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नदियों के बिना हमारे जीवन की कल्पना भी संभव नहीं


पानी और पर्यावरण पर गहरी समझ के साथ नदियों से समाज को जोड़ने और नर्मदा को सदानीरा बनाने की हरसंभव कोशिश में आजीवन जुटे रहे अनिल माधव दवे का प्रोफाइल

अनिल माधव दवे "नदियाँ हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। नदियों के बिना जीवन की कल्पना भी संभव नहीं। भारतीय संस्कृति में नदियों को बड़ी श्रद्धा से देखा गया है। उसे किसी कर्मकांड के अंतर्गत माता नहीं माना, बल्कि पर्यावरण और प्रकृति को स्वच्छ बनाए रखने के लिये उसे मइया जैसा श्रद्धा सूचक नाम व व्यवहार दिया। जो लोग नदी को दो किनारों के बीच बहता हुआ नाला मानते हैं, वे भ्रम या भूल कर रहे हैं।"


इन शब्दों को सिर्फ़ कहने भर से नहीं बल्कि पर्यावरण की गहरी समझ के साथ अपने कृत्तित्व और तन-मन से नदियों को साफ-सुथरा बनाने, उन्हें सदानीरा स्वरूप दिए जाने की आजीवन हरसंभव कोशिश करते रहने वाले पर्यावरणविद तथा केंद्र में वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन जैसे अहम विभागों में स्वतंत्र प्रभार मंत्री रहे अनिल माधव दवे के निधन से देश में पानी और नदियों के लिये काम की भी अपूरणीय क्षति हुई है।

बीते कुछ सालों में पानी के लगातार संकट ने इस मुद्दे पर पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था। अभी-अभी यह काम देश में गति पकड़ रहा था। केंद्र में इसकी बागडोर नदियों और प्रकृति की जमीनी समझ के साथ अगाध प्रेम करने वाले श्री दवे जैसे समर्थ हाथों में थी और देश को पानी और पर्यावरण की दिशा में बड़ी उम्मीदें बंध रही थी। ठीक ऐसे ही वक्त में श्री दवे अचानक महज 61 साल की बहुत कम उम्र में चले गए।

उनका यूँ अचानक चले जाना दुखद तो है ही, पानी आंदोलन के लिये भी धक्का है। उन्होंने देश में ही नहीं अपनी पर्यावरण हितैषी सोच से पूरी दुनिया के पर्यावरण के लिये सोचने वाले लोगों में भी अपनी पहचान बनाई। उनके निधन पर संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यकारी निदेशक एरिक सोल्हेम ने शोक जताते हुए कहा है- "भारत की महान नदियों गंगा और नर्मदा के संरक्षण के प्रति उनके जुनून को हमेशा याद रखा जाएगा।"

उनके लिये नदी की परिभाषा बहते हुए पानी तक ही सीमित नहीं थी। वे मानते थे कि वस्तुतः नदी की परिभाषा में उसका वह सम्पूर्ण जल ग्रहण क्षेत्र आता है, जहाँ बरसी हुई वर्षा की प्रत्येक बूँद बहकर नदी में आती है। इस भू-भाग में जो जंगल, खेत, पहाड़, बस्तियाँ, जानवर और अन्य सभी चल-अचल वस्तुएँ आती हैं, वे भी उसका शरीर ही है। इसमें निवासरत कीट पतंगों से लगा कर बड़े-बड़े पहाड़ों तक से मानव जब व्यवहार में परिवर्तन करता है। तो उसका सीधा प्रभाव नदी पर पड़ता है। चलते-चलते यह प्रभाव समान मात्रा में वहाँ निवास करने वाले लोगों पर भी पड़ने लगता है।

उन्होंने इसे महसूस भी किया और आज से करीब बीस साल पहले जब समाज में पानी और पर्यावरण पर इतना गंभीर संकट नहीं आया था, तब ही इस खतरे को पहचान लिया था और इसके प्रति आगाह करते हुए तब से ही पर्यावरणीय चेतना का सतत विस्तार भी किया। उन्होंने 2007 में नर्मदा नदी की यात्रा करते हुए जो कुछ अपनी खुली आँखों से देखा, उसने उनके मन को ख़ासा विचलित कर दिया। बाद में इसे उन्होंने अपनी किताब नर्मदा समग्र में भी लिखा है।

उन्हीं के शब्दों में- "हमारा दल 5 अप्रैल 2007 को मैकलसुता (नर्मदा) के जन्मस्थान अमरकंटक पहुँच गया था। पानी के अभाव में अमरकंटक से मंडला की यात्रा पानी पर संभव नहीं थी, सो राफ्ट को वाहन पर ढोकर चलना था। नदी की जलयात्रा का आरंभ जलाभाव में सड़क से ही होना था। नर्मदा की जो टीस कागज़ पर दिखाई और कानों में सुनाई दे रही थी, वह वहाँ पहुँचकर साक्षात हो गई. अमरकंटक पहुँचे तो ऐसा लगा मानों नर्मदा नदी की पीड़ा का पिटारा खुल गया। सब नजर आ रहा था, उद्गम स्थल पर निरंतर पतली होती धार, किनारों पर बढ़ता अतिक्रमण, घरों और आश्रमों का नदी में मिलता मानव अपशिष्ट। एक क्षण को हमें लगा कि क्या इन शक्ति केंद्रों के विरुद्ध आवाज़ उठाई जा सकती है? सरकारी अधिकारियों के विकास के नाम पर रखे जाने वाले तुगलकी इरादे। निरंतर अतिक्रमण में ज़्यादा से ज़्यादा जमीन चपेट लेने पर उतारू ये नर्मदा भक्त समाज। कूड़ा-करकट, गंदी सड़क और मैला होता नर्मदा का उद्गम। सब बैचेन कर रहा था।"

वे इन विषम स्थितियों से भी निराश नहीं हुए। वहाँ की स्थितियों ने उन्हें बेचैन तो किया पर हिम्मत नहीं हारी और इसे बदलने के लिये कोशिशें शुरू कर दी। उन्होंने खुद आगे किताब में इसका जिक्र करते हुए लिखा है- "मन का भय मिटा और हम लोगों ने नर्मदा मैया के उद्गम स्थान की पूजा की और वहीं दालान में नर्मदा चौपाल का चिमटा गाड़ दिया। चौपाल में भाग लेने के लिये सबको बुलाया। साधु–संत, महात्मा, वनवासी, कर्मचारी और नेता। इसके साथ ही शुरू हो गई माँ नर्मदा के मर्म को समझने की कोशिश। माँ नर्मदा को कैसे स्वच्छ रखें विषय पर चिंतन। पहली बार की चौपाल सहज और सफल रही। विचार के स्तर पर सभी लोग साथ थे। अब देखना यह था कि क्रियान्वयन के स्तर पर कौन कितनी दूर चलता है? कौन अपना अतिक्रमण तोड़ माँ नर्मदा को अवरोधों से मुक्त करता है। मंचों से दिए गए नर्मदा संरक्षण के व्याख्यानों पर मंच से उतर कर कौन चलता है?"

अनिल माधव दवे का जन्म मध्यप्रदेश में उज्जैन जिले के बडनगर कस्बे में 6 जुलाई 1956 को हुआ था। बडनगर में आज भी करीब 70 साल पुराना उनका पैतृक निवास जूना शहर इलाके में मंगलनाथ पथ पर है। हालाँकि ये लंबे समय से बंद पड़ा है। उनके काका नवीन दवे के मुताबिक अनिल जी की प्राथमिक शिक्षा बडनगर से ही प्रारंभ हुई। उनके पिता माधवलाल दवे वन विभाग में पदस्थ थे और उनके दादा मध्यप्रदेश में आरएसएस के बड़े स्तंभों में से एक थे और संगठन में उनकी काफी इज्जत थी। लोग उनका सम्मान करते थे। दादा साहेब दवे को मध्य भारत का पहला संघ चालक बनाया गया। पिता और दादा से ही उन्हें अनुवांशिक रूप से प्रकृति और पर्यावरण के प्रति प्रेम भाव सहज संस्कारों से मिला। जो लगातार बढ़ता गया। उनके पिता सादगी से रहते थे और परिवार की उच्च विचारों में आस्था थी।

अनिल जी के बचपन में ही असमय पिता की ह्रदयाघात से हुए निधन ने अचानक सब कुछ बदल दिया। उन्हें बचपन में बची हुई प्राथमिक शिक्षा के लिये अपने ननिहाल रतलाम के एक प्राथमिक विद्यालय में पढ़ना पड़ा। परिवार के साथ ननिहाल में रहते हुए उन्होंने आगे की पढ़ाई की लेकिन जल्दी ही परिवार के साथ यहाँ से भी गुजरात के जूनागढ़ चले गए। कुछ साल जूनागढ़ में पढने के बाद वे फिर मध्यप्रदेश लौट आए और आखिर तक इसे ही अपनी कर्मस्थली बनाया।

अनिल माधव दवे उनके बचपन के साथी और बडनगर के पूर्व विधायक उदयसिंह पंड्या के मुताबिक अनिल दवे को बचपन से ही प्रकृति आकर्षित करती थी। वे बचपन में भी पेड़-पौधों और नदी की बातें करते थे। वे बड़ी सादगी से रहते थे और अपने अन्तर्मुखी स्वभाव की वजह से ज़्यादा मित्र नहीं बनाते थे। यहाँ से जाने के बाद भी कई बार उनसे मुलाकातें होती रही। वे मिलते ही यहाँ के हाल-चाल पूछते थे। वे बडनगर स्थित अपने पैतृक निवास को शोध संस्थान बनाना चाहते थे। लेकिन उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका।

उन्होंने इंदौर में रहकर गुजराती कॉलेज से एमकॉम की पढ़ाई पूरी की। उसी दौर (1975-77) में तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी। हजारों लोगों के साथ बड़ी संख्या में युवा विद्यार्थी भी आपातकाल की पाबंदियों के खिलाफ सड़क पर उतरे और उन्होंने सरकारी दमन चक्र की परवाह न करते हुए जेपी आंदोलन को सफल बनाया। इसी दौरान वे विद्यार्थी परिषद और आरएसएस के संपर्क में आए। उन दिनों देश की स्थितियों ने उनके भावुक मन को ख़ासा विचलित किया और उन्होंने आजीवन अविवाहित रहते हुए देश की सेवा करने का संकल्प लिया। इसके बाद पारिवारिक दायित्वों से मुक्त होकर वे आरएसएस के प्रचारक बनाए गए। उन्होंने लंबे समय तक यह काम देखा। संगठन का काम देखते हुए उन्हें लगातार घूमने का अवसर मिला। इससे उनके पर्यावरण और प्रकृति प्रेम को और विस्तार मिला तथा समाज और उसके आसन्न संकटों को निकट से देखने का अनुभव मिला।

उन्होंने पायलट के रूप में भी 18 महीने का प्रशिक्षण लिया था। उन्होंने वायुमार्ग से नर्मदा के उद्गम से लेकर खंभात की खाड़ी में मिलने तक की यात्रा खुद तय की थी। 1983-84 में उन्होंने पीथमपुर में एक सॉफ्ट ड्रिंक कंपनी का प्लांट भी डाला था लेकिन खुले रहने वाले और समाज के बीच रहकर काम करने वाले व्यक्तित्व को यह सब रास नहीं आया और डेढ़-दो साल में ही इसे बंद कर वे फिर सार्वजनिक जीवन में लौट आए।

वर्ष 2003 के मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले उन्हें संगठन ने राजनीतिक काम देखने के लिये उन्हें भाजपा में भेजा। उन्होंने अपनी ख़ास रणनीति के चलते उन दिनों की कद्दावर दिग्विजय सिंह सरकार को हराकर भाजपा की सत्ता बनवाई। पर्दे के पीछे रहते हुए वे किंग मेकर बन चुके थे लेकिन लोगों के बीच पहली बार उनका नाम तब चर्चाओं में आया जब तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती ने उन्हें अपना राजनीतिक सलाहकार नियुक्त किया। हालाँकि थोड़े ही दिनों में उमा भारती को पद छोड़ना पड़ा पर दवे सत्ता के केंद्र में बने रहे। उन्होंने 2008 के चुनाव में भाजपा की शिवराज सरकार को फिर से सत्ता में लाने के लिये जी तोड़ काम किया और कुशल रणनीति बनाई। इसी तरह 2013 के चुनाव में भी उन्होंने भाजपा की लगातार तीसरी जीत दर्ज कराई। उन्हें चुनावी मैनेजमेंट में माहिर माना जाता था। इसे खुद सूबे के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी मानते हैं। उनके निधन पर शोक संदेश में खुद श्री चौहान ने इसे स्वीकार किया है।

1985 से 1995 के बीच ही उन्हें लगने लगा था कि पानी की स्थिति भयावह होती जा रही है। मालवा जैसे हरे-भरे तथा पानीदार इलाके में भी पानी की कमी और उसपर मँडराते संकट के बादल उन्होंने देख लिये थे। सन 2000 से उन्होंने इस पर फोकस किया तथा इससे निपटने की चुनौतियों पर विस्तार से मंथन किया। अच्छे समाजसेवी, राजनीतिक कार्यकर्ता, कुशल रणनीतिकार और पर्यावरणविद होने से पहले वे एक बेहतर इंसान थे। उन्हीं दिनों मेरी उनसे पहली मुलाकात जब वे एक गाँव में पानी का काम देखने आए थे, तब हुई थी। उनसे बात करते हुए पानी के काम को लेकर उनकी बेताबी और चिंता साफ़ नजर आती थी। बाद में तो लगातार उन्हें पढ़ता रहा। वे अपने कामों और विचारों से पानी के काम में जुटे छोटे-बड़े सभी लोगों का हौसला बढ़ाते थे।

अनिल माधव दवे 2007 में उन्होंने कुछ साथियों के साथ नर्मदा की जल मार्ग से यात्रा की। 19 दिनों में उन्होंने नर्मदा की 1312 किमी यात्रा की थी। इस जल यात्रा ने नर्मदा से उनके माँ-बेटे के स्नेह रिश्ते को और भी मजबूत कर दिया। इस यात्रा के बहाने उन्होंने नर्मदा की पीड़ा को न केवल देखा बल्कि बाद में अपनी किताब 'नर्मदा समग्र' में उसकी मुखर अभिव्यक्ति भी हुई है। उन्होंने नर्मदा की कई बार यात्राएँ की। कभी पैदल, कभी जल तो कभी सड़क और कभी वायु मार्ग से भी। वे हर बार नर्मदा की पीड़ा को आत्मसात करते रहे। 2007 में नर्मदा की यात्रा करते हुए अमरकंटक में वे नर्मदा की हालत देख गमगीन हो गए थे। उन्होंने नर्मदा समग्र पुस्तक में इसका विस्तार से उल्लेख भी किया है। इसमें अतिक्रमण, नर्मदा में मिलने वाले सीवेज और जगह-जगह अवैध रेत उत्खनन से नदी को होने वाले नुकसान पर उनकी ज़रूरी चिंता है। तब उन्होंने नर्मदा के दोनों ओर मनरेगा योजना से हरियाली चुनरी नाम से पेड़ लगाने की महत्त्वाकांक्षी योजना बनाई थी लेकिन वह पूरी नहीं हो सकी। अब प्रदेश सरकार नर्मदा सेवा यात्रा के अगले चरण में 2 जुलाई को इसे बड़े अभियान के रूप में आयोजित कर रही है।

इसके बाद नर्मदा समग्र ट्रस्ट का गठन कर उन्होंने नर्मदा को बचाने का बीड़ा उठाया। नर्मदा समग्र पर बात करते हुए उन्होंने कहा था- "नर्मदा समग्र एक प्रयत्न है। नर्मदा नदी, एक जलस्रोत, एक आस्था को स्वस्थ, सुंदर और पवित्र बनाए रखने का यह एक प्रयास है। विश्व की अधिकांश संस्कृतियों का जन्म व विकास नदियों के किनारे हुआ है। भारत के ऋषियों ने पर्यावरण संतुलन के सूत्रों को ध्यान में रखकर समाज की नदियों, पहाड़ों, जंगलों व पशु-पक्षियों सहित पूरे संसार की ओर देखने की विशेष सह अस्तित्व की अवधारणा का विकास किया। उन्होंने पाषाण में भी जीवन देखने का मंत्र दिया। ऐसे प्रयत्नों के कारण भारत में प्रकृति को समझने व उससे व्यवहार करने की आदान-प्रदान के भाव से युक्त परम्पराओं का विकास हुआ। जियो और जीने दो जैसी मान्यताएँ विकसित हुईं। पेड़-पौधे, पशु, पानी सभी पूज्य हो गए। समय के साथ चलते-चलते जब परम्पराएँ बगैर समझे निबाही जाने लगीं तो वे रूढ़ियाँ बन गईं। आँखें तो रहीं लेकिन दृष्टि बदल गई। इसने सह अस्तित्व के सिद्धांत को बदलकर न जियेंगे न जीने देंगे जैसे विकृत सोच का विकास किया। इसी का परिणाम रहा कि नदी व पहाड़, पशु व पेड़ सब अब मरने लगे हैं। नर्मदा जैसी प्राचीन नदी भी इस व्यवहार से नहीं बच पा रही है। उसका अस्तित्व संकट में है।"

वे आगे कहते हैं- "जंगल कट रहे हैं, नदी का जल कम हो रहा है और प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। नर्मदा से सभी को पानी चाहिए, किन्तु नर्मदा में पानी कहाँ से आता है? वह कैसे बढ़ाया जाय? इस विचार का सर्वत्र अभाव है। नर्मदा समग्र एक पहल है। पहले से कार्य कर रहे व आगे कार्य करने वालों के बीच संवाद की यह कोशिश है। नर्मदा समग्र इस पुण्य सलिला के सभी पक्षों पर संयुक्त प्रयास चाहता है। यह नर्मदा के सारे आयामों को एक स्थान पर समेटने की ओर आगे भी बढ़ना चाहता है। आप सभी से प्रार्थना है कि सपरिवार, सकुटुम्ब इस कार्य में अपनी भागीदारी निश्चित करें जिससे प्रयत्न को सहयोग मिले व मैकलसुता की सेवा भी हो सके। मैंने नर्मदा पर केंद्रित पुस्तक को नदी के सारे आयामों, भावनाओं और विचारों को जोड़कर पुस्तक की शक्ल में एक रचना की है। यह कोई रिसर्च बुक नहीं है। सरल और सहजता से नर्मदा को प्रस्तुत करने का प्रयास मात्र है। नर्मदा विश्व की ऐसी अनूठी नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। ऐसी नदी जिसका पानी ग्लेशियर से नहीं आता। नर्मदा से सबको पानी और ऊर्जा चाहिए। जल तंत्र के बिगड़ने से गंगा और यमुना की दुर्दशा हुई, अगर ध्यान न दिया तो नर्मदा के साथ भी यही होने वाला है। इसलिये इस नदी को संभालने की ज़रूरत है। दीर्घकालीन प्रयासों के लिये सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हर व्यक्ति सेवा का एक कार्य हाथ में ले। पुस्तक से मिलने वाली रॉयल्टी को नर्मदा के विकास व संरक्षण पर खर्च करेंगे।"

उन्होंने पर्यावरण और नदियों की स्थिति में सुधार लाने के लिये अन्तरराष्ट्रीय नदी महोत्सव का आयोजन प्रारंभ किया। इसमें देश-विदेश के चिंतको के बीच नदी के साथ जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दे भी उठे। यह एशिया में अपनी तरह का अनूठा प्रसंग बना। यहाँ हुए विचार मंथन का असर जन जागरूकता तक भी पहुँचा।

जन अभियान परिषद में श्री दवे ने गाँव-गाँव नौजवानों की फौज तैयार की थी। ये लोग पर्यावरण बचाने के लिये काम करते हैं। वे परिषद के स्थापकों में से थे और पहले उपाध्यक्ष भी रहे। वे 2009 से लगातार मध्यप्रदेश से राज्यसभा सदस्य रहे और इस दौरान कई बार संसद में पर्यावरण मुद्दों पर उन्होंने अच्छी तहरीर की। उज्जैन में अप्रैल 2016 में सिंहस्थ के दौरान उन्होंने वैचारिक कुंभ का आयोजन उन्हीं की कल्पना थी। सिंहस्थ में हमेशा से शंकराचार्यों के बीच वैचारिक संगम होता है। इसी परम्परा को उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय स्वरूप वैचारिक महाकुंभ के रूप में दिया था। इसमें पानी, पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, नदियों और जलाशयों की स्थिति तथा जैविक खेती पर देश-दुनिया के अध्येताओं ने अपनी बात रखी थी।

अनिल माधव दवे पर्यावरणविद होने के नाते उन्हें 5 जुलाई 2016 में केंद्र में वन और पर्यावरण राज्य मंत्री बनाया गया। उन्होंने यह जिम्मेदारी बड़ी खूबी से संभाली। जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते में भारत का पक्ष मजबूती से रखने में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई।

अनिल दवे शिवाजी और उनके सुशासन से बेहद प्रभावित थे। उन्होंने शिवाजी को खूब पढ़ा और बाद में अपने निधन के कुछ समय पहले ही उन्होंने 'शिवाजी और सुराज' नाम से महत्त्वपूर्ण किताब लिखी है। इसमें उन्होंने शिवाजी के शासनकाल के दौरान 'सु राज' यानी अच्छा शासन चलाने और उनकी बेहतर प्रबन्धकीय छवि का उल्लेख किया गया है। इसमें उस काल के दौरान पानी, जंगल, खेती और पर्यावरण तथा किसानों की स्थिति पर भी विस्तार से लिखा गया है। इतना ही नहीं इसमें आज की स्थितियों के मद्देनजर चुनौतियों और पानी, पर्यावरण तथा खेती की हालिया स्थिति पर भी विस्तार से चर्चा की गई है। इसकी प्रस्तावना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लिखी है।

इस किताब में शिवाजी के समय पानी और खेती पर बात करते हुए वे कहते हैं- "भारत जैसे कृषि प्रधान देश का राजा कृषि के महत्त्व को समझे और उसके लिये योग्य दिशा में प्रयत्न करें, यह अनिवार्य है। शिवाजी ने कृषि भूमि प्रबंधन, जल संग्रह और उसके विविध पक्षों पर गहन विचार कर व्यवस्थाएँ खड़ी की थी। उन दिनों बारिश का पानी रोका जाए तथा उसका उपयोग साल भर तक पशुपालन और खेती के विभिन्न कार्यों के लिये किया जाए, ये उनका सदैव आग्रह रहता था। महाराष्ट्र के पुणे शहर में स्थित पर्वती के नीचे अम्बील ओढा नामक शिवाजी ने स्वयं बाँध बनवाया था, जिसे आज भी देखा जा सकता है। इसी प्रकार उन्होंने पुणे के पास कुंडवा में भी बाँध बनवाया था। कोंडवा भारतीय राजव्यवस्था में मिट्टी के बाँधों व तालाबों के निर्माण का विशेष महत्त्व है पेयजल के लिये कुएँ-बावड़ी और कृषि आधारित सभी कार्यों के लिये बड़े जलाशयों का निर्माण हर सुशासन में होता है। कृषि का उत्पादन बढ़ाने और शासन पर भार कम करने के लिये शिवाजी ने अपने सैनिकों को वर्षा काल के समय कृषि कार्य में लगाने का प्रावधान किया। शांति के समय ये किले के नीचे अथवा अपने-अपने गाँव में कृषि भूमि पर खेती करने जाते थे। वर्षा समाप्ति पर विजयादशमी के दिन सैनिक गाँव की सीमा का लंघन कर फिर से एकजुट होते और अगले सात-आठ महीने के लिये मुहिम पर चले जाते। श्रम का कृषि में विनियोग और कृषि कार्य पूर्ण होने पर उसका रक्षा व्यवस्था में उपयोग का यह तरीका अपने आप में राष्ट्रीय श्रम प्रबंधन का अनूठा उदाहरण था।"

घर का नाम- 'नदी का घर'


भोपाल के शिवाजीनगर स्थित अपने घर का नाम ही उन्होंने 'नदी का घर' रखा हुआ था। इससे उनके नदी प्रेम का सहज अंदाजा किया जा सकता है। उनके घर की दीवारों पर भी नदी की आकृतियाँ चित्रित हैं। आज वह घर तो उसी तरह खड़ा है लेकिन उसमें रहने वाले दवे अब इस दुनिया में नहीं हैं।

उनकी हमेशा चिंता रहती थी कि नदियों के महत्त्व को भूलते जा रहे समाज में कैसे फिर से उसके महत्त्व और योगदान को रेखांकित किया जा सके। वे नदियों की दुर्दशा को लेकर खासे चिंतित रहते थे। करीब बीस साल पहले से वे इसके लिये काम करते रहे हैं। नर्मदा तो जैसे उनके प्राणों में ही बसती रही। नर्मदा किनारे के गाँवों में लोगों के लिये स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध मनहिं होने के कारण उन्होंने देश की पहली 'नदी एम्बुलेंस' योजना शुरू की। इसमें एक जहाज पर डॉक्टर और कर्मचारियों की टीम नर्मदा किनारों पर करीब सौ किमी का सफ़र तय करती थी। इसकी इलाके में खूब चर्चा हुई और लोगों को इसका फायदा भी मिला।

नदी एंबुलेंस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर शोक जताते हुए कहा- "उनके आकस्मिक निधन से मैं सदमे में हूँ, । मैं संवेदनाएँ व्यक्त करता हूँ। दवे को एक समर्पित लोक सेवक के तौर पर याद किया जाएगा जो पर्यावरण संरक्षण के प्रति बेहद जुनूनी थे।"

वसीयत में आमतौर पर लोग अपनी संपत्ति के बँटवारे का उल्लेख करते हैं लेकिन अनिल जी ने अपनी मात्र आधे पन्ने की वसीयत में भी नर्मदा और पर्यावरण को ही महत्त्व दिया। इसमें उन्होंने अपना अंतिम संस्कार नर्मदा और तवा के संगम बांद्राभान में करने और स्मृति में महज पेड़ लगाने और नदी-जलाशयों को बचाने के काम करने की इच्छा जताई। उसमें भी कोई उनका नाम न ले, बस समाज अपना दायित्व समझकर इसे करता रहे। सरकारों में बड़ी भूमिकाओं और केंद्र में पर्यावरण मंत्री होने के बावजूद उनका मन राजधानी में नहीं, ज्यादातर वक्त नर्मदा के आंचल में बीतता था। उन्होंने कहा था- "बिना नर्मदा मध्यप्रदेश की कल्पना नहीं की जा सकती। यह कोई हिमालय के ग्लेशियर से निकलने वाली नदी नहीं है। सतपुड़ा के जंगल और पहाड़ ही इसके जलस्रोत हैं। अगर जंगल कट जाएँगे और पहाड़ रेत खनन की बलि चढ़ जाएँगे तो नर्मदा खत्म हो जाएगी। इसे बचाने के लिये सबको मिलकर प्रयास करने होंगे।"

नदी किनारे रहने की इच्छा रह गई अधूरी


अनिल जी के मन में नदी के प्रति गहरी श्रद्धा और असीम प्रेम था। इसकी बानगी हमें उनके कई रूपों में मिलती है। यह बहुत कम लोग जानते होंगे कि उन्होंने अपने सांसद आदर्श ग्राम योजना में चयनित होशंगाबाद जिले के गाँव जेहनपुर में ठीक नदी के पास करीब दो एकड़ में बना एक मकान अपने लिये लिया था। इस गाँव में बुनियादी सुविधाओं के लिये वे सतत प्रयासरत रहे और उन्होंने गाँव को कई सौगातें भी दिलाई। वे यहाँ नदी के पास रहना चाहते थे। उनका साधना कक्ष ठीक नदी की लहरों के सामने खुलता था। सरपंच हरिसिंह मीणा के मुताबिक उन्होंने यह मकान 2012 में खरीदा था और यहाँ अपने जीवन का उत्तरार्ध बीतना चाहते थे, लेकिन उससे पहले वे चले गए और उनकी यह इच्छा अधूरी ही रह गई।

पानी और पर्यावरण पर लिखी कई पुस्तकें


पानी, इतिहास कला, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण पर उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं। इनमें प्रमुख हैं 'नर्मदा समग्र' , 'सृजन से विसर्जन तक' , 'फ्रॉम अमरकंटक टू अमरकंटक' , 'समग्र ग्राम विकास' , 'शिवाजी और सुराज' , 'बियोंड ओपन हेरम' और 'शताब्दी के पाँच काले पन्ने'।

'शिवाजी और सुराज' किताब में उन्होंने लिखा है- " भारत जैसे कृषि प्रधान देश में आजादी से आज तक कृषि में जो प्रयोग हुए हैं उनके परिणाम सामने हैं। स्वतंत्र भारत के नीति निर्धारकों ने जो कृषि नीतियाँ बनाई उससे किसान के घर पैदा हुआ बेटा किसानी करने की बजाय शहरों में जाकर श्रमिक या बाबू बनना ज़्यादा पसंद करने लगा। गाँव का स्वच्छ पर्यावरण छोड़कर वह महानगरों की प्रदूषित झुग्गी बस्तियों में रहने को अपनी महानता समझने लगा। खेती लाभ का धंधा होना चाहिए यह वाक्य ही अर्धसत्य है। खेती धंधा नहीं बल्कि स्वयं में उत्पादन का कार्य है। कृषि क्षेत्र में होने वाले कार्य लाभप्रद कार्य बने यह उपयुक्त व्याख्या है। जो भी विसंगतियाँ पिछली शताब्दी में खड़ी हुई उसकी जवाबदारी किसान की नहीं शासकों की है। भारत का किसान अगर ज़्यादा ना माने तो भी उसी भूमि पर निरंतर पाँच हजार सालों से वह खेती कर रहा है।”

ऐसा करते हुए न उसने खेत खराब किया और ना ही पर्यावरण को कभी प्रदूषित किया उसने भूमि की अल्टा-पलटी की। फसल चक्र को बदला, भूमि की उर्वरता बनाए रखने के लिये हर वर्ष विशेष प्रयत्न किए। उसने कृषि करते हुए उत्तम धन से अपना जीवन चलाया और राज्य को लगान के रूप में योगदान भी दिया। अगर कहीं चूक हो रही है तो बात दिल्ली से लेकर राज्यों की राजधानी तक कृषि विभाग के कर्णधार द्वारा ही हो रही है, जिन्होंने जीवन में खेती करना तो छोड़ एक घंटे के लिये भी खेत में समय व्यतीत नहीं किया, ऐसे लोग कृषि नीति बनाते हैं। वे खेत-खलिहान, भंडारण, पशुधन, कृषि उत्पादन व विक्रय जैसे कृषि के विभिन्न आयामों पर बैठक और सेमिनारों में अपने विचार नियंता की तरह व्यक्त करते हैं।

कृषि सम्बंधी महत्त्वपूर्ण निर्णय करते हैं। ऐसी अवस्था में कृषि को नुकसान होता है। किसान कर्ज में डूबने लगता है और फिर किसान के पास कर्ज मुक्ति के लिये आत्महत्या करने के अलावा कोई मार्ग नहीं बचा रह जाता। उत्पादन बढ़ाने के लिये रासायनिक खेती की और उसके परिणाम बीस सालों में ही आ गए। धान का कटोरा कहे जाने वाले क्षेत्र सदियों के लिये कृषि कार्य हेतु अयोग्य होने की घोषणा की कगार तक आ पहुँचे हैं। रासायनिक खेतों को सीखने के लिये प्रचुर मात्रा में लगने वाले पानी की ज़रूरत ने भूजल स्तर को एक हजार फीट से भी अधिक नीचे पहुँचा दिया है। आधुनिक खेती के नाम पर हमने जो रास्ता चुना है, आज अनिवार्य रूप से पुनर्विचार और पुनर्परिवर्तन की माँग करता है।

वे आगे लिखते हैं कि आज का हमारा कृषि मार्ग सही है अथवा गलत, यह तो आने वाला समय ही निश्चित करेगा, लेकिन इतना ज़रूर है कि कृषि सम्मान का कार्य बने, लघु और सीमांत किसान कृषि की पैदावार से न केवल अपने परिवार का भरण पोषण करें बल्कि उसे अतिरिक्त आय भी प्राप्त हो, आय के उपयुक्त विनियोग से उसका जीवन स्तर ऊपर उठ सके, उसमें कृषि लागत को न्यूनतम रखते हुए कृषि पैदावार बढ़ाने की क्षमता बढ़े, इन सब बातों पर स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए विचार करने की ज़रूरत है। कृषि कार्य में विदेशी बीज, रासायनिक खाद, कीटनाशक दवाइयाँ और यंत्र साधनों का प्रयोग बढ़ने से कृषि की लागत हर वर्ष बढ़ती जा रही है। आजादी के प्रारंभिक वर्षों में नीति निर्धारकों को चमचमाती कार से उतर कर दूर खेतों में बैलों से चलने वाले हलों को देखने के स्थान पर ट्रैक्टर से खेती करते किसानों के दृश्य ज़्यादा अच्छे लगे। वह नहीं समझ पाए कि हल और बैल का मालिक किसान होता है, जबकि ट्रैक्टर उधार का है। उसका मालिक कोई बैंक या संस्था है, जिसके ब्याज का मीटर तब भी चलता है जब किसान अपने घर में सो रहा होता है। आप लोगों ने विदेश यात्राओं में जो दृश्य देखे उन्हें आँख मूँदकर भारत को समझे बिना भारत में उतारने लगे।

मेरी स्मृति में लगाएँ पेड़ और संरक्षण करें नदियों का


नदी महोत्सव 18 मई 2017 को उनका निधन पानी और नदियों के लिये समाज में काम करने वाले लोगों के लिये व्यक्तिगत नुकसान है। उनके चले जाने से यह काम धीमा हो सकता है लेकिन उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके अधूरे काम को आगे बढ़ाएँ। उन्होंने खुद अपनी वसीयत में भी साफ़ लिखा है- "मेरी स्मृति में कोई भी स्मारक, प्रतियोगिता, पुरस्कार, प्रतिमा इत्यादि जैसे विषय न चलाएँ। जो मेरी स्मृति में कुछ करना चाहते हैं। वे कृपया वृक्ष रोपें। वैसे ही नदी-जलाशयों के संरक्षण में अपने सामर्थ्य अनुसार अधिकतम प्रयास भी किए जा सकते हैं। ऐसा करते हुए भी मेरे नाम से बचेंगे।"

फिलहाल उनके कामों की पर्यावरण और नदियों के क्षेत्र में महती ज़रूरत थी। उन्होंने गहरे अध्यवसाय, चिंतन और मंथन से पर्यावरण को बेहतर बनाने के सूत्र सामने रखे थे। इस समय उनकी योजनाएँ मूर्त रूप आनी थी और इसका फायदा देश के पानी और पर्यावरण को मिलना था लेकिन दुर्भाग्य की नियति ने उन्हें हम से छीन लिया। उनका निधन पानी और नदियों के लिये समाज में काम करने वाले सभी प्रहरियों के लिये व्यक्तिगत नुकसान की तरह है। उनके चले जाने से यह काम धीमा हो सकता है लेकिन उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके अधूरे काम को आगे बढ़ाएँ।

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