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राजस्थान की अर्थव्यवस्था

Author: 
केसर सिंह
Source: 
योजना, 30 सितम्बर 1993

राज्य में सीमित साधनों तथा अकाल व बाढ़ जैसे प्राकृतिक आपदाओं का सामना करते हुए, विकास का अनवरत प्रयास किया है। राज्य को विशेष आवश्यकताओं, अर्थव्यवस्था की क्षमता एवं विकास में आ रही प्रमुख बाधाओं को दृष्टिगत रखने के साथ ही साथ, सामाजिक एवं आर्थिक स्तर पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। यह राजस्थान ही है, जहाँ देश की जनसंख्या के पाँच प्रतिशत भाग को, देश के जल संसाधनों के मात्र एक प्रतिशत से ही काम चलाना पड़ता है।

गत साढ़े चार दशकों में 7 पंचवर्षीय योजनाओं एवं अनेक वार्षिक योजनाओं को पूरा कर राज्य आठवीं योजना को पूरा करने में जुटा है। राज्य की अर्थव्यवस्था में अनेक रंग उभरे हैं और आर्थिक एवं सामाजिक पिछड़ेपन को समाप्त करने की दिशा में मजबूती से प्रयास किए गए हैं। किन्तु यदि तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो अन्य राज्यों से विभिन्न क्षेत्रों में, राजस्थान आज भी पिछड़ा हुआ है। इसके मुख्य कारण राष्ट्रीय औसत की तुलना में प्रति व्यक्ति योजना व्यय में कमी, वित्तीय स्रोतों की कमी और राष्ट्रीय विनियोजन में राज्य का 2 प्रतिशत से कम हिस्सा है।

प्रतिकूल भौगोलिक परिस्थितियों वाले इस राज्य का क्षेत्रफल की दृष्टि से द्वितीय स्थान है, किन्तु इसका 61 प्रतिशत भू-भाग मरुस्थलीय है। राज्य में मानसून सबसे अन्त में प्रवेश करता है, साथ ही वर्षा की अनिश्चितता एवं कमी भी अर्थव्यवस्था के मार्ग को अवरुद्ध कर देती है। राजस्थान का क्षेत्रफल देश के कुल क्षेत्रफल का 10.4 प्रतिशत, जनसंख्या 5 प्रतिशत एवं बोया गया क्षेत्र 10.6 प्रतिशत है, वहीं जल संसाधनों की उपलब्धता मात्र एक प्रतिशत है।

आठवीं योजना का आकार


राज्य के विकास की गति को बढ़ाने के लिये आवश्यक है कि योजनाओं का आकार आवश्यकता के अनुरूप हो। पिछली वार्षिक योजनाएँ इस दिशा में आशा की किरण हैं, जहाँ 1991-92 की वार्षिक योजना 1166 करोड़ रुपये की थी जो पिछली योजना के मुकाबले 22 प्रतिशत अधिक थी वहीं 1992-93 में 1400 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया जो गत तीन वर्षों में 76 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। इस प्रकार आठवीं योजना के दौरान राज्य की वार्षिक योजना में लगभग 25 प्रतिशत से अधिक वृद्धि हो सकेगी। आठवीं पंचवर्षीय योजना में 11 हजार 50 करोड़ रुपये का आकार निर्धारित किया गया है जो राज्य की आकांक्षाओं एवं अपेक्षाओं के अनुरूप है।

राज्य की अर्थव्यवस्था जो कुछ वर्षों पूर्व एक स्थिर एवं गतिविहीन अर्थव्यवस्था कहलाती थी। इसके मुख्य कारण राज्य का निरंतर सूखे व अकाल की चपेट में रहना। उद्योगों की आधारभूत आवश्यकताओं तथा बिजली, पानी, परिवहन, विपणन आदि सुविधाओं की कमी, शिक्षा का ग्राफ अन्य राज्यों के मुकाबले काफी निम्न, स्वास्थ्य सेवाओं का अपेक्षानुरूप न होना व निरंतर जनसंख्या वृद्धि रहा है। यह कहना कि राजस्थान के विकास की गति मंथर है बेमानी होगा क्योंकि वर्तमान में अर्थव्यवस्था ने विकास का नया मार्ग चुना है। विभिन्न क्षेत्रों का विश्लेषण करने से यह स्पष्ट होता है।

कृषि का राज्य की अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण स्थान है। राजस्थान खाद्यान्न उत्पादन में, आत्मनिर्भरता के राष्ट्रीय लक्ष्य से अधिक उत्पादन करने वाले राज्यों में है। खाद्य तेल के उत्पादन में राज्य में नई छलांग लगाई है। ‘‘तिलम संघ’’ की स्थापना इस क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। वर्ष 1990-91 में 23.53 लाख टन तिलहन का उत्पादन रहा, वहीं 1991-92 में 28.00 लाख टन उत्पादन हुआ। खाद्यान्न उत्पादन जहाँ 1950-51 में 29.5 लाख टन था, वह 1990-91 में बढ़कर 109.52 लाख टन ही रहा। किन्तु 1992-93 में उत्पादन में पर्याप्त वृद्धि के संकेत हैं। कृषि विकास के लिये विश्व बैंक ने 400 करोड़ रुपये की एक महत्त्वपूर्ण परियोजना स्वीकृत की है, साथ ही राजस्थान सरकार ने भी विस्तृत दीर्घकालीन कृषि नीति का प्रारूप तैयार किया है।

सिंचाई क्षेत्र


खाद्यानों के उत्पादन में भारी उतार चढ़ाव को रोकने का एक मात्र रास्ता है, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार। सिंचाई के क्षेत्र में जीवनदायिनी इन्दिरा गाँधी नहर के आगमन से थार के रेगिस्तान में भी हरियाली लहरायी है। वर्ष 1991-92 में सिंचाई व बाढ़ नियंत्रण योजना के तहत 214 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं। राज्य का यह प्रयास रहा है कि आन्तरिक स्रोतों के साथ ही साथ, अन्तरराज्यीय स्रोतों में से राज्य के हिस्से का भी प्रयोग किया जा सके। इस संदर्भ में नोहर एवं सिद्धमुख परियोजनाएँ जो लम्बे समय से लंबित पड़ी थीं, इन्हें स्वीकृति देने के बाद विदेशी सहायता हेतु आगे बढ़ाया गया है। इसी प्रकार नर्मदा परियोजना को 548 करोड़ रुपये के बजट के साथ, विदेशी सहायता हेतु प्रस्तावित किया गया है। जर्मनी से लघु सिंचाई परियोजनाओं के लिये धन का प्रस्ताव प्राप्त हुआ है। सूखा विकास कार्यक्रम के तहत भी कई परियोजनाएँ स्वीकृत हुई हैं।

वनों का क्षेत्रफल


राज्य के कुल भूभाग का 9 प्रतिशत भाग ही वन भूमि है। वास्तव में 3 प्रतिशत भूमि सघन वन से आच्छादित है। वनों का क्षेत्रफल भी राष्ट्रीय औसत से कम है। इस असंतोषजनक स्थिति से निपटने के लिये सरकार ने बीस सूत्री कार्यक्रम के तहत वृक्षारोपण और 1991-92 में ‘हरित राजस्थान कार्यक्रम’ प्रारम्भ किए हैं। 107.65 करोड़ रुपये की परियोजना इंदिरा गाँधी नहर परियोजना के आस-पास के क्षेत्र के वृक्षारोपण के लिये स्वीकृत हुई है। इसी प्रकार अरावली पहाड़ियों पर वन संरक्षण व विकास की योजना बनाई गई है। इसी प्रकार सम्भावित भूमि विकास कार्यक्रम के तहत, सात जिलों में 2,528.15 लाख रुपये की परियोजनाएँ भारत सरकार ने स्वीकृत की है।

बिजली


राज्य में 1950-51 में विद्युत स्थापित क्षमता 8 मेगावाट थी, जो सातवीं योजना के अंत में लगभग 2,700 मेगावाट हो गई। बिजली आधारभूत आवश्यकता है। शक्ति के साधनों की अपर्याप्तता अर्थव्यवस्था को पंगु बना देती है। इस क्षेत्र में राज्य ने विशेष प्रयास किए हैं। वर्ष 1990-91 में जहाँ 11,144 लाख यूनिट बिजली उपलब्ध थी, वहीं 1991-92 में बढ़कर 12,313 लाख यूनिट हो गई। वर्ष 1991-92 के दौरान राज्य विद्युत मंडल के विकास के लिये 313.31 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया। वर्ष 1992-93 में यह बढ़कर 372.91 करोड़ हो गया। कोटा थर्मल पावर की क्षमता 40 प्रतिशत से बढ़ाकर 63 प्रतिशत कर दी गई। सूरतगढ़ थर्मल पावर परियोजना इस वर्ष प्रारम्भ की गई। साथ ही बरसिंहसर लिग्नाइट थर्मल पावर परियोजना, नेवेली लिग्नाइट कॉरपोरेशन की मदद से विद्युत उत्पादन की अपर्याप्तता को दूर करने के लिये प्रारम्भ की गई। धौलपुर परियोजना, जो पर्यावरण की दृष्टि से अनुचित मानकर रद्द कर दी गई थी, उसे स्वीकृति मिल गई है। आठवीं योजना में विद्युत क्षेत्र पर 3,255.49 करोड़ रुपये (28.31 प्रतिशत) का प्रावधान है।

उद्योग एवं खनिज


राजस्थान में औद्योगिक विकास की वृहद सम्भावनाएँ हैं। इस क्षेत्र में राज्य निरंतर प्रगति कर रहा है। 1949 में पंजीकृत उद्योगों की संख्या जहाँ 207 थी, वहाँ 1988 के अन्त में 10,509 हो गई है। राज्य के कृषि प्रधान होते हुए भी, कृषि आधारित उद्योगों का पर्याप्त विकास नहीं हुआ है। साथ ही खनिजों में राज्य, 8 धात्विक और 25 अधात्विक खनिजों के उत्पादन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। भारत के कुल जिप्सम का 94 प्रतिशत, एस्बेस्टोस का 83 प्रतिशत फेल्सपार का 68 प्रतिशत और चाँदी का 76 प्रतिशत यहीं से प्राप्त होता है। प्राकृतिक संसाधनों की समृद्धि के बावजूद कुछ बाधाओं के कारण पर्याप्त वृद्धि नहीं हो पाई है। राजस्थान में घाटारू नामक स्थान पर प्राकृतिक गैसों के भंडार मिले हैं। इसका प्रयोग शक्तिगृह स्थापित करने, लघु उद्योगों के लिये व खाना पकाने की गैस के लिये हो सकता है। राजस्थान की औद्योगिक नीति, राजस्थान के औद्योगीकरण के उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करती है। मशीन तथा संयंत्र पर 60 से 75 लाख रुपये तक के विनियोग के निर्यात सम्बन्धी उद्योगों को प्रोत्साहन, रोजगारोन्मुखी उद्योगों, खादीग्रामोद्योग, हस्तशिल्प, हथकरघा तथा चर्म उद्योग जैसे लघुतम उद्योगों को प्राथमिकता दी गई है। पर्यटन को उद्योग का दर्जा दिया गया है। नई औद्योगिक इकाइयों को 300 के.बी.ए. तक बिजली की कटौती से मुक्त रखा गया है। लघु एवं वृहद उद्योगों को 15 से 20 प्रतिशत तक अनुदान तथा इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग को बिक्रीकर में 100 प्रतिशत छूट का प्रावधान है। राज्य सरकार ने बीमार उद्योगों को फिर चालू करने के निर्णय के साथ ही, ऐसे उद्योगों को विद्युत कटौती से मुक्त एवं न्यूनतम विद्युत शुल्क वसूल करने का निर्णय किया है।

रेगिस्तानी क्षेत्र होने के कारण परिवहन के साधनों का विकास भी राज्य में अपेक्षानुरूप नहीं हो पाया। सड़क और रेल लाइनों का मिट्टी में दब जाना या उखड़ जाना जैसे कारण प्रमुख रहे हैं। परिवहन पर प्रथम पंचवर्षीय योजना में 5.55 करोड़ रुपये खर्च किए गए। वहीं सातवीं योजना के अंत में 142.48 करोड़ रुपये इस पर खर्च हुए। राज्य सरकार ने ग्रामों को सड़क से जोड़ने के महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम हाथ में लिये हैं। आठवीं योजना में यातायात के लिये 783.97 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। राजस्थान में सड़कों की लम्बाई 5,51,231 किलोमीटर है, 2,521 किलोमीटर लम्बा राष्ट्रीय राजमार्ग है। रेल परिवहन के क्षेत्र में भारत सरकार ने राज्य की 1,071 किलोमीटर गेज लाइन को ब्राड गेज लाइन में बदलने की महत्त्वपूर्ण घोषणा की, जो राजस्थान की अर्थव्यवस्था के विकास को नए आयाम प्रदान करने में सहायक होगी।

राज्य में शिक्षा


राजस्थान में शिक्षा का प्रतिशत 38.81 है, जो राष्ट्रीय औसत 52.11 से कम है। साथ ही स्त्री साक्षरता में राजस्थान का स्थान सबसे नीचे है, जो 20.84 प्रतिशत है। 1981-91 के दशक में शिक्षा में 8.72 प्रतिशत की वृद्धि रही है। 1991-92 में 1,315 प्राथमितक विद्यालय ग्रामीण क्षेत्रों में खोले गए। वर्ष 1992-93 में 1,000 प्राथमिक विद्यालय खोले गए। उच्च शिक्षा पर भी पर्याप्त ध्यान दिया गया। शिक्षा के विकास के लिये भाभा शाह योजना, ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड, सीमा क्षेत्र शैक्षिक विकास कार्यक्रम, लोक जुम्बिश जैसे कार्यक्रम राज्य में चलाए जा रहे हैं।

स्वास्थ्य सेवा


राज्य ने चिकित्सा क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण प्रगति की है। सभी पंचायत समितियों में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र स्थापित कर दिए गए हैं। राजस्थान में अस्पतालों की संख्या 1,454 है। 10,587 चिकित्सा संस्थान, राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं में कार्यरत हैं। सन 1989-90 में बिस्तरों की संख्या 28,867 थी, वह बढ़कर दिसम्बर 1992 में 32,178 हो गई। राज्य सरकार ने सन 2000 तक सभी को स्वास्थ्य सुविधाएँ लक्ष्य प्राप्त करने का प्रयास किया है। परिवार नियोजन कार्यक्रम को भी पंचायत स्तर पर लागू कर प्रभावोत्पादक बनाया गया है।

पर्यटन विकास


पर्यटन मानचित्र पर, राजस्थान एक विशिष्ट स्थान रखता है। पर्यटन विकास की सम्भावनाओं को ध्यान में रखकर ही, इसे उद्योग का दर्जा दिया गया है। जहाँ राज्य की योजनानुसार 1990-91 में 135.23 करोड़ रुपये खर्च किए गए, वहीं केन्द्र सरकार से 244.41 लाख रुपये स्वीकृत किए गए। राजस्थान की 1990 में जहाँ (4,17,641 विदेशियों को मिलाकर) 41,52,815 पर्यटकों ने यात्रा की वहीं 1991 में 47,95,007 (4,94,150 विदेशी) पर्यटकों ने पर्यटन का लाभ उठाया। नई ‘पेइंग गेस्ट योजना’ आरम्भ की गई है। पर्यटन सलाहकार बोर्ड की स्थापना के साथ ही, विश्व विख्यात ‘पैलेस ऑन व्हील्स’ गाड़ी की रोमांचक यात्रा प्रारम्भ की गई। राजपुतानों की इस भूमि को पर्यटन का स्वर्ग बनाने के भगीरथ प्रयास जारी हैं एवं राज्य की अर्थव्यवस्था में इसका योग बढ़ रहा है।

ग्रामीणा विकास


गाँव, गरीब और विकास ये तीन ऐसे आधार बिन्दु हैं जिन्हें मिलाकर ही विकास का त्रिभुज बनाया जा सकता है। राज्य का आधे से भी अधिक बजट, इसी त्रिभुज की उन्नति के लिये खर्च किया जा रहा है। योजनाओं में ग्रामीणों की सहभागिता के प्रयास किए गए हैं।। राजस्थान पंचायत संशोधन अध्यादेश 1992 इसका ज्वलंत उदाहरण है। अन्त्योदय, अपना गाँव अपना काम, तीस जिले तीस काम, पशुधन के लिये गोपाल योजना, शिल्पबाड़ी व्यवस्था, बाल्मीकि ग्राम, जवाहर रोजगार योजना, इन्दिरा आवास योजना, जीवनधारा, एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम, ट्राइसेम एवं बीस सूत्री कार्यक्रम के माध्यम से ग्रामों के बहुमुखी विकास की कहानी गूंथी गई है। आठवीं पंचवर्षीय योजना में, ग्रामीण विकास पर 1021.75 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

पेयजलापूर्ति


इसी प्रकार, जयपुर से लेकर रेगिस्तान के सुदूर अंचलों तक पेयजलापूर्ति के लिये भी विशेष प्रयास किए गए हैं। विदेशी सहायता से कई परियोजनाओं को सहायता प्राप्त हुई है। बड़े शहरों जोधपुर, जयपुर, उदयपुर आदि के लिये योजनाएँ बनाई गई हैं। एवं मरुभूमि को विभिन्न परियोजनाओं यथा इन्दिरा गाँधी नहर परियोजना, बीसलपुर बाँध परियोजना, फ्लोरीकृत क्षेत्रों में पेयजल योजना आदि के माध्यम से पेयजल उपलब्ध कराए जाने के प्रयास किए गए हैं। साथ ही रेगिस्तान की रोकथाम के प्रयास किए हैं और सूखा सम्भावित क्षेत्र के विकास की दिशा में भी कारगर कदम उठाए गए हैं। आठवीं योजना में इस कार्यक्रम पर 5 अरब 38 करोड़ रुपये से अधिक राशि व्यय करने का प्रावधान है।

राज्य में सीमित साधनों तथा अकाल व बाढ़ जैसे प्राकृतिक आपदाओं का सामना करते हुए, विकास का अनवरत प्रयास किया है। राज्य को विशेष आवश्यकताओं, अर्थव्यवस्था की क्षमता एवं विकास में आ रही प्रमुख बाधाओं को दृष्टिगत रखने के साथ ही साथ, सामाजिक एवं आर्थिक स्तर पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। यह राजस्थान ही है, जहाँ देश की जनसंख्या के पाँच प्रतिशत भाग को, देश के जल संसाधनों के मात्र एक प्रतिशत से ही काम चलाना पड़ता है। ऊर्जा विकास के सीमित साधनों के उपलब्ध होने के बावजूद, राजस्थान ने ऊर्जा उत्पादन में महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया है। यदि साधनों में वृद्धि के केन्द्र सरकार द्वारा ईमानदारी से प्रयास किए गए, विश्व बैंक और विदेशी संस्थाओं का सहयोग पिछले वर्षों की भाँति प्राप्त हुआ तो अर्थव्यवस्था के सुधार में नई दिशा मिलेगी।

टी-33 प्राध्यापक आवास, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर (राजस्थान) 302004

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