाड़ियाँ हैं, लेकिन 5 मार्च, 1994 को हुए एक सम्मेलन में भारत सरकार के एक उच्च अधिकारी डॉ. ज्ञानेन्द्र सिंह ने जानकारी दी कि बैलगाड़ियों की संख्या बढ़कर ढाई करोड़ हो गई है।

इससे यह सिद्ध होता है कि वर्तमान में यंत्रीकरण के युग में भी बैलगाड़ियों की उपयोगिता तेजी से बढ़ रही है। मेरा विश्वास है कि यह कम नहीं होगी, बल्कि बढ़ेगी। जब तक बैलगाड़ियों के पहिए लकड़ी के बनते रहे और उस पर लोहे की पटरी चढ़ाई जाती रही। कुछ वर्ष पूर्व डनलप कम्पनी ने गाड़ियों में मोटर-वाहन की तरह के टायर-ट्यूब भी लगाये लेकिन उतनी सफलता नहीं मिली जितनी आशा थी। उसका मुख्य कारण यही रहा कि जहाँ कहीं पहियों की हवा निकल जाये बेचारा किसान असहाय हो जाता है। इस कठिनाई को दूर करने के लिये केन्द्रीय कृषि यांत्रिकी अनुसंधान संस्थान, भोपाल ने बस और ट्रक के पुराने टायरों को लेकर उनमें नारियल की जटा भरकर उन्हें पंचर-रहित बना दिया है।

व्यावहारिक विज्ञान संस्थान, सांगली ने परम्परागत बैलगाड़ी को विकसित करके बलवान नाम से एक नया स्वरूप प्रदान किया। बलवान नामक इस विकसित गाड़ी का पूरा स्वरूप लोहे का बनाया गया। एकदम नए ढंग से बनाई गई इस गाड़ी के पहिये का व्यास तो परम्परागत गाड़ी जितनी ही है लेकिन गोलाकार धुरी से जुड़े कोणों से बनाया गया है। पहिये में अलग-अलग धुरियाँ हैं। बलवान नामक इस मॉडल में सामान लादने के लिये 30 वर्गफुट स्थान रखा गया जबकि परम्परागत गाड़ियों में यह सिर्फ दस वर्गफुट ही है। इस नए मॉडल में चेसिक के नीचे जो बियरिंग ब्लॉक लगाया गया है वह आसानी से झटके सह लेता है। इसमें स्टब एक्सल का प्रयोग भी हुआ है। गाड़ी का ढाँचा इस ढंग से बनाया गया है कि उसे गाड़ी की लम्बाई के हिसाब से व्यवस्थित किया जा सकता है। गाड़ी के पहिये में सपोर्टर खास तौर से लगाए गये हैं। ये सपोर्टर अधिकांश भार को सीधा अपने ऊपर वहन कर लेते हैं। इस बैलगाड़ी में ब्रेक की भी व्यवस्था की गई है। यह बैलगाड़ी की भार-क्षमता परम्परागत गाड़ियों से दोगुनी है। इसकी मरम्मत आदि पर खर्च भी न के बराबर होता है। गति को बढ़ाने के लिये इसके पहियों पर रबड़ चढ़ाई गई है। इससे सड़क को नुकसान नहीं पहुँचता है।

इधर ग्रामलक्ष्मी नाम की एक विकसित बैलगाड़ी हाल ही में सामने आई है। पिछले दिनों भारत सरकार के जहाजरानी मंत्रालय की प्रेरणा से पूर्ण रूप से इस्पात से बनाई गई इन गाड़ियों का प्रदर्शन भारतीय प्रबंध संस्थान, बंगलुरु की विज्ञान प्रौद्योगिकी शाखा ने एक कृषि मेले में किया था। इसमें दो बैलों के स्थान पर एक ही बैल से काम चलाया जा सकता है। इस गाड़ी में भी ब्रेक की व्यवस्था है। यह दोगुना माल ढो सकती है।

नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ट्रेनिंग इन इंजीनियरिंग (नाइटी), बम्बई ने ऐसा उपकरण बनाया है जिससे रहट के साथ बैल के घूमने पर विद्युत-धारा उत्पन्न होती है। उस उपकरण से दो बैल एक हार्स-पावर अर्थात 786 वाट बिजली लगातार पैदा करते हैं।

भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने नैरोबी में 10 अगस्त, 81 को हुए अन्तरराष्ट्रीय ऊर्जा सम्मेलन में स्वीकार किया था कि हमारे बिजली घरों, जिनकी अधिष्ठापित क्षमता 22 हजार मेगावाट है, से अधिक ऊर्जा हमारे बैल प्रदान करते हैं। यदि उनको हटा दिया जाये तो बिजली उत्पादन पर कृषि-अर्थव्यवस्था को गोबर की खाद और कंडे के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले सस्ते ईंधन की हानि होगी।

1993 में लगाये गये एक अनुमान के अनुसार भारत में एक हजार मेगावाट बिजली के उत्पादन की लागत लगभग एक हजार करोड़ रुपये आ रही हैं। 5 मार्च, 1994 को आयोजित पशु ऊर्जा सम्मेलन में भारत के कृषि मंत्री बलराम जाखड़ का कहना था कि देश में 7 करोड़ 40 लाख बैलों और 80 लाख भैंसे प्रतिवर्ष 10 हजार करोड़ रुपये की चार हजार करोड़ हॉर्सपावर ऊर्जा प्राप्त होती है।

वैदिक वांगमय में शिव शब्द कल्याण का पर्याय है। भगवान शिव भक्ति ज्ञान, वैराग्य एवं लोककल्याण की साक्षात मूर्ति है। लोककल्याण की भावना अर्थात शिव का ब्रह्माविद्यास्वरूप माँ पार्वती वरण करती हैं। दोनों के सान्निध्य से गणेश जी अर्थात लोककल्याण के कार्य में निर्विघ्नता का प्रादुर्भाव होता है। कामधेनु के वत्स नन्दी जी काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, रागद्वेष एवं अहंकार से विरत रहकर जीवनभर लोककल्याणरत रहते हैं। अर्थात भगवान शिव का वहन करते हैं, उनके वाहन हैं।

साभार - विज्ञान भारती

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