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नदी का घर छोड़ गया उसका प्रहरी


पर्यावरण मंत्री तथा नर्मदा को अगाध प्रेम करने वाले अनिल माधव दवे के निधन पर श्रद्धांजलि

. 'नदी का घर' हाँ, यही नाम था भोपाल में उनके घर का भी। नदी और उनके घर ही एक नहीं थे। वे नदी की चिंता करने वाले सजग प्रहरी थे और नदी पर मँडराते संकटों के इस दौर में उनकी चिंता हमेशा बनी रही कि कैसे नदियों और जलाशयों को समाज की निगहबानी में पुनर्जीवित और पुनर्प्रतिष्ठित किया जाए। पानी के संकट और नदियों की स्थिति की आहट को उन्होंने अब से करीब बीस साल पहले ही पहचान लिया था और उस पर काम करना भी। यहाँ तक कि उन्होंने अपनी चार बिंदु की छोटी-सी वसीयत में भी अपना अंतिम संस्कार नर्मदा और तवा के संगम बांद्राभान में करने और स्मृति में महज पेड़ लगाने और नदी-जलाशयों को बचाने के काम करने की इच्छा जताई। उसमें भी कोई उनका नाम न ले, बस समाज अपना दायित्व समझकर इसे करता रहे।

प्रकृति के ये सजग प्रहरी थे अनिल माधव दवे। निधन के बाद भी नदियों और खासकर नर्मदा संरक्षण के लिये उनके काम हमें सहज ही उनकी याद दिलाते रहेंगे। सरकारों में किंग मेकर और केंद्र में पर्यावरण मंत्री होने के बावजूद उनका मन सत्ता के गलियारों में कम ही रमता था। उनका ज्यादातर वक्त नर्मदा के किनारों पर उसकी चिंता और उसके लिये हरसंभव कोशिश में बीतता था। मध्य प्रदेश के लोग और नदी किनारे का समाज जानता है कि नदियाँ कैसे उनके प्राणों में बसती थी। उन्होंने भोपाल में अपने घर का नाम ही नदी का घर रख लिया था। उनके घर की दीवारों पर भी नदी के पानी की नक्काशी है। नर्मदा समग्र, नदी महोत्सव, सिंहस्थ में वैचारिकी कुंभ और बीते दिनों नर्मदा पर राष्ट्रीय मंथन जैसे महत्त्वपूर्ण आयोजनों में उनकी भूमिका सबके सामने है।

अपने निधन से कुछ पहले उन्होंने भोपाल में नदी, जल और पर्यावरण संरक्षण विषय पर नर्मदा कार्य योजना के सेमीनार में बात करते हुए अपने अंतिम उद्बोधन में उन्होंने कहा था कि बिना नर्मदा मध्य प्रदेश की कल्पना नहीं की जा सकती। यह कोई हिमालय के ग्लेशियर से निकलने वाली नदी नहीं है। सतपुड़ा के जंगल और पहाड़ ही इसके जलस्रोत हैं। अगर जंगल कट जाएँगे और पहाड़ रेत खनन की बलि चढ़ जाएँगे तो नर्मदा खत्म हो जाएगी। इसे बचाने के लिये सबको मिलकर प्रयास करने होंगे। नर्मदा के आस-पास एक लाख वर्ग किमी में जितने भी छोटे–बड़े जलस्रोत हैं, उन्हें किसी तरह पुनर्जीवित कर लिया जाए तो प्रदेश का नक्शा ही बदल जाएगा। इसे लेकर राजनीति मत कीजिए, संरक्षण ऐसा हो कि मिसाल बने।

सरकारें आती–जाती रही, लेकिन नदियों–जलाशयों और ख़ास नर्मदा नदी को लेकर उनकी चिंता राजनीतिक नहीं बल्कि ईमानदार कोशिशें रही। कई बार उन्होंने पर्यावरण के मुद्दों पर अपने विचारों से समाज को समृद्ध किया। उनका निधन पानी और नदियों के लिये समाज में काम करने वाले सभी प्रहरियों के लिये व्यक्तिगत नुकसान की तरह है। उनके चले जाने से यह काम धीमा हो सकता है लेकिन उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके अधूरे काम को आगे बढ़ाएँ। उन्होंने खुद अपनी वसीयत में भी साफ़ लिखा है- "मेरी स्मृति में कोई भी स्मारक, प्रतियोगिता, पुरस्कार, प्रतिमा इत्यादि जैसे विषय न चलाएँ। जो मेरी स्मृति में कुछ करना चाहते हैं। वे कृपया वृक्ष रोपें। वैसे ही नदी-जलाशयों के संरक्षण में अपने सामर्थ्य अनुसार अधिकतम प्रयास भी किए जा सकते हैं। ऐसा करते हुए भी मेरे नाम से बचेंगे।"

मेरी उनसे पहली मुलाकात करीब पंद्रह साल पहले जब वे एक गाँव में पानी का काम देखने आए थे, तब हुई थी। उनसे बात करते हुए पानी के काम को लेकर उनकी बेताबी और चिंता साफ़ नजर आती थी। बाद में तो लगातार उन्हें पढ़ता रहा। वे अपने कामों और विचारों से पानी के काम में जुटे छोटे–बड़े सभी लोगों का हौंसला बढ़ाते थे।

उन्होंने नर्मदा की कई बार यात्राएँ की। कभी पैदल, कभी जल तो कभी सड़क और कभी वायु मार्ग से भी। वे हर बार नर्मदा की पीड़ा को आत्मसात करते रहे। 2007 में नर्मदा की यात्रा करते हुए अमरकंटक में वे नर्मदा की हालत देख गमगीन हो गए थे। उन्होंने नर्मदा समग्र पुस्तक में इसका विस्तार से उल्लेख भी किया है। इसमें अतिक्रमण, नर्मदा में मिलने वाले सीवेज और जगह-जगह अवैध रेत उत्खनन से नदी को होने वाले नुकसान पर उनकी ज़रूरी चिंता है।

बारिश की बूँदे बनकर धरती पर आने से लेकर उसके नदियों-जलाशयों तक बहने वाले पानी की साज-संभाल और उसके वैज्ञानिक तथा परम्परागत ज्ञान और अवधारणों पर उनका विशद अध्ययन और साफ़ समझ थी। वे जानते थे कि महज नदियों को पूजने से कुछ नहीं बदलने वाला, इसके लिये उन्हें साफ़-सुथरा बनाने और समाज का रवैया बदलने की महती ज़रूरत है। उन्होंने इसके लिये करीब एक दर्जन किताबें भी लिखी। नर्मदा समग्र किताब में वे लिखते हैं– "नर्मदा की जो टीस कागज पर दिखाई और कानों में सुनाई देती थी, वह साक्षात हो गई। पतली धारा, नर्मदा में मिलते मानव अपशिष्ट।"

वे रासायनिक खेती के खिलाफ थे। खासकर नर्मदा किनारे रासायनिक खेती को नदी के लिये बेहद खतरनाक मानने वाले दवे का कहना था कि रासायनिक खेती करने से हम अपनी सेहत से तो खिलवाड़ कर ही रहे हैं साथ ही मिट्टी की उर्वरकता को भी खत्म कर रहे हैं। नर्मदा किनारे होने वाली रासायनिक खेती से रसायनों का जहर नर्मदा तक भी पहुँच रहा है जो नर्मदा नदी के लिये बहुत ही नुकसान दायक है। उनकी आखरी किताब शिवाजी और सुराज में उन्होंने शिवाजी के सुशासन के जरिए वर्तमान सत्ता को किस तरह सुशासन के रास्ते ले जा सकें और उसके मानक बिंदु क्या हों, इस पर विस्तार से लिखा है।

उन्होंने किताब में लिखा है- "रासायनिक कृषि ने पानी को सबसे ज़्यादा प्रभावित किया है। रासायनिक कृषि में जल की आवश्यकता को अस्वाभाविक मात्रा में बढ़ा दिया। उसकी अधिकांश पूर्ति किसान भूमि से जल खींचकर करता है। रसायनों के कारण भूमि की ऊपरी सतह कठोर होने लगी और उसने वर्षा का जल अपने अंदर सोखना भी कम कर दिया। आसमान से बरसने वाला अधिकांश पानी चल कर खेतों से बाहर जाने लगा। बड़े बाँधों ने जहाँ कुछ अभाव में पानी पहुँचाया है तो कुछ दूसरे क्षेत्रों में भूमि को दलदल में बदल दिया है। भारत की वर्षा आधारित खेती के लिये लघु सिंचाई योजनाएँ अनुकूल थी, उन्हें छोड़ कर हमने विकसित देशों से भीमकाय बाँधों की नकल करना आरंभ कर दिया। पानी का वितरण संतुलन नहीं है। शहर का व्यक्ति हर दिन औसत डेढ़ सौ लीटर से ज़्यादा पानी का उपयोग करता है जबकि गाँव और जंगल में रहने वाला व्यक्ति पानी की खपत 35 लीटर से भी कम करता है। भारत के कई क्षेत्रों में किसान को दस गैलन पानी भी प्रति एकड़ जमीन के लिये उपलब्ध नहीं है जबकि दूसरी ओर गेहूँ की पैदावार करने वाले किसान को एक बार में प्रति हेक्टेयर एक लाख 78 हजार 316 गैलन पानी लगता है क्योंकि गेहूँ की एक फसल को औसतन तीन से चार बार पानी देने पड़ते हैं। इसका योग 7 लाख 13 हजार 264 गैलन प्रति हेक्टेयर है। वहीं दूसरी ओर कई कृषि क्षेत्र ऐसे हैं कम पानी के कारण कृषि भूमि सूखे या दलदल में परिवर्तित होती जा रही है।"

वे आगे लिखते हैं- "यह जल असंतुलन पानी की ठीक समझ के अभाव और अपरिपक्व योजनाकारों के कामों का परिणाम है। आज तो स्थिति यहाँ तक खराब हो गई है कि भारत में सर्वाधिक वर्षा का स्थान चेरापूँजी पिछले कुछ वर्षों से गर्मियों के दिनों में जल संकट से जूझने लगा है। वर्ष 2001 से 2010 तक भारत में किए गए नलकूपों और कुओं के सर्वेक्षण से जो परिणाम सामने आए हैं वह चिंताजनक और चौंकाने वाले हैं। उससे प्राप्त आंकड़े हमें सावधान करते हैं वह सरकार और सरकार के मुखिया को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिये चेतावनी देते नजर आते हैं। बीते दस सालों में भारत के भूजल स्तर में आए बदलाव के परिणाम बहुत बड़ी चुनौती की ओर हमें आगाह करते हैं।"

अनिल माधव दवे जी का दाह संस्कार 6 जुलाई 1956 को मध्यप्रदेश में उज्जैन जिले के बडनगर कस्बे में जन्मे अनिल माधव दवे ने इंदौर में रहकर गुजराती कॉलेज से एमकॉम की पढ़ाई पूरी की। वे आजीवन अविवाहित रहे। पायलट, समाजसेवी, राजनीतिक कार्यकर्ता, कुशल पर्यावरणविद होने से पहले वे एक बेहतर इंसान थे। नर्मदा समग्र ट्रस्ट का गठन कर उन्होंने नर्मदा को बचाने का बीड़ा उठाया था। जन अभियान परिषद में दवे ने गाँव-गाँव नौजवानों की फौज तैयार की थी। ये लोग पर्यावरण बचाने के लिये काम करते हैं। वे ना सिर्फ़ नर्मदा नदी बल्कि उसमें मिलने वाली सहायक नदियों, आस-पास के पहाड़ों, पेड़-पौधों औऱ तालाबों पर भी जोर देते थे। उनका कहना था कि नदी इन सब के बिना नहीं हो सकती। वे कहते थे कि नदी को बचाने के लिये लोगों को जागरुक कर अलख जगाना होगा। नदी के महत्त्व को प्रत्येक व्यक्ति तक पहुँचाने से ही नदी के प्रति समाज की धारणा बदलेगी। नदी किनारे ना सिर्फ़ पेड़-पौधे लगाने होंगे बल्कि उन पौधों को पेड़ बनने तक बच्चों की तरह पालना पड़ेगा। नदी में मिट्टी को जाने से रोकना होगा। नदी में साबुन लगाना, गंदगी फैलाना रोकना होगा।

बांद्राभान में नदी महोत्सव के जरिये देश-दुनिया से चिंतकों को बुलाकर औऱ नदी के बारे में बातें करते हुए इसका सार लोगों तक सहजता से पहुँचाना उनका मकसद हुआ करता था। जुलाई 2016 में वे पर्यावरण राज्य मंत्री बनाए गये थे। उन्हें देखकर कभी लगता ही नहीं था कि ये मंत्री हैं, जब भी कोई उनसे मिलता तो यही लगता था कि ये कोई प्रोफेसर या नदियों पर काम करने वाले सहज व्यक्ति या कार्यकर्ता ही हैं।

आज देश में जिस तरह पानी और पर्यावरण की बिगड़ते हालातों को लेकर ऐसे व्यक्तियों के कामों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, तब ही उनका इस तरह चले जाना पानी और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिये तकलीफदेह है।

अनिल माधव दवे जी का वसीयत

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