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ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नींव मजबूत करने वाला बजट

Author: 
भुवन भास्कर
Source: 
कुरुक्षेत्र, मार्च 2017

ऐसा कम ही होता है कि देश के कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से सरोकार रखने वाले लोग आम बजट को लेकर उत्साहित हों। लेकिन इस साल का आम बजट 2017-18 इस मामले में एक अपवाद था। सरकार ने पिछले बजट में किसानों और खेती को लेकर जिस तरह कई नई योजनाओं की घोषणा की थी और जिस तरह मूलभूत कृषिगत ढाँचे को सुधारने के लिये कई पहल की थी, उसके मद्देनजर यह माना जा रहा था कि वर्ष 2107-18 के बजट में ग्रामीण भारत केंद्रीय विषय होगा। और इस दृष्टि से देखा जाये तो एक फरवरी, 2017 को पेश बजट वाकई कई मायनों में खेती-किसानी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव छोड़ने वाला साबित होगा।

फंड आवंटन: एक नजर में


सरकार ने इस बजट में ग्रामीण विकास पर 1,87,223 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रावधान किया है। इसमें से 58663 करोड़ रुपये कृषि और सम्बन्धित गतिविधियों पर खर्च किये जायेंगे, जोकि चालू वित्तवर्ष के संशोधित बजटीय प्रावधान से 5842 करोड़ रुपये अधिक हैं। इसके अलावा ग्रामीण विकास पर 1,28,560 करोड़ रुपये खर्च करने की योजना है। चालू वित्तवर्ष के संशोधित बजटीय प्रावधान से यह 13,613 करोड़ रुपये ज्यादा हैं। यह साफतौर पर सरकार की प्राथमिकताओं में ग्रामीण भारत के महत्त्व को इंगित करता है और 2022 तक किसानों की आमदनी को दोगुना करने के सरकार के लक्ष्य को पूरा करने की दिशा में संसाधनों की प्रचुरता सुनिश्चित करने के लिहाज से एक अहम कदम है।

किसानों को कृषि कार्यों के लिये दिये जाने वाले कर्ज का प्रावधान भी चालू वित्तवर्ष के 9 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 10 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है। पिछले आम बजट में पहली बार सरकार ने महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत स्थायी निर्माण कार्य कराने पर जोर दिया था और इसके तहत मार्च 2017 तक 5 लाख तालाबों के निर्माण का लक्ष्य रखा था। वित्तमंत्री श्री अरुण जेटली ने अपने बजट भाषण में बताया कि मार्च 2017 तक मनरेगा के तहत 5 लाख की जगह कुल 10 लाख तालाब तैयार कर लिये जायेंगे और अगले साल भर में एक बार फिर 5 लाख तालाब खोदने का लक्ष्य रखा गया। वित्तमंत्री ने यह भी बताया कि 2017-18 के लिये मनरेगा के तहत 48,000 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रावधान किया गया है, जो अब तक इस योजना के तहत किया गया सबसे ज्यादा आवंटन है। चालू साल के लिये यह प्रावधान 38,500 करोड़ रुपये था। हालाँकि संशोधित बजट में इसे बढ़ाकर 47499 करोड़ रुपये कर दिया गया था। इस लिहाज से देखा जाये तो बजट में केवल 501 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ है।

इन तमाम खर्चों और अच्छे मानसून के आधार पर सरकार यह उम्मीद कर रही है कि कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर चालू वित्तवर्ष में 4.1 प्रतिशत तक रहने की उम्मीद है। जाहिर है कि 2022 तक किसानों की आमदनी को दोगुना करने का लक्ष्य तब तक हासिल नहीं किया जा सकता, जब तक कृषि, इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश, रोजगार इत्यादि जैसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विभिन्न हिस्सों की वृद्धि दर में पर्याप्त तेजी नहीं आती। अर्थशास्त्र के मूलभूत नियम के मुताबिक वृद्धि दर का सीधा सम्बन्ध पूँजी निर्माण (कैपिटल फॉर्मेशन) पर निवेश की दर से है और इसीलिये सरकारी लक्ष्यों की गम्भीरता को परखने के लिये खर्च की प्रकृति को समझना आवश्यक है। आइये, देखते हैं कि इस लिहाज से 2017-18 के बजट से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कितने बदलाव की उम्मीद की जा सकती है।

बुनियादी ढाँचा


ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बदलाव की शुरुआत उसके बुनियादी ढाँचे से ही हो सकती है। इस लिहाज से मोदी सरकार ने सत्ता में आने के तुरंत बाद से प्रयास शुरू कर दिये थे और सड़क व बिजली को इस विकास के केंद्र में रखा गया था। इस फोकस के परिणाम भी दिखने शुरू हो गये हैं। अपने बजट भाषण में वित्तमंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत 2016-17 के दौरान प्रतिदिन 133 किलोमीटर सड़कों का निर्माण हुआ है, जोकि 2011-14 के दौरान औसतन महज 73 किलोमीटर था। अगले वित्तवर्ष में इस फोकस को बनाये रखते हुए सरकार ने ग्रामीण सड़कों के निर्माण के लिये 19,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। यह 2012-13 में 8,885 करोड़ रुपये और 2013-14 के दौरान खर्च किये गये 9,806 करोड़ रुपये के दोगुना से भी ज्यादा है। इसी तरह, केंद्र सरकार 100 प्रतिशत गाँवों के विद्युतीकरण का अपना लक्ष्य पूरा करने के लिहाज से भी लगातार आगे बढ़ रही है और 2017-18 के बजट में श्री जेटली ने भरोसा दिलाया है कि 1 मई 2018 तक यह लक्ष्य पूरा कर लिया जायेगा। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 2017-18 के दौरान 29043 करोड़ रुपये खर्च किये जायेंगे, जोकि पिछले वित्तवर्ष से 8107 करोड़ रुपये अधिक हैं। सरकार 2019 तक कच्चे घरों में रहने वाले और बेघर करीब एक करोड़ लोगों को आवास मुहैया कराना चाहती है। साफ है कि सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था के मूलभूत क्षेत्रों की वृद्धि दर में तेजी लाना चाहती है।

कृषि: कृषि को लेकर 2017-18 के आम बजट में कई घोषणाएँ और प्रावधान किये गये हैं। इनमें कुछ तो सब्सिडी और जोखिम प्रबंधन के मद में हैं और कुछ निवेश के मद में। जहाँ सिंचाई, किसानों के लिये मार्केटिंग लिंकेज का निर्माण इत्यादि पूँजीगत निवेश की श्रेणी में डाले जा सकते हैं, वहीं खाद सब्सिडी, खाद्य सब्सिडी, फसल बीमा योजना इत्यादि को सब्सिडी और जोखिम प्रबंधन की श्रेणी में रखा जायेगा। किसानों की आमदनी बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिये इन मदों पर हुई घोषणाओं को समझना जरूरी है।

सिंचाई: चालू वित्तवर्ष में कृषि क्षेत्र में 4.1 प्रतिशत तक वृद्धि की उम्मीद है। इस सफलता के पीछे एक बड़ा कारण 2016 में मानसून का सामान्य रहना है, जिसके कारण जहाँ बुवाई के रकबे में 3.5 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गई, वहीं उत्पादकता भी 0.6 प्रतिशत बढ़ी। इससे सरकार को कृषि वृद्धि दर सुनिश्चित करने के लिये सिंचाई के महत्त्व का भी पता चल गया है और इसलिये इस बजट में इससे सम्बन्धित कुछ अहम घोषणाएँ की गई हैं। पिछले बजट में नाबार्ड के तहत सिंचाई के लिये बनाये गये लम्बी अवधि के 20,000 करोड़ रुपये के कोष (लाँग टर्म इरीगेशन फंड) में 20,000 करोड़ रुपये और जोड़कर इसे 40,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है।

इक्रियर में कृषि के लिये इंफोसिस चेयर प्रोफेसर डॉ. अशोक गुलाटी के मुताबिक नाबार्ड इस साल मार्च अंत तक इस कोष में 15,000 करोड़ रुपये जुटा लेने के लिये आश्वस्त है और उनके मुताबिक नाबार्ड ने पहले ही 36,000 करोड़ रुपये की योजनाओं की स्वीकृति दे दी है, जिसके लिये अब बाजार से फंड जुटाये जाने की जरूरत है। लाँग टर्म इरीगेशन फंड के अलावा ‘हर बूँद से ज्यादा फसल’ लेने के प्रधानमंत्री के नारे को जमीन पर उतारने के लिये 5000 करोड़ रुपये से नाबार्ड के तहत एक समर्पित सूक्ष्म सिंचाई कोष की भी शुरुआत की गई है। इसमें यदि प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत चल रही विभिन्न योजनाओं के लिये आवंटित 7,160 करोड़ रुपये भी जोड़ दिये जायें, देशभर में सिंचाई इंफ्रास्ट्रक्चर के खाते में कुल 52,000 करोड़ रुपये से ज्यादा आये हैं, जो सरकार के नेक इरादे दर्शाता है। इसे सही दिशा में किया जा रहा एक बेहतरीन प्रयास माना जाना चाहिये, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुखद बदलाव की नींव रखेगा।

मार्केंटिंग: ई-नाम सरकार की एक अति महत्त्वाकांक्षी योजना है, जिसकी शुरुआत 14 अप्रैल, 2016 को हुई। बजट भाषण में श्री जेटली ने एक बार फिर ई-नाम यानी इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार के तहत मार्च 2018 तक 585 मंडियों को शामिल करने के लक्ष्य को दोहराया। सरकार ई-नाम के जरिये पूरे देश के कृषि बाजारों को इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म पर लाना चाहती है और एक बार इसके पूरी तरह लागू हो जाने के बाद देश के किसी भी एक हिस्से में बैठा कारोबारी देश के किसी भी दूसरे हस्से की किसी मंडी में आने वाली फसल के बारे में कम्प्यूटर के एक क्लिक से सारी जानकारी हासिल कर सकेगा और वहीं से बोलियाँ भी लगा सकेगा। यही नहीं, इन मंडियों में नापतोल के लिये पूरी तरह इलेक्ट्रॉनिक मशीनों का इस्तेमाल होगा, किसानों को उसी दिन शाम तक सीधे खाते में भुगतान हासिल हो सकेगा और बोलियों की कीमतें पूरी तरह पारदर्शी होंगी। कर्नाटक में इसी अवधारणा के साथ पिछले दो सालों से ज्यादा से एकीकृत बाजार प्लेटफॉर्म (यूएमपी) सफलतापूर्वक काम कर रहा है, जिसे कमोडिटी एक्सचेंज एनसीडीईएक्स और कर्नाटक सरकार बराबर भागीदारी वाली एक कम्पनी राष्ट्रीय ई-मार्केट्स लिमिटेड (आरईएमएस) के जरिये चला रहे हैं।

लेकिन इस मॉडल के पूरी तरह सफल होने के लिये फसलों के मानकीकरण (स्टैंडर्डाइजेशन) पर काम करने की जरूरत है ताकि व्यापारी फसल को बिना देखे या बिना छुए उसकी गुणवत्ता के बारे में आश्वस्त हो सकें। इसके लिये देश भर में फसलों की क्लीनिंग और ग्रेडिंग का बुनियादी ढाँचा विकसित करने की जरूरत पड़ेगी। सरकार ने पहली बार इस महत्त्वपूर्ण मसले पर ध्यान देते हुये 2017-18 के आम बजट में ई-नाम में शामिल हर मंडी को 75 लाख रुपये देने की घोषणा की है, जिससे किसानों को क्लीनिंग और ग्रेडिंग की सुविधा दी जायेगी। यह एक स्वागत योग्य घोषणा है लेकिन जिन 250 से ज्यादा मंडियों को अब तक ई-नाम में जोड़ा जा चुका है, वहाँ भी अब तक इसका पूरा फायदा किसानों को नहीं मिल पा रहा है। नई मंडियों को जोड़ने के साथ ही सरकार को जुड़ चुकी मंडियों की व्यवस्था को दुरुस्त करने और किसानों को उनका पूरा फायदा मिले, यह सुनिश्चित करने की भी जरूरत है।

 

बजट 2017-18 का एजेंडा


- वर्ष 2017-18 का एजेंडा है: टेक इंडिया यानी ‘ट्रांसफार्म, एनर्जाइज एंड क्लीन इंडिया’।


टेक इंडिया के उद्देश्य


- शासन की गुणवत्ता और जनता के जीवन-स्तर को बदलना।


- समाज के विभिन्न वर्गों विशेषतः युवकों और कमजोर तबकों में ऊर्जा का संचार करना और उन्हें उनकी क्षमता से परिचित कराना; और


- देश में भ्रष्टाचार, काला धन और अपारदर्शी राजनीतिक फंडिंग की बुराइयों को समाप्त करना।


इस व्यापक एजेंडे को चलाने के दस विशिष्ट स्तम्भ


- किसान : 5 वर्षों में आय दोगुना करने के लिये प्रतिबद्ध;


- ग्रामीण आबादी : रोजगार और बुनियादी अवसंरचना मुहैया कराना;


- युवा : शिक्षा, कौशल और रोजगार के जरिये ऊर्जा का संचार करना;


- गरीब तथा विशेष सुविधाओं से वंचित वर्ग : सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और किफायती आवास की प्रणाली को मजबूत करना;


- अवसंरचना : कारगरता, उत्पादकता और जीवन-स्तर के लिये;


- वित्तीय क्षेत्र : मजबूत संस्थाओं के द्वारा विकास और स्थिरता;


- डिजिटल अर्थव्यवस्था : गति, उत्तरदायित्व और पारदर्शिता हेतु;


- सार्वजनिक सेवा : जनता की भागीदारी के जरिये कारगर शासन और कारगर सेवा सुपुर्दगी;


- विवेकपूर्ण राजकोषीय प्रबंधन : संसाधनों का इष्टतम नियोजन सुनिश्चित करना और राजकोषीय स्थिरता बनाये रखना;


- कर प्रशासन : ईमानदारों का आदर करना।

 

 
बीमा: पिछले साल घोषित प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत शामिल रकबे का लक्ष्य चालू साल के 30 प्रतिशत से बढ़ाते हुये 2017-18 में 40 प्रतिशत और 2018-19 में 50 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिये बजट में 9000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जोकि लक्ष्य के हिसाब से काफी कम है। बजट 2016-17 के दौरान इस मद में 5,500 करोड़ रुपये आवंटित किये गये थे, लेकिन कुल खर्च 13,500 करोड़ रुपये होने की सम्भावना है। इक्रियर के डॉ. गुलाटी का दावा है कि इस साल भी यह रकम 25 से 33 प्रतिशत कम पड़ सकती है। जाहिर है इसके लिये साल के दौरान सरकार को और रकम का प्रावधान करना पड़ेगा, जिसके बिना यह लक्ष्य हासिल कर पाना मुश्किल है। जिस देश में 65 प्रतिशत खेत सिंचाई के लिये मानसून पर निर्भर हो, और लू, ओला, आँधी जैसी प्राकृतिक आपदाएँ तलवार के समान हमेशा किसानों की महीनों की मेहनत पर पानी फेरने को तैयार रहती हो, वहाँ प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। लेकिन यहाँ सबसे बड़ा मसला क्रियान्वयन का है।

किसानों के लिये चलने वाली किसी बीमा योजना की सफलता को मापने के दो मानदंड हैं। पहला, योजना के तहत शामिल किसान और खेतों का रकबा और दूसरा, नुकसान के दावे का निपटारा। पीएमएफबीवाई से पहले किसानों की फसल राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एनएआईएस) और संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एमएनएआईएस) के तहत कवर होती थी। यदि खरीफ 2015 मौसम के आँकड़े देखें, तो उस वक्त एनएआईएस और एमएनएआईएस में शामिल किसानों की कुल संख्या 3.09 करोड़ थी और इसमें 3.39 करोड़ हेक्टेयर जमीन कवर हुई थी। यह हाल के कई वर्षों के दौरान सबसे कम बारिश वाला साल था, जिसमें पूरा देश सूखे से बुरी तरह प्रभावित हुआ था। फिर फरवरी 2016 में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना आरम्भ हुई। पीआईबी द्वारा 7 दिसम्बर, 2016 को जारी रिलीज के मुताबिक खरीफ 2016 मौसम के दौरान इसमें शामिल होने वाले किसानों की संख्या पिछले मौसम के मुकाबले 18.5 प्रतिशत बढ़कर 3.66 करोड़ तक पहुँच गई जो देश में मौजूद कुल किसानों की एक-चौथाई से ज्यादा (26.5 प्रतिशत) है। इसी तरह 2016 खरीफ के दौरान पीएमएफबीवाई के तहत कवर जमीन का रकबा भी 15 प्रतिशत बढ़कर 3.88 करोड़ हेक्टेयर तक पहुँच गया। और जो सबसे महत्त्वपूर्ण सफलता सरकार को मिली वह थी सुनिश्चित बीमित राशि के मोर्चे पर जहाँ 104 प्रतिशत की शानदार बढ़त दर्ज की गई और यह रकम सालभर पहले के 69,307 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,41,339 करोड़ रुपये तक पहुँच गई। इन आँकड़ों के लिहाज से माना जा सकता है कि अपने पहले ही साल में पीएमएफबीवाई ने कवरेज के लिहाज से जबर्दस्त सफलता हासिल की है। लेकिन क्रियान्वयन के मोर्चे पर तस्वीर इतनी गुलाबी नहीं है।

वैसे तो पिछले साल सामान्य मानसून के कारण कमोबेश खेती की स्थिति ठीक ही रही, लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और असम जैसे कुछ राज्यों में बाढ़ और अतिवृष्टि के कारण किसानों को फसल का नुकसान हुआ। इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (इक्रियर) की रिपोर्ट के मुताबिक इन मामलों में दावे के निपटारे के लिये खुली आँखों से नुकसान का जायजा लिया गया, जबकि ड्रोन की मदद ली जा सकती था। पीएमएफबीवाई के दिशा-निर्देशों में साफ है कि फील्ड अधिकारियों को स्मार्टफोन का इस्तेमाल करना है, जो नहीं हुआ। राज्यों को बीमा कम्पनियों के खाते में प्रीमियम की रकम का अग्रिम भुगतान करना है, लेकिन वह भी नहीं हुआ। इन परिस्थितियों में किसानों को दावे के भुगतान में आंशिक सफलता ही मिली है। पहले साल के इस अनुभव से केंद्र सरकार सीख लेकर अपेक्षित बदलाव करे, तभी बजटीय प्रावधानों और आँकड़ों को जमीनी सफलता में बदला जा सकेगा।

कृषि कर्ज: खेती-किसानी के कामों में किसानों को छोटी अवधि की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिये दिये जाने वाले फार्म क्रेडिट यानी कृषि कर्ज के मद में 10 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। पिछले साल यह 9 लाख करोड़ रुपये था। यह हालाँकि सरकार की ओर से किसानों को सूदखोर महाजनों के चंगुल से बचाने के लिये किया जाने वाला एक अहम प्रयास है, लेकिन इसके साथ ही यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि कृषि कर्ज के लिये लगातार बढ़ते फंड के बावजूद न तो किसानों के हालात में बहुत बदलाव आ रहा है और न ही कर्ज में डूबे किसानों की आत्महत्याओं में। इसका एक प्रमुख कारण सरकारी-तंत्र तक बड़ी संख्या में किसानों की पहुँच न हो पाना है। पिछले कई वर्षों से यह संख्या 65 प्रतिशत तक सीमित है, हालाँकि जनधन योजना की अपार सफलता के बाद इसमें अब बढ़ोत्तरी होने की उम्मीद है। लेकिन इसके लिये आँकड़ों का इंतजार करना होगा। बहरहाल, होता यह है कि सरकार की ओर से आवंटित सब्सिडी वाले कृषि कर्ज (ब्याज दरों में छूट के तौर पर 15,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी) का एक बड़ा हिस्सा बड़े और समृद्ध किसान समेट लेते हैं और फिर उसे उसी बैंक में जमा कर 6 से 8 प्रतिशत का ब्याज हासिल करते हैं। इस व्यवस्था को दुरुस्त करने की जरूरत है। ताकि इस विशाल फंड का इस्तेमाल सच में जरूरतमंद कर सकें। इसी दिशा में आगे बढ़ते हुये सरकार ने 2017-18 के बजट में सभी 63,000 सक्रिय प्राथमिक कृषि क्रेडिट सोसायटीज को जिला सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंकों के कोर बैंकिंग से जोड़ने के लिये नाबार्ड की मदद करने की बात कही है और इसके लिये 3 साल की अवधि तय की है, जिस दौरान इस पर 1900 करोड़ रुपये खर्च होंगे। यह कदम छोटे और सीमांत किसानों के लिये कर्ज हासिल करने को आसान बनायेगा।

इस अहम बुनियादी कदम के साथ ही सरकार को अब लम्बी अवधि के ऐसे कर्ज की भी व्यवस्था करनी चाहिये, जिससे पूँजी निर्माण हो सके क्योंकि ऊपर बताये गये कृषि कर्ज के 80 प्रतिशत का इस्तेमाल छोटी अवधि के फसल कर्ज के तौर पर होता है। वस्तुतः अगर सरकार इस कर्ज का ज्यादा उत्पादक इस्तेमाल करना चाहती है, तो उसे यह व्यवस्था करनी होगी कि किसान ट्रैक्टर और दूसरी परिसम्पत्तियों की खरीद में इसका इस्तेमाल कर सके, जिससे उसकी आमदनी बढ़ाने में ढाँचागत प्रगति होगी।

सब्सिडी और निवेश: यह एक ऐसा मसला है, जिस पर 2017-18 के बजट ने बहुत हद तक निराश किया है। जिस तरह प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी आधार नम्बर से जोड़कर डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर की पैरवी करते रहे हैं, उसे देखते हुए उम्मीद थी कि 70,000 करोड़ रुपये की खाद सब्सिडी और 1,45,339 लाख करोड़ रुपये की खाद्य सब्सिडी के वितरण में सरकार किसी बड़े सुधार का रास्ता दिखायेगी। लेकिन इस मसले पर सरकार ने बजट में पूरी तरह चुप्पी साधी है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करने के लिहाज से यह एक अहम सुधार है, जिसके लिये शायद अब अगले बजट तक इंतजार करना होगा।

वहीं दूसरी ओर सरकार ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, सब मिशन ऑन एग्री एक्सटेंशन और कृषि शोध एवं शिक्षा पर कुल मिलाकर 38,903 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रावधान किया है। दूसरे शब्दों में, आमदनी बढ़ाने के वास्तविक तरीके यानी पूँजी निर्माण के लिये निवेश पर सरकार का खर्च सब्सिडी के मुकाबले में पाँचवे हिस्से से भी कम है। यह अनुपात किसानों की आमदनी दोगुनी करने के सरकार के लक्ष्य को मुश्किल बनायेगा।

अन्य गतिविधियाँ


वित्तमंत्री श्री अरुण जेटली ने बजट में कृषि के साथ कृषि सम्बन्धित अन्य गतिविधियों के लिये कुल 58,663 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इन अन्य गतिविधियों में गौ-पालन, मछली पालन, कुक्कुट पालन इत्यादि गतिविधियाँ शामिल हैं। बजट 2017-18 में सरकार ने नाबार्ड के तहत 2000 करोड़ रुपये के शुरुआती फंड के साथ डेयरी प्रोसेसिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डवलपमेंट फंड बनाने की घोषणा की है, जिसमें अगले 3 साल में 6000 करोड़ रुपये और डाले जायेंगे। सरकार ने हालाँकि साफ नहीं किया है कि इस फंड का इस्तेमाल किस तरह किया जायेगा, लेकिन यदि इसे केवल प्रोसेसिंग प्लांट लगाने पर ही खर्च किया जाये तो परिणाम चमत्कारिक हो सकते हैं। दूध की प्रोसेसिंग के लिये 10 लाख लीटर क्षमता का प्लांट लगाने में 100 करोड़ रुपये की लागत आती है यानी 2000 करोड़ रुपये में सरकार दूध की प्रोसेसिंग के 20 प्लांट लगा सकती है। जब एक बार प्लांट लगता है तो उसके कारण आस-पास के क्षेत्रों में माँग पैदा होती है और फिर किसान उसके लिहाज से गायों की संख्या भी बढ़ाता है। तो इस तरह किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिहाज से यह एक बहुत अहम घोषणा है, जिसके दूरगामी परिणाम होंगे।

रोजगार: ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से सरकार ने इस बजट में कई बुनियादी बातों का समावेश किया है। प्रशिक्षण और कौशल विकास ऐसा ही एक क्षेत्र है। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, एटीयूएफएस, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, पीएमईजीपी और एएसपीआईआरई सहित मनरेगा से इतर रोजगार सृजन कार्यक्रम के लिये 11,640 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है जोकि पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान 10,682 से 958 करोड़ रुपये ज्यादा है। बजट पेश किये जाने के महज हफ्ते भर बाद 8 फरवरी को कैबिनेट ने प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान को मंजूरी दे दी। इस अभियान के तहत सरकार मार्च 2019 तक करीब 6 करोड़ ग्रामीण परिवारों में डिजिटल साक्षरता का प्रसार करना चाहती है जिसके लिये 2,351.38 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। दुनिया के इस सबसे बड़े डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम के तहत सरकार ने चालू वित्त वर्ष के दौरान 25 लाख उम्मीदवारों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा है। वर्ष 2017-18 के दौरान 2.75 करोड़ और 2018-19 के दौरान 3 करोड़ उम्मीदवारों को प्रशिक्षण दिया जायेगा। इसे सरकार का एक अति महत्वाकांक्षी कार्यक्रम माना जाना चाहिये क्योंकि शिक्षा पर 71वें एनएसएसओ सर्वे के मुताबिक 2014 में 15 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से महज 6 प्रतिशत घरों में कम्प्यूटर थे। यानी माना जा सकता है बचे घरों में से ज्यादातर डिजिटली निरक्षर हैं।

इसके अलावा अपने बजट भाषण में वित्तमंत्री श्री अरुण जेटली ने 2022 तक ग्रामीण क्षेत्रों में 5 लाख लोगों को राजमिस्त्री का प्रशिक्षण दिये जाने की भी घोषणा की। इन घोषणाओं के अलावा वित्तमंत्री की ओर से 50 करोड़ सालाना टर्नओवर तक की कम्पनियों के लिये कॉरपोरेट टैक्स में 5 प्रतिशत की कटौती कर उसे 25 प्रतिशत तक लाने की घोषणा भी ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नये अवसर पैदा करेगी क्योंकि देश में मौजूद लगभग 96 प्रतिशत कम्पनियाँ इसी दायरे में आती हैं और इनमें से ज्यादातर छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। जाहिर तौर पर टैक्स में कमी से उनके लिये निवेश बढ़ाने के अवसर बढ़ेंगे जिससे रोजगार पैदा होंगे। इन सब घोषणाओं और योजनाओं से सरकार को उम्मीद है कि 2019 तक एक करोड़ परिवार गरीबी के दलदल से बाहर आ जायेंगे और इसके साथ ही 50,000 ग्राम पंचायतों को भी गरीबी से मुक्त करने का लक्ष्य रखा गया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और आर्थिक व कृषि मामलों के विशेषज्ञ हैं।), ई-मेल : bhaskarbhuwan@gmail.com

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