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कौन चाहता है गंदगी में रहना

Author: 
वीना सुखीजा
Source: 
दैनिक भास्कर, 6 मई, 2017

देश के हर शहर में अभिजात्य वर्ग और आम जनता की रिहाइश में काफी बड़ा अन्तर है। 90 प्रतिशत गन्दगी आम लोगों के इलाकों में ही केंद्रित होती है। आज स्वच्छता महज निजी व नैतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि वास्तव में संसाधनों में कब्जेदारी का मुद्दा बन चुका है…

इसमें कोई दो राय नहीं है कि स्वच्छता से रहने के फायदे ही फायदे हैं। अगर हमारे चारों ओर स्वच्छता रहेगी तो इससे न सिर्फ हमारा तन बल्कि मन भी पूरी तरह से स्वस्थ रहता है। इसलिये स्वच्छता सर्वेक्षण के नतीजों के आइने में राजनेता सफाई के फायदे न भी गिनवाएँ, तो भी हर कोई उसका महत्त्व अच्छी तरह से समझता है और इसके फायदों को जानता है। सच बात तो यह है कि आम लोगों को नहीं, बल्कि यह देश के नेताओं और अभिजात्य तबके को समझने की जरूरत है कि आखिर गन्दगी में रहना कौन पसन्द करता है?

निश्चित रूप से कोई भी नहीं, लेकिन यह चाहने या न चाहने की बात नहीं है क्योंकि स्वच्छता महज निजी व नैतिक मुद्दा नहीं है। वास्तव में स्वच्छता भी संसाधनों में कब्जेदारी का मुद्दा है। देश 70 प्रतिशत से ज्यादा रहिवास संसाधनों पर नेताओं और अभिजात्य तबके का कब्जा है। यही वजह है कि हमारे देश के नेता जहाँ-जहाँ भी रहते हैं या अभिजात्य तबके के लोग, वहाँ रिहायश के आदर्श औसत से भी कम लोग रहते हैं। जबकि जहाँ आम लोग रहते हैं वहाँ औसत का आँकड़ा एक कल्पना भर रह जाता है। इस बारे में बहुत कुछ आश्चर्य से सोचने की जरूरत नहीं है।

देश की राजधानी दिल्ली के ही एक उदाहरण से बात स्पष्ट हो जाएगी। देश की राजधानी दिल्ली हरे भरे बाग-बगीचों वाला शहर माना जाता है। नई दिल्ली के जिस एनडीएमसी इलाके को देश का सातवाँ सबसे साफ शहर होने का तमगा मिला है, उसके करीब 10,000 एकड़ में मुश्किल से 1600 से 2000 के करीब बंगले हैं। हरियाली का घना जाल है। यहाँ पर शोर बहुत ही कम होता है; क्योंकि एक तो यह ध्यान रखा गया है कि अनावश्यक रूप से इस इलाके में बसें दौड़कर शांति में खलल न डालें। दूसरी बात यह कि जब इस इलाके के लोग बसों में चलते या चढ़ते ही नहीं, तो फिर इस इलाके में बहुत बसें दिखेंगी ही क्यों? नतीजतन ध्वनि प्रदूषण भी इस इलाके में बिल्कुल भी नहीं है। लेकिन क्या पूरी दिल्ली को यह ठाठ हासिल है?

इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या इस इलाके की साफ-सफाई इस इलाके के रहने वाले लोगों के सिविक सेंस का नतीजा है? बिल्कुल भी नहीं। वास्तव में यह रहिवास संसाधनों पर ज्यादा से ज्यादा कब्जेदारी का नतीजा है। अंग्रेजों ने अपने लिये दिल्ली में रहने की जगह नहीं खोजी थी, उन्होंने अपने लिये एक दिल्ली ही अलग बसाई, जिसे उन्होंने नई दिल्ली का नाम दिया था। अंग्रेजों के जाने के बाद होना तो यह चाहिए था कि नई और बराबरी की भावना वाली आवास नीति बनती। क्योंकि अंग्रेजों ने शासक वाली भावना से अपने लिये आवास निर्मित किए थे। मगर अंग्रेजों के जाने के बाद हमारे राजनीतिक अभिजात्य ने किसी भी उस शानो-शौकत को नहीं त्यागा, जो कि शोषक अंग्रेज बरतते थे।

लुटियन जोन वाली इसी दिल्ली में ही सीलमपुर और सीमापुरी जैसे इलाके भी मौजूद हैं। जहाँ प्रति वर्ग किलोमीटर में लुटियन जोन से हजारों गुना ज्यादा लोग रहते हैं। अब आबादी का इतना असंगत बँटवारा दोनों दिल्लियों को एक कैसे रहने देगा? नतीजा यह है कि बाकी की दिल्ली का बहुत बुरा हाल है। कई इलाकों में तो इतनी संकरी गलियाँ हैं कि धूप को भी एडजस्ट करके आगे बढ़ना पड़ता है। चाँदनी चौक, दरियागंज और लक्ष्मी नगर जैसे इलाकों में इंसानों का दरिया सा लहराता हुआ प्रतीत होता है। अब सवाल है कि राजधानी दिल्ली में इस तरह की इतनी भिन्न डेमोग्राफी क्यों देखने को मिलती है? कारण वही है अंग्रेजों के जाने के बाद अंग्रेजियत पर यहाँ के अभिजात्य तबके ने अपना कब्जा जमा लिया। रसूखदार लोगों ने अपने लिये वही व्यवस्था बनाए रखी जिसे कि अंग्रेजों ने अपने लिये बनाया था।

इसका नतीजा यह है कि 90 के दशक में दुनिया की सबसे ग्रीन कैपिटल का दर्जा पाने के बाद भी आज देश की राजधानी दिल्ली एक साथ कुछ लोगों के लिये स्वर्ग है, तो बहुत सारे लोगों के लिये बजबजाता नरक भी है। करीब-करीब यही बात देश के सारे शहरों में लागू होती है। चाहे वह मुम्बई हो या बंगलुरु, चेन्नई हो या फिर कोलकाता। दूसरी इस बात पर भी गौर हो कि देश के गन्दे से गन्दे शहर में भी अपना लुटियन जोन है। दिल्ली से सटे गुड़गाँव को ही ले लें। जहाँ अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर के अपार्टमेंट हैं, तो इसके साथ ही बेहद बेतरतीब स्लम एरिया भी मौजूद हैं। यहाँ भी निजी व सरकारी क्षेत्र ने बड़ी तेजी से अव्यवस्थित तथा बेतरतीब ढंग से विकास किया है।

कहीं अभिजात्य वर्ग की आलीशान कोठियाँ हैं, तो कहीं बिना निकासी वाली नालियों का नरक है। कहीं बड़ी-बड़ी शानदार व खुली-खुली इमारतें हैं, तो कहीं 100 गज के प्लाट में भी चार किस्म के मकान बने हैं। कहीं चौड़ी-चौड़ी और पूरी तरह से साफ-सुथरी सड़कें पार्किंग समेत मौजूद हैं। तो कहीं इतनी पतली गलियाँ हैं कि वहाँ बस स्कूटर ही जा सकते हैं।

दरअसल देश के हर शहर में अभिजात्य वर्ग की रिहाइश और आम जनता की रिहाइश में जमीन आसमान का अन्तर है। जहाँ तक शहरों की गन्दगी का सवाल है तो 90 प्रतिशत गन्दगी आम लोगों के इलाकों में ही केंद्रित होती है। कोलकाता और मुम्बई जैसे शहर भी इसका अपवाद नहीं हैं। इसलिये स्वच्छता के पैमाने के मामले में अच्छा और खराब प्रदर्शन करने वाले शहरों की नई सूची को अगड़े-पिछड़े-प्रदेशों के रूप में नहीं देखना चाहिए जैसा कि नेता लोग इशारा कर रहे हैं।

वेंकैया नायडू ने खुद इशारों-इशारों में यह कहने की कोशिश की है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब जैसे राज्यों के शहर स्वच्छता के मामले में फिसड्डी हैं। उनके मुताबिक ये राज्य साफ-सफाई को लेकर बिल्कुल भी गम्भीर नहीं हैं। ऐसा नहीं है। बात यह है कि उत्तर के राज्यों में अमीरी-गरीबी की खाई कहीं ज्यादा गहरी और धारदार हो चुकी है, इसलिये यहाँ के शहरों में भी अमीर और गरीब इलाकों का ज्यादा बेरहमी से बँटवारा हुआ है। हाँ, इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि शहरों की गंदगी के लिये ही नहीं, बल्कि गाँवों की गंदगी के लिये भी आम लोगों की यह सोच जिम्मेदार है कि सब कुछ चलता है। यह निराशाजनक है। लेकिन सफाई के बारे में सोचते समय अगर रहिवास सुविधाओं के लोकतांत्रिक बँटवारे पर भी सोचा जाए, तो शायद ज्यादा सकारात्मक होगा। क्योंकि आमतौर पर देखा यह जाता है कि शहर की जो बस्तियाँ जितना अधिक गरीब होती हैं वहाँ उतनी ही कम निकाय सुविधाएँ भी मौजूद होती हैं। यह स्थिति गन्दगी में बड़ा योगदान करती है।

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