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ख्वाबों के जंगल, हकीकत के आरे

Author: 
राकेश कलशियान
Source: 
डाउन टू अर्थ, मार्च 2017

बिजली बनाने के लिये जंगल काटने का नया खेल चल पड़ा है। कार्बन क्रेडिट कमाने के नाम पर हो रही इन कोशिशों की पर्यावरण को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है

अगर यह दुनिया ताश के पत्तों का बना घर है तो जलवायु परिवर्तन को नया जोकर कहा जा सकता है। ऐसा जोकर जिसने बने बनाए नियम-कायदों, प्रचलित तौर तरीकों और जाने-पहचाने दाँवपेंचों को इतने अप्रत्याशित ढंग से बदल दिया है कि कोई समझ नहीं पा रहा कि क्या सही है और क्या गलत! उदाहरण के लिये बहुत से लोग परमाणु ऊर्जा व बड़े बाँधों को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में बड़ा हथियार मान रहे हैं। जबकि अब तक ऐसा कतई नहीं था। परमाणु ऊर्जा और बड़े बाँध हमेशा से पर्यावरणवादियों की आँखों की किरकिरी रहे हैं।

दरअसल जलवायु परिवर्तन को लेकर जो तमाशा हो रहा है, उसमें बिजली बनाने के लिये जंगल जलाने का नया शिगूफा छोड़ा गया है। यानी बिजलीघरों में गैस या अन्य ईंधन की जगह पेड़ों का इस्तेमाल किया जाए। इतिहास गवाह है कि पेड़ और जंगल पर्यावरण आंदोलनों के सर्वव्यापी, सर्वमान्य प्रतीक रहे हैं। लगभग हर बड़ा पर्यावरण आंदोलन इनकी बुनियाद पर ही लड़ा गया है।

तो क्या पेड़ों का जो पारिस्थितिकीय, नैतिक और सौंदर्यात्मक योगदान है, उसे ध्यान में रखते हुए उनका संरक्षण नहीं होना चाहिए? लेकिन अब अमेरिकी कम्पनियाँ जंगल काटकर पेड़ों के लट्ठे यूरोप, विशेषकर ब्रिटेन के बिजलीघरों को ईंधन के रूप में भेज रही हैं। इस लकड़ी को कोयले और गैस का जलवायु अनुकूल विकल्प बताया जा रहा है। यह सिलसिला यूरोपीय संघ के उस फैसले के बाद जोर पकड़ रहा है, जिसके तहत साल 2020 तक वह अपनी 20 प्रतिशत बिजली नवीकरणीय स्रोतों से पैदा करेगा।

मतलब लकड़ी से ऊर्जा पैदा करना अब जायज ठहराया जाएगा! टिम्बर का यह कारोबार फिलहाल 65 लाख मीट्रिक टन का है, जिसके 2021 तक बढ़कर 90 लाख मीट्रिक टन होने की उम्मीद की जा रही है। यूरोपीय संघ के उदाहरण से उत्साहित अमेरिका अपनी नीतियों में बदलाव पर विचार कर रहा है ताकि लकड़ी ईंधन को नवीकरणीय ऊर्जा वाली श्रेणी में रखा जा सके। अपनी कार्बन प्रतिबद्धताओं के चलते जापान व दक्षिण कोरिया भी इसी राह पर चल सकते हैं।

सवाल है कि क्या इस प्रकार ईंधन के रूप में लकड़ी का इस्तेमाल उचित है या फिर निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये यह भी चतुराई से गढ़ा गया एक कुतर्क है? इसके समर्थकों का कहना है कि कोयले या प्राकृतिक गैस की तुलना में लकड़ी के जलने से बहुत कम कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। इसके अलावा, काटे गए पेड़ों की भरपाई नए पौधे लगाकर की जा सकती है। इस आधार पर उनका दावा है कि लकड़ी का ईंधन एक कार्बन निरपेक्ष स्रोत है।

हालाँकि, संदेहवादियों का कहना है कि कार्बन का लेखा-जोखा इतना आसान नहीं है, जितना नजर आता है। यह कई तथ्यों पर निर्भर करता है, जिनमें काटे गए पेड़ों की किस्में, कटाई के बाद उगने वाली वनस्पति के प्रकार, नए पेड़ों के उगने व कार्बन की भरपाई में लगने वाला समय और जंगलों की कटाई से समूचे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाला असर शामिल है। उनका तर्क है कि नया जंगल उगने और कार्बन की भरपाई होने में काफी समय लगता है, इसलिये लकड़ी के ईंधन से कुल कार्बन उत्सर्जन बढ़ेगा, जिससे जलवायु परिवर्तन का संकट और गहराएगा। इसलिये बेहतर होगा कि यह निवेश पवन व सौर ऊर्जा जैसे कार्बन-तटस्थ ऊर्जा स्रोतों में किया जाए।

लकड़ी के ईंधन को कार्बन-तटस्थ मानने में एक और समस्या है। ऐसा होने पर इसे भी पवन व सौर ऊर्जा की भाँति नियमों व करों में छूट मिलने लगेगी। इससे विभिन्न देशों के बीच अपनी मूल्यवान वन सम्पदा को ईंधन में बदलने की होड़ मच जाएगी। कुछ जीव विज्ञानियों की इस आशंका को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता है कि कार्बन उत्सर्जन घटाने के नाम पर जंगलों का कटान हमारी जैव-विविधता को अपूरणीय क्षति पहुँचा सकता है।

अमेरिका की एनवायरन्मेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी का मानना है कि लकड़ी ईंधन का विचार 100 साल जितनी लम्बी अवधि में ही कारगर और भरोसेमंद साबित हो सकता है। धरती पर ग्लोबल वार्मिंग के असर पर जानने में भी इतना ही समय लग सकता है। यह महज संयोग नहीं है कि किसी वन के फिर से घना भरा होने में भी कमोबेश इतना ही समय लग जाता है। तर्क यह भी दिया जा रहा है कि लकड़ी के बढ़ते कारोबार के मद्देनजर भूस्वामी अपनी जमीन बेचने के बजाय पेड़ लगाकर दीर्घअवधि में मुनाफा कमाने के लिये प्रेरित होंगे। लेकिन यह मामले का अति सरलीकरण है, जो न सिर्फ बाजार के जटिल व अनिश्चित बर्ताव पर निर्भर बल्कि वनों के सफाये के तात्कालिक दुष्प्रभावों को भी नजरअंदाज करता है।

अगर इस पूरी कवायद के निहितार्थों को समझा जाए तो ‘कार्बन एकाउंटिंग’ विज्ञान आधारित अनुमान कम और हाथ की सफाई अधिक नजर आती है। यानी अनुमानों के आरे में हकीकत के जंगलों को बलि चढ़ाने जैसी कवायद नजर आती है। ताज्जुब की बात नहीं है कि ऐसे समय में जब सारी दुनिया जलवायु परिवर्तन से भयभीत है तो चालाकियों, चतुराइयों और बेइमानियों के इस ‘काले जादू’ को ही ‘तुरुप का पत्ता’ मान लिया गया है।

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