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पहाड़ी हुई हरी–भरी तो सात तालाब लबालब


. कुछ गाँव के लोगों ने अपने पड़ोस की एक बंजर पहाड़ी को सहेजने की कोशिश की तो देखते ही देखते गाँवों के आस-पास सात तालाब और करीब 50 से ज़्यादा कुएँ पानी से लबालब हो उठे। ताज़ा–ताज़ा पानीदार हुए इन गाँवों में भीषण गर्मी के दिनों में भी फसलें लहलहा रही है। पहाड़ी पर सीताफल और करौंदे की बहार है। इस साल ही यहाँ के किसानों ने फल और खेती से करीब दो करोड़ रूपये का फायदा लिया है। इलाके के पानीदार होते ही यहाँ के लोगों के चेहरों पर भी रौब और समृद्धि का पानी दमकने लगा है।

यह नजारा है मध्यप्रदेश के आगर मालवा जिले के कुछ गाँवों का। इंदौर–कोटा के चमचमाते हाईवे पर इंदौर से करीब सवा सौ किमी का सफ़र तय करने पर आगर से थोड़ी दूर जाते ही दायीं ओर एक पहाड़ी नजर आती है। इलाके में लोग इसे निपानिया की पहाड़ी के रूप में जानते–पहचानते हैं। हाईवे से निपानिया तक सड़क के किनारे करीब दो किमी लंबी इस पहाड़ी को देखकर यह अनुमान लगाना भी मुश्किल है कि कुछ सालों पहले तक यह इतनी बंजर हुआ करती थी कि दूर–दूर तक साफ़ नजर आती थी, लेकिन आज यह पूरी तरह हरियाली से आच्छादित हो चुकी है। तालाबों में नीला पानी ठाठे मारता है। आस-पास के इलाके में फसलें लहलहा रही है और किसान दोपहिया और चारपहिया वाहनों से आते-जाते हैं। एक और बात, पहाड़ी की हरियाली से चरागाह विकसित हुआ तो गाँव दूध उत्पादन में इलाके भर में अग्रणी बन गया है।

करीब 15-17 साल पहले निपानिया, भानपुरा और देहरिया सहित आस-पास छह–सात गाँवों में पानी की जबर्दस्त किल्लत होने लगी। खेती तो दूर, हालात ऐसे बने कि लोगों को पीने के पानी के लिये भी कोस–कोस भर से इंतजाम करना पड़ा। पानी की कमी से सालभर में एक ही फसल पैदा होने से किसान ना-उम्मीद होने लगे। नौजवान रोजगार की तलाश में उज्जैन–इंदौर की राह पकड़ने लगे। इलाके में मंदी छा गई। लोगों का उत्साह जाता रहा। शादी–ब्याह होते, त्यौहार आते लेकिन सब फीके लगते। सबकी एक ही चिंता। यह साल तो जैसे–तैसे निकल गया, अगले साल क्या होगा। कहाँ से आएगा पानी और पानी नहीं तो अन्न कहाँ से, मवेशियों का क्या होगा। घर का खर्च कैसे चलेगा ...जैसी सैकड़ों चिन्ताएँ। चिन्ताएँ और आशंकाएँ तो सबके जेहन में थी लेकिन इसका उपाय किसी के पास नहीं था। ऐसा क्या करें कि पानी मिल सकें। इससे पहले कई किसान धरती में गहरे से गहरे उतरकर बोरिंग करवा चुके थे। हाड़तोड़ मेहनत का लाखों रुपया गँवा देने के बाद भी धरती से पानी नहीं निकल रहा था। लोग कहते धरती में ही बारिश का पानी नहीं रिसता तो धरती भी कब तक अपनी कोख का पानी दे पाती। ट्यूबवेल में पानी नहीं निकलता और कहीं निकल भी जाता तो हिचकोले भरते हुए बमुश्किल थोड़ा ही पानी मिल पाता।

पहाड़ी ऐसे ही निराशा के वातावरण में एक दिन चौपाल पर बात उठी तो किसी ने कहा कि यदि हम सब मिलकर इस पहाड़ी को हरी–भरी बनाकर पानीदार बना सकें तो गाँव में भी पानी ठहर सकता है। पहले तो कोई इसे मानने को ही तैयार नहीं था कि आधे किमी दूर खड़ी इस पहाड़ी की हरियाली का गाँव के पानी से क्या सम्बन्ध हो सकता है। लेकिन कुछ लोगों को बात जंच गई। तब तक मध्यप्रदेश में चलने वाले जलाभिषेक अभियान के कारण जमीनी पानी का जल स्तर, बारिश के पानी को रिसाने की तकनीक और खेतों में पानी के लिये जंगल और पौधे लगाने की बातें गाँव–गाँव की हवा में तैरने लगी थी।

एक दिन आस-पास के सभी किसानों की एक बैठक बुलाई। इसमें खूब बातें हुई और आखिर में निर्णय हुआ कि हम सब मिलकर 142 हेक्टेयर की इस पहाड़ी को सहेजेंगे और इसे फिर से हरियाली का बाना ओढ़ाकर ही दम लेंगे। काम इतना आसान नहीं था। गाँव वाले मेहनत करे और कोई पेड़ ही काट ले जाए तो। मवेशी पौधे चर जाएँ तो। लेकिन जहाँ चाह, वहाँ राह की तर्ज पर रास्ता निकला और इसी रास्ते ने गाँवों की दशा ही बदल डाली। सरकार से मदद मिल सकती थी लेकिन समय बहुत लगता और उनके पास अब समय कहाँ बचा था। उन्होंने आपस में सहकारी समिति बनाकर 2001 में इस पहाड़ी को सरकार से 30 साल के लिये लीज पर ले लिया। समिति में 11 रूपये की सदस्यता से साढ़े तीन सौ किसान जुड़े। फिर यहाँ कुल्हाड़ीबंदी लागू की कि कोई भी गीली लकड़ी नहीं काटेगा। अगला काम था–पानी रोकने का। यहाँ बरसाती पानी रोकने के लिये सबसे पहले कन्टूर ट्रेंच खोदी। 20 फीट लंबी, 2 फीट चौड़ी और 2 फीट गहरी खंतियाँ खोदी गई। नालों के प्राकृतिक प्रवाह को सुचारू किया। जगह–जगह बरसाती पानी को छोटे पत्थरों के बाँध से रोका। सात छोटे तालाब बनाए। पौधे लगाए। गाँव वाले इस काम में जुट गए, जिससे जो बनता वही करने लगा। दो तीन सालों में पहाड़ी की रंगत बदलने लगी। कोशिशों से पहाड़ी का पानी धरती में थमने लगा।

पहाड़ी ग्रामीण नारायण सिंह चौहान कहते हैं– "किसानों ने तय किया है कि इन तालाबों से कोई भी किसान सीधे पंप लगाकर सिंचाई नहीं कर सकेंगे। इन तालाबों में पानी मार्च महीने तक भरा रहता है। इनमें पानी भरे रहने से आस-पास का जलस्तर बना रहता है और किसानों के निजी कुओं में भी पर्याप्त पानी भरा रहता है। इसी पानी से किसान गेहूँ की फसल में पाँच से छह पानी तक दे पा रहे हैं। कुछ किसान अब सब्जियों की खेती कर रहे हैं।"

ये तालाब आधे से दो हेक्टेयर तक के हैं। इससे करीब 800 लोगों की आबादी वाले भानपुरा के आस-पास इन दिनों कोई खेत सूखा नहीं है। 50 कुएँ पानीदार हैं। करीब एक सौ किसान खुश हैं। इसी तरह डेढ़ हजार की आबादी वाले देहरिया गाँव में भी सवा सौ किसान गेहूँ–चने की फसल कर रहे हैं। यहाँ करौंदे की झाड़ियों के बीच नीम की निम्बौलियाँ डाली। इससे पौधे निकल आए।

तेज़ सिंह बात को आगे बढ़ाते हैं– "हम सोच भी नहीं सकते थे कि थोड़े से काम से इतना फायदा होगा। पानी तो हुआ ही। डेरी में दूध भी 60-70 लीटर से बढ़कर 400 लीटर हो गया है। अब हम दूध उत्पादन में भी अग्रणी हैं। पहाड़ी पर जंगली जानवर और पक्षी आने लगे हैं।"

ग्रामीणों के इस नेक काम में उज्जैन की संस्था फाउंडेशन फॉर इकोलाजी सिक्योरिटी ने तकनीकी और जागरूकता बढ़ाने में ग्रामीणों की मदद की तो आईटीसी ने कुछ वित्तीय मदद की है।

संस्था फाउंडेशन फॉर इकोलॉजी सिक्योरिटी के सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर सतीश पवार कहते हैं– "हमने देखा कि ग्रामीण जोश–खरोश से काम कर रहे हैं तो हमने उन्हें जागरूकता बढ़ाने और तकनीकी मदद की। सच में उनका काम अनुकरणीय है। हमने तो सिर्फ़ दिशा दिखाई पर बड़ी ख़ुशी है कि ग्रामीणों ने उस पर चलकर कड़ी मेहनत से अपने सपने को सच कर दिखाया है।"

अब यहाँ शीशम, सफ़ेद चंदन, पलाश, नीम महुआ, जामुन, बांस सहित कई प्रजातियों के करीब पाँच हजार से ज़्यादा पौधे 8 से 10 फीट तक हो चुके हैं। इससे इलाके के करीब तीन सौ किसानों की उपज में बढ़ोतरी हुई है। डेढ़ सौ बीघा जमीन में पहले एक ही फसल बरसात के पानी से होती थी पर अब यहाँ दो फसलें और सब्जियाँ होने लगी हैं। इससे लगे छह गाँवों में पीने के पानी की दिक्कत खत्म हुई है। गाँवों के कुएँ इससे रीचार्ज हो रहे हैं।

सीताफल, जामुन और करौंदे की बहार तो ऐसी आती है कि हर साल हजारों रूपये में नीलाम करनी पड़ती है। नीलामी की राशी ग्राम कोष में जमा होती है और इसका उपयोग पहाड़ी को और भी बेहतर बनाने में किया जा रहा है। सीताफल जो इस क्षेत्र से खत्म हो रहे थे, अब बम्पर पैदावार होने लगी है। बीते साल समिति ने छह हजार रुपये के सीताफल नीलाम किए हैं। इसके अलावा खेतीहर अजा वर्ग के 20 परिवारों को करौंदे की पैदावार का फायदा लेने के लिये ग्रामीणों ने तवज्जो दी है। ये लोग मध्यप्रदेश के इंदौर और उज्जैन सहित राजस्थान के कोटा में इन्हें बेचकर मुनाफा कमाते हैं। इस काम में नारायणसिंह चौहान, तेजसिंह, गजेन्द्रसिंह, दरियावसिंह लोहार, रमेशचंद, विजय सिंह, लालजीराम तथा रजाक खान की महत्त्वपूर्ण भागीदारी रही।

अब सब बहुत खुश हैं और उनके चेहरे पर खोई चमक लौट आई है। यह पहाड़ी अब पूरे इलाके की समृद्धि की नई इबारत रच रही है।

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