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उजड़ने की कीमत पर विकास

Author: 
स्वतंत्र मिश्र
Source: 
जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण (2013) पुस्तक से साभार

आज मध्य प्रदेश में उमा भारती ने इस त्रासदी से अपना पल्लू यह कहकर झाड़ लिया कि कुछ नहीं होगा, मामूली क्षति होगी। दो-चार बन्दर, भालू और बाघ मारे जाएँगे। परन्तु सत्य तो यह है कि इस परियोजना से कम-से-कम दो लाख से ज्यादा लोग विस्थापित होंगे और 20 हजार हेक्टेयर सघन वन डूब जाएगा।

भूगोलवेत्ताओं और पर्यावरण वैज्ञानिकों का मानना है कि समस्त भू-भाग पर 33 फीसदी जंगल होना चाहिए, परन्तु आँकड़े बताते हैं कि भारत में इसका प्रतिशत 19 से भी कम है। पेड़-पौधों की कमी से जीना तो मुहाल हो ही रहा है, साथ ही विकास के नाम पर पर्यावरण को और पर्यावरण जिनके लिये जीने-मरने का प्रश्न है, उन्हें तबाही के दौर से समय-समय पर गुजरना पड़ा है। प्रकृति जिनकी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं, उन्हें इसमें जरा-सी उलट-फेर की भारी कीमत चुकानी पड़ी है। पर्यावरणविद डॉ. एम.पीपरमेश्वरण का मानना है कि आज पर्यावरण चिन्तन और चिन्ता का विषय हो गया है, क्योंकि आज थोड़े-बहुत आर्थिक लाभ के लिये एक बड़ी आबादी को उजाड़ा जा रहा है। 1977-78 से ही ‘साइलेंट वैली’ में थोड़े-बहुत अर्थ लाभ के लिये जंगल को डुबाने की कोशिशें चल रही हैं। वनग्राम में रहने वाले हजारों परिवार विस्थापित होने का सन्त्रास वर्षों से झेलते आ रहे हैं। वहाँ आन्दोलन चल रहा है। मीडिया की सार्थक भूमिका से हरसूद प्रकरण एक ज्वलनशील मुद्दे के तौर पर हमारे सामने प्रकट हो पाया है। हालांकि यह मामला वर्षों पुराना है। पर्यावरणविद अनुपम मिश्र की मान्यता है कि हरसूद आज से नहीं, पिछले 20 साल से डूब रहा है। किसी भी सरकार ने इसे डूबने से बचाने की तैयारी कभी नहीं की। यही वजह है कि हरसूद आज उजड़ता दिख रहा है, परन्तु वह वर्षों पहले मन से उजड़ चुका है। कोई भी सरकार इसकी भरपाई की नहीं सोच रही है।

नर्मदा नदी पर बाँध निर्माण से गुजरात और मध्य प्रदेश के बीच बिजली और खेती (सिंचाई) की परियोजना तैयार की गई है। हरसूद समेत 120 से भी ज्यादा गाँवों की आबादी इस परियोजना का शिकार हो रही है। डूबते गाँवों में केवल गरीब तबके के लोग ही शामिल नहीं हैं। यहाँ के अधिकतर लोग मेहनत से अपनी रोजी-रोटी जुटाते रहे हैं। यहाँ के खेत उपजाऊ हैं, जिन पर बड़ी आबादी आश्रित है। सच तो यह कि इस परियोजना से सबसे बड़ी क्षति दलित और आदिवासी जनसंख्या की होनी तय है। अमेरिका के आदिवासियों की लूट और नरसंहार के समय रेड इण्डियन आदिवासी कवि सिसंथल ने ‘प्रमुख के नाम’ कवितानुमा एक पत्र लिखा था। ‘प्रमुख के नाम पत्र’ कविता जो दुनिया में आदिवासी और दलितों की तबाही का दर्द बयाँ करती है, उसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:

बड़े सरदार ने कहलवाया है-
वो कुछ जमीन हमारे लिये अलग रखेगा,
जहाँ हम आराम से रह सकें।
सरदार यह भी कहता है-
कि वे हमारे पिता हैं और हम उसकी सन्तान।
हम तुम्हारे प्रस्ताव पर विचार करेंगे।
लेकिन यह काम उनके लिये आसान नहीं।
क्योंकि जमीन हमारे लिये पवित्र है, पूज्य है।
नदियों और झरनों में
बहता निर्मल
जल,
केवल जल नहीं, हमारे पूर्वजों
का लहू है।


नर्मदा पंचाट के फैसले के हिसाब से बाँध के काम को रोक देना चाहिए। मध्य प्रदेश सरकार अगर चाहे तो यह काम आज भी हो सकता है, परन्तु कांग्रेस तथा भाजपा समेत अन्य दलों को केवल वोट उगाहने की राजनीति करनी है। उन्हें इनके जीवन-मरण से कोई वास्ता नहीं है, अन्यथा 2003 में चिमलखेड़ी में आदिवासियों के घर तबाह हुए और उन्हें राहत न देकर जेल में ठूँस दिया गया। सरकारें जनता का समर्थन उनमें दहशत पैदा कर हासिल करना चाहती हैं। मुआवजे की माँग न उठे, इसी मंशा के तहत ऐसी नाजीवादी घटना को अंजाम देती हैं। अगर हम इस वारदात को द्वितीय विश्व युद्ध के समय के नाजीवादी आतताई नेता हिटलर से भी जोड़ना चाहें तो काफी परेशानी होगी। हिटलर का उद्भव जर्मनी के खिलाफ मित्र राष्ट्रों की दोगली नीति के कारण हुआ था। जर्मनी के अपमान का बदला लेने के लिये वह अतिराष्ट्रवादी हो गया। हिटलर की करतूतों को मैं सही नहीं ठहरा सकता हूँ, लेकिन परिस्थिति को बहुत हद तक उत्तरदाई मानता हूँ। हिटलर राष्ट्र और जाति-प्रेम से भरा हुआ था, परन्तु दलित व पिछड़ों का समर्थन पाकर सत्ता में पहली बार आये दिग्विजय सिंह ने बाँध न बनाने की वकालत की थी।

परिणामस्वरूप 1994-95 तक काम बन्द हो गया। पुनः मुख्यमंत्री बने दिग्विजय सिंह ने उन्हीं को छला, जिनकी राजनीति करके वह सत्ता में आये थे।

विस्थापितों को नगद मुआवजा देकर खाक छानने के लिये छोड़ दिया गया, नर्मदा सागर क्षेत्र में आई पहली डूब ने जब तांडव दिखाया तो उन्हें राहत न देकर खदेड़ दिया गया। भाजपा नेता गोविंदाचार्य ने सुन्दरलाल पटवा के मुख्यमंत्रित्व काल में नर्मदा घाटी का दौरा किया था। इस परियोजना को जनविरोधी बताकर भर्त्सना की गई थी। आज मध्य प्रदेश में उमा भारती ने इस त्रासदी से अपना पल्लू यह कहकर झाड़ लिया कि कुछ नहीं होगा, मामूली क्षति होगी। दो-चार बन्दर, भालू और बाघ मारे जाएँगे। परन्तु सत्य तो यह है कि इस परियोजना से कम-से-कम दो लाख से ज्यादा लोग विस्थापित होंगे और 20 हजार हेक्टेयर सघन वन डूब जाएगा। ताज्जुब तो यह है कि मुख्यमंत्री उमा भारती के सलाहकार गोविंदाचार्य ने इस षडयंत्र पर मौन धारण कर लिया है। मान और वेदा के सैकड़ों आदिवासी परिवार तबाही के दृश्य की भयावह कल्पना को वर्षों से झेल रहे हैं। तबाही का भूत इस कदर उनके मन में समा गया है कि उनमें कइयों ने नींद तो दूर, झपकियाँ लेनी भी बन्द कर दी हैं।

पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में सबर आदिवासियों का मेला प्रत्येक वर्ष सितम्बर-अक्टूबर माह में लगता है। इस मेले में 15 हजार आदिवासी इकट्ठा होते हैं। वहाँ सबर अपने शिल्प, कला, नृत्य, गीत और संगीत का प्रदर्शन करते हैं। यहाँ सबर समुदाय के लिये भोजन की मुफ्त व्यवस्था के अलावा कपड़ा, साबुन, तेल और दवाओं का भी प्रबन्ध रहता है। आश्चर्य होगा कि यह सारी व्यवस्था 78 साल की अवस्था प्राप्त कर चुकीं महाश्वेता देवी स्कूल-स्कूल जाकर बच्चों के बीच से जुटाती हैं। एक साथ कई उद्देश्यों की पूर्ति होती है। बच्चों को समाज के सुख-दुःख से जोड़ना, आदिवासियों की जमीन से जुड़ी कला-संस्कृति का संरक्षण और समाज के प्रति लेखिका के दायित्व की पूर्ति आदि। दूसरी तरफ ऐसी घटना, जो अपने साथ तबाही का मंजर समेटे हुए है, इस दारुण स्थिति पर वहाँ की मुख्यमंत्री जान-माल की क्षति का गणित भी छुपाना चाहती हैं। मतलब साफ है, सरकार किसी भी दल की आये-जाये, जब तक जमीन से जुड़े नेता, कार्यकर्ता लोकतंत्र की अगुवाई नहीं करेंगे, तब तक यह सिलसिला चलता रहेगा।

 

जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें)

क्रम

अध्याय

 

पुस्तक परिचय - जल, जंगल और जमीन - उलट-पुलट पर्यावरण

1

चाहत मुनाफा उगाने की

2

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आगे झुकती सरकार

3

खेती को उद्योग बनने से बचाएँ

4

लबालब पानी वाले देश में विचार का सूखा

5

उदारीकरण में उदारता किसके लिये

6

डूबता टिहरी, तैरते सवाल

7

मीठी नदी का कोप

8

कहाँ जाएँ किसान

9

पुनर्वास की हो राष्ट्रीय नीति

10

उड़ीसा में अधिकार माँगते आदिवासी

11

बाढ़ की उल्टी गंगा

12

पुनर्वास के नाम पर एक नई आस

13

पर्यावरण आंदोलन की हकीकत

14

वनवासियों की व्यथा

15

बाढ़ का शहरीकरण

16

बोतलबन्द पानी और निजीकरण

17

तभी मिलेगा नदियों में साफ पानी

18

बड़े शहरों में घेंघा के बढ़ते खतरे

19

केन-बेतवा से जुड़े प्रश्न

20

बार-बार छले जाते हैं आदिवासी

21

हजारों करोड़ बहा दिये, गंगा फिर भी मैली

22

उजड़ने की कीमत पर विकास

23

वन अधिनियम के उड़ते परखचे

24

अस्तित्व के लिये लड़ रहे हैं आदिवासी

25

निशाने पर जनजातियाँ

26

किसान अब क्या करें

27

संकट के बाँध

28

लूटने के नए बहाने

29

बाढ़, सुखाड़ और आबादी

30

पानी सहेजने की कहानी

31

यज्ञ नहीं, यत्न से मिलेगा पानी

32

संसाधनों का असंतुलित दोहन: सोच का अकाल

33

पानी की पुरानी परंपरा ही दिलाएगी राहत

34

स्थानीय विरोध झेलते विशेष आर्थिक क्षेत्र

35

बड़े बाँध निर्माताओं से कुछ सवाल

36

बाढ़ को विकराल हमने बनाया

 


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