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प्रकाश से प्रदूषण (Pollution from light)

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पर्यावरण प्रदूषण : एक अध्ययन, हिंद-युग्म, नई दिल्ली, अप्रैल 2016

प्रकाश का प्रदूषण रात के समय आसमान पर दिखने वाली चमक-दमक को कहते हैं। प्रकाश का प्रदूषण हमारे घरों में दरवाजों और खिड़कियों के जरिये बाहर सड़कों पर लगे हुए बिजली के खम्भों और लैम्पों से भी घुस आता है। जो मौजूदा जिन्दगी में अनिवार्य और जरूरी चीज बन जाता है। इस तरह का प्रदूषण पर्यावरण में प्रकाश की वजह से लगातार बढ़ रहा है। इसको रोकने या कम करने का तरीका यही है कि बिजली या रोशनी का उपयोग जरूरत पड़ने पर ही किया जाये। प्रकाश का प्रदूषण तीन तरह से फैलता है -

1. आसमान की चमक-दमक लालिमा से।
2. घरों के अन्दर और बाहर से आने वाला प्रकाश। चौंधिया देने वाला तेज प्रकाश।
3. लगातार निकलने वाली आसमान की चमक-दमक या लालिमा।

प्राकृतिक रूप से पाँच तरह के प्रकाश प्रदूषण होते हैं-


1. प्रकाश का प्रदूषण चाँद और सूरज पर निर्भर करता है।
2. सुबह के वक्त मध्यम मगर स्थाई लालिमा।
3. वातावरण में फैली हुई रोशनी।
4. सुदूर स्थित सितारों से आने वाली रोशनी।
5. कुछ प्राकृतिक गैसों और चमकदार पदार्थों से झलकती हुई धुंधली रोशनी।

इन सब प्राकृतिक कारकों से आने वाली रोशनी की वजह से आसमान पर रात के वक्त तमतमाती हुई लालिमा या दमक हमें नजर आती है। इसी के साथ ही मानवीय कारणों से भी यह लालिमा या चमक आसमान पर दिखाई देती है। बिजली की रोशनी से ऊपर की तरफ जाती है और अपने साथ मिट्टी व गुबार के जरिये और गैस के कण भी वातावरण में फैलाती जाती है, जिसके नतीजे में वहाँ चमक-दमक पैदा हो जाती है जिसकी वजह से अक्सर बहुत से सितारे हमारी नजर से ओझल रहते हैं। वातावरण में गैस के कणों की मात्रा अधिक हो जाने से धुन्ध छा जाती है, जिससे खगोलविदों को प्रेक्षण में बाधा आती है।

आसमान की चमक से वहाँ के प्रकाशित हिस्से और ज्यादा रोशन हो जाते हैं, जिससे कम प्रकाश वाले तारे ठीक से प्रेक्षकों को दिखाई नहीं देते। इसीलिये खगोलविद साफ और सुहाने मौसम की रातों को पसन्द करते हैं जिसमें वो अपना काम आसानी से कर सकें।

रात के वक्त चमक-दमक वाला आसमान कुदरती हालत वाले आसमान से 5-10 गुना प्रकाशमान होता है। बल्कि कुछ केंद्रों पर तो वे 25 से लेकर 50 गुना ज्यादा चमकदार पाया गया है। आसमान की इस चमक दमक या लालिमा में बराबर बढ़ोत्तरी हो रही है। चुनांचे ‘फ्लेग स्टाफ अरिजोना’ की मार्स हल लेबोरेटरी के अनुमान के अनुसार सन 1976 और सन 1988 के बीच में आसमान की चमक-दमक में 0.5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। जिसका मतलब यह है कि कुछ तारे और आकाशीय पिंड नजर से इतना दूर हो जायेंगे कि इनकी पहचान बहुत मुश्किल हो जायेगी।

घरों के अन्दर और बाहर से घुस आने वाली रोशनी


इससे आशय यह है कि ऐसी रोशनी का निकास और फैलाव ऐसी जगह होना जहाँ इसकी जरूरत न हो। हालांकि, यह बताना या अन्दाजा लगाना बहुत मुश्किल है कि किसी खास जगह कितनी रोशनी जरूरी है और कितनी गैर जरूरी है। बाहर से घुस आने वाली रोशनी की सबसे अच्छी मिसाल सड़कों पर स्ट्रीट लाइट या फिल्ड लाइट ट्यूब हैं जिनकी रोशनी खिड़कियों और दरवाजों से घुसकर घरों के बहुत से हिस्सों को रोशन कर देती है।

चकाचौंध करने वाली रोशनी


यह एक दृष्टि सम्बन्धी अनुभव है जो बहुत ज्यादा और बर्दाश्त न हो सकने वाली तेज रोशनी से आँखों पर होता है। कई बार इससे नुकसान भी हो सकता है। मगर आमतौर पर इसका विपरीत असर महसूस होता है। आज की दुनिया में यह अपरिहार्य है। बुजुर्ग और कमजोर लोगों को इससे तकलीफ पहुँचती है। और उनकी आँखें इसे बर्दाश्त नहीं कर पातीं। तेज चौंधिया देने वाली रोशनी देखने की ताकत पर बुरा असर डालती है। वैसे भी एकदम से तेज रोशनी अच्छी नहीं लगती और इन्सान दर्द या उलझन महसूस करने लगता है।

आज कल शहरों में सड़कों पर फील्डलाइट ट्यूब या खूब तेज रोशनी देने वाले बल्ब लगाये जाते हैं जिनकी वजह से परेशानी बढ़ती ही चली जा रही है। उससे बचने की सूरत नजर नहीं आती। सिनेमा हॉल, जलशों, तकरीरों और चौंधिया देने वाली तेज रोशनी का रिवाज आम हो चुका है और इस प्रदूषण के नुकसान का एहसास लोगों को नहीं है।

रोशनी का प्रदूषण वातावरण पर किस तरह और क्या असर डालता है


यह एक हकीकत है कि तेज रोशनी जो घर के अन्दर या बाहर से घुस आती हो, हर हाल में कुछ अरसा के बाद अपना असर दिखाती है। बरसों के अन्वेषण से पता चला है कि घरों के अन्दर फ्लोरेसन्ट ट्यूब और तेज रोशनी से माइग्रेन, सिर दर्द, थकावट, चिड़चिड़ाहट जैसी शिकायत पैदा हो जाती है। घर के बाहर सड़कों पर पब्लिक इमारतों में रात के वक्त दुर्घटनाओं को रोकने के लिये खूब तेज रोशनी का इस्तेमाल किया जाता है। जिससे पर्यावरण में प्रदूषण बढ़ जाता है।

अनुभव और खोज से पता चला है कि ऐसी रोशनी से अपराध में कोई खास कमी तो नहीं आई अलबत्ता हर साल सिर्फ एक लाइट पर कई टन कोयला खर्च हो जाता है। अगर आप रात के वक्त आसमान की चमक-दमक की तरफ नजर करें तो आप को उसमें मध्यम रोशनी की धुन्ध भी दिखाई देगी। यही रोशनी के प्रदूषण का सबूत है। इस मसले पर सालों से खोज व अध्ययन का काम जारी है और रात के वक्त शहरों और देहातों के साफ आसमान की अलग-अलग तस्वीरें खींची जाती हैं जिसमें मालूम होता है कि रात के वक्त रोशनी से कैसा प्रदूषण माहौल में घुल रहा है और यह बहुत ही खतरनाक समस्या है। इस तरह स्थाई तेज रोशनी के इन्तजाम से फसलों, दरख्तों और जानवरों को जबरदस्त नुकसान हो सकता है। पौधों को बढ़ने और जिन्दा रहने के लिये अंधेरा और रोशनी दोनों ही की जरूरत पड़ती है अंधेरा बीज को फूल में बदलने और पौधे को जिन्दगी देने में मदद देता है। रात के वक्त रोशनी की ज्यादती से घबराकर चिड़िया खिड़कियों, मीनारों और वीरान इमारतों की तरफ उड़कर जाने की कोशिश करती हैं।

रोशनी का दुष्प्रभाव मेढकों और रात के वक्त जागने वाले कीड़े-मकोड़ों की प्रजनन क्षमता पर भी पड़ता है। इन्सानी आँख को कुदरत ने इतनी ताकत दी है कि वह मानसूनी रोशनी और उसके दबाव को बर्दाश्त कर लेती है, मगर तेज और चौंधिया देने वाली रोशनी और उसकी ज्यादती उसको नुकसान पहुँचाती है। इससे देखने की क्षमता प्रभावित होती है। यह ऐसा खतरा है जो आने वाली नस्लों को और ज्यादा परेशान और प्रभावित करेगा। कुदरत ने जो साफ-स्वच्छ वातावरण मानव जीवन को कायम रखने के लिये बनाया है हमें उसकी हर कीमत पर हिफाजत करना चाहिए यह हमारा फर्ज है कि इस महत्त्वपूर्ण मुद्दे को हल करने का प्रयास करें।

एक जानी मानी सामाजिक कार्यकर्ता ने लिखा है कि इस महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं है। इसके सम्बन्धी जरूरी जानकारी और उपाय बताने के लिये उन्होंने एक वेबसाइट बनाई है, जिससे लोग फायदा उठा सकते हैं। और यह जान सकते हैं कि रोशनी के प्रदूषण को कैसे काम किया जा सकता है।

तेज रोशनी एक कष्टदायक चीज है। रात के वक्त सुरक्षा और माहौल को ठीक रखने के लिये यह जरूरी भी है। रोशनी के प्रदूषण को आसानी से कम किया जा सकता है-

1. रोशनी (बिजली) की फिटिंग इस तरह की जाय कि उससे निकलने वाली रोशनी कम मात्रा में ऊपर की तरफ जाये।
2. बल्ब, ट्यूब वगैरह उचित जगहों पर फासलों पर नीचे की तरफ झुकाकर लगाये जायें।
3. रोशनी का इस्तेमाल कम-से-कम किया जाये।
4. गैर जरूरी रोशनी को बुझा दिया जाये। खासकर सजावट करने वाली रोशनी और इश्तेहारों के पोस्टरों और खेमों में देखा जाता है कि रात भर बल्ब जलते रहते हैं। यह गलत तरीका है। सुबह होने पर रोशनियों को गुल कर देना चाहिए।

खुशी की बात है कि रोशनी प्रदूषण के खिलाफ बहुत सी संस्थाएं हरकत में आ गई हैं। खासकर आसमान पर रोशनी के प्रदूषण के खिलाफ उनका कहना है कि आसमान पर ज्यादा अंधेरा रहना चाहिये। शहरी महकमों, लोकल सेल्फ कौंसिल और कॉर्पोरेशन रोशनी के डिजाइन बनाने वाले इंजीनियरों को इस बात का एहसास हो रहा है कि रोशनी के प्रदूषण को कम करने की जरूरत है।

कानून बनाने की जरूरत


रोशनी के प्रदूषण को एक कानूनन अपराध करार देना चाहिए और इसे सख्ती से लागू किया जाना चाहिये।

 

पर्यावरण प्रदूषण

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

1

पर्यावरण प्रदूषण : आपबीती

2

प्रदूषण के भिन्न पहलू (Different aspects of pollution)

3

जल प्रदूषण और मानव स्वास्थ्य (Water pollution and human health)

4

वायु प्रदूषण और मानव जीवन (Air pollution and human life)

5

ध्वनि प्रदूषण और मानव स्वास्थ्य (Sound pollution and human health)

6

आर्सेनिक से पर्यावरण में प्रदूषण (Pollution in the environment from Arsenic)

7

प्रकाश से प्रदूषण (Pollution from light)

8

वातावरण में नमक की वजह से प्रदूषण (Road Salt Contamination)

9

सीसा जनित प्रदूषण (lead pollution in the environment)

10

रेडियोएक्टिव पदार्थों के कारण प्रदूषण (Radioactive Pollution)

11

आतिशबाजी के खेल से पर्यावरण में प्रदूषण (Pollution in the environment by fireworks)

12

लेखक परिचय - डॉ. रवीन्द्र कुमार

 


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