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कब पानीदार होंगे हम

Author: 
आनंद मिश्र
Source: 
‘और कितना वक्त चाहिए झारखंड को?’ वार्षिकी, दैनिक जागरण, 2013

जल नीति में जल आयोग का गठन व बढ़ती हुई शहरी आबादी की जरूरत को ध्यान में रखते हुए शहरों के पास जलाशयों के निर्माण पर जोर दिया गया है। जल के उपयोग की प्राथमिकता के तहत पशुधन सहित मानव के पीने, स्वच्छता और सफाई जैसी आवश्यकताओं को सबसे ऊपर रखा गया है। विभाग स्वयं स्वीकारते हैं कि जिस सेक्टर को जितना पानी दिया जाना चाहिए उतना नहीं दिया जा पा रहा है। औसतन 1400 मिमी वर्षा होने के बावजूद राज्य पानीदार नहीं हो पा रहा है। वर्षा का पानी नालों में बह जा रहा है। मैग्सेसे पुरस्कार विजेता राजेंद्र सिंह भी कहते हैं कि यदि झारखंड में पानी पर आत्मनिर्भरता नहीं बढ़ती है तो यहाँ स्थिति विस्फोटक हो सकती है।

शहरी-ग्रामीण क्षेत्र में पानी की स्थिति :


शहरी क्षेत्रों में प्रतिव्यक्ति 135 लीटर व ग्रामीण क्षेत्रों में 40 लीटर पानी की प्रति व्यक्ति आवश्यकता का आकलन राष्ट्रीय स्तर पर किया गया है। हम यह आवश्यकता पूरी नहीं कर पा रहे हैं। स्थिति यह है कि सूबे के 24 शहरी निकायों में 1616.95 लाख गैलन पानी की आवश्यकता है जबकि उपलब्धता महज 734.35 लाख गैलन है। ग्रामीण क्षेत्रों की वस्तुस्थिति भी तकरीबन यही है। विभागीय दावे की मानें तो ग्रामीण क्षेत्रों को 40 लीटर प्रतिदिन प्रति व्यक्ति पानी की आवश्यकता है और उन्हें 61 लीटर मुहैया कराया जा रहा है। हालांकि विभागीय दावा चाहे जो कहे, पर ग्रामीण इलाकों में लोगों को पानी के लिये तरसते देखा जा सकता है।

कृषि उपलब्धता:


झारखंड का कृषि क्षेत्र भी पानी की मार झेल रहा है। यहाँ 23 लाख हेक्टेयर खेती योग्य भूमि पर महज 10-12 फीसदी पर ही सिंचाई की सुविधा मुहैया हो पाई है। यह दावा कृषि विभाग का है, जल संसाधन विभाग की मानें तो 34 फीसदी भूमि पर खेती के लिये पानी मुहैया कराया गया है। हालांकि यह भी राष्ट्रीय औसत 67 प्रतिशत से काफी कम है। जल संसाधन विभाग की 7 बड़ी सिंचाई योजनाएँ व 21 मध्यम सिंचाई योजनाएँ वर्षों से लम्बित हैं। खेतों को महज 3813.17 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी ही मिल पा रहा है, जबकि आवश्यकता 10592.15 मिलियन क्यूबिक मीटर से अधिक की है।

उद्योग की आवश्यकता:


पानी के लिये उद्योग भी तरस रहे हैं। उद्योगों को करीब 4338 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी चाहिए, जबकि उन्हें मिल मात्र 3790 मिलियन क्यूबिक मीटर ही रहा है। राज्य में अभी उद्योगों का जाल बिछाया जाना है। जितने एमओयू हुए हैं, वहीं अगर धरातल पर आ गए, तो इससे करीब दोगुना अधिक पानी की जरूरत होगी।

भू-गर्भ जल का हो रहा अंधाधुंध दोहन :


झारखंड में भू-गर्भ जल का अंधाधुंध दोहन हो रहा है। यहाँ अन्य राज्यों से 2.5 गुना अधिक भू-गर्भ जल का दोहन हो रहा है। स्थिति यह कि आज शहरी क्षेत्रों में 60 फीसदी व ग्रामीण क्षेत्रों में 93 फीसदी पानी की आपूर्ति भू-गर्भ जल से की जा रही है। पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के आँकड़े बताते हैं कि 2004 से 2009 के बीच भू-गर्भ जल का दोहन दोगुना बढ़ा है। झारखंड गठन के 11 साल बाद भी सरकार महज 7 फीसदी ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल के लिये पाइपलाइन की व्यवस्था कर पाई है। शेष 93 फीसदी आबादी चुआँ, कुआँ, चापाकल या अन्य स्रोतों पर निर्भर है।

शहरी क्षेत्रों में भी महज 40 फीसदी आबादी को ही पेयजल की आपूर्ति पाइपलाइन से की जा रही है। शेष भूगर्भ जल पर निर्भर है। ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट से लोगों को निजात दिलाने का सरकार को सबसे सहज तरीका चापाकल लगाना ही सूझा। स्थिति यह है कि वर्ष 2002 में जहाँ प्रत्येक 91 व्यक्ति पर एक चापाकल था, वह अब घटकर 61 पर पहुँच गया। राष्ट्रीय औसत 250 व्यक्ति पर एक व्यक्ति का है। झारखंड में चापाकलों की संख्या 3.50 लाख हो गई है। सूबे में औसतन 140 लीटर पानी प्रति व्यक्ति के हिसाब से भू-गर्भ जल का दोहन किया जा रहा है।

झारखंड राज्य जल नीति-2011 : पानी पर पहला हक मनुष्य व पशु का


झारखंड में मौजूदा उपलब्ध जल संसाधन पर पहला हक मनुष्य व पशु का है, इसके बाद ही इसे अन्य क्षेत्रों में उपयोग की अनुमति दी जाएगी। राज्य सरकार ने अपनी प्रस्तावित ‘जल नीति’ में इसे आधार बनाया है। पहली बार जल संसाधन विभाग द्वारा बनाई गई जल नीति का प्रारूप फाइनल कर लिया गया है और सुझावों के बाद इसे अमल में लाया जाएगा।

जल नीति में जल आयोग का गठन व बढ़ती हुई शहरी आबादी की जरूरत को ध्यान में रखते हुए शहरों के पास जलाशयों के निर्माण पर जोर दिया गया है। जल के उपयोग की प्राथमिकता के तहत पशुधन सहित मानव के पीने, स्वच्छता और सफाई जैसी आवश्यकताओं को सबसे ऊपर रखा गया है। इसके बाद कृषि, सिंचाई, मत्स्य पालन को प्राथमिकता दी गई। जल विद्युत विकास व कृषि आधारित उद्योगों को प्राथमिकता कृषि के बाद तय की गई है। इसके बाद औद्योगिक विकास तथा अन्य प्रयोजन के लिये जल का उपयोग किया जा सकेगा। जल संरक्षण के तमाम उपायों का भी जिक्र किया गया है। प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिये भी सख्त प्रावधान किए गए हैं। सामान्य रूप से जल नीति की समीक्षा प्रत्येक पाँच वर्ष के पश्चात की जाएगी।

राज्य जल योजना : विविध जल उपयोगों के बीच समुचित समन्वय स्थापित करते हुए सन्तुलित विकास को बढ़ावा देने के लिये सरकार विभिन्न नदी बेसिनों अभिकरणों द्वारा विकसित जल संसाधन विकास तथा प्रबंधन योजनाओं के आधार पर राज्य जल संसाधन योजना तैयार करेगी।

अन्तरराज्यीय जल भागीदारी : सभी अन्तरराज्यीय जल भागीदारी समझौते के प्रदर्शन का मूल्यांकन होगा ताकि राज्य के हित संरक्षण के लिये जरूरी कदम उठाए जा सकें।

राज्य के जल संसाधन : राज्य के अंतर्गत सतह या उपसतह पर उपलब्ध कुल जल अथवा राज्य से गुजरने वाले सभी नालों तथा राज्य के भीतर के जलस्रोत राज्य के जल संसाधन के रूप में परिभाषित होंगे। अनुमानित जल संसाधन की औसत वार्षिक उपलब्धता सतह जल 27.726 किलोमीटर तथा उपसतह के 5,251 किमी में विद्यमान है। इस औसत वार्षिक उपलब्धता का 50 प्रतिशत से अधिक राज्य के 16 नदी बेसिनों में से पाँच प्रमुख नदी बेसिनों (स्वर्णरेखा, दामोदर, बराकर, उत्तरी कोयल, गुमानी व दक्षिणी कोयल) में पाया जाता है।

कृषि योग्य भूमि के लिये सिंचाई : दस वर्ष के भीतर राज्य के प्रत्येक कृषि योग्य भूखंड में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने के लिये प्रत्येक नदी बेसिन में एग्रो क्लाइमेटिक जोन के आधार पर चरणबद्ध ढंग से एक योजना अपनाई जाएगी। इस योजना का प्रारम्भिक कार्य राज्य में उपलब्ध सभी कृषि योग्य भूखंड तथा सिंचाई संसाधन-परियोजना का कम्प्यूटरीकृत डेटा बेस तैयार करना होगा।

सिंचाई पद्धति के लिये कृषक प्रबंधन : सिंचाई प्रबंधन में जल उपभोक्ता संघ के माध्यम से कृषकों की भागीदारी को अनिवार्य किया जाएगा। महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। लघु सिंचाई के लिये पारम्परिक जलस्रोतों के प्रबंधन एवं संवर्धन का कार्य पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से किया जाएगा।

घरेलू उपयोग के लिये जल : घरेलू उपयोग के लिये शहरी तथा ग्रामीण दोनों क्षेत्रों की सम्पूर्ण आबादी को पर्याप्त मात्रा में जल सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। किसी उपलब्ध जल संसाधन की पहली प्राथमिकता पर्यावरण विज्ञान एवं मानव और पशुओं के लिये पेयजल की आवश्यकता होगी। नहर तथा नदी जल को बर्बादी से बचाने के लिये यथासम्भव जलाशयों से पेयजलापूर्ति प्राप्त करने के लिये पाइपलाइन बिछाई जाएगी।

विशेष योजना : शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में आबादी बढ़ने के कारण पेयजल की माँग में वृद्धि हुई है। 1991-2001 तथा 2001-2011 दशक के दौरान राज्य की जनसंख्या दशकीय वृद्धि का क्रमशः 24.55 व 22.34 प्रतिशत पहुँच गया है। राज्य में स्वच्छ पेयजल की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिये गाद की सफाई तथा अन्य तकनीकी उपायों को अपनाकर पेयजलापूर्ति वाले विद्यमान जलाशयों की क्षमता में टिकाऊ वृद्धि के लिये एक समयबद्ध कार्ययोजना तैयार की जायेगी। अल्प उपायों के तहत पेयजलापूर्ति पाइपलाइनों में रिसाव को रोकना शामिल है, जबकि दीर्घकालिक उपायों के तहत अन्य उपाय तलाशे जाएँगे।

औद्योगिक उपयोग के लिये जल : प्राथमिकता के अधीन रखे गए क्षेत्रों की आवश्यकता की पूर्ति के बाद नदी बेसिन में उपलब्ध जल उद्योगों को आवंटित किया जाएगा। प्रदूषण फैलाने वाले सभी उद्योगों को वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाना होगा। उपचारित बेकार जल के पुनःचक्रण या पुनरुपयोग को बढ़ावा दिया जाएगा।

निजी क्षेत्र की भागीदारी : राज्य के प्रत्येक नदी बेसिन में निजी उद्योगपतियों, व्यावसायिक उद्यम तथा जल सेवा प्रदाताओं की सम्पूर्ण एवं प्रभावी भागीदारी अपेक्षित होगी।

जल की गुणवत्ता : राज्य के सतह जल एवं उपसतह जल में प्रदूषित बहिःस्राव के नियंत्रण के लिये जल अधिनियम के अधीन राज्य सरकार किसी प्राधिकृत एजेन्सी द्वारा एक कार्यक्रम चलाया जाएगा। राज्य के जल संसाधन में प्रदूषण फैलाने वालों, प्रदूषण में सहायक या प्रदूषण को उकसाने वालों को राज्य की विधि एवं विनियम के उपबन्ध के अनुसार सुसंगत राज्य अभिकरण द्वारा दंडित किया जाएगा।

सूखा प्रबंधन : राज्य के सर्वाधिक सूखाग्रस्त क्षेत्रों में सूखे की स्थिति का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने के लिये सूखा पूर्वानुमान तथा मूल्यांकन के लिये एक व्यवस्थित दृष्टिकोण अपनाया जाएगा। उपलब्धता में कमी के दौरान जल प्रयोक्ताओं के विविध क्षेत्रों के बीच बराबर की हिस्सेदारी होगी, चाहे वह ऊँचाई वाले क्षेत्र में हो या नीचे वाले क्षेत्र में। जल संसाधन विकास कार्यों में सूखे से बचाव के उपायों को प्राथमिकता दी जाएगी।

 

और कितना वक्त चाहिए झारखंड को

(इस पुस्तक के अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिये कृपया आलेख के लिंक पर क्लिक करें।)

जल, जंगल व जमीन

1

कब पानीदार होंगे हम

2

राज्य में भूमिगत जल नहीं है पर्याप्त

3

सिर्फ चिन्ता जताने से कुछ नहीं होगा

4

जल संसाधनों की रक्षा अभी नहीं तो कभी नहीं

5

राज व समाज मिलकर करें प्रयास

6

बूँद-बूँद को अमृत समझना होगा

7

जल त्रासदी की ओर बढ़ता झारखंड

8

चाहिए समावेशी जल नीति

9

बूँद-बूँद सहेजने की जरूरत

10

पानी बचाइये तो जीवन बचेगा

11

जंगल नहीं तो जल नहीं

12

झारखंड की गंगोत्री : मृत्युशैय्या पर जीवन रेखा

13

न प्रकृति राग छेड़ती है, न मोर नाचता है

14

बहुत चलाई तुमने आरी और कुल्हाड़ी

15

हम न बच पाएँगे जंगल बिन

16

खुशहाली के लिये राज्य को चाहिए स्पष्ट वन नीति

17

कहाँ गईं सारंडा कि तितलियाँ…

18

ऐतिहासिक अन्याय झेला है वनवासियों ने

19

बेजुबान की कौन सुनेगा

20

जंगल से जुड़ा है अस्तित्व का मामला

21

जंगल बचा लें

22

...क्यों कुचला हाथी ने हमें

23

जंगल बचेगा तो आदिवासी बचेगा

24

करना होगा जंगल का सम्मान

25

सारंडा जहाँ कायम है जंगल राज

26

वनौषधि को औषधि की जरूरत

27

वनाधिकार कानून के बाद भी बेदखलीकरण क्यों

28

अंग्रेजों से अधिक अपनों ने की बंदरबाँट

29

विकास की सच्चाई से भाग नहीं सकते

30

एसपीटी ने बचाया आदिवासियों को

31

विकसित करनी होगी न्याय की जमीन

32

पुनर्वास नीति में खामियाँ ही खामियाँ

33

झारखंड का नहीं कोई पहरेदार

खनन : वरदान या अभिशाप

34

कुंती के बहाने विकास की माइनिंग

35

सामूहिक निर्णय से पहुँचेंगे तरक्की के शिखर पर

36

विकास के दावों पर खनन की धूल

37

वैश्विक खनन मसौदा व झारखंडी हंड़ियाबाजी

38

खनन क्षेत्र में आदिवासियों की जिंदगी, गुलामों से भी बदतर

39

लोगों को विश्वास में लें तो नहीं होगा विरोध

40

पत्थर दिल क्यों सुनेंगे पत्थरों का दर्द

 

 

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