तीन साल : गंगा बदहाल

Submitted by Hindi on Thu, 06/01/2017 - 11:28
Printer Friendly, PDF & Email


चार जून - गंगा दशहरा पर विशेष

.चार जून को गंगा दशहरा है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी अर्थात गंगा अवतरण की तिथि। कहते हैं कि राजा भगीरथ को तारने गंगा, इसी दिन धरा पर आई थी। जब आई, तो एक चक्रवर्ती सम्राट होने के बावजूद, राजा भगीरथ स्वयं गंगा का पायलट बनकर रास्ते से सारे अवरोध हटाते आगे-आगे चले। गंगा को एक सम्राट से भी ऊँचा सम्मान दिया। धरती पुत्र-पुत्रियों ने गंगा की चरण-वन्दना की; उत्सव मनाया। परम्परा का सिरा पकड़कर हम हर साल गंगा उत्सव मनाते जरूर हैं, किंतु राजा भगीरथ ने जैसा सम्मान गंगा को दिया, वह देना हम भूल गये। उल्टे हमने गंगा के मार्ग में अवरोध ही अवरोध खड़े किए। वर्ष 1839 में गंगा से कमाने की पहला योजना बनने से लेकर आज तक हमने गंगा को संघर्ष के सिवा दिया क्या है? हमने गंगा से सिर्फ लिया ही लिया है। दिया है तो सिर्फ प्रदूषण, किया है तो सिर्फ शोषण और अतिक्रमण।

हम इतने स्वार्थी हैं कि गंगा के शोषण के खिलाफ जान हथेली पर लेकर आगे बढ़े स्व. स्वामी श्री निगमानंद जी, स्वामी श्री ज्ञानस्वरूप सानंद जी के साथ भी खड़े दिखाई नहीं दिए। इसी मई के अंत में गंगा में खनन के खिलाफ अनशन पर बैठे मातृ सदन, हरिद्वार के स्वामी श्री शिवानंद सरस्वती जी पर पुलिस ने बल प्रयोग किया। ऐसे में भी क्या समाज या सरकार की संवेदना जगी? नहीं, तो क्या ऐसे मुर्दा समाज अथवा सरकार को हक है कि हम गंगा दशहरा का उत्सव मनायें? पलटकर पिछले तीन साल का चित्र देखता हूँ, तो ‘नमामि गंगे’ कहकर गंगा के नाम पर पैसा गँवाने और शोषण बढ़ाने के अलावा कोई चित्र नहीं दिखता। आइये, इस चित्र से परिचित हों।

 

एक आकलन, नमामि गंगे


कहते हैं कि प्रधानमंत्री श्री मोदी जी जब बोलते हैं, तो उनकी बोली में संकल्प दिखाई देता है। कभी माँ गंगा को भी दिखाई दिया था। मोदी जी ने इस संकल्प की पूर्ति के लिये जल मंत्रालय के साथ ‘गंगा पुनर्जीवन’ शब्द जोड़ा। गंगा भक्त कही जाने वाली साध्वी सुश्री उमा जी को उसका मंत्री बनाया। पाँच साल के लिये 20 हज़ार करोड़ रुपये की वित्त व्यवस्था की। अनिवासी भारतीयों से आह्वान किया। नमामि गंगे कोष बनाया। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन बनाया। अस्सी घाट पर श्रमदान किया। उन्होंने यह सब किया, लेकिन अपने ही लोकसभा क्षेत्र वाराणसी में गंगा से मिलने वाले अस्सी नाले को निर्मल करने की कोई ठोस कोशिश आज तक नहीं कर सके। गंगा, वाराणसी के घाटों से दूर हो रही है। उन्होंने क्या किया? प्राधिकरण का अध्यक्ष होने का बावजूद, गंगा के लिये हुई बैठकों के लिये वक्त देना तक उन्होंने ज़रूरी नहीं समझा। संभवतः उन्हें अपने से ज्यादा, अपने मंत्रियों पर भरोसा रहा हो।

 

मंत्रियों ने क्या किया?


पर्यावरण मंत्री, वर्ष 2006 की पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना में बदलाव का प्रारूप ले आये। मकसद था कि अधिसूचना का उल्लंघन करने के बावजूद परियोजनायें चलती रहे। उन्हें पर्यावरण अनुपूरक योजना के साथ काम करने की छूट देने की बात की। भला नदी का भी कोई विकास कर सकता है? चूँकि जल मंत्रालय में ‘गंगा पुनर्जीवन’ के साथ-साथ ‘नदी विकास’ शब्द भी जोड़ा गया था; लिहाजा, परिवहन मंत्री नितिन गडकरी जी ने गंगा पुनर्जीवन से ज्यादा ‘नदी विकास’ के नाम पर नदी से व्यापार में रुचि दिखाई। वह भारत की सभी प्रमुख नदियों पर ड्रेजिंग, टर्मिनल निर्माण और बैराज निर्माण वाली जलमार्ग परियोजना ले आये।

हल्दिया से इलाहाबाद तक गंगा पर बनने वाले राष्ट्रीय जलमार्ग संख्या - एक के लिये 37 करोड़, 50 लाख डाॅलर कर्ज भी मंजूर करा लाये। बिहार शासन ने भी आगे बढ़कर अपनी छह नदियों पर जलमार्ग की सहमति दे दी: गंडक पर 37 मेगावाट, कर्मनासा पर 54, कोसी पर 58, पुनपुन पर 81 और सोन पर 94 मेगावाट। संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री ई नौका सजाने वाराणसी पहुँच गये। डाक मंत्री, गंगाजल बेचने की सुविधा ले आये। ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल की रुचि जल विद्युत परियोजनाओं को चलाने और बढ़ाने में हो सकती थी। उन्होंने यही किया। जलविद्युत परियोजनायें पर्यावरण मानकों का पालन करें। श्री गोयल ने इसमें कोई रुचि नहीं दिखाई। पर्यावरण मानकों की अनदेखी के लिये राष्ट्रीय हरित पंचाट द्वारा टिहरी हाइड्रो डवलपमेंट कार्पोरेशन पर ठोका 50 लाख रुपये का जुर्माना इसका प्रमाण है।

पूछने लायक प्रश्न है कि क्या इन कदमों से गंगा को कोई लाभ हुआ? नहीं, उल्टे जलमार्ग परियोजनाओं के कारण गंगा बेसिन की नदियों के मार्ग में अवरोध, गाद से कृत्रिम छेड़-छाड़, परिणामस्वरूप कटान तथा कचरे का अंदेशा और बढ़ हो गया है। गौर कीजिए कि बिहार शासन को पिछले पाँच साल में कटान राहत के काम में 1058 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े हैं। कृत्रिम ड्रेजिंग का ताजा दुष्प्रभाव यह है कि भागलपुर के बरारी घाट पर गंगा के मध्य गहराई घटी है और किनारे पर बढ़ गई है।

 

ज्ञान बहुत, संकल्प शून्य


प्रदूषित गंगासब जानते हैं कि गाद में मिलकर सीमेंट की भाँति जम जाने वाला मल भी गाद के बहने में एक रुकावट ज़रूर है, लेकिन नदी मध्य थमी गाद का मूल कारण, नदी की त्रिआयामी अविरलता में पेश की गई रुकावटें ही होती हैं। क्या उन्हें हटाने की कोई कोशिश केन्द्र अथवा किसी गंगा मार्ग की किसी राज्य सरकार द्वारा हुई? शासन यह भी जानता है कि त्रिआयामी अविरलता, प्रवाह की मात्रा तथा वेग में बढ़ोत्तरी सुनिश्चित किए बगैर निर्मलता संभव नहीं हैं। अविरलता सुनिश्चित करने के लिये तय करना ज़रूरी है कि कम से कम गंगा के मुख्य प्रवाह पर और बाँध-बैराज न बनें। बन चुके बाँध-बैराज सतत इतना प्रवाह अवश्य छोड़ें, ताकि गाद की प्राकृतिक तौर पर उड़ाही प्रक्रिया और नदी की स्वयं को निर्मल करने लायक वेग बचा रहे। इसके लिये डिज़ाइन बदलना हो, तो बदले; ढाँचों को ढहाना हो, तो ढहायें। सुनिश्चित किया जाये कि बाढ़ मुक्ति अथवा परिवहन सुविधा के नाम पर गंगा के निचले तट की तरफ एक्सप्रेस-वे अथवा दिल्ली कोलकाता काॅरीडोर जैसी किसी परियोजना को मंजूर नहीं किया जायेगा; कारण कि बेहतर विकल्प कुछ और है। प्रश्न कीजिए कि क्या तीन साल में यह हुआ?

गंगा मंत्री बनने से पहले सुश्री उमा जी, श्रीनगर बाँध परियोजना की चपेट में आये धारी देवी मंदिर को बचाने को ज़मीन-आसमान एक कर देने का ऐलान करते दिखीं। मंत्री बनते ही गंगा प्रवाह में बाँध परियोजनाओं पर लगाम लगाना तो दूर, उनसे सतत आवश्यक न्यूनतम प्रवाह भी सुनिश्चित नहीं करा सकी। उत्तराखण्ड में रेत माफिया को बढ़ावा देने की शासकीय कोशिशों के खिलाफ स्वामी शिवानंद सरस्वती अनशन पर बैठने को विवश हैं। लेकिन उमाजी, इस गंगापुत्र की गंगा हितैषी मांग के पक्ष में कहीं खड़ी नहीं दिखाई दे रही। वह नैनीताल हाईकोर्ट की सीमा में गंगा को जीवित मानव दर्जे का भी सम्मान नहीं कर रही। न्यायमूर्ति गिरधर मालवीय की अध्यक्षता में गंगा पर कानून बनाने वाली समिति को बने कितना वक्त गुजर गया। गंगा संरक्षण कानून कब बनेगा? इसका अभी भी कुछ पता नहीं है। उमाजी ने कहा था कि अवजल शोधित हो अथवा अशोधित..उसे गंगा में नहीं जाने देंगे। गंगा, 250 से अधिक सहायक छोटी-बड़ी नदियों से मिलकर बनी नदी है। तीन साल में गंगा तो दूर, गंगा की किसी एक छोटी सी सहायक नदी पर भी वह यह वादा पूरा करने का दावा आपने नहीं सुना होगा।

 

बेबस मंत्री, हावी कर्जदाता


मेरा मानना है कि उमाजी, ठीक से जानती हैं कि सिर्फ शहरों में सीवेज पाइप बिछाने, मल शोधन संयंत्र लगाने, गाँव-गाँव शौचालय बनाने, गंगा रक्षक बल बनाने अथवा संस्थाओं को पाँच-पाँच गाँव की परियोजनायें बाँटने से गंगा निर्मल नहीं होने वाली; किंतु वह कर नहीं सकती। उमाजी यह भी जानती हैं कि प्रवाह बढ़ाने के लिये गंगा बेसिन की हर नदी और प्राकृतिक नाले में पानी की आवक भी बढ़ानी होगी। इसके लिये गंगा खादर में बसावटों पर रोक लगानी होगी। छोटी नदियों को पुनर्जीवित करना होगा। शोधित जल-नहर में और ताज़ा पानी नदी में बहाना होगा। नदियों को सतह अथवा पाइप से नहीं, बल्कि भूगर्भ तंत्रिकाओं के माध्यम से जोड़ना होगा। जहाँ कोई विकल्प न हो, वहाँ छोड़ लिफ्ट कैनाल परियोजनााओं को न बोलना होगा। जलदोहन नियंत्रित करना होगा।

वर्षाजल संचयन ढाँचों से कब्जे हटाने होंगे। जिस फैक्टरी, व्यावसायिक उपक्रम अथवा कृषक समुदाय ने जितना और जैसा जल जिस स्रोत से लिया, उसे उतना और वैसा जल वापस लौटाने के कायदा बनाना होगा। कायदे की पालना सुनिश्चित करनी होगी। गंगा और इसकी सहायक नदियों में रेत खनन नियंत्रित करने से नदी की जल संग्रहण क्षमता बढ़ेगी। इससे गंगा का प्रवाह बढ़ेगा; बावजूद इस जानकारी के उमा जी का गंगा मंत्रालय ने इनमें से एक भी कदम को ज़मीन पर उतार सका है ? क्यों ? क्योंकि गंगा, अब कर्जदाता एजेसिंयों के सदस्य देशों की कमाई का एजेंडा है। समस्या भी बनी रहे और समाधान भी चलता रहे; कर्जदाता एजेंसियों का यही एजेंडा है। भारत में गंगा और पानी के कार्यक्रम जनता अथवा जनप्रतिनिधि के हिसाब से नहीं, कर्जदाता एजेंसियों द्वारा सौंपे प्रारूप के हिसाब से बनाये जाते हैं।

गंगाजानते हुए कि केन-बेतवा नदी जोड़ नदी गुण के विपरीत काम नहीं है; उमा जी इस जोड़ के लाभ गिना रही हैं और परियोजना को हरी झंडी देने के लिये दबाव बना रही हैं। इसे कर्जदाता एजेंसी का दबाव न कहें, तो क्या कहें?? हम समझ सकते हैं कि उन पर परियोजना लागत के रूप मे आंकी गई 18,000 करोड़ रूपये की धनराशि का कितना दबाव होगा। तीन साल में गंगा समृद्धि में कुछ भी ठोस योगदान न कर पाने की अपनी बेबसी को छिपाने के लिये उमा जी कभी राज्य सरकारों पर असहयोग का ठीकरा फोड़ती हैं और कभी आकलन का बहाना लेकर गंगा यात्रा पर निकल जाने और कभी गंगा में कूद जाने की बात कहती हैं। वह भूल जाती हैं कि गंगा को राष्ट्रीय नदी इसीलिए घोषित किया गया था, ताकि गंगा अविरलता और निर्मलता सुनिश्चित करने की मुहिम राज्य और केन्द्र के झगड़ों में फँसने से बच जाये। कहना न होगा कि जितनी उम्मीदें होती हैं, उतनी निराशा भी होती है। बीते तीन सालों में गंगा को लेकर केन्द्र सरकार को कोर्ट ने जितनी डाँट पिलाई, उतना कभी नहीं हुआ। राष्ट्रीय हरित पंचाट को तो गढ़मुक्तेश्वर की गंगा परियोजना को लेकर सीबीआई जाँच तक के आदेश करने पड़े। गोमती रिवर फ्रंट में घोटाले की बात लेकर योगी सरकार सामने आई है। गंगा की ज़मीनी हक़ीकत से दफ्तरी फाइलों से मिलान करेंगे, तो घोटाले कई और निकलेंगे और लपटें, गंगा मंत्रालय तक पहुँचेगी।

 

राजनीति ज्यादा, आस्था कम


ताजा परिदृश्य यह है कि उमाजी अब अपना भविष्य गंगा से ज्यादा, राममंदिर में देख रही हैं। श्रीमान नीतीश जी कह रहे हैं; फरक्का बैराज तोड़ो। माननीय शंकराचार्य स्वामी श्री निश्चलानंद जी कह रहे हैं; टिहरी हटाओ। शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद जी के शिष्य प्रतिनिधि स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद जी कह रहे हैं कि आगामी अक्तूबर में गंगा संसद करेंगे; गंगा स्वतंत्रता संग्राम छेड़ेंगे। बतौर सांसद, श्री आदित्यनाथ योगी जी ने कभी गोरखपुर की अति प्रदूषित नदी आमी की परवाह नहीं की। बतौर मुख्यमंत्री, अब श्री योगी ने गंगा सेवा यात्रा का निश्चय किया है। इसके लिये 400 करोड़ रुपये मंजूर करने की बात भी समाचारपत्रों में छपी। अब श्री योगी कह रहे हैं कि गंगा का अपमान करना राष्ट्रद्रोह है। ऐसे ऐलानों को लेकर मैं यहाँ इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये विवश हूँ कि सब के सब राजनीति कर रहे हैं। यदि श्रीमान नीतीश जी राजनीति नहीं कर रहे, तो फरक्का बैराज से पहले गंगा और इसकी स्थानीय सहायक नदियों की त्रिआयामी अविरलता में बाधक स्थानीय कारणों को खत्म करें।

यदि शंकराचार्य जी राजनीति नहीं कर रहे, तो जिन स्वामी श्री ज्ञानस्वरूप सानंद जी का 121 दिन लंबा अनशन उन्होंने यह आश्वासन देकर तुड़वाया था कि जब भाजपा की सरकार आयेगी, तो तीन माह के भीतर उनकी मांग पर विचार करेगी; उनकी मांग को लेकर अब तीन साल बाद ही सही, स्वयं शंकराचार्य श्री निश्चलानंद जी स्वयं अनशन पर बैठें। यदि स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद जी राजनीति नहीं कर रहे, तो उन्हेें चाहिए कि वह बतायें कि तीन साल चुप क्यों रहे? गंगा जैसी माँ और राष्ट्रीय नदी में मलीन नाले अथवा अवजल डालना, गंगा का अपमान है। यदि मुख्यमंत्री योगी जी राजनीति नहीं कर रहे, तो गंगा में मलीन नाले डालने वाले स्थानीय निकायों, सबंधित समितियों, जहरीला अवजल डालने वाली फैक्टरियों तथा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के जवाबदेह प्रमुखों पर शासन की ओर राष्ट्रद्रोह के व्यक्तिगत/संस्थागत मुक़दमे दर्ज करायें।

 

Add new comment

This question is for testing whether or not you are a human visitor and to prevent automated spam submissions.

12 + 8 =
Solve this simple math problem and enter the result. E.g. for 1+3, enter 4.

More From Author

Related Articles (Topic wise)

Related Articles (District wise)

About the author

अरुण तिवारीअरुण तिवारी

शिक्षा:


स्नातक, पत्रकारिता एवं जनसंपर्क में स्नातकोत्तर डिप्लोमा

कार्यवृत


श्रव्य माध्यम-

Latest